लेखक परिचय

अरुण माहेश्‍वरी

अरुण माहेश्‍वरी

अरुणजी हिन्दी के महत्वपूर्ण वामपंथी आलोचक हैं और कोलकाता में रहते हैं।

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अरुण माहेश्वरी

हरीश भादानी की तीसरी पुण्य तिथि के अवसर पर श्रद्धांजलि लेख

सचमुच इससे कठिन शायद ही कोई दूसरा काम हो सकता है कि एक बेहद मासूम, सरल और सीधे आदमी को गहराई से समझा जाए। किसी कपटी, कठिन और टेढ़े चरित्र की गुत्थियों को खोलना आसान होता है। उसमें बहुत कुछ ऐसा होता है जो खोले जाने की अपेक्षा रखता है, पर्दे के पीछे छिपा होता है। लेकिन एक पूरी तरह से पारदर्शी जीवन को और गहरे तक समझने की सायास कोशिश कितनी दुष्कर हो सकती है, आज जब मैं हरीश जी के व्यक्तित्व के बारे में लिखने बैठा हूं तब पता चल रहा है। अनंत तिकड़मों और स्वार्थों में डूबे इस संसार में कोई योजनाविहीन नि:स्वार्थ जीवन ही हमारे लिये सबसे बड़ी चुनौती है, हरीश जी की स्मृतियों से उनकी कोई तस्वीर बनाने की कोशिश में खुद को सबसे अधिक इसी चुनौती से जूझता हुआ पाता हूं।

 

चीन के महान कथाकार लू शुन की सबसे प्रसिद्ध कहानी है : आ क्यू की सच्ची कहानी। गांव का एक बेहद गरीब, अबोध, सबसे लात खाने वाला फिर भी सदा सबकी सेवा के लिये उपलब्ध चरित्र। गांव भर में अनायास विचरण करने वाले उस चरित्र में कहीं किसी प्रकार की कोई नाटकीयता नहीं थी, सिवाय इसके कि उसका अंत गांव के ही एक घमंडी ‘क्रांतिकारी’ से झूठी होड़ में फांसी पर चढ़ जाने से हुआ था। ऐसे निष्प्रयोजन और अनाटकीय जीवन को कहानी का विषय बनाना सचमुच एक कठिन चयन था। लेकिन इसी जीवन के ब्यौरे से लू शुन ने ऐसी कहानी कह दी कि आज तक साहित्य के पंडितगण उसमें अपना मगज खपाये हुए हैं। लू शुन के इस विचित्र से चयन के पीछे के तर्क को लेकर अब तो एक पूरे जीवन दर्शन, आक्यूवाद तक की रचना हो चुकी है।

 

आ क्यू के ठीक विपरीत हमारे सामने पूरी तरह से पारदर्शी, सरल और सादा जीवन का एक दूसरा चरम उदाहरण गांधीजी का है। उनके निजी जीवन में जो भी थोड़ी बहुत गुत्थियां थीं, खुद उन्होंने उन्हें सबके सामने रख दिया था। उनके दर्शन, उनके जीवन के उद्देश्यों पर कहीं कोई पर्दादारी नहीं थी। फिर भी उनके जीवन काल में ही बड़े-बड़े दिग्गजों ने उन्हें ‘चालाक लोमड़ी’ तक कहा। आज तक वे दुनिया के सबसे रहस्यमय और आकर्षक व्यक्तित्व बने हुए हैं। रोमा रोलां का यह कहना कि लोग इस बात पर विश्वास नहीं करेंगे कि इस धरती पर गांधी जैसा भी कोई व्यक्ति हुआ था, अतिशयोक्ति नहीं था।

 

