दीपक चौरसिया ‘मशाल’

Author:   दीपक चौरसिया ‘मशाल’

आप स्कूल आफ फार्मेसी, क्वीन्स युनिवरसिटी, बेल्फास्ट, उत्तरी आयरलैंड, यु. के. से फार्मेसी में स्नातक कर रहें हैं। आपकी लेखन में गहरी रुची है। आप समसामयिक विषयों, पर लेख, व्यंग्य व गीत - गज़ल लिखते हैं।

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बेज़ार मैं रोती रही, वो बे-इन्तेहाँ हँसता रहा

बेज़ार मैं रोती रही, वो बे-इन्तेहाँ हँसता रहा

बेज़ार मैं रोती रही, वो बे-इन्तेहाँ हँसता रहा। वक़्त का हर एक कदम, राहे ज़ुल्म पर बढ़ता रहा। ये सोच के कि आँच से प्यार की पिघलेगा कभी, मैं मोमदिल कहती रही, वो पत्थर बना ठगता रहा। उसको खबर नहीं थी कि मैं बेखबर नहीं, मैं अमृत समझ पीती रही, वो जब भी ज़हर देता [...]

काव्यपाठ और राजनीति – दीपक चौरसिया ‘मशाल’

काव्यपाठ और राजनीति - दीपक चौरसिया 'मशाल'

” ऐसी रचनाएँ तो सालों में, हजारों रचनाओं में से एक निकल के आती है. मेरी तो आँख भर आई” “ये ऐसी वैसी नहीं बल्कि आपको सुभद्रा कुमारी चौहान और महादेवी वर्मा जी की श्रेणी में पहुँचाने वाली कृति है”

एक समसामयिक राजनीतिक व्यंग्य – दीपक ‘मशाल’

एक समसामयिक राजनीतिक व्यंग्य - दीपक 'मशाल'

आज की ताज़ा खबर, आज की ताज़ा खबर… ‘कसाब की दाल में नमक ज्यादा’, आज की ताज़ा खबर…चौंकिए मत, क्या मजाक है यार, आप चौंके भी नहीं होंगे क्योंकि हमारी महान मीडिया कुछ समय बाद ऐसी खबरें बनाने लगे तो कोई बड़ी बात नहीं.

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