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	<title>Comments on: राजनीति में धर्म की उपयोगिता ?</title>
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	<description>Online Hindi Magazine, Hindi News, Hindi Newspaper, Hindi Magazine, Hindi Website, Hindi Portal, Hindi Blog, हिन्दी : न्यूज़ पेपर, समाचारपत्र, मैगजीन, वेबसाइट, पोर्टल, ब्लाग</description>
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		<title>By: dr.rajesh kapoor</title>
		<link>http://www.pravakta.com/?p=6277&#038;cpage=1#comment-4462</link>
		<dc:creator>dr.rajesh kapoor</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 30 Jun 2010 16:57:48 +0000</pubDate>
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		<description>जाफरी जी, आपके लेखन में इमानदारी तो झलकती है पर इतना तो मानना ही होगा की कोई भी पूर्वाग्रहों का शिकार अनजाने में बन सकता है. कहीं आप भी इसका शिकार तो नहीं. जब भी सांप्रदायिक संकीर्ण सोच की आलोचना करनी हो तो केवल हिन्दू प्रतीक ही निशाना क्यों बनजाते हैं ? जीत भार्गव जी ने बड़ी सही -सटीक बात कही है. दुनियां के कुछ सम्प्रदायों ने पंथ के नाम पर अनगिनत मानवों का रक्त अनेक सदियों तक बहाया है. भारतीय मूल के एक भी सम्प्रदाय का ऐसा इतिहास अपवाद स्वरुप ही मिलेगा. प्राप्त प्रमाणों के अनुसार भारत में धर्म ने राजनीती का सदा सुधार और संशोधन ही किया है. सर्वस्वत्यागी संतों ने सदा राजनीती और सत्ता का सही दिशा में मार्गदर्शन किया है. 
ज़रा विश्व इतिहास तो देखें,  बाहरी सम्प्रदायों ने सत्ता के सहयोग से अमानवीय अत्याचार अपने सम्प्रदायों के नाम पर किये हैं. क्या यह इमानदारी की बात है कि उस रक्तरंजित अतीत पर तो हम एक शब्द नहीं लिखते, सारे संसार को सुसभ्य,सुसंस्कृत बनाने वाली भारतीय संस्कृति और धर्म पर आधारहीन लानछन लगाते रहते हैं. 
जाफरी जी ,यदि जानना चाहें कि भारत ने संसार के किन देशों को कब सभ्य बनाया तो दर्जनों प्रमाण उपलब्ध हैं,चाहें तो कुछ प्रमाण भेजने में मुझे प्रसन्नता होगी. यह  कमाल कि बात जानकर आपको अचा लगेगा और गौरव होगा  कि भारत ने विश्व कि सांस्कृतिक विजय सैनिक आक्रमण के बिना केवल ज्ञान और सेवा के बल पर की थी . 
ऐसी  श्रेष्ठ संस्कृति, धर्म के बारे में गहराई से जानकर जन व मानव मात्र के हित में उसका प्रचार प्रसार किया जाना चाहिए न की ठीक से समझे बिना धर्म और सम्प्रदाय की घालमेल करनी चाहिए .
सादर सुझाव है की अगर नहीं जानते तो जानलें की सम्प्रदाय और धर्म बिलकुल अलग-अलग हैं. सम्प्रदाय भी दो प्रकार के हैं, एक तो भारतीय और दूसरे विदेशी या सेमेटिक. सह अस्तित्व भाव, सहिष्णुता सेमेटिक सम्प्रदायों में कितनी है, यह बताने की ज़रूरत तो नहीं है न? सारे सम्प्रदायों को सामान मानने की सोच भारत के इलावा  विश्व के किसी सम्प्रदाय में है कहीं? इस सहनशीलता, इस सज्जनता का दुरूपयोग करना तो भले लोगों का काम नहीं. अति तो हर बात की खराब साबित होती है. 