हरीश जी न आ क्यू थे और न ही महात्मा गांधी। वे सुदूर रेगिस्तान के एक छोटे से शहर के सामंती परिवार में पनपे हिंदी के अपने प्रकार के विद्रोही रूमानी कवि थे। अन्यों से फर्क शायद इतना ही था कि स्वरों और अक्षर-ब्रह्म के मनमोही अनहद के गुंफन ने उनसे आम जीवन के प्रयोजनों और स्वार्थी सरोकारों को छीन लिया था। अपने पिता और दादा की भगवाधारी होने की पारिवारिक परंपरा के ठीक विपरीत वे पूरी तरह से गृहस्थ, अपने परिवार के मुखिया थे। फिर भी उन्हें चालू अर्थों में पूरी तरह से पारिवारिक नहीं कहा जा सकता। घर से दूर महीनों किसी दूसरे-तीसरे शहर में डेरा जमाये रखने वाले घुमंतु। अपने सुरों और शब्दों से निर्मित संसार में एक खासप्रकार की आत्मलीनता के साथ उन्होंने ऐसा जीवन जीया कि अनायास ही उनके निकट के अनेक लोग उनमें किसी संत का रूप देखने लगते थे। लेकिन सच सिर्फ यही है कि वे भी एक सच्चे, सरल, निश्छल और पारदर्शी इंसान थे। और इसीलिये एक चरित्र के रूप में अध्ययन की दृष्टि से बेहद कठिन चरित्र थे। उन्हें खोलना किसी खुले हुए को खोलने जितना ही दुष्कर काम जान पड़ता है।

 

हरीशजी की अंतिम यात्रा के समय बीकानेर शहर की सड़कों पर जो जन-सैलाब उमड़ा और उनकी शोकसभा में शहर के जाने-माने लोगों के रूंधे गलों की जो सुबकियां सुनाई दी, उनसे एक बात साफ थी कि वे बेहद लोकप्रिय ऐसे आदमी थे जिनके संसर्ग से हर आम और खास को सिर्फ सुकून और सुकून ही मिलता था। ऐसी शोकसभाओं में ही जो बात सबसे अधिक सुनने को मिली, वह यह कि उन्होंने कभी किसी से अपने बारे में कोई सिफारिश नहीं की।

 

जिनकी अपने बारे में कोई योजना ही नहीं थी वे फिर किस बात की सिफारिश करते! लगता है होश संभालते ही उन्होंने किसी पवित्र प्रेमी के ओज और विगलित उदात्तता के प्याले को पीकर होश गंवा दिया था। प्रेम फिर प्रिया से हो या यृद्धरत आदमी से, या अपने देश, धरती और यहां तक कि परंपरा के सूत्रों से ही क्यों न हो! हरीश जी की तमाम रचनाएं, उनकी भाषा और शैली किसी भक्त की अडिग आस्था से उपजे तेज और समर्पण की आवेशपूर्ण और आवेगमय आत्मलीनता की गवाह है। उम्र और अनुभवों के साथ उनके विषय बदलें लेकिन रचना का मूल स्वभाव नहीं। और, उसी प्रकार उनका पूरा व्यक्तित्व भी नहीं। उनके व्यक्तित्व का कोई भी अंश उनकी रचनाओं से जुदा नहीं था। इसीलिये जानकार उन्हें एक आपाद-मस्तक कवि कहते थे। मृत्यु के उपरांत उन्हें दीगयी श्रद्धांजलियों में जिस एक जुमले का सबसे अधिक प्रयोग दिखाई देता है, वह है – मुकम्मल कवि। खास के प्रति उनमें न कभी कोई आकर्षण था और न ही खास बनने की कोई ख्वाहिश। आम के वृत्त में ही रचते-बसते थे। इहलोक परलोक सब इसी दायरे में था। इसीलिये कहना मुश्किल है कि प्रेम के कवि का जनकवि में उत्तरण हुआ या जनकवि प्रेम का कवि, प्रकृति और धरती का कवि बन गया। जन और प्रेम, जन और प्रकृति की नैसर्गिक अभिन्नता उनमें चरितार्थ हुई थी।

 

