लेखक परिचय

प्रवीण दुबे

प्रवीण दुबे

विगत 22 वर्षाे से पत्रकारिता में सर्किय हैं। आपके राष्ट्रीय-अंतराष्ट्रीय विषयों पर 500 से अधिक आलेखों का प्रकाशन हो चुका है। राष्ट्रवादी सोच और विचार से प्रेरित श्री प्रवीण दुबे की पत्रकारिता का शुभांरम दैनिक स्वदेश ग्वालियर से 1994 में हुआ। वर्तमान में आप स्वदेश ग्वालियर के कार्यकारी संपादक है, आपके द्वारा अमृत-अटल, श्रीकांत जोशी पर आधारित संग्रह - एक ध्येय निष्ठ जीवन, ग्वालियर की बलिदान गाथा, उत्तिष्ठ जाग्रत सहित एक दर्जन के लगभग पत्र- पत्रिकाओं का संपादन किया है।

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प्रवीण दुबे
यह सच है कि भारत में बोलने और लिखने की सभी को छूट मिली हुई है। लेकिन इसका कदापि यह अर्थ नहीं लगाया जाना चाहिए कि कुछ भी बोला जाए और कुछ भी लिखा जाए। इस अधिकार की आड़ में राष्ट्रहित से खिलवाड़ अथवा किसी पर झूठे आरोप लगाकर उसकी छवि धूमिल करने की इजाजत किसी को भी नहीं दी जा सकती।
इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि इस देश के तमाम राजनीतिज्ञ हों या फिर मीडिया से जुड़े पत्रकार इस बात की तनिक भी चिंता नहीं करते कि उनकी झूठी बातें, आरोप अथवा टिप्पणियों से किसी को मानसिक रूप से कितनी क्षति पहुंचती है या उसकी छवि को कितना नुकसान पहुंचता है।

हाल ही की बात की जाए तो देश के सर्वोच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी द्वारा की गई एक झूठी टिप्पणी पर उन्हें अर्थात राहुल गांधी को सही सलाह देकर अपरोक्ष रूप से ऐसा कार्य कर रहे तमाम लोगों को संकेत दिया है कि बोलने के अधिकार की आड़ में किसी पर झूठे आरोप लगाना अथवा उसकी छवि धूमिल करना किसी बड़े अपराध से कम नहीं है।

सर्वोच्च न्यायालय की इसके लिए तारीफ की जाना चाहिए कि उसने राहुल गांधी को यह बताया कि बोलने के अधिकार में क्या शामिल है और क्या नहीं। यहां बताना उपयुक्त होगा कि राहुल गांधी और पूरी की पूरी कांग्रेस लंबे समय से देशभक्त स्वयंसेवी संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर गांधी हत्या का झूठा आरोप लगाते रहे हैं।

मार्च 2014 में ठाणे की एक रैली में राहुल गांधी ने ऐसा ही अनर्गल और झूठा प्रलाप करते हुए कहा था कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लोगों ने गांधी की हत्या की थी और आज उनके (भाजपा) लोग गांधी की बात करते हैं। राहुल ने यह भी कहा था कि इन लोगों ने सरदार पटेल और गांधीजी का विरोध किया था।

राहुल के इस सफेद झूठ पर दायर आपराधिक याचिका को खारिज कराने के लिए राहुल गांधी ने मई 2015 में उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर की थी। इस पर मंगलवार को सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि इस झूठ पर राहुल माफी मांगे या फिर मुकदमा झेलने के लिए तैयार रहें।

न्यायालय ने यहां तक कहा कि बिना किसी सबूत के किसी संगठन (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) को बदनाम नहीं कर सकते हैं। आपको बताना होगा कि आपने जो आरोप लगाया है उसका क्या सबूत है और वह किस तरह से जनहित में है।

न्यायालय की यह टिप्पणी न केवल राहुल गांधी बल्कि पूरी की पूरी कांग्रेस के उन नेताओं के मुंह पर तमाचा है जो 1947 में गांधी हत्या के बाद से ही इस मामले को लेकर संघ को बदनाम करते रहे हैं।

सर्वविदित है कि अकेले गांधी हत्या ही नहीं गाहे-बगाहे कांग्रेस हमेशा संघ पर अनर्गल व झूठे आरोप लगाकर उसकी छवि खराब करने का षड्यंत्र करती रही है। अपने शासन काल के दौरान कांग्रेस ने इस देशभक्त संगठन पर प्रतिबंध भी आरोपित किए। लेकिन आज तक संघ पर लगाए किसी भी आरोप को कांग्रेस सिद्ध नहीं कर सकी है।

जहां तक गांधी का सवाल है कांग्रेस स्वयं को गांधी का बहुत बड़ा हितैषी साबित करने की कोशिश करती है, लेकिन पूरा देश इस बात को भली प्रकार देख रहा है कि कांग्रेस ने चुनावों के लिए वोट मांगते वक्त गांधी नाम का केवल इस्तेमाल किया जबकि वास्तविक अर्थों में गांधी की वैचारिक हत्या करने का श्रेय कांग्रेस को ही जाता है।

यदि कांग्रेस गांधी की उस सलाह को जिसमें उन्होंने कहा था कि कांग्रेस का आजादी का मकसद पूर्ण हो गया है अत: अब इसको समाप्त कर देना चाहिए, यदि मान लिया होता तो आज उसकी यह दुर्दशा नहीं होती।

आज कांग्रेस की गलत नीतियों और गांधी परिवार की झूठ आधारित राजनीति के कारण कांग्रेस हाशिए पर जा पहुंची है बावजूद इसके उसके नेता न तो झूठ छोडऩा चाहते हैं न परिवारवाद का अंत करना चाहते हैं।

बेशर्मी देखिए सर्वोच्च न्यायालय की तल्ख टिप्पणी के बावजूद वह कह रहे हैं कि राहुल अपनी टिप्पणी पर माफी नहीं मांगेंगे यह चरित्र तो चोरी और सीनाजोरी की कहावत को चरितार्थ करता है। राहुल को सुब्रमण्यम स्वामी की उस सलाह पर ध्यान देना चाहिए जिसमें उन्होंने कहा है कि राहुल गांधी को महात्मा गांधी की हत्या से संबंधित दस्तावेज पढऩा चाहिए और फिर सोच समझकर निर्णय लेना चाहिए।

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