लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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प्रमोद भार्गव

संपूर्ण संस्कृत वांग्मय में शिव साधु रूप में हैं। माया मोह से लगभग निर्लिप्त हैं। शिव अपने शरीर पर जो वस्तुएं धारण किए हुए हैं,उनमें भी वैभव के प्रतीक नहीं झलकते। उनके शरीर पर राख मली हुई है। जटा-जूट धारी हैं। कई सर्प उनके गले और हाथों में गहनों की तरह शोभायमान हैं। बर्फ की सघनता से आच्छादित हिमालय में उनकी आश्रयस्थली है। साधनालीन शिव की आंखें सदैव बंद रहती हैं। हालांकि वे त्रिनेत्र धारी हैं। लेकिन उनका तीसरा नेत्र अपवादस्वरूप आपातस्थिति में ही खुलता है। इस समय शिव रौद्र, यानी गुस्से में होते हैं। इसी समय कभी-कभी शिव तांडव नृत्य भी करते हैं। इस नृत्य का शाब्दिक अर्थ ‘देवता का नृत्य‘ या ‘नृत्य करते देवता‘ है। इस नृत्य का चित्राकंन विश्व प्रसिद्ध ‘नटराज‘ की मूर्ति में किया गया है। ऐसी मान्यता है कि शिव ने यह नृत्य केरल के चिदंबरम् नामक स्थान पर किया था। प्राचीन भौगोलिक धारणा के अनुसार इस स्थल को विश्व का केंद्र माना जाता है। इससे यह भाव प्रकट होता है कि हमारे जिज्ञासु ऋषि-मुनियों को दुनिया का केंद्र जानने की इच्छा थी।

नटराज की प्रतिमाा में शिव की महिमा प्रदर्शित है। नटराज की मूर्ति के वृत्ताकार घेरे में चारों तरफ अलंकृत अग्नि व मछली जैसे चिन्ह प्रस्तुत हैं। ये चिन्ह पृथ्वी पर जीवन और विनाष को प्रदर्शित करने के प्रतीक हैं। नटराज के ऊपर अर्द्धचंद्र व जटाओं में गंगा ब्रह्माण्ड व पृथ्वी की सृजन की कथा बयान करते हैं। नटराज के दाहिने हाथ में डमरू व अभय मुद्रा प्रदर्शित है। यह विश्व में घटित होने वाले घटनाचक्रों का प्रतीक है। बाईं भुजा में आधृत अग्नि शिव के रौद्र रूप को दर्शाती है। साथ ही यह अग्नि के महत्व को भी चिन्हित करती है। आमतौर पर नटराज की मूर्ति को एक बालक पर खड़े होकर नृत्य करते हुए दिखाया गया है। यह बालक के रूप में अपस्मरा नामक दानव का वध है। शिव की खुली जटाएं, नेत्रों में झलकता आवेग, बालक पर सधे हुए एक पैर से खड़े होकर संतुलित नृत्य का संयोजन और स्थिर मुद्रा भाव, वैसे तो शिव का तांडव नृत्य है, लेकिन जब इसी मुद्रा को मूर्त रूप दिया जाता है तो यही शिव कहलाते हैं, नटराज ! पत्थर पर उत्कीर्ण नटराज की ये                                                                                                                                                                                                                                                                                कलाकृतियां अजंता व एलोरा की गुफाओं में भी देखने को मिलती हैं।

भगवान महादेव के इस रूप वर्णन में शिव एक तरह से प्रकृति के अवयक्त रूप भी हैं। दरअसल अव्यक्त प्रकृति से महत्त्तव और महत्तत्व से अहंकार तत्व उत्पन्न होता है। इस अहंकार तत्व के अधिष्ठाता शिव हैं। अवतारवाद की कथा कहने वाले सभी पुराणों में विष्णु के नाभि-कमल से ब्रह्मा तथा ब्रह्मा के क्रोध से रूद्र अर्थात शिव की उत्पत्ति का वर्णन है। त्रिदेव के इस प्रादुर्भाव के क्रम में उनका पूर्वापरत्व सिद्ध है। अर्थात विष्णु प्रथम, ब्रह्मा द्वितीय और महेश यानी शिव का तृतीय स्थान अपने-अपने जन्म की वरिष्ठता के अनुसार हैं। इसीलिए इस त्रिदेववाद की कल्पना में ब्रह्मा सृष्टि की रचना, विष्णु सृष्टि का पालन और शिव संहार व प्रलय करने वाले देवता माने गए हैं।