हरीश जी महीनों हमारे घर रहते थे। लगभग चार दशकों से उनके गीतों और धुनों से हमारा परिवेश गुंथा हुआ था। लेकिन उनसे संवाद तुलनामूलक कम ही हुआ करता था। युवा वय में जब हम पर क्रांतिकारी राजनीति का जोम था, हम उन्हें गाते थे, उनमें रमते थे, लेकिन अक्सर उनपर राजनीति के कुछ अजीबोगरीब मानदंडों की अपेक्षाओं के हथौड़ें भी चलाया करते थे। लेकिन अपनी धुन के पक्के हरीश जी हमारे आवेश से ज्यादा विचलित नहीं होते थे। यहां तक कि परवर्ती दिनों में जब हम क्रिया को संज्ञा और संज्ञा को क्रिया बनाने के भाषा के उनके खेलों पर या शब्दों की पुनरावृत्ति से अभिव्यक्ति के आवेग को बनाये रखने के उनके अतिरिक्त आग्रह पर या नितांत निजी अनुभवों और स्थानिक भाषाई और मिथकीय संदर्भों के बिंबों से लबालब उनकी लंबी-लंबी कविताओं के अभेद्य से लगने वाले संसार पर घनघोर आपत्ति करते थे, तब भी लगभग किसी चिकने घड़े की तरह वे बेअसर ही रहते थे। आज जब वे नहीं है तब उनके ऐसे ही विपुल रचना संभार को देख कर लगता है कि भाषा, शैली और अभिव्यक्ति के सभी स्तरों पर रचाव की उनकी जिद ने सचमुच रचना का उनका अपना ही व्याकरण, एक संपूर्ण शास्त्र गढ़ दिया है। पहले उस व्याकरण को समझो, शास्त्र को सिद्ध करो, फिर उनके इस रचना संसार में प्रवेश करो। आम लोगों के बीच रचने-बसने और बड़ी से बड़ी भीड़ को भी अपने गीतों से रिझाने और प्रेरित करने वाले, कोई ‘खास’ बनने की ख्वाहिशों से कोसों दूर हरीश जी का किंतु यह अपना एक खास क्षेत्र था, कुछ-कुछ मिर्जा गालिब की अरबी-फारसी शायरी के क्षेत्र की तरह ही। गालिब-विशेषज्ञों के लिये उनकी अरबी-फारसी की शायरी कम महत्वपूर्ण नहीं है। हरीशजी के अध्येता-प्रशंसक भी उनकी रचनाओं के इस विशाल, किन्तु अचर्चित अंश में डूब कर रोमांचित और अनुप्रेरित होंगे, इसमें कोई शक नहीं है।

 

तथापि, गालिब ‘गालिब’ हुए, उनकी उर्दू शायरी के चलते। बिल्कुल इसी तरह, हरीश भादानी हरीश भादानी है अपने असंख्य बेहद लोकप्रिय गीतों के चलते। हरीश जी के अमर, जन-जन में गाये जाने वाले गीतों और कविताओं का भी इतना बड़ा भंडार है, जिसे उनके एक श्रेष्ठ रचनाकार व्यक्तित्व की तस्वीर बनाने के लिये काफी कहा जा सकता है।

 

इधर के दिनों, जब हरीश जी हमारे घर पर होते थे, सरला से अक्सर कहा करता था कि यह शख्स हमारी जिंदगी भर, अपनी गैर-मौजूदगी में भी, अपने गीतों के बोल और धुनों से पता नहीं हमें कितना रुलायेगा, और हमेशा एक अलग प्रकार की छाया और सुकून भी देगा।

 

जब से हमने हरीश जी को जाना, हमेशा उन्हें आर्थिक संकटों से जूझते हुए ही जाना। अर्थ का विषय शायद उनके लिये किसी बला की तरह था। वे उससे दुखी हो सकते थे, उसके टल जाने की प्रार्थना कर सकते थे, लेकिन उससे मुक्ति का उनके पास कोई उपाय नहीं था। एक समय वे कवि सम्मेलनों के बड़े कवि थें, लेकिन कवि सम्मेलन उनके लिये थे, वे कभी कवि सम्मेलनों के नहीं हुए। राजस्थान का बच्चन और नीरज कहलाना उन्हें प्रिय हो सकता था, लेकिन कविसम्मेलनी कहलाना कत्तई नहीं। अपनी गायकी के लिये उनके निकट अज्ञेय जी की इतनी सी प्रशंसा ही काफी थी कि हरीश भादानी को सुन कर पता चलता है कि कविता को कैसे गाया जा सकता है। गीत और मंच उनके जीविकोपार्जन के साधन नहीं बने, कविगोष्ठियों और जन-आंदोलनों की वस्तु ही रहे। व्यवसायिक कवि सम्मेलनों में न जाने का निर्णय उन्होंने उस वक्त लिया जब वे अपने जीवन के सबसे गहरे और पीड़ादायी आर्थिक संकट के दौर से गुजर रहे थे। आर्थिक परेशानी उन्हें मसीजीवी लेखन की ओर ले गयी, जयपुर में डेरा डाला। इसका भी रचनात्मक फल यह निकला कि प्रौढ़ शिक्षा के कार्यक्रमों से जुड़ कर वे राजस्थान के ग्रामीण क्षेत्रों के जन-जीवन से एकाकार होगये। गांव के लोगों के लिये उन्होंने ‘क्षण-क्षण उकल्या हूणियां’ के जिन दोहों की रचना की उन्हें नगाड़ों की थाप पर आज राजस्थान के सुदूर गांवों तक में गाया जाता है। इसी काल के अकेलेपन में उन्हें पौर्वात्य साहित्य, वेदों की कविता और उपनिषदों की जिज्ञासाओं ने भी काफी घेरा।

