पाटलीपुत्र में इतिहास की पुनरावृत्ति की आहट


- डॉ. विनोद बब्बर

इतिहास केवल सजावट की वस्तु नहीं होती क्योंकि वह अनुभव और सुखद स्मृतियों ही नहीं, खून और चित्कारों से लथपथ ऐसा दस्तावेज होता है जिसकी उपेक्षा की भारी कीमत चुकानी ही पड़ती है। यह भी सत्य है कि इतिहास अपने आपको दोहराता है। जो इतिहास के श्याह-सफेद अध्यायों से सबक नहीं लेता, समय का क्रूर चक्र उसे अपने पैरों तले कुचल देता है। इतिहास गवाह है कि कभी पाटलीपुत्र के सिंहासन पर महात्मा चाणक्य ने नंद वंश का सफाया कर एक अज्ञात युवक को बैठाया था, जिसे चंद्रगुप्त मौर्य के नाम से स्मरण किया जाता है। इतिहास यह भी याद दिलाता है कि एक समय वहीं चंद्रगुप्त स्वयं को राजसिंहासन तक पहुंचाने वाले की उपेक्षा करने लगा था। तब महात्मा चाणक्य निराश होकर उसे छोड़ गये थे। महान साहित्यकार, इतिहासकार श्री जयशंकर प्रसाद ने ‘कौमदी महोत्सव’ में इस विचित्र परिस्थितियों का बहुत कुशलता से वर्णन किया है। बिहार की उसी भूमि पर आज इतिहास फिर से उसी मोड़ पर खड़ा नजर आ रहा है। आधुनिक चंद्रगुप्त अर्थात् नितिश कुमार को स्थापित करने वाली भाजपा को भी अपमान का कड़वा घूंट पीना पड़ रहा है। अब कौन किसे छोड़ेगा, यह पटकथा लिखी जानी फिलहाल शेष है।

यह किसी से छिपा हुआ नहीं है कि अब से कुछ वर्ष पूर्व तक नितिश के दल जनता दल यू से भाजपा की शक्ति दूगनी से भी अधिक थी। लालू यादव ने ऐसी व्यूह रचना की कि अपने परंपरागत संसदीय क्षेत्र बाढ़ से पराजय निश्चित देख नितिश सुरक्षित क्षेत्र की तलाश में दिखाई दे रहे थे। ऐसे में भारतीय जनता पार्टी के महारथी लालकृष्ण आडवाणी ने नितिश को गठबंधन का नेता घोषित कर उन्हें प्रतिष्ठा ही प्रदान नहीं की बल्कि अपने दल की पूरी शक्ति उनके पीछे झोंक दी। परिणाम सभी जानते हैं, आधुनिक नंद को आधुनिक चंद्रगुप्त ने करारी शिकस्त दी। राजतिलक हुआ जो इस बार भी आधुनिक चाणक्य ने ‘लो प्रोफाइल’ रहकर राजकाज में मदद का जिम्मा संभाला। जगजाहिर है कि इस बार भी पाटलीपुत्र के सिंहासन पर हुए परिवर्तन ने बिहार की तस्वीर बदलने की शुरुआत की। बिहार ही नहीं सारे देश की जनता ने इन प्रयासों को सराहा तो इसका श्रेय किसी एक व्यक्ति को नहीं बल्कि सामूहिक नेतृत्व को जाता है। ‘प्रभुता पाये किन्हें मद नाहिं’ एक नये रूप में सामने आया। नितिश भाजपा के प्रति कृतज्ञ होने की बजाय उसकी उपेक्षा करने लगे क्योंकि वे भी राजनीति के इस सूत्र का पालन करने लगे, ‘जिस सीढ़ी से ऊपर चढ़ों, मौका लगते ही उसे तोड़ डालों।’ उनका मत रहा है कि वहाँ भाजपा को इस बात से कोई मतलब नहीं होना चाहिए कि नितिश की पार्टी में कौन आता, जाता है लेकिन वे तय करेंगे कि भाजपा की कमान कौन संभाले, कौन क्या बोले, कौन प्रचार के लिए आएगा, कौन नहीं आएगा, आदि, आदि। हद तो तब हो गई जब भाजपा की विचारधारा और उसके मजबूत जनाधार को खिसकाने की राजनीति शुरू हो गई।

