लेखक परिचय

मनमोहन आर्य

मनमोहन आर्य

स्वतंत्र लेखक व् वेब टिप्पणीकार

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-मनमोहन कुमार आर्य
स्वामी दिव्यानन्द सरस्वती आर्यजगत के प्रतिष्ठित विद्वान संन्यासी हैं जिन्होंने अपने जीवन में योग प्रशिक्षण के कार्यों के साथ वेद पारायण यज्ञों एवं उपदेशों द्वारा भी आर्यसमाज की उल्लेखनीय सेवा की है। सम्प्रति आप 78 वर्षों के हो गये हैं परन्तु जीवन भर काम, काम और काम पर केन्द्रित रहने के कारण उनका शरीर दुबला हो गया है व किंचित रुग्ण रहता है। आज दिनांक 5 अक्तूबर, 2016 को देहरादून के वैदिक साधन आश्रम तपोवन, देहरादून का शरदुत्सव आरम्भ हुआ है। आप इस आश्रम के संरक्षक हैं अतः आज आप आश्रम में उपस्थित हुए हैं। आज आप यज्ञ के ब्रह्मा पद को प्रतिष्ठित नहीं कर सके परन्तु आश्रम में ध्वजारोहण कार्यक्रम में आप सम्मिलित हुए जहां आपने अपना संक्षिप्त सम्बोधन भी दिया जिसे हम एक पृथक लेख द्वारा प्रस्तुत करेंगे। आज यज्ञोपरान्त हम अपने मित्र श्री ललित मोहन पाण्डेय की प्रेरणा से उनके साथ स्वामी दिव्यानन्द जी के कक्ष में गये जहां हमने सामान्य बातों के अतिरिक्त आर्यजगत को कुछ सन्देश देने का अनुरोध किया। स्वामीजी ने जो-जो बातें इस अवसर कही, उसे हम पाठकों के लाभार्थ प्रस्तुत कर रहे हैं।

स्वामी जी बोले ‘मनुष्य को लोकोपकार उतना ही करना चाहिये जितना स्वास्थ्य अनुमति देता हो। स्वास्थ्य को गवां कर उपकार करने से अपना अपकार हो जाता है। मैंने जीवन में उपकार के कार्य किए परन्तु अपने स्वास्थ्य पर ध्यान नहीं दिया। स्वास्थ्य का कभी विचार नहीं किया। अब बीमार हूं। 78 वर्ष का हूं। पहले मैं कभी बीमार नहीं हुआ।

पहले जुकाम होता था। बुखार मुझे कम आया। कोई बीमारी स्थाई नहीं हुई। इस कारण मैं स्वस्थ रहा। श्री ललित मोहन पाण्डेय मुझसे परिचित हैं और मेरी स्वास्थ्य विषयक बातों के साक्षी हैं। मैं जीवन भर आर्यसमाज के कार्यक्रमों में व्यस्त रहा इस कारण मुझे बीमारी ने घेर लिया।

वैदिक धर्म के प्रचार के लिए योग का प्रचार और प्रक्षिशण उत्तम हैं। सम्प्रति योग से सभी मत-पंथ वाले जुड़ रहे हैं। सबको योग सीखना चाहिये। कई समाजों को मैंने समय समय पर सदस्य बना कर दिये जो आर्यसमाजी नहीं थे।

