लेखक परिचय

डा. अरविन्द कुमार सिंह

डा. अरविन्द कुमार सिंह

उदय प्रताप कालेज, वाराणसी में , 1991 से भूगोल प्रवक्ता के पद पर अद्यतन कार्यरत। 1995 में नेशनल कैडेट कोर में कमीशन। मेजर रैंक से 2012 में अवकाशप्राप्त। 2002 एवं 2003 में एनसीसी के राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित। 2006 में उत्तर प्रदेश के सर्वश्रेष्ठ एनसीसी अधिकारी के रूप में पुरस्कृत। विभिन्न प्रत्रपत्रिकाओं में समसामयिक लेखन। आकाशवाणी वाराणसी में रेडियोवार्ताकार।

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shahido

डा. अरविन्द कुमार सिंह

दुनिया ने उन लोगों को कभी नहीं याद किया जिन्होने दुनिया से लिया तो बहुत कुछ पर दिया कुछ नहीं। हाॅ, उनको जरूर याद किया जिन्होने लिया कुछ नहीं पर दिया बहुत कुछ। राष्ट्र अपना सर्वस्व देने वाले लोगों से निर्मित होता है और ऐसे ही लोगों से जिन्दा भी रहता है। एक सैनिक का जीवन इन्ही शब्दो के आस पास पूणर््ा होता है। आत्म विश्वास और सर्मपण उसकी सबसे बडी पूजी है।
मानस में एक प्रसंग आता है। प्रभु श्रीराम समुद्र के किनारे खडे है। लंका जाने के लिए समुद्र से रास्ते के लिए निवेदन कर रहे है। समुद्र अपनी विशालता पर इतरा रहा है। तीन दिन का वक्त बीत गया। समुद्र ने प्रभु श्रीराम की याचना अनसुनी कर दी। आखिर तीन दिनो के उपरान्त राम का सब्र छलका, जिसे तुलसी ने दो पक्तियों के माध्यम से व्यक्त किया –
विनय न मानत जलधि जड, गयऊ तीन दिन बीत।

बोले राम सकोप तब, भय बिन होत न प्रीत।।
श्रीराम ने समुद्र से कहा – हे समुद्र तू अपनी जिस विशालता पर इतरा रहा है, मैं अपने तरकश के एक बाण से तेरा सारा पानी सूखा देने की क्षमता ही नहीं रखता हूॅ वरन रास्ता नहीं दिया तो सूखा के दिखा भी दूॅगा। आगे की कहानी सभी को पता है, प्रभु श्रीराम के लंका विजय तक की।
प्रभु श्रीराम का सब्र तो तीन दिन में ही छलक गया। मुम्बई की घटना हुयी हमारा सब्र नहीं छलका? सैनिको का सर कट गया हमारा सब्र नहीं छलका? संसद पर अटैक हो गया, हमारा सब्र नहीं छलका? पठानकोट हो गया हमारा सब्र नहीं छलका? अट्ठारह सैनिक मौत के घाट उतार दिये गए, हमारा सब्र नहीं छलका? आखिर सबकुछ लुटाकर होश में आयेगें तो इस होश में आने का क्या अर्थ? राष्ट्र कवि रामधारी सिंह दिनकर ने कभी कहा था –
छिनता हो सत्व कोई और तू, त्याग तप से काम ले यह पाप है।

पुण्य है विछिन्न कर देना उसे, बढ रहा तेरी तरफ जो हाथ हैै।।
इससे भी आगे बढकर हरिओम पवार कहते है जो प्रासागिंक भी है और राष्ट्र की आवाज भी है –
दुश्मन ने विश्वासघात का छुरा पीठ में गाड दिया।

शिमला समक्षौते में लिख्खे मानचित्र को फाड दिया।

कस्मे वादे प्यार मोहब्बत, सब खूटी पर टाॅग चुका।

तो तुम भी घातों प्रतिघातों का निणर्य एक बार हो जाने दो।

और एक युद्ध सीमा रेखा के आर पार हो जाने दो।।
विकल्प तो बहुत कुछ है, करने की इच्छा शक्ति नदारद है। आईये उन विकल्पों पर गौर फरमाये जो हम आजमा सकते है –
•देश के अन्दर छिपे गद्दारो को बेनकाब करना और उन्हे जेल के सीकचों के पीछे पहुॅचाना।

