लेखक परिचय

राजकुमार सोनी

राजकुमार सोनी

स्वतंत्र वेब लेखक व ब्लॉगर

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राजकुमार सोनी

बहुत दिनों से मेरी कलम शांत थी कोई विषय नहीं मिल रहा था मन बैचेन हुआ तो ऐसे ही गार्डन की ओर चल पड़ी। आज शनिवार था और बच्चों की स्कूल की छुट्टी थी। इसलिए आज उनकी टीचर सुबह ही आने वाली थी। तब तक मैंने सोचा दोनों बच्चों के लिए उनकी पसंद का नाश्ता बनाया जाए। सनी को कच्चा सेंडविच पसंद है, तो निकी को छुट्टी के दिन उत्तपम और मेगी ही पसंद है। दोनों को नाश्ता कराकर मैंने भी नाश्ता कर लिया। पतिदेव काम की वजह से दिल्ली गए हुए थे। कामवाली बाई राधा आ चुकी थी। आने से ही पहले वो हम दोनों की चाय बनाती। उसके बाद पूरे मोहल्ले की खबरें सुनाती। कहा- क्या हुआ। किसके बच्चे हॉस्टल से आए हैं या कौन से बंगले की मालकिन मायके गई है। आज मैं भी फुर्सत में थी। बच्चे नहाने जा चुके थे।

राधा झाडू निकाल ही रही थी कि मिसेज शर्मा की गुस्से से भरी आवाज सुनाई दी।

आज क्या मिसेज पंवार के ही घर रहना है। एक दिन की पगार कटेगी तो समझ आएगा।

राधा बेबसी से मेरी तरफ देखती रही।

मैंने कहा- घबरा मत, मेरा काम बाद में आकर कर लेना।

राधा फुर्ती से हाथ पोंछकर मिसेज शर्मा के घर चली गई।

बच्चे तैयार हो चुके थे। 11 बजने को आए पर उनकी टीचर पारुल अभी तक नहीं आई थी। बच्चे रविवार का प्रोग्राम बना रहे थे। लंच बाहर करना, शाम को मूवी, फिर डिनर बाहर…. पूरा दिन मस्ती होने वाली थी। तभी घंटी की आवाज आई। लगता है टीचर आ गई है। पारुल आज बहुत उदास लग रही थी। मेरे पास आई। बोली- दीदी आज मैं पढ़ा नहीं पाऊंगी, पर आपसे थोड़ी देर बात करना चाहती हूं।

बैठो….।

पारुल मैं चाय बनाकर लाती हूं।

सनी-निकी छुट्टी की बात सुनते ही खुश हो गए। और अपने दोस्तों के यहां खेलने चले गए।

पारुल कुछ देर चुप रही फिर बोली-

…दीदी, आप लिखती हो, इसलिए आज में अपनी जिंदगी की बातें आपके साथ बांटना चाहती हूं।

कभी आपको ऐसा कुछ लगे लिखने जैसा तो आप वो जरूर लिखना। मैं चुपचाप सुन रही थी।

पारुल के रुकने पर मैंने उसे कहा कि तुम सुनाओ मैं तुम्हें बीच में नहीं रोकूंगी।

पारुल ने जो कहानी सुनाई मुझे लगा कि ये कहानी हर जागरुक आदमी को पढऩा चाहिए। इसलिए ये कहानी आप सभी के सामने है।