शिव को अनेक नामों से जाना जाता है। इनमें महेष, शंकर, महेश्वर, महाकाल, ओंकारेश्वर, रुद्र, नीललोहित प्रमुख नाम हैं। शिव कई जगह अनेक अंगों-उपांगों वाले दर्शाए गए हैं। इन रूपों में उन्हें पंचानन, दशबाहु, त्रिनेत्र, त्रिशूली, अष्टमूर्ति, त्र्यम्बक, अर्धनारीश्वर, चंद्रधर, भूतनाथ और वृषवाहन के नामों से जाने जाते हैं। वृष यानी बैल उनका वाहन है। उनके हाथों में शक्ति, त्रिशूल, डमरू, यष्टि नामक अस्त्र उपलब्ध हैं। शिव की धर्म पत्नी गौरी भी गौरांगी हैं। इसलिए उनका नाम गौरी है। शिव जिस हिमालय में अधिकतम समय रहते हैं, चूंकि वह बर्फीला क्षेत्र है, इसलिए वह भी सफेद है।

एकमुखी और बहुमुखी शिव जिस रूप में भी हैं, उनका प्रकृति से गहरा रिश्ता है। पहले एकमुखधारी रूप में शिव की जटाएं पृथ्वी तत्व की,उसमें स्थित गंगा जल तत्व की, कपाल में स्थित तीसरा नेत्र अग्नि तत्व की, नीलकंठी गला वायुतत्व का और शब्दात्मक ध्वनि प्रकट करने वाला डमरू आकाश तत्व का प्रतीक है। जीवनदायी यही पंचमहाभूत हैं।

पंचमुखी शिव को यदि पांच महाभूतों का प्रतीक माना जाए तो उनके इन अलंकरणों को पंचतन्मात्रात्मक स्वरूप का प्रतीक माना जा सकता है। इन मुखों को विष्णु पुराण में सद्योजात, वामदेव, अघोर, तत्पुरुष तथा ईशान नामों से भी जाना गया है। इन पांच मुखों को पंचत्व का भी प्रतीक माना गया है। पंचतन्मात्र का उद्गम तामस अहंकार से माना गया है। ये मूर्त रूप में नहीं होते। ये ऐसी सूक्ष्म अवस्थाएं हैं, जिनका अनुभव किया जाता है। इसीलिए इन्हें अविशेष रूप में भी संबोधित किया जाता है। ये पांच तन्मात्र हैं, शब्द, रूप, रस, गंध तथा स्पर्श। इन्हीं अविशेष तन्मात्रों से स्थूल भूतों की सृष्टि होती है। ये स्थूल भूत इंद्रियों द्वारा ग्रहण करके अनुभूति मात्र से समझ आते हैं। इन तन्मात्रों में शब्द से आकाश, रूप से तेज, रस से जल, गंध से पृथ्वी तथा स्पर्श से वायु को आकार प्राप्त होता है।

शिव को पुराणों में दस भुजाओं वाला भी दर्शाया गया है। ये भुजाएं, दस दिशाओं की प्रतीक हैं। उनके हाथों में जो दस प्रकार के आयुध हैं, वे दस कारणों के अधिष्ठता होने के साथ, दस देवताओं की प्रतिकात्मक शक्ति के प्रतीक हैं। शिव अपने मस्तक पर पंचमी को प्रकट करने वाले चंद्रमा का आकार रूप धारण किए हुए हैं। इसीलिए शिव को चंद्रधर, चंद्रशेखर या चंद्रमौली कहा जाता है। चंद्रमा को सात्विक अंहकार का भी प्रतीक माना गया है। चंद्रमा की कपाल पर यह उपस्थिति उनके मनोहारी होने के भाव को भी अभिव्यक्ति देती है। पंचमी के इस चंद्रमा का जो कला रूप शिव के भाल पर प्रस्तुत है, उसका संबंध चंद्रमा की घटती-बढ़ती कलाओं से भी है, जो शिव के अंतर्मन में आलोड़ित होने वाले संकल्प व विकल्प की असमंजस रूपी मनस्थिति का प्रतीक है।

