लेखक परिचय

निर्मल रानी

निर्मल रानी

अंबाला की रहनेवाली निर्मल रानी कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से पोस्ट ग्रेजुएट हैं, पिछले पंद्रह सालों से विभिन्न अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं में स्वतंत्र पत्रकार एवं टिप्पणीकार के तौर पर लेखन कर रही हैं...

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janakpur
निर्मल रानी
पिछले दिनों अपने दरभंगा (बिहार)प्रवास के दौरान भारत-नेपाल के सीमावर्ती मिथिलांचल परिक्षेत्र के अंतर्गत पडऩे वाले नेपाल के जनकपुर शहर में भ्रमण करने का अवसर मिला। वैसे तो हमारे देश के भी कई नगर व कस्बे ऐसे हैं जो प्रशासनिक दुव्र्यवस्था का शिकार हैं। परंतु नेपाल के जनकपुर जैसे प्रसिद्ध शहर की हालत देखकर तो ऐसा प्रतीत हुआ गोया प्रशासनिक दुव्र्यवस्था की इंतेहा शायद जनकपुर में ही आकर समाप्त होती है। भारत-नेपाल सीमा पर भारत की ओर से पडऩे वाले अंतिम रेलवे स्टेशन जयनगर से उतरकर सड़क मार्ग से जब आप नेपाल की ओर मिनी बस अथवा टैक्सी के माध्यम से अपनी यात्रा शुरु करेंगे उसी समय सड़कों की दुर्दशा देखकर आपको यह एहसास होना शुरु हो जाएगा कि आप किसी ऐसी मंजि़ल की ओर बढ़ रहे हैं जहां परेशानियां तथा दुव्र्यवस्था आपका स्वागत करने ही वाली हैं। जयनगर से लगभग 40 किलोमीटर की दूरी पर भारत-नेपाल सीमा स्थित है जिसे जटही के नाम से जाना जाता है। विश्वास कीजिए कि जयनगर से जटही तक का यह छोटा सा सफर भी दो बसें बदलने के बाद लगभग तीन घंटे में पूरा होता है। और जटही सीमा पार करने के बाद तो परेशानियों का पहाड़ गोया आपके सामने खड़ा नज़र आएगा।
जनकपुर के अंतर्गत पडऩे वाले नेपाली क्षेत्र में जो स्थानीय नेपाली बसें जटही से जनकपुर ले जाती हैं उनकी हालत ऐसी है जिन्हें शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता। संक्षेप में यूं समझिए कि बस में लगी प्रत्येक सीट ऐसी है जिससे निकली हुई कोई भी लोहे की नोक अथवा कील आपको किसी भी समय घायल कर सकती है। इसके अतिरिक्त सड़कों का तो यह आलम है कि लगता है जटही-जनकपुर मार्ग शायद धरती की उत्पत्ति से लेकर आज तक कभी बना ही नहीं। गोया बजरी,डामर आदि तो कहीं दिखाई ही नहीं देते। केवल मिट्टी के ढेरों पर बसें अथवा अन्य वाहन जैसे-तैसे अपना सफर पूरा करते हैं। और सोने पर सुहागा तो उस समय हो जाता है जबकि इन्हीं रास्तों पर बारिश के बाद दलदल और गड्ढे हो जाते है और किसी न किसी वाहन का पहिया इस दलदलमें फंस जाता है और यात्रीगण असहाय होकर एक-दूसरे का मुंह देखते रह जाते हैं। जब बस की दयनीय हालत के विषय में बस परिचालक से बात की तो पता चला कि भारत-नेपाल सीमावर्ती इस रूट पर आमतौर पर वही बसें चलाई जाती हैं जो लंबे रूट पर चलने के बाद कबाड़ हो जाती हैं। उन्हीं की मरहम पट्टी कर इस रूट पर चलाया जाता है। जब बस परिचालक को यह कहा गया कि हम पत्रकार हैं और तुम्हारी बस की दुर्दशा का वर्णन अखबारों में ज़रूर करेंगे इस पर वह भी खुश होकर बोला कि आप इस विषय में ज़रूर लिखिएगा ताकि हमारे साथ-साथ यात्रियों को भी इन परेशानियों से निजात मिल सके।
