नज़्म/ मेरे महबूब


मेरे महबूब !

उम्र की

तपती दोपहरी में

घने दरख्त की

छांव हो तुम

सुलगती हुई

शब की तन्हाई में

दूधिया चांदनी की

ठंडक हो तुम

ज़िन्दगी के

बंजर सहरा में

आबे-ज़मज़म का

बहता दरिया हो तुम

मैं

सदियों की

प्यासी धरती हूं

बरसता-भीगता

सावन हो तुम

मुझ जोगन के

मन-मंदिर में बसी

मूरत हो तुम

मेरे महबूब

मेरे ताबिन्दा ख्यालों में

कभी देखो

सरापा अपना

मैंने

दुनिया से छुपकर

बरसों

तुम्हारी परस्तिश की है…

-फ़िरदौस ख़ान

January 2nd, 2010 | Tags: | Category: कविता | Print This Post Print This Post | Email This Post Email This Post | 186 views

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