शिव त्रिनेत्रधारी हैं। अर्थात उनकी तीन आंखें हैं। शिव की ये तीन आंखें सूर्य,च्रद्रमा तथा अग्नि की द्योतक हैं। इन तीन चक्षुओं को अंहकार के तीन गुण, सत्व, रज तथा तम का भी प्रतीक भी माना गया है। अब त्रिशूलधारी शिव को जानते हैं। शिव का प्रमुख अस्त्र त्रिशूल है। इसी से शिव अनाचारी व अन्यायिओं का दण्ड देते हैं। त्रिशूल के तीन शूल दैहिक, दैविक तथा भौतिक तापों का प्रतीक हैं। चूंकि अहंकार से दुखों की उत्पत्ति होती है, इसलिए त्रिशूल के तीन शूलों को उपरोक्त तीन तापों का प्रतीक माना गया है।

पुराणों में शिव के आठ रूप भी दर्शाए गए हैं। ये रूप हैं रुद्र, भव, शर्व, ईशान, उग्र, पशुपति, भीम तथा महादेव। इन्हें आठ रुद्र भी कहा जाता है। इन रुद्रों के निवास स्थान के रूप में सूर्य, जल, पृथ्वी, वायु, अग्नि, आकाश, दीक्षित, ब्रह्माण्ड एवं चंद्रमा का भी उल्लेख है। रुद्रों के इन्हीं आवास-स्थलों को अष्टमूर्तियों के प्रतीकों के रूप में जाना जाता है। अर्थात शिव की इन अष्टमूर्तियों में अंततः एक तो मनुष्य की जो आठ मूल प्रकृतियां हैं, पंचतन्मात्र, अहंकार, बुद्धि तथा अव्यक्त उन्हें अभिव्यक्त किया गया है, दूसरे इन्हीं में से पांच पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु तथा आकाश तत्व एवं पंचतन्मात्र की और तीन महत् अव्यक्त एवं अहंकार का प्रतीक हैं। इसी प्रकार चंद्रमा को समाधि रूपों में दर्शाया गया है। वैसे अब विज्ञान ने मान लिया है कि अंततः ब्रह्माण्ड का उद्गम सोम अर्थात चंद्रमा और अग्नि अर्थात सूर्य से अस्तित्व में आया है। भौतिक प्रकृति को बनाने वाले दिन और रात के उदय व अस्त होने की स्थिति भी सूर्य और चंद्रमा की चाल पर निर्भर है। दिन में सूर्य अर्थात अग्नि की प्रधानता रहती है, जबकि रात में चंद्रमा यानी सोम तत्व की। चंद्रमा अपनी परिवर्तनशील कलाओं को व्यक्त करता हुआ घटता-बढ़ता रहता है। इसीलिए शिव को काल यानी समय का देवता भी माना गया है। यदि पंचतत्व से निर्मित संपूर्ण भौतिक जगत की एक यज्ञ के रूप में परिकल्पना करें तो सभी भौतिक पदार्थ यज्ञ की समिधा होंगे, सूर्य उनको जलाने वाली आग और चंद्रमा उसमें दी जाने वाली आहुति और इस सृष्टि रूपी यज्ञ की प्रक्रिया को संपन्न करने वाले व्यक्ति कहलाएंगे, भगवान शिव। अर्थात शिव का जो अलंकारिक विलक्षण रूप है, उसमें सृष्टि समाई हुई है। सृष्टि को इतने सूक्ष्म एवं एक रूप में अभिव्यक्त कर देना हमारे पुराणकारों की अनूठी बौद्धिक कल्पनाशीलता का विलक्षण प्रतिबिंब है।

