लेखक परिचय

सुरेश हिन्‍दुस्‍थानी

सुरेश हिन्‍दुस्‍थानी

स्वतंत्र वेब लेखक व ब्लॉगर

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सुरेश हिन्दुस्थानी

भारत में लम्बे समय से यह देखा जा रहा था कि सत्ताधारी राजनीतिक दल अपने विरोधियों को ठिकाने लगे के लिए साम, दाम, दण्ड व भेद की कूटनातिक चालों को अंजाम देते रहे हैं। सरकारें अगर देश के कानून को अपने हिसाब से उपयोग करें तो उस देश भविष्य सुखमय नहीं कहा जा सकता। इसके बाद भी सरकारों ने कानून का अपने तरीके दुरुपयोग किया। कई बार देखा गया है कि राजनीतिक सत्ता का संचालन करने वाले लोगों के गलत काम का कोई अधिकारी कानून के दायरे में काम करता है तो उस अधिकारी को उसका अंजाम भुगतना ही पड़ता है। इस प्रकार कानून के दुरुपयोग किए जाने पर हम कह सकते हैं कि हमारा देश केवल और केवल राजनीतिक सत्ता जैसा चाहती हैं, उसी प्रकार से चलाती हैं।

देश में कांगे्रस की सरकारों के समय जिस प्रकार से भगवा आतंकवाद का भय दिखाकर देश में हिन्दू आस्था पर प्रहार किया गया था, उससे निश्चित ही देश का मूल स्वरुप को बिखराने का प्रयास किया गया। कांगे्रस सहित कई राजनीतिक दलों ने ऐसे प्रयासों की आग में घी डालने का काम किया। लेकिन जिस प्रकार से सोना आग में तपकर कुंदन बन जाता है, उसी प्रकार से सत्य पर कितने भी प्रहार किए जाएं, वह हर कसौटी पर खरा ही उतरेगा। समय भले ही कितना भी लग जाए, लेकिन झूंठ एक दिन सबके सामने आता है। भगवा शब्द के बारे में पूर्व की सरकारों ने जितना कुप्रचार किया, वह हम सभी जानते हैं। कांगे्रस के कई नेताओं ने तो यहां तक कह दिया कि देश के लिए हिन्दू बहुत खतरनाक हैं। उन नेताओं को संभवत: यह नहीं मालूम कि देश का हिन्दू इतना सहनशील है कि उनके हर बयान को हमेशा सहन करते रहे। अगर हिन्दू वास्तव में ही खतरनाक होता तो क्या वे कांगे्रसी और अन्य दलों के नेता इस प्रकार की भाषा बोल सकते थे। धर्मनिरपेक्षता के नाम पर हिन्दुओं पर किया गया कुठाराघात ही उसकी मानसिकता को बताने के लिए काफी है। कौन नहीं जानता कि हिन्दुओं के आराध्य भगवान राम को कांगे्रस ने काल्पनिक पात्र बता दिया था। अमेरिका को लाभ पहुंचाने के लिए श्रीरामसेतु को तोडऩे का पूरा प्रयास किया गया, लेकिन समाज के जबरदस्त विरोध के चलते उनको अपने कदम पीछे खींचने पड़े। अगर उस समय की केन्द्र सरकार का यह प्रयास सफल हो जाता तो संभवत: देश से भगवान श्रीराम के मंदिर और श्रीरामसेतु आज समाप्त हो जाते।

राजनीतिक सत्ता ने देश के कानून का दुरुपयोग किया, यह बात साध्वी प्रज्ञा सिंह के बरी हो जाने के बाद साफ हो जाती है। साध्वी प्रज्ञा सिंह को अपराध साबित नहीं होने के बाद भी अपराधी की तरह से प्रताडऩा दी गईं। यह कानून का मजाक ही तो कहा जाएगा। यह पूरा भारत देश जानता है कि भगवा रंग जिसने भी पूरे सम्मान और मर्यादा के साथ पहन लिया, वह कभी देश विरोधी या समाज विरोधी हो ही नहीं सकता। लेकिन यह भी सत्य है कि त्याग और शौर्य का प्रतीक भगवा वस्त्र को धारण करने वाला तपस्वी व्यक्ति किसी भी प्रकार के बलत काम को सहन नहीं कर सकता। भगवा रंग पहनने वालों से हमेशा ही देश विरोधियों को भय बना रहता है। भगवा रंग पर आरोप लगाने वाले व्यक्तियों को सबसे पहले इस बात का अध्ययन करना चाहिए कि भगवा रंग का परिधान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ या अन्य किसी भी संगठन की देन नहीं है, वह तो पुरातन काल से चली आ रही भारत की एक परंपरा है। और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भारत की इस परंपरा को बचाने के लिए वही काम कर रहा है, जो भारत में साधु संत करते आए हैं। अपनी संस्कृति को बचाने के लिए किए गए प्रयास समस्त समाज के लिए लाभकारी ही होते हैं। देश के सभी हिन्दुओं को मुसलमान समाज से इस बात की प्रेरणा लेना चाहिए कि वह अपने रंग और धर्म के प्रति किस प्रकार समर्पण रखता है। अपने धर्म की रक्षा के लिए वह देश के संविधान तक को ताक पर रख देता है। लेकिन अपने धर्म को बचाने के लिए जान देने के लिए तैयार रहता है।

