लेखक परिचय

बीनू भटनागर

बीनू भटनागर

मनोविज्ञान में एमए की डिग्री हासिल करनेवाली व हिन्दी में रुचि रखने वाली बीनू जी ने रचनात्मक लेखन जीवन में बहुत देर से आरंभ किया, 52 वर्ष की उम्र के बाद कुछ पत्रिकाओं मे जैसे सरिता, गृहलक्ष्मी, जान्हवी और माधुरी सहित कुछ ग़ैर व्यवसायी पत्रिकाओं मे कई कवितायें और लेख प्रकाशित हो चुके हैं। लेखों के विषय सामाजिक, सांसकृतिक, मनोवैज्ञानिक, सामयिक, साहित्यिक धार्मिक, अंधविश्वास और आध्यात्मिकता से जुडे हैं।

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नींद नहीं मेरी सखी,मुश्किल से है आय,
चौक कर खुल जाय कभी,फिर नख़रा दिखलाय।

सपनों का घर नींद है , निंदिया का घर नैन
नींद नैन आवे नहीं , ना सपनों को चैन।

कच्चा घर है नींद का , टूट कभी भी जाय
बार- बार टूटे कभी , बन न निशा भर पाय।

शाम रात में ढ़ल गई,खोले रजनी द्वार।
गगन भाल चँदा उगा,तारे पहरेदार।

सूरज-किरणें छा गयीं ,पहन लाल परिधान ।
गगन सुनहरी हो रहा , देखो हुआ विहान।

गगन भाल बिंदी लगी, चँदा का आकार।
तारे बिखरे हैं पड़े , गगन करे श्रृंगार।

झाँका खिड़की से लगा,अद्भुत है ये प्रात।
सागर की लहरें करें , आरुषि संग उत्पात।

भंवरे तितली ने किया,फूलों से अनुबंध।
उनके आने पर लगे ,न कोई प्रतिबंध।

सूरज – थाली में सजा , आया प्रातः काल।
सागर में फैला दिया , रूप सुनहरा जाल।

चाँद सितारों से जड़ी,चुनरी रजनी भाल।
सप्तऋषी पहना गये ,रजनीगंधा माल।

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