अवमूल्यन : कविता – सतीश सिंह

पता नहींpicture 214 150x119 अवमूल्यन : कविता   सतीश सिंह

कब और कैसे

धूल और धुएं

से ढक गया आसमान

सागर में मिलने से पहले ही

एक बेनाम नदी सूख़ गई

एक मासूम बच्चे पर

छोटी बच्ची के साथ

बलात्कार करने का

आरोप है

स्तब्ध

हूँ

खून के इल्ज़ाम में

गिरफ्तार

बच्चे की ख़बर सुनकर

इस धुंधली सी फ़िज़ा में

सितारों से आगे की

सोच रखनेवाला

एक होनहार छात्र

बम विस्फ़ोट में

मारा गया

घर के सामने वाला

अंतिम ज़मीन का टुकड़ा भी

तब्दील हो गया है

कंक्र्रीट में

डायनामाईट

से उड़ा दिया गया

हरे-भरे से

पहाड़ को

सहमे हुए हैं

जीव-जन्तु

अचानक!

एक मासूम बच्चा

चौंककर

बाहर निकल आता है

ख्वाबों की दुनिया से।

November 9th, 2009 | Tags: , , , , | Category: कविता | Print This Post Print This Post | Email This Post Email This Post | 49 views

2 Responses to “अवमूल्यन : कविता – सतीश सिंह”

  1. 2
    Sanjay Says:

    Bahut hi prasangki kavita hai wartman sandarbh me.

  2. 1
    Vinita Kaur Says:

    You have shown mirror to society. Nice & Excellent Poem. Keep it up.

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