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प्रवक्‍ता ब्यूरो

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-मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून।

पंजाब केसरी लाला लाजपत राय जी का देश की आजादी के आन्दोलन में प्रमुख योगदान था। आप आर्यसमाज के संस्थापक महर्षि दयानन्द के आरम्भिक शिष्यों में थे। आपने लिखा है कि आर्यसमाज मेरी माता है और महर्षि दयानन्द मेरे धर्म पिता हैं। आपने महर्षि दयानन्द का उर्दू भाषा में जीवन चरित भी लिखा है। इस जीवन चरित का पण्डित गोपालदास देवगुण शर्मा, क्लर्क डैडलैटर आफिस, लाहौर द्वारा किया गया हिन्दी अनुवाद लगभग 60-70 वर्ष पूर्व सार्वदेशिक साप्ताहिक पत्र के एक विशेषांक के रूप में प्रकाशित हुआ था। अनुदित पुस्तक का प्राक्कथन लाला लाजपतराय जी ने स्वयं लिखा है। इस पुस्तक की भूमिका 88 पृष्ठों की है जिसे लाला जी ने अनेक उपशीर्षक देकर लिखा है। भूमिका अत्यन्त महत्वपूर्ण है एवं सुधी पाठकों द्वारा पढ़ने योग्य है। इस भूमिका में लाला जी ने उपशीर्षक ‘ब्राह्ण ग्रन्थों के समय में सामाजिक और राजनैतिक अवस्था’ से भी महत्वपूर्ण एवं सारगर्भित विचार व्यक्त किये हैं। इसी को महत्वपूर्ण जानकर हम इस सामग्री को पाठकों के  लिए प्रस्तुत कर रहे हैं।

 

‘‘उस (ब्राह्मण ग्रन्थों के) समय की सामाजिक और राजनैतिक अवस्था का चित्र हमको रामायण और महाभारत से मिलता है। रामायण का सामाजिक चित्र सच पूछो तो सामाजिक स्वर्ग का नमूना दिखलाता है। सचमुच उस समय भारत भूमि स्वर्ग भूमि थी। यह धरा कर्म भूमि थी और धर्म भूमि भी थी। प्रत्येक मनुष्य माता पिता, पुत्र वा पुत्री, पति व स्त्री, राजा व प्रजा, तथा गुरु और शिष्य अपने अपने उद्देश्य जानते थे और उन पर आचरण करते थे। सारे देश में आर्यों का राज्य था, मनुष्यमात्र उत्तम अवस्था में थे, और निश्चिन्त थे, चारों ओर राज्य कर रहे थे, पश्चिमोत्तर में लगभग सारा अफगान स्थान और क्या जाने कुछ तुरकस्थान का भाग आर्यों की राजधानी में था। भारतवर्ष धन की खान थी और मालामाल था। न किसी के धावे का भय था, और न किसी अन्य जाति की चिन्ता थी। वर्णों के स्वाभाविक विभाग जिसने अभी अपने पूर्ण पावं नहीं जमाये थे, लोगों को अपने अपने धर्म कर्म पर नियत रखा हुआ था। प्रत्येक मनुष्य अपने धर्म और स्वभावानुकूल जातीय और देश के कामों में भाग लेता था। वह ऐसा समय था कि जिसने शस्त्र विद्या में द्रोणाचार्य जैसे अद्वितीय गुरु और अर्जुन, भीम, युधिष्ठिर और कर्ण जैसे सुयोग्य प्रसिद्ध योद्धा धनुष विद्वाऽभिज्ञ मल्ल, और भीष्म पितामह जैसे क्षत्रिय उत्पन्न किये। वह ऐसा समय था कि जिसने लक्ष्मण और भरत जैसे भाई, श्री  रामचन्द्र जी सरीखे पुत्र और सीता महारानी जैसी स्त्रियां उत्पन्न कीं। यह वह समय था जिसमें पाणिनी जैसे वैयाकरणी उत्पन्न हुए जिसके सम्मुख मानों भाषा हाथ बांधे हुए खड़ी थी। यदि एक पाणिनी ही इस समय में उत्पन्न होता तो वही उस समय के संसार के इतिहास में प्रसिद्ध समय बनाने के लिए बहुत था। क्योंकि संसार में उस मुनि सरीखा व्याकरण वक्ता व कर्ता फिर दोबारा उत्पन्न नहीं हुआ। परन्तु ब्राह्मणों और उपनिषदों का समय केवल पाणिनी मुनि से ही प्रसिद्ध नहीं, किन्तु विद्या की अन्य शाखाओं मंे भी वैसे ही वक्ता उत्पन्न हुए। क्या ज्योतिष विद्या, क्या उकलीदस (बीज गणित), क्या राग विद्या और क्या फिलासफी, जिधर दृष्टि करो उधर ही इस समय से तुलना नहीं रखते। और सब को छोड़ दें तो क्या धर्म और भक्ति के विषय में उपनिषदों के कर्ता ही अपनी उत्पत्ति के समय अपने देश के नाम को सदैव चिरस्थाई बनाने के लिये क्या कम है? उपनिषद क्या हैं मानों ज्ञान की खानें हैं। उपनिषदों के ये वाक्य हैं, या अनमोल रत्न हैं, जो संसार मात्र के साहित्य में अपनी समानता वा तुलना नहीं रखते। छोटे छोटे संक्षिप्त से वाक्य ऐसे बुमूल्य रत्न हैं कि अब तक दुनिया उनकी झलक से प्रकाशमान होती है, मानो कि ज्योति के श्रोत निज किरणों से आत्मा के अज्ञानांधकार को दूर करते हैं। और साथ ही व्याकुल और संसार से विरक्त हुए मनुष्यों के मन को अमृत दान करके शान्ति और शीतलता प्रदान करते हैं।