शुभाकांक्षी,</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>जाफरी जी, आपके लेखन में इमानदारी तो झलकती है पर इतना तो मानना ही होगा की कोई भी पूर्वाग्रहों का शिकार अनजाने में बन सकता है. कहीं आप भी इसका शिकार तो नहीं. जब भी सांप्रदायिक संकीर्ण सोच की आलोचना करनी हो तो केवल हिन्दू प्रतीक ही निशाना क्यों बनजाते हैं ? जीत भार्गव जी ने बड़ी सही -सटीक बात कही है. दुनियां के कुछ सम्प्रदायों ने पंथ के नाम पर अनगिनत मानवों का रक्त अनेक सदियों तक बहाया है. भारतीय मूल के एक भी सम्प्रदाय का ऐसा इतिहास अपवाद स्वरुप ही मिलेगा. प्राप्त प्रमाणों के अनुसार भारत में धर्म ने राजनीती का सदा सुधार और संशोधन ही किया है. सर्वस्वत्यागी संतों ने सदा राजनीती और सत्ता का सही दिशा में मार्गदर्शन किया है.<br />
ज़रा विश्व इतिहास तो देखें,  बाहरी सम्प्रदायों ने सत्ता के सहयोग से अमानवीय अत्याचार अपने सम्प्रदायों के नाम पर किये हैं. क्या यह इमानदारी की बात है कि उस रक्तरंजित अतीत पर तो हम एक शब्द नहीं लिखते, सारे संसार को सुसभ्य,सुसंस्कृत बनाने वाली भारतीय संस्कृति और धर्म पर आधारहीन लानछन लगाते रहते हैं.<br />
जाफरी जी ,यदि जानना चाहें कि भारत ने संसार के किन देशों को कब सभ्य बनाया तो दर्जनों प्रमाण उपलब्ध हैं,चाहें तो कुछ प्रमाण भेजने में मुझे प्रसन्नता होगी. यह  कमाल कि बात जानकर आपको अचा लगेगा और गौरव होगा  कि भारत ने विश्व कि सांस्कृतिक विजय सैनिक आक्रमण के बिना केवल ज्ञान और सेवा के बल पर की थी .<br />
ऐसी  श्रेष्ठ संस्कृति, धर्म के बारे में गहराई से जानकर जन व मानव मात्र के हित में उसका प्रचार प्रसार किया जाना चाहिए न की ठीक से समझे बिना धर्म और सम्प्रदाय की घालमेल करनी चाहिए .<br />
सादर सुझाव है की अगर नहीं जानते तो जानलें की सम्प्रदाय और धर्म बिलकुल अलग-अलग हैं. सम्प्रदाय भी दो प्रकार के हैं, एक तो भारतीय और दूसरे विदेशी या सेमेटिक. सह अस्तित्व भाव, सहिष्णुता सेमेटिक सम्प्रदायों में कितनी है, यह बताने की ज़रूरत तो नहीं है न? सारे सम्प्रदायों को सामान मानने की सोच भारत के इलावा  विश्व के किसी सम्प्रदाय में है कहीं? इस सहनशीलता, इस सज्जनता का दुरूपयोग करना तो भले लोगों का काम नहीं. अति तो हर बात की खराब साबित होती है.<br />
शुभाकांक्षी,</p>
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		<title>By: Mohammad</title>
		<link>http://www.pravakta.com/?p=6277&#038;cpage=1#comment-4455</link>
		<dc:creator>Mohammad</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 30 Jun 2010 06:53:12 +0000</pubDate>
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		<description>हमें निश्चित रूप से यह मान लेना चाहिए कि धर्म व राजनीति के मध्य रिश्ता स्थापित कर यदि कोई नेता अथवा धर्मगुरु हमसे किसी पार्टी विशेष के लिए वोट मांगता है तो ऐसा व्यक्ति अथवा संगठन हमारी धार्मिक भावनाओं से खिलवाड़ करने की ही कोशिश मात्र कर रहा है। 
सही कह है जाफरी साहब</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>हमें निश्चित रूप से यह मान लेना चाहिए कि धर्म व राजनीति के मध्य रिश्ता स्थापित कर यदि कोई नेता अथवा धर्मगुरु हमसे किसी पार्टी विशेष के लिए वोट मांगता है तो ऐसा व्यक्ति अथवा संगठन हमारी धार्मिक भावनाओं से खिलवाड़ करने की ही कोशिश मात्र कर रहा है।<br />
सही कह है जाफरी साहब</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: jagannath mishra</title>
		<link>http://www.pravakta.com/?p=6277&#038;cpage=1#comment-2298</link>
		<dc:creator>jagannath mishra</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 29 Jan 2010 23:41:01 +0000</pubDate>
