राजनीति में धर्म की उपयोगिता ?


धर्म, मानव समाज द्वारा अपनाई जाने वाली एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय वस्तु का नाम है। धर्म की अलग-अलग परिभाषाएं भी हमारे पूर्वजों द्वारा गढ़ी गई हैं। कहीं धर्म को धारण करने के रूप में परिभाषित किया गया है तो कहीं इसे मनुष्य की आस्था तथा उसके विश्वास के साथ जोड़ा गया है। कुल मिलाकर हम यह कह सकते हैं कि किसी आध्यात्मिक शक्ति अथवा आध्यात्मिक व्यवस्था के प्रति मनुष्य की आस्था को ही हम धर्म कहते हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि धर्म की व्यवस्था स्हस्त्राब्दियों पुरानी है। यह भी सत्य है कि धर्म का मार्ग दिखाने वाले हमारे प्राचीन धर्मगुरुओं ने समाज में इस धर्म रूपी व्यवस्था को इसलिए लागू व प्रचलित किया ताकि मानव जाति के दिलों में एक दूसरे के प्रति प्रेम, भाईचारा, सहयोग, एक दूसरे के दु:ख तकलींफों को समझना, दीन दुखियों की मदद करना, गरीबों, असहायों, बीमारों आदि के प्रति सहयोग व सहायता करना जैसे तमाम सकारात्मक भाव उत्पन्न हों। इसी धर्म का सहारा लेकर हमारे पूर्वजों तथा धर्मगुरुओं ने हमें बुरे कामों के बदले पाप तथा नर्क के भागीदार बनने जैसी काल्पनिक बातों से भी अवगत कराया। आज लगभग प्रत्येक धर्म में यह बात स्वीकार की जाती है कि मनुष्य द्वारा जीवन में किए गए सद्कार्यों का फल उसे मरणोपरांत स्वर्ग के रूप में प्राप्त होता है। जबकि दुष्कर्म करने वाला व्यक्ति पाप का भागीदार होता है तथा वह मरणोपरांत नर्क में जाता है।

धर्म से संबंधित उपरोक्त तथ्य कितने सही हैं और कितने गलत इन्हें आज तक न तो कोई प्रमाणित कर सका है और संभवत: भविष्य में भी इन्हें प्रमाणित नहीं किया जा सकेगा। परंतु धर्मरूपी व्यवस्था से एक बात जरूर सांफ हो जाती है कि इंसान के पूर्वजों ने धर्म नामक व्यवस्था का संचालन मात्र इसीलिए किया था ताकि इंसान सच्चाई के रास्ते पर चलते हुए अपने जीवन में अच्छे कार्यों को करे तथा अच्छी बातों का अपनाए। और साथ ही साथ बुरे रास्तों व बुराईयों से दूर रहे। इन धार्मिक व्यवस्थाओं अथवा परंपराओं के संचालन के हंजारों वर्षों बाद आज के उस दौर में जबकि मनुष्य पहले से कहीं अधिक सक्षम, समझदार व सामर्थ्यवान हो गया है,यह सवाल उठने लगा है कि क्या यह धार्मिक व्यवस्था हमारे पूर्वज धर्मगुरुओं की आशाओं पर खरी उतर रही है या फिर आज यही धार्मिक व्यवस्था अथवा धर्म उसी मानव जाति के लिए सबसे बड़ा ख़तरा बना दिखाई दे रहा है। और यदि ऐसा है तो इसके लिए जिम्मेदार कौन है? धार्मिक व्यवस्थाओं की शुरुआत करने वाले हमारे पूर्वज या कुछ ऐसे लोग जो उसी धर्म के स्वयंभू ठेकेदार, धर्माधिकारी अथवा उत्तराधिकारी बने बैठे हैं। क्या वजह है कि कल तक आस्था,विश्वास एवं श्रद्धा की नंजरों से देखा जाने वाला धर्म अब भय,आतंक तथा ंहिंसा का पर्याय बनता जा रहा है। धर्म को इस स्थिति तक पहुंचाने वाले लोग आख़िर हैं कौन?