पुराणों में शिव की कल्पना एक ऐसे विशिष्ट व्यक्ति के रूप में की गई है,जिसका आधा शरीर,स्त्री का तथा आधा शरीर पुरुष का है। शिव का यह स्त्री व पुरुष मिश्रित शरीर अर्धनारीश्वर के नाम से जाना जाता है। शिव पुराण के अनुसार शिव को इस रूप-विधान में परम पुरुष ब्रह्मात्मक मानकर, ब्रह्म से भिन्न उसकी शक्ति माया को स्त्री के आधे रूप में चित्रित किया गया है। शिव का रूप अग्नि एवं सोम अर्थात सूर्य एवं चंद्रमा के सम्मिलन का भी रूप है। यानी पुरुष का अर्धांश सूर्य और स्त्री का अर्धांश चंद्रमा के प्रतीक हैं। यह भी पुराण सम्मत मान्यता है कि सृष्टि के आरंभ में फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी के दिन शिव और शक्तिरूपा पर्वती हुए थे। कथा में यह भी है कि इसी दिन शिव अत्यंत क्रोधित हुए और संपूर्ण ब्रह्माण्ड के विनाष के लिए विश्व प्रसिद्ध तांडव नृत्य करने लगे। शिव स्वयं यह मानते हैं कि स्त्री-पुरुष समेत प्रत्येक प्राणी की ब्रह्माण्ड में स्वतंत्र सत्ता स्थापित है। इसे ही वैयक्तिक रूप में ब्रह्मात्मक या आत्मपरक माना गया है।

अर्घनारीश्वर के संदर्भ में जो प्रमुख कथा प्रचलन में है,वह है, जब ब्रह्मा ने सृष्टि के विधान को आगे बढ़ाने की बात सोची और इसे साकार करना चाहा, तो उन्हें इसे, अकेले पुरुष रूप से आगे बढ़ाना संभव नहीं लगा। तब उन्होंने शिव को बुलाकर अपना मंतव्य प्रगट किया। शिव ने ब्रह्मा के मूल भाव को समझते हुए उन्हें अर्घनारीश्वर में दर्शान दिए। अर्थात स्त्री और पुरुष के सम्मिलन या सहवास से सृष्टि के विकास की परिकल्पना दी। इस सूत्र के हाथ लगने के बाद ही ब्रह्मा सृष्टि के क्रम को निरंतर गतिशील बनाए रखने का विधान रच पाए। सच्चाई भी यही है कि स्त्री व पुरुष का समन्वय ही सृष्टि का वास्तविक विधान है। इसीलिए स्त्री को प्रकृति का प्रतीक भी माना गया है। अर्थात प्रकृति में जिस तरह से सृजन का क्रम जारी रहता है, मनुष्य-योनी में उसी सृजन प्रक्रिया को स्त्री गतिशील बनाए हुए है। अर्धनारीश्वर यानी आधे-आधे रूपों में स्त्री और पुरुष की देहों का आत्मसात हो जाना, शिव-गौरी का वह महा-सम्मिलन है, जो सृष्टि के बीज को स्त्री की कोख, अर्थात प्रकृति की उर्वरा भूमि में रोपता है। सृष्टि का यह विकास क्रम अनवरत चलता रहे, इसीलिए सृष्टि के निर्माताओं ने इसमें आनंद की उत्तेजक सुखानुभूति भी जोड़ दी है। सृष्टि के इस आदिभूत मातृत्व व पितृत्व को पुराणों की प्रतीकात्मक भाशा में पर्वती-परमेश्वर या शिव-पर्वती कहा गया है। अर्थात शिव-शक्ति के साथ संयुक्त होकर अद्र्वनारीश्वर बन जाते हैं। इसलिए शिव से कहलाया गया है कि शक्ति यानी स्त्री को स्वीकार किए बिना पुरुष अपूर्ण है। उसे शिव की प्राप्ती नहीं हो सकती। स्त्री के सहयोग के बिना कोई कल्पना फलित नहीं हो सकती। इसीलिए पुरुषरूपी शिव और प्रकृति रूपी स्त्री जब अर्धनारीश्वर के रूप में एकाकार होते हैं तो सभी भेद और विकार स्वतः समाप्त हो जाते हैं। अर्थात जब पति-पत्नी के रूप में स्त्री-पुरुष एक दूसरे को आंतरिक रूप से तृप्त करते हैं, तभी अर्धनारीश्वर स्वरूप सार्थक होता है। अर्धनारीश्वर की तरह एकाकार हुए बिना हम अपने जीवन अर्थात काल को आनंद या सुख की अनंत अनुभूति के साथ जी ही नहीं सकते हैं। मनुष्य जीवन में सुख अनंत काल तक बना रहे, इस हेतु स्त्री-पुरुष का एकालाप भी युग-युगांतरों में बने रहना जरूरी है।