दीदी, उस दिन बहुत तेज बारिश हो रही थी। बारिश भी दो प्रकार की होती है। अमीरों के लिए घूमना, चाय काफी पकौड़े और पिकनिक, मगर गरीबों के लिए उस दिन सिर्फ बारिश होती है दिन भर के उपवास के साथ पर भगवान का शुक्र था कि पारुल ऐसे घर में पैदा हुई थी…. जहां दो वक्त के खाने के लिए सोचना नहीं पड़ता था। भरा पूरा परिवार था। दादा-दादी, दो भाई, मम्मी-पापा सब लोग थे। पारुल की सबसे प्यारी सखी सरिता की सगाई थी और पारुल अपनी सहेलियों के साथ उसी की सगाई में गई हुई थी कि अचानक बेमौसम की बारिश चालू हो गई। हम लोग सरिता के घर से निकल चुके थे और रास्ते में ही बारिश की वजह से हमारी गाड़ी खराब हो गई। तभी एक जीप आकर रुकी। कुछ लड़के उसमें बैठे थे। पारुल को समझ नहीं आ रहा था कि वे लोग क्या करें। मदद लें या नहीं पर समय को देखते हुए उनके पास और कोई चारा नहीं था। मन बहुत घबरा रहा था। अखबारों में आए दिन ऐसी ही घटनाएं घटती रहती हैं। सहमती हुई वे सब उस जीप में सवार हो गईं। कुछ देर के रास्ते में ही पता चल गया कि राहुल नाम का लड़का अपने 4 दोस्तों के साथ कमरा लेकर एमबीए की तैयारी कर रहा है। पारुल को राहुल अच्छा लगा। राहुल ने उसे अपना सेल नम्बर दिया और उन सभी को सुरक्षित घर पहुंचा दिया। पारुल के घरवालों ने सही सलामत देखकर चैन की सांस ली।

चार-पांच दिन बीते होंगे कि एक दिन सुबह-सुबह ही राहुल का फोन आ गया। उसका जन्म दिन है और वो चाहता है कि पारुल अपने पूरे परिवार के साथ उसके जन्मदिन में शामिल हो। थोड़ी बहुत ना नुकुर के बाद पारुल मान गई।

शाम को वे सभी राहुल के बर्थडे में गए। वहीं पर अचानक राहुल ने उसके मम्मी-पापा से उसका हाथ मांग लिया। ये सब कुछ बहुत ही अचानक था। एकदम फिल्मी स्टाइल पर। पारुल भी उसे चाहने लगी थी। आखिर दिल जीत गए और राहुल के मम्मी-पापा व पारुल के मम्मी-पापा ने हां कर दी।

चट मंगनी और पट विवाह हो गया।

ये सब कुछ एक खुशनुमा अहसास था।

राहुल एक साये की तरह उसके साथ रहता। उसकी पढ़ाई खत्म हो चुकी थी और एक अच्छी कंपनी में नौकरी भी मिल गई थी। सब कुछ अच्छा चल रहा था। कभी-कभी पारुल को जरूर राहुल का व्यवहार अजीब लगता, कभी गुस्सा-कभी चिड़चिड़ापन, कभी एक दम से डर जाना।

राहुल की मम्मी का व्यवहार बुहत ही अजीब था। राहुल अपनी मम्मी से ज्यादा बात नहीं करता था। एक दिन राहुल की तबीयत बहुत खराब हो गई। वो दीवारों पर सिर फोडऩे लगा। जोर-जोर से चिल्लाने लगा। कभी शांत हुआ तो कभी गुस्सा करने लगा।

पारुल घबरा गई, उसे समझ नहीं आया कि क्या करें।

मम्मी से तो मदद की बिल्कुल भी उम्मीद नहीं थी। पारुल बेबस और लाचार थी। हर जगह अंधेरा नजर आ रहा था। उसने अपनी सहेली को फोन किया तो उसने बताया कि उसके घर के पास ही एक आश्रम है, जहां पर इसी प्रकार के लक्षणों वाले रोगी आते हैं। वहां ले जाने पर डॉक्टर ने चेकअप करने के बाद बताया कि उसे बाईपोलर डिसआर्डर है। ये बीमारी लाइलाज नहीं है, पर रोगी के साथ-साथ घरवालों को धैर्य व प्यार के साथ रोगी का ध्यान रखना चाहिए। तबी उसका चिड़चिड़ापन, चीखना, कभी अचानक खुश होना, कभी गुस्सा होना…. ठीक हो जाएगा और रोगी सामान्य जीवन जी पाता है।