इन पंक्तियों के लेखक को दिसंबर, 2009 में बिहार के अनेक स्थानों की यात्रा का सौभाग्य प्राप्त हुआ। भागलपुर के तीन दिन के प्रवास के दौरान वहां के सामान्यजन से हुए अपने संवाद में मैंने यह अनुभव किया वे इस बात को खुले हृदय से स्वीकार करते हैं कि इस सरकार ने बदहाल बिहार की तस्वीर बदली है। साथ ही साथ वे नितिश की ‘छद्म धर्मनिरपेक्षता’ से आहत भी दिखाई दियें। अनेक युवकों ने बताया कि बरसों पुराने दंगों की जांच के नाम पर गड़े मुर्दें उखाड़कर अनेक निर्दोंष लोगों पर मुकद्दमें बनाये गये हैं। तुष्टीकरण का ऐसा भयानक खेल कांग्रेस के शासन में भी नहीं खेला गया। इस प्रकार के कदमों से ‘सर्वधर्म सद्भाव’ किस प्रकार कायम हो सकता है, भागलपुर निवासी समझने में असमर्थ दिखाई दियें। वे नितिश से अधिक भाजपा की चुप्पी से निराश दिखाई दे रहे थे। उनका मत था कि भाजपा के कुछ नेता सत्ता की खातिर अपनी ही जड़ें खोद रहे हैं।

उनका मत था कि नितिश ने तुष्टीकरण के अपने अभियान के अंतर्गत किशनगंज में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय स्थापना करने तथा उस अरबी भाषा के लिए करोड़ों रुपये की धन राशि लगाने की घोषणा की जिसे जानने वाला शायद ही कोई बिहारी हो। वे वोटों का व्यापार करते हुए इतना आगे बढ़कर यह भी भूल गये कि बिहार के मुस्लिमों की भाषा हिन्दी, भोजपुरी, मैथिली, अंगिका जैसी स्थानीय भाषाएं हैं। यहां का मुसलमान विदेश से आया हुआ नहीं हैं बल्कि इसी धरती का पुत्र है जिनके पूर्वजों को किन्हीं परिस्थितियों में धर्मांतरण करना पड़ा था। अब उसे अरबी के नाम पर किस प्रकार से खुश किया जा सकता है, यह बात धर्मनिरपेक्षता के ठेकेदार ही बेहतर ढ़ंग से बता सकते हैं। भाजपा द्वारा यह सब कुछ भी बर्दाश्त किया जा रहा था लेकिन पटना में होने वाली भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक ने सारा परिदृश्य ही बदल दिया। गुजरात में रहने वाले बिहार कुछ पुत्रों ने वहां के मुख्यमंत्री के सम्मान में अखबारों में विज्ञापन क्या दिये, नितिश की त्यौरियां चढ़ गईं। उन्होंने सामान्य सा शिष्टाचार भूलकर अपने घर होने वाले भोज को रद्द कर दिया तथा विज्ञापन में अपनी फोटो इस्तेमाल करने पर मानहानि का मुकदमा करने के तेवर भी दिखाये। उन्होंने कोसी बाढ़ के संकट के समय गुजरात द्वारा दी गई सहयोग राशि को लौटा दिया। उन्हें मोदी से असुविधा हो सकती है लेकिन धन लौटाकर गुजरात का अपमान करने का अधिकार किसने दिया? उनका तर्क है कि मोदी ने सहयोग का प्रचार कर गलत काम किया है। क्या उनसे यह पूछा जा सकता है कि बिहार के विकास, अल्पसंख्यकों को सहायता, लड़कियों को साइकिल जैसे कार्यों का वे प्रचार करते हैं या नहीं? यदि हाँ तो क्या यह उसी तर्क के अनुसार गलत नहीं हैं? और फिर उनका सारा ड्रामा भी तो प्रचार के लिए ही था या नहीं? राजनीति में प्रचार ही तो मुख्य मुद्दा है। आज सारा भारत कह रहा है कि नितिश एक समुदाय विशेष के वोट हथियाने के लिए यह सब नाटक कर रहे हैं। आखिर उनके पास इस बात का क्या जवाब है कि अतिथि का अपमान करना किस प्रकार से बिहार के गौरव को बढ़ाता है? वरना ‘भाजपा मंजूर लेकिन भाजपायी नहीं’ का क्या अर्थ हो सकता है?