ऐसा नहीं है कि केवल भारत-नेपाल सीमावर्ती मार्ग जटही से लेकर जनकपुर तक ही खराब था। बल्कि जनकपुर शहर के भीतर की सड़कें भी चारों ओर से गड्ढों में डूबी दिखाई दे रही थीं। निश्चित रूप से शहर के बाज़ार काफी विस्तृत एवं विशाल थे। परंतु गड्ढेदार सड़क और उन गड्ढों में भरा हुआ बरसात का पानी बाज़ार की संभावित रौनक़ को और भी चौपट कर रहा था। बहरहाल जनकपुर पहुंचकर किसी भी यात्री का शरीर निश्चित रूप से ऐसा हो जाता है गोया उसने अपनी कई दिनों की कष्टदायक यात्रा पूरी की हो। और उसका शरीर आराम करने के सिवा और कुछ भी गवारा नहीं करता। इसी विश्राम की गरज़ से हम जनकपुर के एक होटल में कमरा लेने पहुंचे। दोपहर के लगभग दो बजे का समय था और भीषण गर्मी पड़ रही थी और होटल के रिसेप्शन कक्ष में पंखा तक नहीं चल रहा था। होटल में कमरा लेने से पूर्व जब होटल मैनेजर से पंखा चलाने का निवेदन किया तो उसने दो टूक शब्दों में यह जवाब दिया कि सर, पंखा रात 8 बजे से लेकर सुबह 6 बजे तक ही चलेगा। ऐसा क्यों?यह पूछने पर उसने बताया कि होटल प्रबंधन रात 8 बजे से सुबह 6 बजे तक के लिए ही अपनी जनरेटर सेवा उपलब्ध कराता है। फिर प्रात: 6 से रात 8 बजे तक बिजली की आपूर्ति की क्या व्यवस्था है? इस पर होटल मैनेजर ने बताया कि कोई व्यवस्था नहीं है। बिजली कटौती अथवा आपूर्ति का कोई निर्धारित समय नहीं है। नेपाल का विद्युत विभाग जब चाहे और जितनी देर के लिए चाहे बिजली दे देता है और जब चाहे विद्युत आपूर्ति बंद कर देता है। इसलिए हम अपने ग्राहकों को केवल रात की बिजली आपूर्ति का भरोसा अपने जनरेटर के बल पर ही देते हैं। इतनी गर्मी में होटल प्रबंधन द्वारा विद्युत आपूर्ति के बारे में इतनी खरी व कोरी बात करने के बावजूद हमें होटल में कमरा लेने के लिए मजबूर होना पड़ा। परंतु यह हमारा सौभाग्य समझें या इत्तेफाक कि अपने कमरे में पहुंचते ही विद्युत आपूर्ति भी शुरु हो गई जो निर्बाध रूप से अगले दिन सुबह तक चलती रही।
नेपाल में भारतीय मुद्रा की कीमत नेपाली मुद्रा के मूल्य से काफी अधिक है। यहां के सौ रुपये के बदले नेपाल के 160 रुपये मिलते हैं। नेपाली मुद्रा को भारू तथा मोरू के नाम से पुकारते हैं। किसी समय में नेपाली मुद्रा पर नेपाली राजघराने के शासक का चित्र दिखाई देता था जो अब नदारद हो चुका है। जनकपुर में चारों ओर लंबे-लंबे बाज़ार व दुकानें तो ज़रूर दिखाई देती हैं परंतु उनमें ग्राहकों का आना-जाना कम ही नज़र आता है। सड़कों पर स्ट्रीट लाईट नाम की कोई चीज़ दिखाई नहीं देती। हां शराब की बोतलें अधिकांश दुकानों पर बिकती नज़र आ जाएंगी। क्योंकि वहां शराब की नीलामी अथवा ठेकेदारी जैसी कोई व्यवस्था अथवा बंदिश