भारत में राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने जिस प्रकार से संदेह के आधार पर साध्वी प्रज्ञा सिंह को गिरफ्तार किया, वह तो कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा माना जा सकता है, लेकिन साध्वी प्रज्ञा सिंह को जिस प्रकार से मानसिक प्रताडऩा दी गई, वह घोर निन्दनीय ही कहा जाएगा। विगत आठ वर्षों में साध्वी प्रज्ञा सिंह के विरोध में राष्ट्रीय जांच एजेंसी को एक भी ऐसा प्रमाण नहीं मिला, जिससे वह अपराधी की श्रेणी में आए। इसके बाद भी सुनने में यह आया कि साध्वी प्रज्ञा के साथ अमानुषिक अत्याचार किए गए। उसे नंगी फिल्मों से साक्षात्कार कराया गया, यहां तक कि उसे जबरदस्ती मांस खिलाने का प्रयास किया गया। यहां पर सबसे बड़ा सवाल यह आता है कि जिस प्रकार से देश में आतंकवादियों के पक्ष में मानवाधिकार संगठन आवाज उठाते हैं, उस प्रकार से साध्वी प्रज्ञा सिंह के लिए आवाज क्यों नहीं उठाई गईं। इस देश में आतंकवादियों के मानवाधिकार हो सकते हैं, लेकिन एक निर्दोष के लिए इस अधिकार की भी मान्यता नहीं दी जाती। कानून की यही विसंगति कहीं न कहीं देश के साथ क्रूरतम खिलवाड़ है।

मालेगांव की आतंकी घटना के लिए देश में संदेह के आधार पर मुसलमानों को भी पकड़ा गया। लेकिन मुसलमानों को इस आधार पर जमानत मिल गई कि सरकार द्वारा प्रायोजित कार्यवाही के बाद इस घटना में केवल और हिन्दू को ही आतंकवादी के रूप में दिखाना था। हम जानते हैं कि अभिनेता संजय दत्त को आतंकवादियों के सहयोगी के रूप में गिरफ्तार करने के बाद भी पैरोल पर छोड दिया जाता है। न्यायालय से सजा पाने के बाद राजनेता लालू प्रसाद यादव जेल से बाहर आदर्शवाद का ढिंढोरा पीटते हैं। लेकिन साध्वी प्रज्ञा सिंह को जमानत भी नहीं मिल पाती। क्या यह इस बात को प्रमाणित नहीं करता कि सबके लिए कानून का उपयोग अलग अलग तरीके से किया जाता है। साध्वी प्रज्ञा सिंह पर मामला इसलिए चलाया गया, क्योंकि कांगे्रस की सरकार को लगता था कि इससे मुसलमान खुश हो जाएंगे। अगर यह सही है तो एक हिन्दू साध्वी को इस आधार पर प्रताडऩा देना किसी अपराध से कम नहीं है। हद तो तब हो गई, तब यह साबित होने लगा कि साध्वर प्रज्ञा मालेगांव हिंसा के मामले में दोषी नहीं हैं, तब उन पर नया मामला चलाने के लिए भी शासन और प्रशासन स्तर पर कार्यवाही की गई। और फिर सुनील जोशी की हत्या मामले में प्रज्ञा को फंसाने का प्रयास किया गया। कुल मिलाकर साध्वी प्रज्ञा सिंह बहुत बड़ी राजनीतिक साजिश क शिकार हुई।

मालेगांव विस्फोट मामले में शक के आधार पर की गई साध्वी प्रज्ञा सिंह की गिरफ्तारी हमारे प्रशासन तंत्र पर भी बहुत बड़ा सवाल उठाती है। सारे संसाधनों से भरपूर होने के बाद भी हमारे प्रशासन के सामने आज भी यह सवाल है कि वह मूल अपराधियों को क्यों नहीं पकड़ पाती। भारत में जितनी भी आतंकवादी घटनाएं होतीं थीं, उन सभी में हमेशा कोई न कोई मुसलमान ही पकड़ा जाता था। उस समय की कांगे्रस सरकार ने अपनी तुष्टीकरण की राजनीति के चलते आतंकवाद के लिए हिन्दुओं को निशाना बनाने की सोची और एक साजिश के तहत साध्वी प्रज्ञा को गिरफ्तार कर लिया। इतना ही नहीं उसके बाद भगवा आतंकवाद के नाम पर देश के हिन्दुओं में भय पैदा करने की राजनीतिक साजिश की गई। फिर शुरु हुआ साध्वी प्रज्ञा पर यातनाओं का दौर। निर्दोष होने के बाद भी साध्वी ने सात साल सजा भुगती। अब सवाल यह है कि जब साध्वी प्रज्ञा निर्दोष थीं तो उनको जिसने भी फंसाया, उन्हें क्या इस फंसाने की सजा मिल पाएगी। कहा जाता है कि कानून सबके लिए समान है तो उनके खिलाफ भ्ज्ञी कार्यवाही होना चाहिए, जिन्होंने कानून को खिलौना बनाकर उसका दुरुपयोग किया। अगर ऐसा होगा तो भविष्य में कानून के साथ कोई खिलवाड़ करने की हिम्मत नहीं कर सकेगा।

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1 Comment on "आखिर कब तक होगा कानून का दुरुपयोग"

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Brijesh gupta
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Ye sab dekh kar bhi Hinduo ki aankhe nhi khul rahi h..Sahanshil nahi murkh ho gye h hindu

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