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प्रवक्‍ता ब्यूरो

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इन दिनों श्रीलंका में पर्यटक के रूप में भी भावुक न होना कठिन है। एक राहत की सांस अब भी सरसराती है, क्षितिज को चूमते समुद्र से लेकर व्यस्त नगरों और हरे भरे देहात तक। युद्ध खत्म हो चुका है और पूरी दुनिया मदद करने को आतुर है- सड़कें, पुल, अस्पताल, स्कूल उद्योग यहां तक कि लायबे्ररी और आडीटोरियम भी बनाने को। श्रीलंका के लोगों का कलेजा बड़ा हो गया है और उनमें से कई फिर से भारत को ‘‘द मेनलेंड’’ बुलाने लगे हैं। इसी भाव का विस्तार है कि वे साझा पूर्वजों और भाषाओं की समानता को स्वीकारने लगे हैं। पंचशील का सिद्धांत, जो दोनों राष्ट्रों के मूलाधार में स्थित है, पुनः प्रतिष्ठित हो चुका है। जब वे अर्हत महिन्द (युवराज महेंद्र) के ‘‘मेनलेंड’’ से श्रीलंका आगमन के 2600 वर्षो का जश्न वर्ष 2011 में मनाने की तैयारी कर रहे हैं, तो इसमें उनका गर्व छलकता है – इस आध्यात्मिक विरासत पर जो सिद्धार्थ गौतम से प्रवाहित होती है और उनको एक जिज्ञासा है बुद्ध-पूर्व के अपने अतीत के विषय में भी।

मध्यभारत के दिसम्बर की ठण्ड उड़ गई कोलम्बो की गहन रात्रि की शांत गर्माहट में। जब हमने इस शहर में प्रवेश किया तो ऐसा लगा कि यह दक्षिण भारत में कहीं भी हो सकता था। कोलंबो भी गगनचुम्बी इमारतों और नेताओं के विशालकाय कटआउट से सुसज्जित है। हमें अनगिनत चेक-प्वाइंट पर वर्दीधारी नवयुवकों द्वारा रोका गया, वे बिना किसी अप्रिय रूचि के पड़ताल कर रहे थे। भारत का उल्लेख होने पर उनके चेहरे पर कोई भाव नहीं आया किन्तु जब उन्हें हमने भ्रमण का उद्देश्य ‘‘पर्यटन’’ बताया तो उनके चेहरे पर चकित मुस्कान अवश्य उभरी।

कोलंबो एक विशुद्ध तटीय नगर है। सागर किनारे बिखरी असंख्य बैंचों पर अकेले बैठकर आप सर पटकती हुई लहरों को निहारना चाहें तो ये नहीं हो सकता। अपने प्रिय भोजन पोल सांबोल की डकार लेता हुआ कोई भी श्रीलंकाई नागरिक आपको चैन नहीं लेने देगा। वे हम भारतीयों जैसे ही जिज्ञासु हैं और आपकी हर पारिवारिक जानकारी को खोद कर निकालते हैं। और तो और समस्याओं के सुधार के लिए सुझाव का तड़का भी लगाते रहते हैं। कोलंबो में देखना तो बहुत कुछ था लेकिन हमने पहले पहाड़ों को नापने का निश्चय किया।

कैंडी की चढ़ाई अपनी गहरी हरियाली के साथ ऐसी लग रही थी जैसे केरल की पहाड़ियों में हो। इसका प्रमाण उनके नारियल-केंद्रित मछली-प्रधान भोजन में भी है। हम दलदा मालीगावां गये, जहॉं भगवान बुद्ध का पवित्र दांत एक भव्य इमारत में सुरक्षित है। इसके अनेकों गलियारों में घूमते हुए सैकड़ों श्रद्धालुओं की चहल-पहल भी वहां की सुंदर शांति को भंग नहीं करती है। अनेक रंगों के कमल एवं ढेरों सफेद फूल हर वेदी पर एक नाजुक कशीदाकारी की तरह फैले हुए थे।