शिव माथे पर जो त्रिपुण्ड धारण किए हुए हैं और पूरे शरीर पर जो भस्म लपेटते हैं, उसके भी प्रकृति की महिमा से जुड़े महत्व व उपयोग हैं। शिव के ललाट पर तीन अनुप्रस्थ यानी बहुधा चौड़ी रेखाएं हैं। त्रिपुण्ड रूपी इन तीन रेखाओं में त्रिपुर रूपी तीनों लोक पृथ्वी, पाताल और आकाश प्रतीक रूप में विद्यमान हैं। हालांकि वेदों में इन्हें पृथ्वी, वायुमंडल और आकाश रूपों में चित्रित किया गया है। ब्रह्माण्ड के लोकों की कल्पना के साथ मनुष्य के शरीर की आंतरिक सरंचना भी त्रिपुण्ड में अंतनिर्हित है। इस दृष्टि से पहली रेखा पृथ्वी या भूलोक के साथ देहात्मा और क्रियाशक्ति स्वरूप मानी गई है। दूसरी रेखा, अंतरिक्ष अर्थात वायुमंडल के अलावा इच्छाशक्ति की प्रतीक मानी गई है। तीसरी रेखा आकाश अर्थात स्वर्गलोक के अलावा ज्ञानशक्ति स्वरूप मानी गई है। त्रिपुण्ड, त्रिशूल का भी प्रतीक है, जो संघर्षकाल में, मार्ग  में आने वाले शूलों को नष्ट करता है। त्रिपंुण्ड शिव के तीन नेत्रों का प्रतीक माना गया है। त्रिपुंण्ड के बीच वाली रेखा पर वृत्त के रूप में उभरी हुई बिंदी भी अंकित है। यह बिंदी आम धारणा के अंतर्गत तो शिव पत्नी सती के प्रतीक स्वरूप मानी जाती है, इस नाते बिंदी का महत्व एक रूढ़िवादी परंपरा को ढोते रहने तक सीमित होकर रह जाता है। जबकि इसका मनुष्य की शारीरिक सरंचना से जुड़ा वैज्ञानिक महत्व है। इससे यह पता चलता है कि हमारे ऋषि-मुनियों ने मानव विकास और जीव विकास के क्रम में शरीर की आंतरिक सरंचना को तो समझ ही लिया था, साथ ही शरीर के भीतरी अंगों को पोशण के लिए ऊर्जा कैसे मिले, ये उपाय सुझाने में भी वे सक्षम हो गए थे।

त्रिपुण्ड, तिलक, टीका या फिर बिंदी के अपने महत्व हैं। इनका गूढ़ रहस्य यह है कि शरीर में जितनी भी तंत्रिकाएं हैं, कोशिकाएं हैं, इन सभी की श्रृखंलाबद्ध सरंचनाएं मस्तिष्क से जुड़ी हैं। इस कारण मस्तिष्क सभी संवेगों और संवेदनाओं का केंद्र बिंदु है। बुद्धि के तीन रूप, स्मरण, प्रतिभा और ज्ञान होते हैं अर्थात बुद्धि की प्रतीक भी ये तीन रेखाएं हैं। भस्म, चंदन या रोली का तिलक या त्रिपुण्ड मस्तिष्क को उसी प्रकार ऊर्जावान बनाए रखने का काम करते हैं, जिस तरह से एक कांच के टुकड़े पर सूर्य की किरणें केंद्रित करने से अग्नि प्रज्वलित हो उठती है, उसी तरह तिलक मस्तिष्क में ऊर्जा का संचार करने का काम करता है। इस कारण इसे सात्विक गुणों का प्रतीक भी माना जाता है।