 

लेकिन हरीश जी के पौर्वात्य प्रेम की बातें काफी इधर की है। युवा दिलों के हृदय पर शासन करने वाले और जन-आंदोलनों की अग्रिम पांत में खड़े एक जन कवि के रूप में हरीश जी की मुकम्मल पहचान तीन दशक पहले ही बन चुकी थी। ‘वातायन’ के संपादक हरीश जी की यादें भी ‘60 से लेकर प्राय: ’80 के जमाने की है। ‘अधूरे गीत’(1959), ‘सपन की गली’(1961) के गीत और ‘हंसिनी याद की’(1962) की रूबाइयां, जिनकी जुबान पर तब थे, आज भी हैं और आगे भी सदा उनके फुरसत के क्षणों के खालीपन को अनोखी मानवीय अनुभूतियों से आबाद रखेंगे। हरीश जी को जानना है तो उनके साहित्य शैशव की इन मासूम सी लगने वाली ताजगी से भरी रचनाओं को जानना ही होगा। ये कवि हरीश भादानी के व्यक्ति-सत्व का एक निश्चित परिचय देती हैं। प्रेम की विस्मृतियों और सुधियों के एक विस्तृत फलक में कहीं लोरी सुनाती, तो कहीं उद्बुद्ध करती, और कहीं कदम-ताल मिलाती अनगिन धुनों के उस रचना संसार को सिर्फ रूमानी बता कर खारिज नहीं किया जा सकता है। एक कठोर सामंती परिवेश में वह किसी मुक्त मन के विद्रोही स्वरों का ऐसा प्रवाह था जिसमें डुबकी लगा कर आज भी बड़ी आसानी से मानवीय और जनतांत्रिक संवेदनाओं के पूण्य को अर्जित किया जा सकता है। जिन्होंने भी हरीश जी के प्रेम और सौंदर्य के ऐसे गीतों के पहले संकलन ‘अधूरे गीत’ के ‘तेरी मेरी जिन्दगी के गीत एक है’, ‘रही अछूती सभी मटकियां’, ‘सभी सुख दूर से गुजरे’, ‘प्रिये अधूरी बात’ तथा दूसरे संकलन ‘सपन की गली’ के ‘सात सुरों में बोल’, ‘सोजा पीड़ा मेरे गीत की’ की तरह के गीतों को सुना है, उनके प्रभाव से मुक्त नहीं हो सकते हैं।

 

युवा दिलों पर राज करने वाला हरीश जी का यह रचना संसार हमारी तो साहित्यिक रुचियों के जन्म काल और युवा वय के नितांत आत्मीय और बेहद आनंददायी क्षणों की स्मृतियों से जुड़ा हुआ है और सही कहूं तो हमारे साहित्य-संस्कार का आधार है। इसीलिये इन रचनाओं के सम्मोहक वृत्तांत में मैं खोना नहीं चाहता। अगर इनकी ओर कदम बढ़ा दिये तो न जाने कहां का कहां चला जाऊं और इस भटकाव के चलते उनके पूरे व्यक्तित्व की जिन दूसरी खास बातों की ओर मैं संकेत करना चाहता हूं, उन्हें ही कहीं भूल न जाऊं!