कैंडी से नुवारा एलिया की चढ़ाई किसी भी पहाड़ी यात्रा की तरह थी – हरियाली, हरियाली और हरियाली। हरे रंग के सभी शेड में सतरंगें फूलों से जैसे उसे हाईलाईट किया गया हो। गंपोला नामक स्थान के बाद रोशनी (नुवारा) की नगरी (एलिया) अपने समस्त वैभव के साथ प्रकट होती है।

चाय बागानों की झालर पर झालर से सजे हुए ढलानों को देखकर ऐसा लगा जैसे हम दार्जिलिंग में हों। इस हिमालयीन प्रभामंडल को पूरे लाल रंग के खिले हुए बुरूंश के फूल आग्रहपूर्वक सिद्ध कर रहे थे। हमे संशय हुआ, यह तो भूमध्य रेखा के ठीक ऊपर है ? हमारे गंभीर मेज़बान सूचित करते हैं कि ये उन पहाड़ों के टुकड़े हैं, जिन्हें हनुमान जी घायल लक्ष्मण के उपचार के लिए हिमालय से उठाकर लंका लेकर आये थे। श्री बसंत डिसिल्वा एक रिटायर्ड वरिष्ठ बैंकर हैं इसलिए उन्हें अंधविश्वासी तो नहीं कहा जा सकता! वे यह भी बताते हैं कि श्रीलंका में अनेकों ऐसे स्थान हैं जहॉ स्थानीय उष्णकटिबंधीय हरियाली के बीच अनायास हिमालयीन या ऊंची एल्पाईन पहाड़ियों पर पाई जाने वाली वनस्पति प्रकट हुई है।

हम लंकापुरा में हैं, पराक्रमी राजा रावण की राजधानी में। अब भले ही इसे हक्गाला गार्डन कहा जाता हो मगर सर्वत्र लगे हुए अशोक के पेड़ साफ बताते हैं कि यह कौन सी वाटिका है! एक पतली सी धारा सीता एलिया के छोटे से मंदिर के बगल से कलकल बहती रहती है। इस मंदिर की मुख्य प्रतिमायें एक शताब्दी पहले जलमग्न मिली थीं। वास्तव में यह मंदिर अपने नन्हे गोपुरम और चटक रंगों के दक्षिणात्य शिल्प के साथ शिवकाशी या अरलव्यमोली जैसे किसी तमिल शहर में हो सकती है, किंतु यहॉं माहौल स्थानीय ही है। मंदिर के बाहर खड़े नन्हें हनुमानजी पर लगे दुर्घटनारोधक सिंदूर का स्पर्श इस मार्ग से जाने वाले सभी धर्मो के चालक करते हैं और उसे अपने वाहनों में लगाते हैं। क्या यह वही शिला नहीं है जहॉं पर बजरंग बली बैठे थे और नदी को देख कहाः

संध्याकालमनाः श्यामा धु्रवमेष्यति जानकी।

नदीं चेमां शुभजलां संध्यार्थे वरवर्णिनी।।

(यह प्रातःकालीन संध्या का समय है, इसमें मन लगाने वाली और सदा षोडषी सीता इस पुण्य सलिला के तट पर अवश्य पधारेंगी)

(सुंदरकांडः 14:49 श्री वाल्मीकि रामायण)