दरअसल धर्म नामक व्यवस्था विवादों में उस समय से घिरना शुरु हुई जबसे राजनीति के साथ धर्म का तालमेल बिठाने के दुर्भाग्यपूर्ण प्रयास शुरु हुए। यह घटना भी कोई आज की नई घटना नहीं है। शताब्दियों से हमारे पूर्व शासकों, राजाओं, बादशाहों तथा तानाशाहों द्वारा इस बात के प्रयास किए जाते रहे हैं कि कौन सा ऐसा रास्ता अपनाया जाए जिस पर चलकर उन्हें सत्ता मिल सके, सत्ता पर उनकी पूरी पकड़ बनी रह सके तथा यही सत्ता भविष्य में भी उनके व उनके परिवार के हाथों से बाहर न जाने पाए। धर्म व राजनीति के मध्य पैदा हुए इसी रिश्ते ने धर्म को विवादित, संदेहपूर्ण तथा आलोचना का पात्र बनाना शुरु कर दिया। सौभाग्यवश साथ ही साथ ऐसे भी घटनाक्रम इसी दौर में देखने को मिले जिनसे साथ-साथ यह भी प्रमाणित होता गया कि धर्म के साथ राजनीति का रिश्ता ंकायम करना उचित व कारगर नहीं है। उदाहरण के तौर पर एक ओर कई मुंगल आक्रांताओं ने तलवारों के बल पर अपने साम्राज्य का विस्तार करने हेतु बड़े से बड़े अत्याचार किए। धार्मिक विद्वेष को भड़काकर अपना राज कायम करने के लिए इन आक्रांताओं ने कहीं मंदिर तोड़े तो कहीं धर्म विशेष के लोगों पर जुल्म ढाए। ठीक इसके विपरीत राजनीति में सामाजिक सद्भावना को सबसे अधिक जरूरी महसूस करते हुए कभी सम्राट अकबर, जोधा बाई के साथ विवाह सूत्र में बंधते दिखाई दिया तो कभी हुमायूं के हाथों पर कलावती राखी बांधते नंजर आईं। कभी मराठा शासक छत्रपति शिवाजी, मुल्ला हैदर को अपना अत्यंत विश्वासपात्र निजी सचिव नियुक्त करते दिखाई दिए तो कभी यही शिवाजी दौलतखां व दरियाखां के रूप में अपने प्रमुख नेवल कमांडर नियुक्त करते व उनपर सबसे अधिक विश्वास करते नंजर आए। हमारे देश में न जाने ऐसे कितने प्रमाणित उदाहरण देखने व सुनने को मिलेंगे जिनसे यह साबित होगा कि अनेक हिंदू शासकों ने मुसलमान धर्म स्थानों जैसे मस्जिद, दरगाह व कब्रिस्तान आदि के लिए जमीनें मुहैया कराई हों। ठीक इसी प्रकार ऐसी भी सैकड़ों मिसालें यहां मौजूद हैं जो हमें यह बताती हैं कि अनेक मुस्लिम शासकों ने मंदिर, गुरुद्वारे तथा अन्य मठों व आश्रमों हेतु जमीनें उपलब्ध कराईं हैं।

धर्म व राजनीति के मध्य समन्वय के ऐसे दृश्य यदि समाज में समग्ररूपता, एकता, सद्भाव तथा भाईचारा पैदा करें फिर तो धार्मिक व्यवस्था आदरणीय, सम्मानयोग्य तथा स्वीकार्य प्रतीत होती है। परंतु जब यही व्यवस्था मानव जाति में नंफरत पैदा करे, एक भाई को दूसरे भाई के खून का प्यासा बना दे, एक समुदाय दूसरे समुदाय का बेवजह दुश्मन बन जाए ऐसे में यही धर्म, आस्था तथा विश्वास का प्रतीक नजर आने के बजाए नंफरत तथा भय का पर्याय बनता नंजर आता है। हम आज जिस लोकतांत्रिक व्यवस्था में सांस ले रहे हैं उसमें धार्मिक कट्टरपंथ, धार्मिक पूर्वाग्रह तथा अपने धार्मिक राजनैतिक विचार आदि जबरन किसी पर थोपने की कोई गुंजाईश नहीं है। भारतवर्ष हालांकि विभिन्न धर्मों व जातियों का एक संयुक्त गुलदस्ता रूपी देश है। परंतु हमारे देश में मतों की राजनीति करने तथा सीमित सोच रखने वाले पूर्वाग्रही एवं कट्टरपंथी नेता राजनीति पर तथाकथित धर्म का लेप चढ़ाकर इसे प्रदूषित व अपवित्र करने का लगातार प्रयास कर रहे हैं। यदि एक तानाशाह आक्रांत शासक ने कल सोमनाथ मंदिर को ध्वस्त करने जैसी बड़ी हिमाक़त की थी तो आज की लोकतांत्रिक व्यवस्था में विवादित बाबरी मस्जिद को गिराकर उसी हिमाक़त का बदला लेने का उसी अंदांज में प्रयास किया जाता है। कभी कश्मीर में जेहाद फैलाने व कश्मीरी पंडितों को घर से बेघर करने जैसा दुष्प्रयास धर्म के नाम पर किया जा रहा है तो कहीं राज्य प्रायोजित गुजरात दंगों के सहारे सत्ता पर अपनी पकड़ मंजबूत करने की कोशिश की जाती है।