हिमालय पर ध्यानस्थ शिव, शरीर पर भस्मी का लपेटे हुए दिखाए जाते हैं। चूंकि शिव संहार के प्रतीक माने गए हैं, इस दृष्टि से भस्म, राख के रूप में एक ऐसी वस्तु है, जो जलकर जिस रूप में थी, अपना वह जीवन नष्ट कर चुकी है। यानी नश्वर हो चुकी है। अब भस्म ऐसे रूप में है, जिसे न तो जलाया जा सकता है और न ही नष्ट किया जा सकता है, अर्थात भस्म जिस रूप में है, वह पांच तत्वों का अनश्वर रूप है। अनश्वर आत्मा को माना गया है और आत्मा सनातन धर्म के मतानुसार अमर है। अनश्वर है। वह कभी नष्ट नहीं होती है। इसलिए शिव भस्म को लपेटते हैं। ‘कालग्निरूद्रोपनिशद्‘ में पीपल और खैर की समिधा से रूपांतरित हुई भस्म को श्रेष्ठ माना गया है। इसी अनुसार आज भी हवन व यज्ञ में पीपल व खैर की लकड़ियां ही समिधा के रूप में प्रयोग में लाई जाती हैं।

शिव-लिंग का रहस्य जाने बिना, शिव-महिमा का बखान अधूरा है। इसलिए लिंग के प्रकृति से जुड़े महत्व और इसकी पूजा के कारण भी जान लेते हैं। वैसे आम प्रचलन में तो यही मान्यता है कि शिव और शक्ति दोनों का संयोगात्मक प्रतीक ही शिव-लिंग है। और यही इनकी माया है। क्योंकि सामान्यतः पुरुष और स्त्री के गुप्तंगों का आभास देने वाले शिव-लिंग की प्रतीक मूर्तियों से साधारण अर्थ यही निकलता है। लेकिन ‘स्कंदपुराण‘ में इसका अर्थ प्रकृति की चेतना से संबंधित है, आर्थात आकाश लिंग है और पृथ्वी उसकी पीठिका है। यह आकाश इसलिए लिंग कहलाता है, क्योंकि इसी में समस्त देवताओं का निवास है और इसी में वे गतिशील रहते हैं। आकाश को पुराणकारों ने इसलिए लिंग माना है, क्योंकि इसका स्वरूप शिव-लिंग जैसा अर्ध-वृत्ताकार है। दूसरे वह पृथ्वी रूपी पीठिका पर स्थित या अधिरोपित होने जैसा दिखाई देता है।

प्रकृतिमय इसी लिंग के आकार का वर्णन लिंग पुराण में है। इसके अनुसार सभी लोकों का स्वरूप लिंग के आकार का है। इसी लिंग में ब्रह्मा समेत सभी चर-अचर जीव, बीज स्वरूप लघु रूपों में प्रतिश्ठित हैं। सांख्य दर्शान भी लिंग और योनि को प्रकृति के रूपों में देखता है। इसमें व्यक्त प्रकृति के लिए लिंग शब्द का उपयोग किया गया है, जबकि अव्यक्त प्रकृति के लिए अलिंग शब्द का। अलिंग अर्थात जो लिंग नहीं है, यानी इसका आशय योनि से है। अर्थात शिव-लिंग के रूप में जिस मूर्ति की पूजा की जाती है ,वह लौकिक स्त्री-पुरुष के जननांग नहीं, वरन् विश्व जननी व्यक्त एवं अव्यक्त प्रकृति की मूर्तिस्वरूपा प्रतिमा है। शिवपुराण में शिव-लिंग को चैतन्यमय और लिंगपीठ को अंबामय बताया गया है। किंतु लिंग पुराण में लिंग को शिव और उसके आधार को शिव-पत्नी बताया गया है। यहीं से यह मान्यता लोक प्रचलन में आई कि शिव-लिंग उमा-महेश के प्रतीक स्वरूप हैं।