नहीं है। कोई भी दुकानदार अपनी दुकान पर शराब की बोतलें रखकर उसकी बिक्री कर सकता है। एक प्राचीन एवं पौराणिक शहर होने के नाते जनकपुर शहर व उसके आसपास कई तीर्थस्थान भी हैं। जैसे वे स्थान जहां सीता स्वयंवर हुआ था। बताया जाता है कि आज भी भगवान राम द्वारा तोड़े गए विशाल धनुष का एक टुकड़ा उस स्थान पर मौजूद है। उस स्थान को धनुषा के नाम से जाना जाता है। जनकपुर में वह स्थान भी है जहां राम-सीता विवाह संपन्न हुआ था। परंतु शहर का सबसे विशाल एवं आकर्षक मंदिर जानकी मंदिर है। जिसका भव्य एवं आकर्षक विशाल भवन स्थानीय जनकपुरवासियों से लेकर बाहर से आने वाले पर्यट्कों तक को सबसे पहले अपनी ओर आकर्षित करता है। इस विशाल मंदिर में भी राम-जानकी विवाह मंडप नामक एक प्राचीन भवन है। इस भवन के भीतर प्रवेश करने का तथा इसमें फोटो आदि खींचने का अलग शुल्क देना पड़ता है। यह कहने में कोई हर्ज नहीं कि यदि जानकी मंदिर को जनकपुर से अलग कर दिया जाए तो जनकपुर शहर जाने का संभवत: कोइ बाहरी व्यक्ति कभी नाम भी न ले।
एक शिक्षित से नज़र आने वाले स्थानीय नागरिक से जब शहर की इस दुर्दशा के बारे में जानने की कोशिश की तो भारत की राजनीति तथा यहां की प्रशासनिक व्यवस्था से पूरी तरह बाखबर नज़र आने वाले उस व्यक्ति ने इसका दो टूक कारण बताते हुए यह स्पष्ट रूप से कहा कि भ्रष्टाचार के संदर्भ में भारत में यदि किसी योजना में आधा पैसा लगाया जाता है और आधा खाया जाता है तो उस प्रतिशत के लिहाज़ से नेपाल में चाहे किसी का भी शासन हो यहां नब्बे प्रतिशत खाया जाता है और केवल दस प्रतिशत किसी योजना में खर्च किया जाता है। बड़े दुर्भाग्य की बात है कि जिस शहर में जानकी मंदिर जैसा आकर्षक व सम्मोहित करने वाला विशाल भवन हो उस शहर की सड़कों व वहां की विद्युत आपूर्ति की ऐसी दुर्दशा हो जो अन्य कहीं देखने को न मिले इससे बड़ी बदनसीबी जनकपुरवासियों की और क्या हो सकती है? इसके अतिरिक्त इन्हीं दूटी-फूटी सड़कों के किनारे की नालियां व नाले पूरी तरह जाम पड़े दिखाई देते हैं जिनमें बहता हुआ पानी तो दिखाई नहीं देता हां बीमारी फैलने के लक्षण साफ दिखाई देते हैं। परंतु भीषण दुर्गंध फैलाते इन्हीं नालों व नालियों के किनारे खड़े होकर दुकानदारों द्वारा अपनी रेहडिय़ों पर चाट तथा खाने-पीने की अन्य सामग्रियां बड़ी बेिफक्री के साथ बिकती दिखाई देती हैं। और इन दुव्र्यवस्थाओं का आदी हो चुका ग्राहक भी ऐसी जगहों पर खड़ा होकर खाता-पीता व खरीददारी करता नज़र आता है। ऐसी दुव्र्यवस्था तथा दुर्दशा वाले शहर का भ्रमण करने के बाद शायद ही कोई पर्यट्क अथवा यात्री दोबारा इस शहर का रुख करने की कल्पना करे। नेपाल सरकार को इतने प्रमुख व ऐतिहासिक सीमावर्ती शहर के रख-रखाव पर पूरा ध्यान देना चाहिए। तथा प्राथमिकता के आधार पर इस नगर का कायाकल्प किया जाना चाहिए।

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