लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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udta punjabप्रमोद भार्गव
आखिरकार बंबई उच्च न्यायालय ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए प्रसार से पहले ही विवाद में उलझकर बहुचर्चित हो चुकी फिल्म ‘उड़ता पंजाब‘ के प्रसार का रास्ता खोल दिया है। 89 की जगह अब फिल्म से केवल एक ‘पेशाब‘ करने वाला दृश्य हटा दिया जाएगा। फैसले में न्यायमूर्ति एससी धर्माधिकारी और न्यायमूर्ति शालिनी कनसालकर जोशी की खंडपीठ ने केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड को निर्देशित किया है कि नशे पर आधारित इस फिल्म को 48 घंटे के अंदर प्रसार का प्रमाण-पत्र दें, जिससे 17 जून को फिल्म पर्दे पर रिलीज हो सके। साथ ही बोर्ड को नसीहत देते हुए कहा है कि उसे ‘दादी मां‘ की तरह काम नहीं करना चाहिए। मसलन बदलते समय के अनुसार सोच में परिवर्तन की जरूरत पर जोर देना चाहिए। अदालत ने सीबीएफसी को अपनी शक्तियों के दायरे में रहने की हिदायत तो दी ही, भविष्य में किसी भी फिल्म को निर्माताओं की रचनात्मक पृष्ठभूमि में कहानी गढ़ने की स्वतंत्रता देने की बात भी कही। इस दृष्टि से यह फैसला अनूठा है। यह सही भी है कि हमारी नियंत्रक संस्थाओं में बैठे लोग चीजों को व्यक्तिगत या राजनीतिक नजरिए से देखते हुए नवाचारियों की मूल मंशा से खिलवाड़ का काम करने लग जाते हैं। शायद इसीलिए बोर्ड के अध्यक्ष पहलाज निहलानी पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का चमचा होने तक के आरोप लगे हैं। दरअसल 2017 की शुरूआत में ही पंजाब में विधानसभा चुनाव हैं और वहां अकाली दल व भाजपा गठबंधन की सरकार है, ऐसे में पंजाब में फैले नशे के कारोबार और उससे बर्बाद हो रही पीढ़ियों का यथार्थ पर्दे पर प्रगट होता है तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर सरकार कर क्या रही है ?
दरअसल हमारे यहां शासन-प्रशासन की ढिलाई से विकराल हो रही समस्याओं पर यथार्थ फिल्म बनाना मुश्किल है। यही मुश्किल उड़ता पंजाब के परिप्रेक्ष्य में पेश आई है। यदि कोई संवेदनशील निर्माता-निर्देशक महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश में आत्महत्या कर रहे किसानों पर फिल्म बनाए तो उसे राजनीति का शिकार होना ही पड़ेगा। ऐसी की कठिनाई छात्रों की आत्महत्या और शिक्षा व कोचिंग माफिया पर फिल्म बनाने में पेश आ सकती है। इस लिहाज से उड़ता पंजाब के फिल्म के निर्माता अनुराग कश्यप और निर्देशक अभिषेक चैबे की पीठ थपथपानी होगी कि उन्होंने एक ऐसे विषय पर फिल्म बनाई, जिसमें जोखिम की आशंकाएं थीं। यदि पंजाब में चुनाव सिर पर नहीं होते तो शायद फिल्म पर इतना बवाल नहीं मचता और न ही बोर्ड को 89 दृश्य काटने का फरमान सुनाने की जरूरत पड़ती। दो-ढाई घंटे की एक फिल्म में 100 से 110 दृश्य होते हैं। ऐसे में यदि 89 दृश्य काट दिए जाएं तो फिल्म में बचेगा ही क्या ? इस फिल्म के निर्माण को लेकर ऐसी अफवाह भी है कि फिल्म में आम आदमी पार्टी से