•कश्मीर में अलगाववादियों को सारी सुविधाए बन्द करना, उनका विदेशी पासपोर्ट जब्त करना तथा विदेशी फडिंग पर रोक लगाना।

•कश्मीर के पत्थरबाजों को चिन्हित करना तथा उनपर कार्यवाही करना। पैलेट गन का प्रयोग बन्द करना आवश्यक नहीं। पुलिस हिसंक भीड पर गोली चला सकती है पर सेना पत्थरबाजो पर पैलेट गन भी नहीं चला सकती?

•अलगाववादी मानसिकता के बुद्धिजीवियों को चिन्हित करना और उनकी फडिंग को बन्द करना। अलगाववादी मानसिकता अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं।

•आतंकवादियों की लाश को जलाना, इसके निम्न परिणाम होगें –
परिणाम

•मरने के बाद जन्नत मिलेगी यह धारणा टूटेगी क्यांेकि मुस्लीम धर्म के अनुसार जल के मरने पर दोजख मिलता है।

•निशाने कब्र न होने से वे महिमा मडिंत न हो पायेगें।
अन्य विकल्प

•सराईल की नीति का अनुसरण – आतंकवादियों को या तो जिन्दा पकडेगें या फिर मारेगें।

•अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान को आतंकवादी राष्ट्र घोषित कराना।

•पाक अधिकृत कश्मीर पर ‘ एयर अटैक ’ करके आतंकवादी ठिकानो को ध्वस्त करना तथा उसे कब्जे में लेकर वहाॅ की जनता को सुरक्षा प्रदान करना।

• महिने में तीन चार बार पाक अधिकृत कश्मीर में घुसकर आतंकवादियों को मारना। यदि वो हमारे देश में घुसपैठ कर सकते है, तो हम क्यों नहीं?

•बलूचिस्तान और सिंध को सर्मथन देकर उसे पाकिस्तान से अलग करना।

•जलसन्धि को तोडकर उसे पानी के लिए तरसाना।

•व्यापार बन्द किया जाय और उसकी आर्थिक कमर तोडी जाए।

•दुश्मन की मारक क्षमता से बाहर रहते हुए तोपो और मिसाईल से उनके आतंकवादी ठीकानों पर वार करना।

•और अन्त में यदि वो लडने पर आमादा ही हो तो आर पार की जंग के बगैर युद्ध न रोकना और समस्या का पूर्णरूपेण खात्मा करना। इन शब्दो को ध्यान में रखते हुए –

जिन बेटो ने पर्वत काटे है अपने नाखूनो से।

उनकी कोई माॅग नहीं है, दिल्ली के कानूनो से।।

तब आॅखों के एक बूद से सातो सागर हारे होगें।

जब मेहदीं वाले हाथों ने मगंलसूत्र उतारे होगें।।
जिन्दगी को यदि हमें आसान करना है तो हमें समस्याओं का समाधान खोजना ही होगा। विकल्प तो आपके पास दोनो खुले है। या तो सारी जिन्दगी समस्याओं के साथ गुजार दे या फिर समस्या का समाधान कर खुद की जिन्दगी आसान करे और आने वाली पीढी का जीवन बेहतर करे।
एक सैनिक अपना सर्वस्व लुटाकर राष्ट्र केा जिन्दा रखता है। ऐसे सैनिक के लिए सम्मान, राष्ट्र का सम्मान है। जब पूरा राष्ट्र उसके साथ खडा होता है तो उसके बढे हौसले और जज्बात की सहज ही कल्पना की जा सकती है। दो पक्तियाॅ बेहतर तरजुमा है, उसके भावों कीं पहली पंक्ति सैनिक की तरफ से है और दूसरी पंक्ति राष्ट्र की अभिव्यक्ति है –
मरने का सलीका आते ही जीने का सऊर आ जाता है।

जब तुम मुझे अपना कहते हो, अपने पे गुरूर आ जाता है।।

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