लिंग-पुराण में एक जगह शिव-लिंग को त्रिदेव का घोतक भी बताया गया है..,

‘मूले ब्रह्मा तथा मध्ये विष्णुस्त्रि भुवनेश्वरः।

अर्थात लिंग के मूल में ब्रह्मा, मध्य में विष्णु तथा शीर्ष पर भगवान शिव का निवास माना गया है।

शिव-लिंग को ज्योतिर्लिंग कहे जाने तथा उसके जन्म के विशय में भी लिंग पुराण में एक कथा है, जो लिंग को प्रकृति के प्रतीक रूप में प्रस्तुत करती है। इस कथा के अनुसार एक दिन ब्रह्मा और विष्णु में विवाद छिड़ गया। इस विवाद के फलस्वरूप ही ज्योतिर्लिंग का आविर्भाव वायुमंडल में अचानक हुआ। अततः इस अद्भुत शक्तिशाली ज्यातिर्लिंग के उद्भव को संज्ञान में लेने में ब्रह्मा व विष्णु असमर्थ रहे, तब दिव्यवाणी के एकाएक गूंजने से उन्हें पता चला कि यह तो महादेव का प्रताप है। इससे अर्थ यह निकलता है कि पहले पहल संसार में कुछ भी नहीं था,किंतु शिव थे। प्रकाश-पुंज रूपी शिव ही विद्युत-पुरुष ज्योतिर्लिंग रूप में अवतरित हुए। गोया, प्रकृति में प्रतिष्ठित शिवतत्व ही लिंग है, जबकि प्रकृति के तीनों गुण, सत्व, रज और तम त्रिकोण रूप में योनि स्वरूप में अवस्थित हैं। ये गुण जलहरी रूप में हैं। इन्हीं से सृष्टि की उत्पत्ति होती है। इस तरह से शिव-लिंग, शिव-शक्ति के मिलन का त्रिदेव के संघात का तथा व्यक्त एवं अव्यक्त प्रकृति का अनुपम प्रतीक चिन्ह है। पुराणकारों और उस समय प्रकृति के रहस्यों को खंगालने पर प्रस्तर प्रतिमाओं में ढालने में लगे शिल्पकारों को लिंग और योनि के अतिरिक्त सृजन का इससे और कौन सी श्रेष्ठ परिकल्पना हो सकती थी ? सृष्टि का प्रत्येक जीवधारी इन्हीं जननांगों से ही तो सृष्टि के सृजन में संलग्न था।

वैदिक ऋचाओं को पढ़ने वाले जानते होंगे कि रुद्र गण शक्तिशाली होने के साथ, स्वेच्छाचारी भी थे। लेकिन इनकी स्वेच्छाचारिता स्वाभिमान से जुड़ी हुई थी। ये लोग उस समय के प्रमुख संगठक व नेतृत्वकर्ता इंद्र, वरूण, दैत्य व दानव किसी भी समूह में रहना पसंद नहीं करते थे। जब इंद्र ने देव संगठन बना लिया और उसका स्वयं को स्वयंभू घोषित करते हुए देवराज इंद्र कहलाना शुरू कर दिया, तब इंद्र ने रुद्रों की उपेक्षा की। उन्हें अपने संगठन से वंचित रखा । परिणामस्वरूप वे यज्ञ-भाग से भी वंचित हो गए। इसके साथ ही सूर्य समेत इन सब देवों ने व्यक्ति-पूजा की शुरूआत कर दी। ब्रह्माणों को दान-दक्षिणा देकर अपनी अर्चना से संबद्ध प्रार्थना से जुड़े स्तुति गान और वैदिक सूक्तों की नई रचनाओं के माध्यम से प्रशंसा-प्रणाली की एक वैचारिक धारा को जन्म दे दिया। इस एकपक्षीय स्थिति का निर्माण होते देख रुद्रों को अपने अस्तित्व की चिंता सताने लगी और उन्होंने इस विशय को गंभीरता से लेते हुए भग और लिंग की पूजा प्रारंभ कर दी। मिट्टी, काठ व पत्थर के योनि-लिंग भी इसी कालखंड में अस्तित्व में आने लग गए। रुद्रों के द्वारा इस पूजा के शुरू होने से जो लोग इनके समर्थक थे व इनके गुटों से जुड़े थे, वे भी लिंग पूजक बन गए। चूंकि ये लोग ताकतवर थे और इनके भी निष्ठावान अनुयायिओं की एक पूरी श्रृंखला थी, इसलिए लिंग-पूजा ने एक प्रथा का विस्तृत रूप ले लिया।