आर्थिक मदद ली गई है। इसलिए फिल्म में नशे से बर्बाद हो रहे पंजाब को बढ़-चढ़ कर दिखाया गया है। मसलन हकीकत से कहीं ज्यादा अतिरंजित दृश्य दिखाए गए हैं। सरकार की शासन-प्रशासन के स्तर पर शिथिलता और समस्या से दूरी बनाए रखने जैसे सवाल भी उठाए गए हैं। स्वाभाविक है, ऐसे प्रष्न खड़े किए जाएंगे तो पंजाब में सत्तारूढ़ अकाली दल और भाजपा को नुकसान उठाना पड़ सकता है ? इन्हीं सियासी दांवपेंचों की कष्मकष के चलते फिल्म को सेंसर बोर्ड के दफ्तर से लेकर अदालत के दरवाजे पर दस्तक देनी पड़ी।
गर्म लोहे पर चोट करने का मौका न चूक जाएं इस मकसद से अब कांग्रेस भी विवाद का एक पक्ष बन गई है। कांग्रेस फिल्म के सीधे-सीधे समर्थन में तो नहीं आई, किंतु उसने पंजाब की बिगड़ती कानून व्यवस्था और नशे के फैलते कारोबार पर धरना-प्रदर्षन करते हुए राज्य सरकार में सत्तारूढ़ नेताओं को कठघरे में खड़ा जरूर कर दिया है। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने विवाद की आग में घी डालते हुए कहा कि ‘सत्तारूढ़ नेताओं के इस कारोबार में शामिल होने से पंजाब बर्बाद हो चुका है। पंजाब की युवा पीढ़ी ही नशे की चपेट में नहीं है, बल्कि पूरा प्रदेश नशे की गर्त में समा रहा है। इस नशे से मुक्ति के लिए कांग्रेस को 2017 के पंजाब विधानसभा चुनाव में जिताने की जरूरत है। यदि कांग्रेस सत्ता में आती है तो वह न सिर्फ नशे के कारोबार पर रोक लगाएगी, बल्कि ऐसा कानून भी लाएगी, जिससे इस नशे के अवैध कारोबारियों से धन की वसूली हो सके।‘
यहां सवाल उठता है कि अब से करीब 14 साल पहले कांग्रेस की ही पंजाब में सरकार थी और अमरिंदर सिंह मुख्यमंत्री थे। कांग्रेस के इसी पांच साल के कार्यकाल में पंजाब में नशे के अवैध कारोबार ने जड़ें जमाईं, लेकिन सरकार ने समस्या के पैदा होते ही इसे नेस्तनाबूद करने की कोशिश नहीं की ? दरअसल पंजाब में सत्तारूढ़ कोई भी दल रहा हो, हमारी राजनीति की यह कमजोरी रही है कि वह अव्वल तो वह अवैध कारोबार को पोशित करती है और जब कोई समस्या विद्रूप व विकराल रूप धारण कर लेती है तो उसे ढंकने की कोशिषें तेज हो जाती हैं। पंजाब में नशा, सरंक्षण के कुछ ऐसे ही उपायों के चलते फला-फूला और हरित क्रांति से लहलहाए पंजाब में नशा आम-फहम हो गया। इस फिल्म में कमोबेष इसी सच्चाई को आइने में लाने की कोशिश हुई है।
2009 में राज्य सरकार ने चंडीगढ़ उच्च न्यायालय को एक जनहित याचिका के संदर्भ में पूछे गए सवाल का जबाव देते हुए कहा था, पंजाब में 67 फीसदी युवा नशे के आदी हैं। सरकार ने इतनी बड़ी सच्चाई को स्वीकार तो किया, लेकिन उस पर लगाम के कारगर उपाय नहीं किए। कालांतर में जो परिणाम सामने आए, वे और भयावह होते चले गए। वर्तमान में पंजाब में 8.6 लाख युवा कोई न कोई नशा करते हैं। इनमें से 2.3 लाख नशे के ऐसे लती हो चुके हैं, जिन्हें लत से मुक्त कराना मुश्किल हो रहा है। इनमें भी 89 फीसदी युवा पढ़े-लिखे हैं। मसलन वे भली-भांति जानते हैं कि नशा कितना घातक है। पंजाब में हालात इतने बद्तर हैं कि महिलाएं भी खूब नशा करने लगी हैं। लोग नपुंसक हो रहे हैं। ये हालात घरों को उजाड़ने का काम कर रहे हैं। यही नहीं वृद्धों को अपने ही जवान बेटों की अर्थी को कंधा देने की जरूरत पड़ने लगी है।