 

दूसरी ओर देखो तो धर्म शास्त्र की शाखा में विचित्र आत्मायें काम करती नजर आती हैं। सूत्र ग्रन्थ भी अद्भुत शास्त्र हैं, जो दुनिया के लिये नियम बनाते हैं, जीवन से मृत्यु तक मनुष्य की आयु को धम्र्म मर्यादा पर चलाने के लिये सविस्तार नियम बनाते हैं। सार यह है कि जिधर देखो आर्य जन आत्मा परमात्मा के ज्ञान भण्डार से आनन्द पा रहे हैं। सबका आश्रय वेद है। वैयाकरणी हो, चाहे गणितशास्त्रभिज्ञ हो, चाहे धर्म शास्त्र का रचयिता हो, चाहे उपनिषदों का कर्ता हो, सब वेदों के सहारे अपनी बुद्धि को प्रकाशित कर रहे हैं। जो कुछ लिखा गया, जो कुछ किया गया, जो कुछ बनाया गया, सब वेदों के सहारे से बनाया गया। क्या ब्राह्मण क्या क्षत्रिय क्या वैश्य और क्या शूद्र, सब ही वेदों का आश्रय ले कर्म करते हुए संसार सागर से पार जाने का यत्न करते हैं।

 

ऋषि, महर्षि, विद्वान, ज्ञानी पुरुष वेदों के अर्थों पर झगड़ते हैं, परन्तु वेदों से विमुख होने का कोई साहस नहीं करता, वर्ण प्रणाली को स्थित रखने का यत्न हो रहा है परन्तु क्यों? जो वेदों का सार समस्त जगत् में विख्यात है, इसलिये इस यत्न से सिद्ध नहीं होता। लोक कर्मानुसार अपने वर्ण व्यत्यय करते हैं, ऊंचे नीचे जाते हैं, और नीचे वाले ऊपर चले जाते हैं, शूद्र की सन्तान अपने कर्मों से ब्राह्मण पदवी को प्राप्त हो जाती है, और ब्राह्मण सन्तान अपने कर्मों से पतित होकर शूद्र बन जाती है।”

 

लाला जी द्वारा प्रस्तुत इस विवरण से उनके इतिहास विषयक गहरे ज्ञान का परिचय मिलता है। हम आशा करते हैं कि पाठक इस लेख को पसन्द करेंगे। खेद है कि हमने अपनी सर्वोत्तम संस्कृति को विस्मृत कर दिया है और पश्चिम की भौतिकवादी अनिष्ट बातों की ओर आंखे मूंद कर दौड़ लगा रहे हैं। महर्षि दयानन्द ने आर्यसमाज के एक नियम में कहा है कि मनुष्य को सत्य के ग्रहण करने और असत्य के छोड़ने में सर्वदा उद्यत रहना चाहिये। होना तो यह चाहिये था कि हम भारतीय संस्कृति का प्रचार प्रसार करते जिससे विदेशी हमारी संस्कृति को अपनाते परन्तु हमने इसके विपरीत अपनी संस्कृति को छोड़कर विदेशी अपसंस्कृति को अपना लिया है। इसके परिणाम भी सामने आ रहे हैं। यदि हम विश्व में सुख व शान्ति की स्थापना करना चाहते हैं तो हमें वेदों की ओर लौटना होगा। नहीं लौटेंगे तो समाज में जो अनिष्ट हो रहा है वह बढ़ता ही जायेगा। इसी के साथ हम इस लेख को पाठकों को भेंट करते हैं।

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