भले ही एशियेटिक सोसायटी की सिंह-मंडली इस बात के लिए हमारे प्राण हर लें किन्तु यहं हमें विश्वास हो गया कि यही रामायण की लंका है। भला काल्पनिक चरित्र एक ऐसे देश में कैसे जिंदा रह सकते हैं जिसने हजारों वर्षो से उन चरित्रों से संबंधित किसी साहित्यिक स्त्रोत को नहीं जाना ? अधिकांश सिंहली बच्चों को जिन रविवारी स्कूलों में धार्मिक शिक्षा दी जाती है, वहॉं रामायण नहीं पढ़ाई जाती, न ही किसी प्रकार की रामलीला का प्रदर्शन देखने को मिलता है। लगभग 2600 वर्ष हो गये सिंहलियों को जीवनशैली के रूप में बौद्ध धर्म को अपनाये हुए, जो सिद्धार्थ गौतम और उनके शिष्यों के जीवन एवं उपदेशों पर ही एकाग्र है। फिर भी श्रीलंका का शासकीय पर्यटन संवर्धन ब्यूरो 50 से अधिक रामायण स्थलों को प्रमोट करना उचित मानता है। अनेक चित्रों से और एक कोने में देवनागरी में लिखे ‘‘जय श्रीराम’’ से सुसज्जित उनका ब्रोशर अनेक रहस्योद्घाटन करता है। इसमें कोई पुरातात्विक शब्दाडम्बर नहीं है। 30 वर्षों से युद्ध में लुटा-पिटा एक देश इस तरह के शौक को फरमाये ऐसी उसकी न तो औकात होती है और न ही फुरसत। श्रीलंका पर्यटन का शासकीय ब्रोशर, रामायण को एशिया का महाकाव्य कहता है और आग्रह करता है कि श्रीलंका ही वह देश है जहॉं लंकापुरा है। यही वह स्थान है जहॉं इस महाकाव्य की सबसे महत्वपूर्ण घटनायें हुईं और स्थलों व मंदिरों की एक समृद्ध थाती यहॉं सुरक्षित है।

आधुनिक इतिहास तो एक आयात है जो शिक्षा के साक्षर व सशस्त्र जमींदारों का साम्राज्य है। फिर भी कई बार इन विद्वानों को उन दंतकथाओं से सहयोग मिलता है जो निरक्षर जनसाधारण में प्रचलित रहती है। क्या ‘‘मोयन जो दरों’’ नाम का एक मुर्दों का स्थान नहीं था पश्चिम भारत में, जिससे उजाकर हुई एक पुरानी सभ्यता ? जिसे कि शास्त्रीय ग्रंथों ने भी नजरअंदाज किया था, चाहे वह संस्कृत हो या फिर ग्रीक ? लेकिन वह स्थान लोकस्मृति में जिन्दा रहा और आज सिंधु घाटी सभ्यता की पताका बना हुआ है।

श्रीलंका की वाचिक परंपरा अपने भूमिपुत्र रावण के प्रति गर्व करती हैं, जिसे स्वयं विष्णु से कम कोई हरा नहीं सका। यह भी अद्भुत है कि विष्णु इस बौद्ध देश के चार रक्षक देवों में हैं, जिनकों स्वयं भगवान बुद्ध के अनुरोध पर ‘‘सक्का’’ यानि इंद्र ने नियुक्त किया था। रावण एल्ला, रावण कोट्टे जैसे नाम आज भी प्रचलित हैं। यद्यपि राम को वे विष्णु का अवतार मानते हैं फिर भी उनके नाम का कोई विशेष स्थल नहीं है। परंतु श्रीराम के द्वारा अभिषेक किये गये राजा विभीषण को भी लंका में एक रक्षक देवता मान लिया गया है। हर बौद्ध मंदिर में चार देवताओं के देवालय आवश्यक रूप से मौजूद हैं-कतरगमा या स्कंद, विभीषण देवा, समन एवं विष्णु।

पंडित जसराज अपने हनुमान जी के लिए गाते हैं ‘‘राम को राम बनाया तुमने’’ – यदि लंका के बारे में भी यही कहा जाये तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। भोपाल एयरपोर्ट पर रवाना होते हुए हमारे भाई श्री के.के.सिंह आईएएस ने गदगद भाव से कहा कि राम लंका नहीं जाते तो मर्यादा पुरूषोत्तम की पदवी नहीं पाते।