अब नितिश की चर्चा छोड़ जरा भारतीय जनता पार्टी की बात भी करें। क्या वह इन सब चालों को नहीं समझती? यदि नहीं, तो उनको नेताओं को राजनीति छोड़कर कोई दूसरा काम धंधा अपनाना चाहिए। और अगर समझती है, तो फिर उसने इस सारे गड़बड़ झाले पर कोई संदेश देने की कोशिश क्यों नहीं की? क्या नितिश द्वारा भोज रद्द करने की स्थिति में भाजपा के उपमुख्यमंत्री को अपने निवास पर देशभर से आए प्रतिनिधियों को बुलाकर न केवल अपने दल के बल्कि बिहार के स्वाभिमान की रक्षा का संदेश देना चाहिए था या नहीं? अफसोस की बात यह है कि बिहार के मोदी तो नितिश के इतने मुरीद है कि कभी-कभी भेद करना मुश्किल हो जाता है कि वे भाजपा के भक्त हैं या कुर्सी के भक्त? आज भी वे अपने केंद्रीय नेताओं को अपमान का घूंट पीकर भी ‘समझौता’ जारी रखने के लिए मना रहे हैं। यह कैसी कुर्सी भक्ति जो जनहित पर भी भारी पड़ती नजर आ रही है?

क्या उनमें इतना साहस और विवेक नहीं जो अपने ‘आका’ को समझा सके कि वोटों की फसल काटने के लिए दिलों में कांटे मत बोओ। क्या वे नितिश से पूछ सकते हैं कि अगर विज्ञापन नहीं छपता तो क्या आप गुजरात के मोदी के सामने थाली परोसते या नहीं? क्या आप उनके साथ फोटो नहीं खिंचवाते? अगर तब फोटो अखबार में छप जाते तो आप क्या करते? और यह भी कि क्या कभी लुधियाना में खिंचा और अब बिहार के अखबारों में छपा फोटो झूठा है? यदि नहीं तो आप इतना क्यों उबल रहे हैं? कहा जाता है कि स्वार्थ मनुष्य को कमजोर बना देता है। उपमुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठा व्यक्ति अपनी कुर्सी छिन जाने के डर से खामोश रह सकता है लेकिन भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व को क्या हुआ जो सत्ता के लिए अपनी पहचान को नष्ट होते देख कर खामोश है? क्या उन्हें अपमान सहकर भी गठबंधन को बचाने के लिए अपने मूर्खतापूर्ण प्रयासों के हश्र के बारे में संदेह है? एक सामान्य सी राजनैतिक बुध्दि रखने वाला व्यक्ति भी समझता है कि नितिश का घमंड भाजपा पर भारी पड़ने वाला है। आज बेशक नितिश खामोश हो गये लेकिन चुनाव के ठीक पूर्व वे भारतीय जनता पार्टी को उड़ीसा के नवीन पटनायक की तरह गठबंधन से निकाल बाहर करेंगे। आज नितिश की चुप्पी अकारण नहीं है। वे जानते हैं कि आज बात बढ़ी तो सरकार गिर जाएगी और लालू के इशारे पर कांग्रेस राष्ट्रपति शासन लगा देगी। जीती हुई बाजी हार में न बदल जाए इसलिए नितिश इस विषय पर कुछ भी नहीं बोल रहे हैं। धोखा देने से धोखा खाना अच्छी बात है लेकिन जब सब कुछ दिन के उजाले की तरह साफ हो तो ठगे जाने की प्रतिक्षा करने वाले को विवेकवान नहीं माना जा सकता। वैसे भी भारतीय जीव-दर्शन और यहाँ के कानून के अनुसार आत्महत्या अपराध है। आज भारतीय जनता पार्टी भी इस रास्ते पर बढ़ रही है। वह यह भी भूल गई कि वह ‘अपनी विशिष्ट पहचान’ के लिए जानी जाती है। समर्पित कार्यकर्ताओं की मेहनत और जनता का स्नेह उसकी सबसे बड़ी सम्पत्ति रही है, जिसे सत्ता के चंद टुकड़ों के लिए नीलाम किया जाना देश के लोकतंत्र के हित में भी नहीं है। उसे आत्महत्या का यह अपराध करने से रोके भी तो कौन? चतुर चंद्रगुप्त की पैंतरेबाजी और मूक बधिर चाणक्यों की मूर्खता इतिहास की पुनावृर्ति का सबब बन सकती है। हाँ इस बार चाणक्य चंद्रगुप्त को छोड़कर नहीं जाएगा बल्कि चंद्रगुप्त ही उसे …….. मार कर निकाले तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। क्या भाजपा अपने उस हश्र की प्रतिक्षा करेगी या अस्थायी सत्ता को ठुकराकर स्थायी सिध्दांतों की रक्षा का साहस दिखाएगी? फिलहाल उत्तर मौन है।

* लेखक ‘राष्ट्र किंकर’ के संपादक हैं।

July 29th, 2010 | Category: राजनीति | Print This Post Print This Post | Email This Post Email This Post | 79 views

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