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		<description>बहुत अच्छा लिखा जाफरी साहब आपने .कमाल का लिखते हैं आप.आलाचकों का क्या इनकी तो भाषा से ही पता चलती है इनकी सोच भी ओकात भी.दुसरे की फटती है लिख रहे है ओर अपना नाम भी छुपा रहे हैं खुद ही समझ लीजिये किसकी फटती है.आज गाँधी जी की पुण्य तिथी पर आप का लेख गाँधी जी को सच्ची श्रधांजलि है. खूब लिखिए यूंही लिखिए देश आप के ओर आप के विचारों के साथ है तालिबानों ओर गोडसे परस्तों को आइना दिखाते रहिये.जगन्नाथ मिश्र</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>बहुत अच्छा लिखा जाफरी साहब आपने .कमाल का लिखते हैं आप.आलाचकों का क्या इनकी तो भाषा से ही पता चलती है इनकी सोच भी ओकात भी.दुसरे की फटती है लिख रहे है ओर अपना नाम भी छुपा रहे हैं खुद ही समझ लीजिये किसकी फटती है.आज गाँधी जी की पुण्य तिथी पर आप का लेख गाँधी जी को सच्ची श्रधांजलि है. खूब लिखिए यूंही लिखिए देश आप के ओर आप के विचारों के साथ है तालिबानों ओर गोडसे परस्तों को आइना दिखाते रहिये.जगन्नाथ मिश्र</p>
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		<title>By: Jeet Bhargava</title>
		<link>http://www.pravakta.com/?p=6277&#038;cpage=1#comment-2281</link>
		<dc:creator>Jeet Bhargava</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 28 Jan 2010 19:30:12 +0000</pubDate>
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		<description>महोदय, सबसे पहले तो लेख के साथ लगी फोटो ही आपत्तिजनक है. इससे किसी धर्म विशेष पर ही उंगुली उठाने की पूर्वाग्रह युक्त सेकुलर परम्परा की बू आती है. दूसरी बात धर्म को नष्ट करने की नहीं बल्कि उसे सही ढंग से समझने -समझाने की जरूरत है. तीसरी बात भारत के इतर राजनीती और धर्म का सम्बन्ध बहुत ही भयावह रहा है. बाहर के मुल्को में राजनीति ने कभी इस्लाम तो कभी ईसाइत के साथ मिलकर काफी अनर्थ किए हैं. लेकिन भारत में ऐसा नहीं हुआ है. यहाँ धर्म ने राजनीति को नैतिक राह दिखाने और व्यापक जनहित के लिए प्रतिबद्ध रहने का पाठ सीखाया है. जिस पर गौर करना आवश्यक है.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>महोदय, सबसे पहले तो लेख के साथ लगी फोटो ही आपत्तिजनक है. इससे किसी धर्म विशेष पर ही उंगुली उठाने की पूर्वाग्रह युक्त सेकुलर परम्परा की बू आती है. दूसरी बात धर्म को नष्ट करने की नहीं बल्कि उसे सही ढंग से समझने -समझाने की जरूरत है. तीसरी बात भारत के इतर राजनीती और धर्म का सम्बन्ध बहुत ही भयावह रहा है. बाहर के मुल्को में राजनीति ने कभी इस्लाम तो कभी ईसाइत के साथ मिलकर काफी अनर्थ किए हैं. लेकिन भारत में ऐसा नहीं हुआ है. यहाँ धर्म ने राजनीति को नैतिक राह दिखाने और व्यापक जनहित के लिए प्रतिबद्ध रहने का पाठ सीखाया है. जिस पर गौर करना आवश्यक है.</p>
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	<item>
		<title>By: Taarkeshwar Giri</title>
		<link>http://www.pravakta.com/?p=6277&#038;cpage=1#comment-2269</link>
		<dc:creator>Taarkeshwar Giri</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 28 Jan 2010 12:12:50 +0000</pubDate>
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		<description>बहुत ही अच्छी पोस्ट लिखी है आपने , SACHMUCH AAJ JARURAT है TO AAP JAISE VICHARO WALE INSAN KI</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>बहुत ही अच्छी पोस्ट लिखी है आपने , SACHMUCH AAJ JARURAT है TO AAP JAISE VICHARO WALE INSAN KI</p>
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	<item>
		<title>By: उम्दा सोच</title>
		<link>http://www.pravakta.com/?p=6277&#038;cpage=1#comment-2268</link>
		<dc:creator>उम्दा सोच</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 28 Jan 2010 12:11:03 +0000</pubDate>
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		<description>आप किस धर्म के मानने वालो को ये नसीहत दे रहे है ???
