बिल है कि मानता नहीं..


utility-bills-2बिल, टैक्स, सेक्स और सेंसेक्स…
जीवन का अर्थशास्त्र इन सबके इर्द-गिर्द घूम रहा है। उधर दुनिया में बिलगेट्स छाए हुए हैं, इधर हम बिल-टैक्स से जूझ रहे हैं। कई बार लगता है कि मनुष्य का जन्म बिल और टैक्स भरने के लिए ही हुआ है। इन बिलों का भरते-भरते मनुष्य का दिल बैठा जाता है लेकिन बिल है कि मानता नहीं। एक जाता है, तो दूसरा चला आता है।
टेलीफोन बिल पटाकर चैन की सांस ले रहे होते हैं कि बिजली का बिल हाजिर।
अरे, अभी तो पंद्रह दिन पहले ही पटाया था ? क्या आजकल पंद्रह-पंद्रह दिनों में बिल आने लगे हैं?
ठीक है साहब, महीने भर बाद ही आया होगा, लेकिन दिन इतनी जल्दी क्यों बीत जाते हैं? बिल पटाते-पटाते इसी सत्य का उद्घाटन होता है कि हमारा जन्म बिल पटाने के लिए ही हुआ है।
दूध का बिल…
 लाँड्री का बिल…
मोबाइल का बिल…
बच्चे के स्कूल की फीस…
अखबार का बिल…
इसका बिल, उसका बिल…
न जाने किस-किस का बिल?
आमदनी अठन्नी, खर्चा रुपइया। उधारखोरी से लाई गई समृद्धि ढेर सारे बिल ले कर आती है। उसकी अलग परेशानी है। इतने सारे बिलों को देखकर सोचता हूँ कि काश, मैं एक चूहा होता तो केवल एक बिल की जरूरत होती, जहाँ मैं दीन-दुनिया से निश्चिंत होकर कुछ न कुछ कुतरते हुए संतोष का अनुभव करता। इन किसम-किसम के बिलों के चक्कर में घनचक्कर तो नहीं बनता।
एक टैक्स हो तो समझ में आता है। यहाँ तो प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष करों की भरमार है।
टैक्सों में टैक्स सर्विस टैक्स तो बड़ी जोरदार चीज है। जिस काम के लिए लोग बैठाए गए हैं, उसी काम को करने के लिए सर्विस टैक्स लिया जा रहा है। सरकार भी पूरी तरह से बनिया बन गयी है। अब तो स्पीड पोस्ट के लिए भी सर्विस टैक्स लगने लगा है। डाक समय पर पहुँचे न पहुँचे, वो तो अलग बात है लेकिन पहले सर्विस टैक्स पहले वसूलो। पता नहीं किस महान अर्थशास्त्री में फंड बढ़ाने के लिए सर्विस टैक्स का फंडा दिया। होटल में खाना खाओ तो वहाँ सर्विस टैक्स, इंटरनेट पर कोई टिकट बुक करो, तो उसका टैक्स, एटीएम कार्ड रखो तो उसका सर्विस टैक्स। सड़क पर गाड़ी चलाओ तो टैक्स। टोल टैक्स क्या है?
मतलब यह कि मैं देखूँ जिस ओर सखे रे, सामने मेरे टैक्स ही टैक्स।
टैक्स से जूझते हुए आगे बढ़ो तो सेक्स से मुठभेड़ हो जाती है।
किसी की शर्ट सेक्सी, तो किसी की पैंट सेक्सी। बॉडी तो खैर सेक्सी होती ही होती है। मलिकाओं, विपाशाओं आदि-आदि हीरोइनों की कृपा से सेक्स की गर्म हवाएँ चल रही हैं। कोई ऊ पर से सेक्सी तो कोई नीचे से। इन सेक्सियों से पार पाते हैं कि सेंसेक्स सामने आ जाता है। यह कभी लुढ़कता है तो बहुतों को लुढ़का देता है, और कभी बहुत ऊपर जाता है तो बहुत से लोग मारे खुशी के ऊपर जाने की तैयारी करने लग जाते हैं। काश, इस जीवन को बिल, टैक्स, सेक्स और सेंसेक्स से कभी मुक्ति मिल पाती। तभी अंदर से आवाज आई, तुम चाहो तो मुक्ति मिल सकती है। कबीर याद है न? वे कह गए हैं, कि
जब आए संतोष धन,
सब धन धूरि समान।
लेकिन बात समझ में आए, तब न। पहले इतना धन तो मिले, कि उस पर संतोष किया जा सके।

October 30th, 2009 | Tags: , , , , | Category: व्यंग्य | Print This Post Print This Post | Email This Post Email This Post | 91 views

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