मैं अपने जीवन में ईश्वर की विशेष कृपा का अनुभव करता हूं। मेरे जीवन में एक विशेष घटना हुई। देहरादून से दिल्ली के लिए प्रातः 5.10 बजे जन शताब्दी रेलगाड़ी चलती है। सन् 2004 या 2005 के दिसम्बर माह की घटना है। सर्दियों के दिन थे। मेरा जनशताब्दी रेलगाड़ी का देहरादून से दिल्ली का टिकट बुक था। मैं वैदिक साधन आश्रम तपोवन से चलने लगा। मुझे कहा गया की दूध पीकर जाओ। मुझे जो दूध दिया गया वह बहुत अधिक गर्म था। मैंने सारा दूघ ठण्डा करने के लिए एक थाली में डाल दिया। फिर भी वह ठण्डा नहीं हुआ। स्टेशन पहुंचने में देर हो गई। फिर हमने कार से हरिद्वार पहुंच कर गाड़ी पकड़ने का निर्णय किया। ड्राइवर ने कहा कि गाड़ी में तेल नहीं है। उस समय पेट्रोल पम्प भी खुले नहीं थे। मैंने ड्राइवर को कहा कि जितनी दूर तक चल सकते हो इसी से चलो। उतने ही पेट्रोल से गाड़ी हरिद्वार रेलवे स्टेशन पर पहुंच गई। कुछ लोग स्टेशन से बाहर आ रहे थे। हमने उनसे पूछा कि क्या देहरादून जनशताब्दी आ गई? उन्होंने बताया कि गाड़ी आ गई है और प्लेटफार्म संख्या 4 पर खड़ी है। हरिद्वार का प्लेटफार्म नं. 4 सबसे आखिरी में है जहां सीढ़ियां चढ़ कर जाना पड़ता है। 4 नम्बर प्लेट फार्म पर काम हो रहा था और भूमि खुदी हुई थी। मैं नीचे कूद गया और गाड़ी पकड़ने के लिए भागा। गाड़ी चलने की सीटी दे रही थी। मैंने सोचा कि कोई यात्री दरवाजा खोल देगा और मैं चढ़ जाऊंगा। गाड़ी पर पहुंचा तो एक माता ने कहा कि दरवाजा नहीं खुलता। यहां डण्डा ठुका हुआ है। मेरे पास एक बैग था और एक चद्र थी। मैंने दरवाजें का ठण्डा पकड़ा और तभी गाड़ी चल पड़ी। अब क्योंकि मैं गाड़ी में प्रवेश नहीं कर सकता था। मैंने अपने मन में कहा कि आज मेरे जीवन का अन्तिम दिन है। मैं आज मर जाऊंगा। हरिद्वार के आगे ज्वालापुर में गुरुकुल महाविद्यालय के पास गंगा नहर पर जो लोहे का पुल है उससे टकराकर मेरी मौत हो जायेगी। रेलगाड़ी के अन्दर नौजवान को मैंने कहा कि जंजीर खींचो। उसने बताया कि कोच में जंजीर नहीं है। मैंने उसे कहा कि दूसरे कोच में जाकर उसकी जंजीर खींचो। उसने जंजीर खींची तो गाड़ी ज्वालापुर के पास जाकर रुकी। गाड़ी के लोगों ने मुझे कहा कि आप आ जाईये। इस दिन को मैं अपने जीवन का अन्तिम दिन समझता हूं। उस दिन मेरी जो जान बची उसे मैं प्रभु की अनुकम्पा समझता हूं। प्रभु ने मुझसे सेवा लेनी थी, उसने मुझे जीवन दिया और काम कराया। देहरादून से जो ड्राइवर साथ आया था, मेरा बैग उसके पास था। रेल की पटरी पर खुदाई होने के कारण वह नीचे उतर कर मुझे बैग दे नहीं पाया था। वह ड्राइवर पलवल-बल्लभगढ़ का रहने वाला है। वह सायं दिल्ली आ गया और मेरा बैग मुझे दे दिया। इस दिन मेरी जो जान बची, उसे मैं ईश्वर की कृपा अनुभव करता हूं।

हमारे मित्र पाण्डेय जी ने हमारी ओर से स्वामी जी को योग की उपलब्धियां बताने के लिए निवेदन किया? स्वामी जी बोले ‘महर्षि दयानन्द जी ने साधना व एकान्तवास किया। मैंने वहां वहां जाकर साधना व एकान्तवास किया है। 8 घंटे मसूरी में बैठा। उस दिन मैं 4.00 बजे उठ गया था। मसूरी आर्यसमाज की सम्पत्ति योगानन्द कुटीर में मैं साधना कर रहा था। इस कुटी में साधना करने वालों की ही जगह दी जाती है। मसूरी ऐसा स्थान है जिसे अंग्रेजों ने विकसित किया था। उससे पहले मसूरी योगियों का स्थान था। वहां किसी प्रकार का शब्द व शोर नहीं आता। राजनीति का भी वहां किसी प्रकार का प्रभाव नहीं होता था। आजकल वहां के स्कूलों में पढ़ाई गतिमान रहती है।’ पाण्डेय जी द्वारा योग का अनुभव बताने का निवेदन करने पर स्वामी जी ने कहा ‘आनन्द का अनुभव किया, परमात्मा का आनन्द मिला। मैं तपोवन की ऊपर वाली पहाड़ियों पर था। वहां सत्संग का कार्यक्रम रखते थे। अन्त में साधना व यज्ञ करते थे। एक बार मैं साधना में था, मुझे पता ही नहीं चला कि सत्संग यज्ञ भी खतम हो गया। दो घंटे यज्ञ चलता है। रात्रि हो गई। साधको ने अनुभव किया और कहा कि स्वामी जी आपको समाधि लग गई, आपको पता नहीं चला। हम तो यज्ञ भी करके आ गये।’ स्वामी जी ने हमें कहा कि हमें भी इसी प्रकार से साधना करनी चाहिये। सभी लोगों को साधना जरूर करनी चाहिये। अपने विषय में वह बोले, ‘मुझे जो कार्य दिया गया, मैंने युक्ति व बल से किया। किसी काम को मैंने भार रूप अनुभव नहीं किया। सभी कामों को मैंने सदैव श्रद्धापूर्वक किया।’

स्वामी जी आर्यसमाज की एक विभूति हैं। आपका जीवन ऋषि दयानन्द के मिशन को सफल करने में लगा है। अतः हमने पाठकों तक उनका सन्देश पहुंचाने के लिए उनसे उक्त उपदेश वा जानकारी प्राप्त की। आर्यसमाज के विज्ञ पाठक इसे उपयोगी पायेंगे और इससे लाभ उठायेंगे। इति शम्।

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