लेखक परिचय

मयंक चतुर्वेदी

मयंक चतुर्वेदी

मयंक चतुर्वेदी मूलत: ग्वालियर, म.प्र. में जन्में ओर वहीं से इन्होंने पत्रकारिता की विधिवत शुरूआत दैनिक जागरण से की। 11 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय मयंक चतुर्वेदी ने जीवाजी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में डिप्लोमा करने के साथ हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर, एम.फिल तथा पी-एच.डी. तक अध्ययन किया है। कुछ समय शासकीय महाविद्यालय में हिन्दी विषय के सहायक प्राध्यापक भी रहे, साथ ही सिविल सेवा की तैयारी करने वाले विद्यार्थियों को भी मार्गदर्शन प्रदान किया। राष्ट्रवादी सोच रखने वाले मयंक चतुर्वेदी पांचजन्य जैसे राष्ट्रीय साप्ताहिक, दैनिक स्वदेश से भी जुड़े हुए हैं। राष्ट्रीय मुद्दों पर लिखना ही इनकी फितरत है। सम्प्रति : मयंक चतुर्वेदी हिन्दुस्थान समाचार, बहुभाषी न्यूज एजेंसी के मध्यप्रदेश ब्यूरो प्रमुख हैं।

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  डॉ मयंक चतुर्वेदी
संस्‍कृति एवं परंपरा के कभी जागृत नमूने रहे भवन आज भले ही अपने वैभव से दूर होकर अनेक स्‍थानों पर टूटे-फूटे स्‍मारकों में तब्‍दील हो गए हों, किंतु वे हैं तो हमारे अतीत का दिग्‍दर्शन करानेवाले आधार स्‍तम्‍भ ही। इसलिए उन्‍हें उनके प्राचीन गौरवपूर्ण स्‍वरूप में वापस लाकर उनसे निरंतर प्रेरणा प्राप्‍त करते रहना हम सभी का दायित्‍व बनता है। इन दिनों इस दिशा में मध्‍यप्रदेश की सरकार जिस तरह से प्रयत्‍न कर रही है और स्‍वयं मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान इस पर अपनी नजर रखे हुए हैं, निश्‍चित ही इसके लिए उनकी जितनी सराहना की जाए वह कम ही होगी।

अक्‍सर राज्‍य व्‍यवस्‍था में मुख्‍यमंत्रियों को अपने दैनन्दिनी कार्य में इतनी अधिक व्‍यस्‍तता होती है कि वे बहुत से लोकोपयोगी कार्यों पर चाह कर भी ध्‍यान केंद्रित नहीं कर पाते हैं, जबकि मध्य प्रदेश के मुख्‍यमंत्री इस पर सतत विशेष ध्‍यान दे रहे हैं। यही कारण है कि आज मध्‍यप्रदेश में 492 राज्य संरक्षित स्मारक सुनिश्‍चित होने के बाद अब राज्य संरक्षित स्मारक एवं पुरातात्‍विक महत्‍व के भवनों की संख्या 497 हो गई है।

यह उचित ही है कि प्रदेश के प्राचीन स्मारक, पुरातत्वीय स्थल और अवशेषों सुरक्षित रखने के उद्देश्य से रीवा, सागर, नरसिंहपुर एवं शिवपुरी जिले के 5 प्राचीन स्मारकों को राज्य संरक्षित स्मारक घोषित करते हुए इस संबंधी अधिसूचना राजपत्र में प्रकाशित कर दी गई है। सरकार ने अभी जिन प्राचीन भवनों को इसमें शामिल किया है, उनमें रीवा जिले की जवा तहसील में स्थित लुकेश्वर नाथ मंदिर, सिरमोर का योगिनी माता स्थल, सागर जिले के मालथौन तहसील मुख्यालय का प्राचीन किला, नरसिंहपुर जिला मुख्यालय में स्थित नरसिंह मंदिर और शिवपुरी जिले की खनियाधाना तहसील के ग्राम पिपरोदा ऊवारी में स्थित विष्णुजी का मंदिर, शंकरजी की मढ़ि‍या को राज्य संरक्षित स्मारक घोषित किया गया है।