घर आने पर जब उसने मम्मी को बताया तो उन्होंने कहा कि वो जानती है, पर वो कोई मदद नहीं कर सकती। आखिर सौतेली संतान के लिए और क्या-क्या करें।

सौतेली संतान।

उफ,

अब पारुल को सब समझ आ गया वो उसी वक्त आश्रम पहुंची और वहां के संचालक से बात करके दोनों के वहीं रहने का इंतजाम भी करवा लिया। सुबह वो आश्रम में काम करती और शाम को मेरे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती।

राहुल के दौरों में कोई कमी न थी। डॉक्टर चाहते थे कि पारुल उसका अतीत जाने किस बात का डर उसमें समाया है। इसका पता करे और एक दिन उसे ये मौका मिल ही गया। उस दिन 2 अक्टूबर था। गांधी जयंती का दिन। राहुल बहुत शुख नजर आ रहा था।

खुद ही पारुल से बोला।

मैं अपने जीवन की कुछ कड़वी सच्चाईयों से तुम्हें मिलवाना चाहता हूं। जब मैं दसवीं कक्षा में था तो एक दिन परीक्षा खत्म होने के बाद मैं और मेरे दोस्त राम-रहीम, पीर और सतपाल स्कूल के बाहर खड़े होकर भविष्य की योजनाएं बना रहे थे, पर हम पांचों दोस्त सिर्फ और सिर्फ अपने देश के लिए काम करना चाहते थे। पांचों अलग-अलग धर्मों के होते हुए भी एक जान थे। वैसे भी दोस्ती में धर्म कहां मायने रखता है। तभी उनके पास एक काली गाड़ी आकर रुकी। याद नहीं पर उन लोगों ने ऐसा कुछ कहा कि हम पांचों उस गाड़ी में बैठ गए। कुछ दूर जाने पर उन्होंने हमें नोटों की गड्डियां दीं और हमें वापस वहीं स्कूल के बाहर बिना कुछ कहे छोड़ दिया। हाथ में नोट और असमंजस के भाव। नादान, कम उम्र… समझ नहीं पाए और उन नोटों से अपने बाकी दोस्तों को बुलाकर एग्जाम खत्म होने की पार्टी दी। सारे रुपए खत्म हो गए। अब हम सब अपने भविष्य के बारे में सोच रहे हैं। मेरे घर में सौतेली मां और मामा दोनों ही थे, जो मुझे बिल्कुल भी नहीं चाहते थे। कुछ दिनों बाद वही काली गाड़ी मेरे घर के बाहर खड़ी थी। मैं पता नहीं क्यों उनके साथ गाड़ी में बैठ गया और अपने बाकी दोस्तों को भी साथ ले लिया। अब हम सभी शहर से दूर एक खंडहर में पहुंचे। जहां नकाब पहने एक आदमी मिला। उसने हम पांचों को अपने मिशन के बारे में बताया। देश में फैले भ्रष्टाचार और भ्रष्ट नेताओं के खिलाफ इतना जहर उगला कि हम सभी को वे दुश्मन दिखने लगे। मगर अब हम पांच दोस्त नहीं पांच मानव बम बन चुके थे। हम सब इस बात को जान भी नहीं पाए कि वो हमारा इस्तेमाल कर रहा है।

पारुल सांस रोके उसकी कहानी सुन रही थी। राहुल ने पानी पिया और आगे कहना चालू किया।

अब हम सभी के पास एक मिशन था।

हमें पांच बड़े-बड़े एरिया दिए गए। हम सब बिना कुछ सोचे-समझे इस घिनौने काम के लिए तैयार हो गए।

4 दिसंबर की सुबह मेरे चारों दोस्तों को एक साथ इस मिशन को अंजाम देना था और एक जुलाई को मुझे ये काम करना था। मेरे चारों दोस्त चले गए। ये सोचकर कि वो अपने देश के लिए कुछ कर रहे हैं। अगले दिन के अखबारों में 4 मानव बमों सहित हजारों लोगों के मरने और घायल होने की खबरें थीं। मुझे लगा कि अखबारों में ये रक्त टपक रहा है। हर निगाह मुझे कह रही है कि मैं कातिल हूं।