राजनीतिज्ञों के ऐसे प्रयासों के परिणामस्वरूप सत्ता प्राप्ति की उनकी स्वार्थपूर्ण इच्छा तो भले ही कुछ समय के लिए पूरी हो जाती है। परंतु मानवता उन सत्ताधीशों को कतई मांफ करने को तैयार नहीं होती जिनके सत्ता के सिंहासन की बुनियाद बेगुनाह लोगों के ख़ून से सनी होती है। अब यहां प्रश्न यह है कि क्या भविष्य में भी यह विसंगतियां यूं ही जारी रहेंगी या फिर इनमें भारी बदलाव की जरूरत महसूस की जा रही है। दरअसल हमें यह बात पूरी तरह समझ लेनी चाहिए कि किसी भी धर्म का कोई भी धर्मगुरु यदि हमें धर्म के नाम पर बांटने या धर्म के नाम पर नंफरत फैलाने, हिंसा पर उतारू होने, एक दूसरे इंसान का ख़ून बहाने का पाठ पढ़ाता है या इसके लिए उकसाता है तो इसके पीछे उसका मंकसद धर्म के प्रति उसका लगाव या प्रेम कतई नहीं है बल्कि वह इस रास्ते पर चलते हुए या तो अपनी रोंजी-रोटी पक्की कर रहा है या फिर किसी राजनैतिक निशाने पर अपने तथाकथित धर्मरूपी तीर छोड रहा है। ऐसे दूराग्रही राजनैतिक लोग निश्चित रूप से अपने साथ धार्मिक लिबासों में लिपटे तथाकथित ढोंगी एवं पाखंडी धर्माधिकारियों की फ़ौज भी लिए फिरते हैं। यदि ऐसे ढोंगी व पाखंडी धर्माधिकारियों से कभी किसी शिक्षित व्यक्ति का साक्षात्कार हो तो इन ढोगियों के ज्ञान की गहराई का आसानी से अंदांजा भी लगाया जा सकता है।

मानव समाज के उत्थान तथा सभी सामाजिक व्यवस्थाओं के सुचारु संचालन केलिए यह जरूरी है कि नासूररूपी कट्टरपंथी, रूढ़ीवादी तथा समाज को हर समय क्षति पहुंचाने वाली सभी दूराग्रही व्यवस्थाओं से पीछा छुड़ाया जाए। हमारे देश के बुद्धिजीवियों, उदारवादी नेताओं, सामाजिक संगठनों तथा गैरसरकारी संगठनों का यह परम कर्तव्य है कि वे समाज में कुकुरमुत्ते की तरह सिर उठाते उन ढोंगी धर्मगुरुओं,धर्म उपदेशकों तथा इन्हें अपने साथ सत्ता स्वार्थ हेतु जोड़ने वाले राजनेताओं से खबरदार करें तथा इनकी वास्तविकताओं व इनके गुप्त एजेंडों को बेनकाब करें। लोकतांत्रिक व्यवस्था में चूंकि आम मतदाता ही सबसे बड़ी शक्ति है लिहाजा प्रत्येक स्तर पर यह कोशिश की जानी चाहिए कि हमारा मतदाता जागरुक हो अपनी आंखें खोले तथा किसी भी राजनैतिक हथकंडे का शिकार होने से बच सके। धर्म के नाम के दुरुपयोग से स्थायी रूप से समाज को बचाने के लिए अनिवार्य बेसिक शिक्षा के स्तर पर भी यह प्रयास अत्यंत जरूरी हैं। इसके अंर्तगत् देश का भविष्य बनने वाले बच्चों को सर्वधर्म समभाव,सांप्रदायिक सौहाद्र,अनेकता में एकता, सर्वे भवंतु सुखिन: तथा वसुधैव कुटुंबकम जैसी प्राचीन एवं पारंपरिक भारतीय शिक्षा एवं मानवता को सकारात्मक संदेश देने वाले इतिहास तथा घटनाक्रमों का अध्ययन कराया जाना अत्यंत जरूरी है।

हमें निश्चित रूप से यह मान लेना चाहिए कि धर्म व राजनीति के मध्य रिश्ता स्थापित कर यदि कोई नेता अथवा धर्मगुरु हमसे किसी पार्टी विशेष के लिए वोट मांगता है तो ऐसा व्यक्ति अथवा संगठन हमारी धार्मिक भावनाओं से खिलवाड़ करने की ही कोशिश मात्र कर रहा है। समाज कल्याण से दरअसल उस व्यक्ति या संगठन का कोई लेना देना नहीं है। धर्म वास्तव में किसी भी व्यक्ति की आस्थाओं तथा विश्वास से जुड़ी एक ऐसी आध्यात्मिक विषय वस्तु है जो किसी भी व्यक्ति को व्यक्ति गत रूप से ही संतोष प्रदान करती है। अत: हम यह कह सकते हैं कि धर्म किसी सामूहिक एजेंडे का नहीं बल्कि किसी की अति व्यक्तिगत् ष्टविषय वस्तु का नाम है। ठीक इसके विपरीत जो शक्तियां धर्म को अपने राजनैतिक स्वार्थ के कारण सड़कों पर लाना चाहती हैं वे शक्तियां भले ही धार्मिक वेशभूषा में लिपटी हुई तथा धर्म के नाम पर ढोंग व पाखंड रचाती क्यों न नंजर आएं परंतु हंकींकत में यही तांकतें हमारे मानव समाज, राष्ट्र यहां तक कि किसी भी धर्म की भी सबसे बड़ी दुश्मन हैं।

-तनवीर जांफरी

January 28th, 2010 | Tags: , | Category: राजनीति | Print This Post Print This Post | Email This Post Email This Post | 190 views

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