क्या ये आप नाम लिए बगैर उलेमाओं के बारे में सतर्क और आगाह कर रहे है या फतवे के डर से उनका नाम लेने में आप की फटी जा रही है ???

तो आप मानते है मुर्दे एक दिन फिर जिंदा होंगे और कब्र से बाहर निकलेंगे,ये बात सही है प्रामाणिक है ज़रा इसका भी ज़िक्र कीजिये ???

भगवा पहने जो आप की फोटो में है उसका नाम नहीं लिखा क्या उसका नाम भी गर्दुल्ला अंसारी है , आप की तरह ही जाकिर नाइक का आदमी मालूम पड़ रहा है!

आप &quot;एडा बन कर पेंडा&quot; खाना बंद करो और अपनी बात साफ़ साफ़ करो की यहाँ भी इस्लाम का फ्री प्रचार कर के जेहादी बन रहे हो अल्लाह्बाज़ी में लगे हो !!!</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>आप किस धर्म के मानने वालो को ये नसीहत दे रहे है ???<br />
क्या ये आप नाम लिए बगैर उलेमाओं के बारे में सतर्क और आगाह कर रहे है या फतवे के डर से उनका नाम लेने में आप की फटी जा रही है ???</p>
<p>तो आप मानते है मुर्दे एक दिन फिर जिंदा होंगे और कब्र से बाहर निकलेंगे,ये बात सही है प्रामाणिक है ज़रा इसका भी ज़िक्र कीजिये ???</p>
<p>भगवा पहने जो आप की फोटो में है उसका नाम नहीं लिखा क्या उसका नाम भी गर्दुल्ला अंसारी है , आप की तरह ही जाकिर नाइक का आदमी मालूम पड़ रहा है!</p>
<p>आप &#8220;एडा बन कर पेंडा&#8221; खाना बंद करो और अपनी बात साफ़ साफ़ करो की यहाँ भी इस्लाम का फ्री प्रचार कर के जेहादी बन रहे हो अल्लाह्बाज़ी में लगे हो !!!</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: RAJ SINH</title>
		<link>http://www.pravakta.com/?p=6277&#038;cpage=1#comment-2267</link>
		<dc:creator>RAJ SINH</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 28 Jan 2010 11:35:21 +0000</pubDate>
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		<description>धर्म पुस्तकों में वर्णित सभी धर्म भले आस्था मूलक इश्वर की बातें करें पर वास्तविक जमीनी रूप में इन्सान में अन्धविश्वास ,ढोंग,पाखंड और धूर्तों की दुकानदारी ही रही है जो बहुजन के शोषण का माध्यम बनी.सत्ता की गुलाम भी चाटुकार भी और कभी कभी उस पर स्वर भी.आज के वर्तमान रूप के सभी धर्मों के विनाश के बिना मानव की मुक्ति नहीं है.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>धर्म पुस्तकों में वर्णित सभी धर्म भले आस्था मूलक इश्वर की बातें करें पर वास्तविक जमीनी रूप में इन्सान में अन्धविश्वास ,ढोंग,पाखंड और धूर्तों की दुकानदारी ही रही है जो बहुजन के शोषण का माध्यम बनी.सत्ता की गुलाम भी चाटुकार भी और कभी कभी उस पर स्वर भी.आज के वर्तमान रूप के सभी धर्मों के विनाश के बिना मानव की मुक्ति नहीं है.</p>
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