शिव महिमा के अंत में शिव के वाहन नंदी यानी वृषभ का वर्णन जरूरी है। नंदी शिव के वाहन के रूप में इसलिए उपयुक्त हैं, क्योंकि वृषभ लोकव्यापी प्राणी होने के साथ खेती-किसानी का भी प्रमुख आधार है। यानी खेती का यांत्रिकीकरण होने से पहले बिना बैल के खेती संभव ही नहीं थी। फिर शिव ने लोक कल्याण की दृष्टि से सर्वहारा वर्ग के ज्यादा हित साधे हैं, उन्हीं के बीच उन्होंने अधिकतम समय बिताया है। इसलिए ऐसे उदार नायक का वाहन बैल ही सर्वोचित है। नंदी के वाहन होने के कारण शिव को नंदीश्वर, वृषध्वाज, वृषध्वज और वृषभकेतन नामों से भी विष्णुधर्मोत्तरपुराण, मत्स्यपुराण, रामायण और महाभारत में उल्लेख किया गया है।

हमारे ऋषि-मुनियों ने प्रकृति के रहस्यों की गवेशणा की आरंभिक अवस्था में ही समझ लिया था कि प्रकृति के अन्य जीव-जगत के साथ ही मनुष्य का सह-अस्तित्व संभव व सुरक्षित है। इसी कारण सभ्यता और संस्कृति का विकास क्रम आगे बढ़ा, वैसे-वैसे अलौकिक शक्तियों में प्रकृति के रूपों को प्रक्षेपित करने के साथ, पशु-पक्षियों को भी देवत्व से जोड़ते गए। नंदी को विरक्ति का द्योतक माना जाता है,इसलिए साधनारत शिव के लिए नंदी शक्ति के भी प्रतीक हैं।

पुराणों में वृषभ को धर्म-रूप में प्रस्तुत किया गया है। इनके चार पैरों को सत्य, ज्ञान, ताप तथा दान का प्रतीक माना गया है। शिव-लिंग की उत्पत्ति को विद्युत तरंगों से भी होना मानते हैं। इसके आकार को ब्रह्माण्ड का रूप माना गया है। इस कारण शिव को विद्युताग्नि और नंदी को बादलों का प्रतीक माना गया है। बादल के प्रतीक होने के कारण ही शिव के नंदी शुभ्र ष्वेत हैं। शिव-लिंग के रूप में योनि और लिंग प्रजनन के शक्ति के प्रतीक भी हैं, इसलिए वृषभ को काम का प्रतीक भी माना गया है। इसे काम का प्रतीक इसलिए भी माना गया है, क्योंकि इसमें काम शक्ति प्रचुर मात्रा में होती है। इस नाते वृषभ, सृजन शक्ति का प्रतीक है। शिव को नंदी पर आरूढ़ भी दिखाया गया है। इसका आशय है, एक शिव ही हैं, जो कामियों की वासनाओं को नियंत्रित करने में या उन पर विजय प्राप्त करने में सक्षम हैं। स्पष्ट है, काम के रूप में वृषभ का प्रतीक शिव को विश्व की सृष्टि के लिए अभिप्रेरणा का द्योतक भी है।

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