लेखक परिचय

जगमोहन ठाकन

जगमोहन ठाकन

फ्रीलांसर. यदा कदा पत्र पत्रिकाओं मे लेखन. राजस्थान मे निवास.

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जग मोहन ठाकन
खादी ग्रामोद्योग के कलेंडर –डायरी से गांधी जी की फोटो डिलीट कर मोदी जी की फोटो पेस्ट कर देने मात्र से न जाने कुछ लोगों के पेट में क्यों मरोड़े उठने लगे हैं । समय बड़ी तेज़ी से बदल रहा है । इतने लंबे अरसे तक गांधी जी को चरखे पर सूत कातने की ड्यूटी संभलवाई गई थी ,क्या वे अपनी ड्यूटी सही ढंग से निभा पाये  ? क्या उन्होने देश के लिए जरूरत के मुताबिक सूत काता ?नहीं न ? जो व्यक्ति इतने सालों तक सूत कातने का उपक्रम करता रहा , वो अपना ही तन आज तक नहीं ढाँप पाया , वो भला कैसे आम आदमी को वस्त्र दे पाएगा ?गांधी जी ने चरखे की गति बड़ी ही धीमी रखी है , यह भी अलग से जांच का विषय है , हम इस पर भी सोचेंगे। इसमे भी किसी राजनैतिक दल  की चाल परिलक्षित हो रही है । आज भी कुछ दल चाहते हैं कि गांधी जी के चरखे की गति धीमी रहे और आम आदमी यों ही नंग धड़ंग फिरता रहे । परंतु भाइयो और बहनों , आज युग परिवर्तन का दौर है , हमे पुराने खादी वस्त्रों की जगह नए दस दस लाख वाले वस्त्र चाहिए । विदेशों में हमारी साख का सवाल है । अब तुम ही बताओ , जिस व्यक्ति ने कभी दस लाख का सूट देखा ही नहीं वो भला कैसे कात पाएगा चरखे पर उस सूट का धागा ?नहीं न ?

अब गांधी जी के हाथ ढीले पड़ चुके हैं । पता है क्यों ? क्योंकि असली हाथ –किसी और के साथ । अब नकली हाथों के सहारे कब तक चलेगा चरखा ? अतः अब गांधी जी को विश्राम की जरूरत है । क्या भला यह अच्छा लगता है कि डेढ़ सौ वर्ष की इस उम्र में भी हम अपने पूजनीय पूर्वज से सूत कतवायेँ ? नहीं न मित्रों ? यह तो सरासर अन्याय है , हमारी संस्कृति के खिलाफ है । यह जरूर किसी 70 साल तक राज करने वाली पार्टी की हमारी संस्कृति का क्षरण करने की साजिश है । परंतु मित्रों हम यह नहीं होने देंगे । एक “बापू” इस वृद्धावस्था में भी चरखा चलाने को विवश हो और औलाद हाथ पर हाथ धरे देखती रहे , यह हमसे सहन नहीं होगा । भले ही हमें खुद ही चरखा क्यों न चलाना पड़े । वैसे भी हमने गांधी जी के चश्मे को तो पहले ही स्वच्छ भारत की निगरानी के लिए डेप्यूट कर दिया है , अब भला बिना चश्मे के गांधी जी कैसे कात पाएंगे सूत ?

विरोधी पार्टियां हो सकता है हम पर आरोप लगाएँ कि हमें चरखा नहीं चलाना आएगा । हमने पुराने चरखे को हटाकर नया चरखा लगाया है, जो कि ऑटोमैटिक है , हमें तो केवल इसके पास बैठकर फोटो खिंचवाना है । हमने तो पुराने ढर्रे के नोटों को एक ही झटके में प्रचलन से बाहर करके दुनियाँ को दिखा दिया है कि हम सारे घर के पर्दे बदल सकते हैं । लोग नोटबन्दी के बाद छपे कुछ नए नोटों पर भी गांधी जी की तस्वीर न छपी होने का राग अलापते रहे हैं । हमने सब को लाइन में लगा दिया है । भाइयो बहनों पुराने विचारों को त्यागिये और नवयुग में प्रवेश कीजिये । आपको नोटों का करना ही क्या है ? कैश लेस हो जाइये । न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी । हम हमारी वसुधैव कुटुंबकम की  नीति का अनुसरण कर रहे हैं । जिस पड़ौसी देश का हमारे साथ सदैव कटुता पूर्ण व्यवहार रहता था , आज वो ही हमें पेटीएम दे रहा है । है न अचरजपूर्ण बदलाव । युग बदल रहा ,जग बदल रहा ,फिर तुम बदलो क्या नई बात । भाइयो बहनों हमने ऐसी ताली बजाई है कि देखते जाओ सारी विदेशी कंपनियाँ आपकी गलियों में आपके आगे नतमस्तक हो जाएंगी । बस चरखे की कताई देखो , कातने वाले को नहीं । हम हर नागरिक को चरखा चलाने का अधिकार देना चाहते है और वो भी अपनी  सेल्फी के साथ ।

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