उफ…..।

तो उन लोगों का ये मिशन था।

मासूमों को मारने का….।

मैं पागल हो गया और मुझे इस बीमारी का पहला दौरा पड़ा।

मां तो मुझे पहले ही पसंद नहीं करती थी। इस बीमारी के बाद तो सब मुझसे नफरत करने लगे।

मुझे घर से निकाल दिया।

मैं पूना जाकर एमबीए की तैयारी करने लगा।

मगर एक जुलाई की याद आते ही मैं सिहर उठता।

तभी मेरे जीवन में तुम आई।

मुझे लगा कि तुम्हारे साथ में इस काले साये से निकल जाऊंगा।

मैं बहुत हद तक सफल भी रहा। एक जुलाई भी निकल गई। उन लोगों का भी कुछ पता नहीं था। मगर आज फिर वो काली गाड़ी उसे ढूंढ़ते हुए वहां आ पहुंची और धमकी दी कि अगर वो उनका मिशन पूरा नहीं करेगा तो उसे पारुल को खोना पड़ेगा।

पारुल सारी घटना दम साधे सब सुनती रही। उसने उसे ढांढस बंधाते हुए उस नकाब वाले से मिलने के लिए कहा। और खुद पुलिस स्टेशन चली गई। वहां जाकर उसने डीजीपी को राहुल के अतीत के बारे में सब कुछ बताते हुए उनसे मदद मांगी। पुलिस पहले ही इन विस्फोटों की जांच में लगी थी। राहुल उनके लिए एक अहम सुराग था। पारुल आश्वासन पाकर आश्रम पहुंची। बाहर एक गाड़ी खड़ी थी। राहुल अपने कमरे में छुपा था। पारुल के समझाने पर वो बाहर आया और उन लोगों से बात करके 4 बजे मिलने का वक्त तय किया। अपने मिशन को अंजाम देने का। राहुल 4 बजे वहां पहुंच गया। इधर पुलिस टीम भी सादा वर्दी में उसके साथ थी। 5 बजे काली गाड़ी आई। उसमें से तीन चार लोग बाहर निकले। उन्होंने राहुल को एक नक्शा दिया और रुपयों से भरा बैग। राहुल बता रहा था कि कैसे मेरे हाथ कांप रहे थे, पर पुलिस की चौकन्नी निगाहें उन लोगों पर थीं। नक्शा हाथ में आते ही चारों तरफ से पुलिस ने उनको घेर लिया और उनके जरिये उस नकाब पोश तक भी पहुंच गए। उस नकाब वाले को देखकर उसके होश उड़ गए। क्योंकि वो और कोई नहीं उसके मामा थे। पर आज उन दोनों को ऐसा लग रहा था कि उनकी जिंदगी से वो काला साया हमेशा के लिए चला गया हो। आज से उसका राहुल आजाद है। पुलिस का मुखबिर बनने पर उसे सारे आरोपों से मुक्त कर दिया था। इसलिए आज पारुल अपनी कहानी मुझे सुनाने आई थी। वे दोनों आज एक नई शुरुआत करने जा रहे थे। संचालक ने आश्रम की पूरी जिम्मेदारी उन पर सौंप दी थी। इसलिए वो आज से ट्यूशन का काम छोडऩा चाहती है और इस कहानी के माध्यम से लोगों को बताना चाहती है कि हमें आतंकवाद का मुकाबला डटकर करना चाहिए। पारुल चली गई पर मेरे पास कुछ सवाल छोड़ गई।

क्या हमारे देश को आतंकवाद से, राहुल जैसे मासूम नौजवानों को बहकाने से बचाने के लिए कोई पारुल आएगी।

नई सुबह लेकर।

क्योंकि करोड़ों लोगों की भीड़ में मैं भी एक हूं। अपने देश से आतंकवाद को हमेशा के लिए मिटा देने के संकल्प के साथ।

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