2013 में ड्रग्स रैकेट का पर्दाफष होने के बाद पूर्व एशियाड खिलाड़ी और अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित जगदीश भोला भी नशीलें पदार्थों के लेन-देन में हिरासत में लिए गए थे। भोला ने सत्तारूढ़ दल के कई मंत्रियों पर नशे के कारोबार से जुड़े होने के गंभीर आरोप भी लगाए थे। नतीजतन तत्कालीन जेल मंत्री सरवण सिंह फिल्लौर को इस्तीफा तक देना पड़ा था। यहीं नहीं अकाली नेता और पुलिस के आला आधिकारियों के तार भी नशे के तस्करों से जुड़े पाए गए हैं। पंजाब के ही जूडो खिलाड़ी जगजीत सिंह भी ड्रग एडिक्ट हो चुके हैं।
हालांकि पिछले कुछ साल से पंजाब सरकार इस कारोबार के मुष्कें कसने के लिए सर्तक हुई है। 5 साल के भीतर 6000 करोड़ के मादक पदार्थ जब्त किए हैं। 388 तस्करों की 80 करोड़ की अचल संपत्ति भी जब्त की है। मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने नशा छुड़ाओं मुक्ति केंद्र खोले हैं। इन केंद्रों के संचालन के लिए 180 करोड़ रुपए भी दिए हैं। सरकार द्वारा किए गए ये ऐसे तथ्य है, जो पंजाब में नशे की भयावहता को उजागार करती हैं। उड़ता पंजाब में इन्हीं तथ्यों से कथानक का ताना-बाना बुना गया है। इसलिए इस हकीकत को नकारना मुश्किल है कि फिल्म पंजाब को बदनाम करने के लिहाज से बनाई गई है। वैसे यह सच्चाई किसी से छिपी नहीं है कि दुनिया में सबसे ज्यादा 90 फीसदी अफीम की खेती अफगानिस्तान में होती है। यही अफीम बारास्ता पाकिस्तान, तस्करी के जरिए पंजाब आती है। यहां जबरदस्त मांग होने के कारण यह कारोबार 7500 करोड़ रुपए प्रति वर्ष का हो गया है।
पंजाब की हकीकत को फिल्म में कलात्मक रूप में रूपांतरित करने की वजह से ही न्यायालय ने दो टूक कहा है कि इसमें भारतीय संप्रभुता व अखंडता पर कोई सवाल नहीं उठाया गया है और न ही नशे का महिमामंडन किया है। साफ है फिल्म को संपूर्णता में संकीर्ण सोच से ऊपर उठकर देखना होगा। साथ ही चरित्रों दृष्यों और गानों को अलग-अलग दृष्टिकोण से देखने और संदर्भ से इतर अर्थ खोजने की भी जरूरत नहीं है। दरअसल कोई भी रचनाधर्मी कथानक की पृष्ठभूमि के अनुरूप कहानी को गढ़ता है, भव्य दृश्य रचता है, समस्या को उभारता है और संभव हुआ तो समाधान भी देता है। कहानी रचने की यही शिल्प दरअसल स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति अथवा रचनात्मक स्वतंत्रता है। फिर भी फिल्म से शाहिद कपूर का भीड़ के सामने पेशाब करने का दृश्य काटने का आदेश दिया गया है। शायद ऐसा इसलिए किया गया है कि षभ्य भारतीय समाज में ऐसे अमर्यादित दृश्य एक तो संभव नहीं हैं, दूसरे अपरोक्ष रूप से यह दृश्य प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वच्छता अभियान को ठेंगा दिखाता है। इसलिए इसका काटा जाना जरूरी था।

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