देखा जाए तो अनादिकाल से वर्तमान तक विभिन्न अवधारणाओं के साथ मध्यप्रदेश में सांस्कृतिक एवं धार्मिक परिवर्तन होते रहे हैं । इसके साथ ही कई नए भवनों, कला दीर्घाओं, मंदिरों का निर्माण समय-समय पर यहां होता रहा है। जिसके परिणामस्‍वरूप ही यहां अनेक प्राचीन ऐतिहासिक स्मारक जैसे कि दुर्ग, महल तथा अन्य सम्बद्ध भवन विद्यमान हैं, लेकिन इनमें से अनेक इमारतें वक्‍त गुजरने के साथ-साथ खण्डहर बनती जा रही हैं। सरकार ने इनमें से अभी जिन पर अपना ध्‍यान केंद्रित किया है, उनकी संख्या भले ही 497 पर पहुँच गई है, किंतु इसका एक पक्ष यह भी है कि ये संख्‍या अभी भी राज्‍य में स्थित प्राचीन दुर्ग, भवन, स्‍मारकों की संख्‍या के लिहाज से पर्याप्त नहीं है। प्रदेश के प्राचीन शहर ग्‍वालियर, इंदौर, जबलपुर, होशंगाबाद, सागर सहित अन्य स्‍थानों पर अभी भी अनेक ऐसे भवन एवं स्‍मारक मौजूद हैं, जिन्‍हें उनके प्राचीन गौरवपूर्ण अतीत को देखते हुए सहेजे जाने की जरूरत है।

सरकार ने जब बुंदेलखण्‍ड के खजुराहो में अपनी विशेष रुचि प्रदर्श‍ित की तो उसका परिणाम हम सभी के सामने है। यह परिक्षेत्र आज अंतर्राष्‍ट्रीय पर्यटन का मुख्‍य केंद्र बन चुका है, किंतु उसी के पास स्थित पन्‍ना जिले में कई महत्‍वपूर्ण पुरातन कला एवं स्‍थापत्‍य के अवशेष मौजूद हैं, जोकि संरक्षण के अभाव में समय के साथ दिनोंदिन खण्‍डहर होते जा रहे हैं। बुंदेलखण्‍ड में पन्‍ना ही क्‍यों, छतरपुर, टीकमगढ़ से लेकर अन्‍य जिलों में भी पुरावशेष बिखरे पड़े हैं, जिनका यदि समय रहते ख्‍याल कर लिया जाए तो वे दिन दूर नहीं कि इनमें से ज्‍यादातर राष्‍ट्रीय ही नहीं, बल्कि खजुराहो की तरह अंतर्राष्‍ट्रीय पहचान बना लेंगे। इसी प्रकार प्रदेश के अन्‍य क्षेत्रों को देखा जा सकता है।

दूसरी ओर एक पहलू यह भी है कि जिन स्‍थानों को सरकार ने संरक्षित स्‍मारक घोषित किया है, क्‍या उन पर सरकार पूरी तरह उचित ढंग से ध्‍यान दे पा रही है ? यह प्रश्‍न इसलिए समीचीन है, क्‍योंकि स्‍वयं पुरातत्‍व विभाग के अधिकारी यह बात स्‍वीकारते हैं कि पुरातन भवनों के संरक्षण एवं सुचारू व्‍यवस्‍था बनाए रखने के लिए प्रदेश सरकार ने जितने बजट का निर्धारण किया है, वह जरूरत को देखते हुए ऊँट के मुँह में जीरे के समान ही है, इस कारण से सभी भवनों एवं पुरा सम्पदा की उचित ढंग से देखभाल नहीं हो पाती है।

ऐसे में सरकार को चाहिए कि वह इस बिन्‍दु पर गंभीरता से विचार जरूर करे। उसे जो राशि इस कार्य में केंद्र से चाहिए, उसके लिए वह केंद्र पर ठीक उसी तरह दवाब बनाए जैसे केंद्र में पूर्व कांग्रेसनीत संप्रग मनमोहन सरकार के समय मुख्‍यमंत्री श्री चौहान बनाने का प्रयत्‍न करते रहे थे। वहीं, यह भी जरूरी है कि अधिक से अधिक इन पुरातन स्‍मारकों एवं भवनों से आम जनमानस को भी जोड़ा जाए, वे उनके पुनरुद्धार के लिए यदि स्‍वप्रेरणा के जागरण के साथ आगे आएंगे तो यह तय मानिए कि सरकार का धन एवं समय दोनों बचेगा और जर्जर हो चुके भवनों में बिखरी पड़ी पुरातन परंपरा भी फिर से जन सहयोग से पुनर्जीवित हो उठेगी ।

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