परंतु लंका में असल नायिका तो अपनी कोमलांगी मगर दृढ़निष्ठा की देवी सीता है। सीता एलिया से लेकर सीता कोटुवा, इस्त्रीपुरा, सीता के आंसुओं का तालाब, दिवुरूम्पोला जैसे अनेकों धार्मिक स्थल इस धैर्य की देवी को समर्पित हैं। दिवुरूम्पोला एक विशेष शुभस्थल है, जो आध्यात्मिक महत्व के कारण सभी का ध्यान आकर्षित करता है। यह स्थान सीता एलिया से वेलीमाड़ा जाते समय 15 किलोमीटर की दूरी पर है। यहीं पर सीता माता को अग्नि परीक्षा देनी पड़ी थी। श्रीलंका के पर्यटन ब्रोशर के अनुसार यहॉं पर आपसी झंझट के मामलों को निपटाने के लिए ली गई शपथ को स्थानीय कानून में वैधानिक मान्यता प्राप्त है।

दिवुरूम्पोला में एक सामान्य सा बौद्ध मंदिर है। एक छोटी सी मढ़िया है जहॉं पत्तिनी देवी की मूर्ति है जो श्रीलंका में सर्वत्र पाई जाने वाली देवी है। इसी में एक राम दरबार को किसी भारतीय भक्त द्वारा स्थापित कराया गया है। यहॉं कुछ भी विशेष नहीं है, सिवाय इस क्षेत्र के विशिष्ट संुदर दृश्यों व गहन शांति के।

जब हम मंदिर के पीछे की ओर जाते हैं तो वहां होता है एक झकझोरने वाला अनुभव। वहीं एक छोटा सा चैत्य है, जहां हर दिशा में भगवान बुद्ध की प्रतिमांए आर्शीवाद-मुद्रा में लगी हैं। प्रदक्षिणा के दौरान महसूस हुआ कि जैसे किसी भीषण वेग द्वारा हमारे अंदर के किसी बंधन को खोल दिया। हमारे आंसू भर आये और हिचकियां रूकने का नाम नहीं ले रही थीं। एक स्त्री सीता के मिथिला की और दूसरी श्रीलंका की….. जहां सीता के जीवन की सबसे दारूण घटनायें घटीं……. हेमा डिसिल्वा और मुझे थोड़ा समय लगा अपने आपको संभालने में……..। तब हमने पाया कि सामने लगे साईनबोर्ड पर तमिल, सिंहल और अंग्रेजी में सूचना लिखी थी, कि यही वह स्थान है, जहां सीता की अग्नि परीक्षा हुई। हमारे दल के पुरूषों में, जिनमें एक कर्मकांडी ब्राम्हण भी थे, ने कहा कि उन्हें इस स्थान पर अनायास अभूतपूर्व क्रोध आया, जैसे किसी ने उनकी मां पर हमला किया हो!

हम सोच रहे थे इस सादे चबूतरे पर बैठकर, जिस पर स्थानीय लोगों को इतना विश्वास है…….. हम…… भारतीय और श्रीलंकाई, हिंदू और बौद्ध……….इस जानकी नवमी को सीता माता के जन्मदिन पर क्या कोई इस भूले बिसरे मंदिर पर जाकर गेंदे के फूल चढ़ायेगा?

-अनुराधा शंकर

हिन्दी कथाकार. सम्प्रति शासकीय सेवा.

3.anushankar@gmail.com

डी-11, 74 बंगला,

भोपाल।

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2 Comments on "कोई सीता मैया को फूल चढ़ायेगा?"

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पंकज झा
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बहुत बधाई अनुराधा जी….! अद्भुत लागल अहांक ई वर्णन…अगर हमर जानकारी सही हो तय अहाँ तै अपने श्री रामचंद्र के सुता छी….मोन गदगद भय गेल पढला पर….ये आ[के शब्दों के फूल ही तो थे जो आप सीता मैया पर चढा रही थी….सादर.

arvind mishra
Guest

बहुत रोचक -सकल राम मय सब जग जानी –
इस संस्मरण ने भी यही साबित किया !

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