 

हरीश जी के जीवन का सीधा संबंध उनकी रचनाओं से रहा है। ‘अधूरे गीत’ और ‘सपन की गली’ के लेखक की रचनाओं का फलक साठ के दशक के लगभग प्रारंभ से ही बुनियादी रूप से बदल चुका था। इसी समय से वे कोलकाता और मुंबई के चक्कर लगाने लगे थे। ‘सुलगते पिंड’(1966) और ‘एक उजली नजर की सूईं’(1966) की कविताओं और गीतों को देखिये, महानगरीय जीवन की त्रासदी, अजनबीपन और मानवीय संवेदनाओं के अनूठे बिंबों से निर्मित यह एक ऐसा रचना-संसार है जो नागर जीवन की बेगानगी को अपनी छैनी के प्रहारों या फिर आत्मीय आलींगनों से दूर करने और जिंदगी की जिल्द के किसी नये सफे को पढ़ने के सपनों से रचा-बुना गया था। यह समय था हरीश जी के मूल विद्रोही तेवर पर कम्युनिस्ट दर्शन के मुलम्मे की चमक का। विद्रोही प्रेमी ड्योढ़ी के रोज ब रोज शहर जाने और कारखाने के सायरन की सीटी से बंधी एक नियत जिंदगी जीने के पीछे के विच्छिन्नताबोध की पीड़ा को महसूस करता है और ‘क्षण-क्षण की छैनी’ से काट कर चीजों को परखने की तरह, कड़े से कड़े प्रश्नों से व्यवस्था को बींधने वाले विद्रोही मजदूर से एकात्म हो जाता है। ‘एक उजली नजर की सुई’ में उनके इस दौर के कई अमर गीत संकलित है, जैसे – ‘मैंने नहीं कल ने बुलाया है’, ‘क्षण-क्षण की छैनी से काटो तो जानूं’, ‘ऐसे तट हैं क्यों इन्कारें’, संकल्पों के नेजों को और तरासो’, ‘थाली भर धूप लिये’ और ‘सड़क बीच चलने वालों से’। कोलकाता और मुंबई में बैठ कर लिखे गये ये गीत सघन और जटिल महानगरीय बोध के साथ नये, बेहतर और मानवीय समाज के निर्माण की बेचैनी के गीत है। इन गीतों में उकेरे गये आधुनिक जटिल भावबोध के बिंब गीत और कविता के बीच श्रेष्ठता की बहस को बेमानी कर देने के लिये काफी है। शायद इन्हें ही सुन कर अज्ञेय जी ने बीकानेर में सुरों में बंधी कविता को सुनने के अपने अभिनव अनुभव का जिक्र किया होगा!

 

इसके बाद आता है 74-75 के बाद का हरीश जी के जीवन का सबसे कठिन समय जब वे जयपुर में अकेले डेरा डालने के लिये मजबूर होते हैं। इस काल में उनकी वैचारिक प्रतिबद्धता, महानगरीय अवबोध और झकझोर देने वाले प्रश्नों को उठाने की बेचैनी कुछ भिन्न दिशा में बढ़ने लगती है। ‘एक उजली नजर की सुई’ का प्रकाशन 1966 में हुआ था। इसके बाद लंबे 13 वर्षों के उपरांत 1979 में उनकी लंबी कविता प्रकाशित हुई ‘नष्टोमोह’। इस कविता को सतही तौर पर देखने से तो लगेगा कि यह भी सत्तर के जमाने के पूरे ‘क्रांतिकारी’ दृष्यपट के साथ आत्मालाप करने वाली उनकी पहले की रचना दृष्टि का ही किंचित विस्तार हैं। लेकिन यदि कोई इसकी सतह की गहराई में जाए तो साठ और सत्तर के पूरे काल के साथ किया गया यह आत्मालाप उनके पूर्व के विप्लवी आवेग की एक और पुनरावृत्ति नहीं, उल्टे उस आवेग को दी गयी एक शानदार श्रद्धांजलि दिखाई देगी।

 

लेकिन ‘66 से ‘79 के बीच के 13 वर्षों के इसी दौर में एक कालखंड सन् ‘75 के आंतरिक आपातकाल से जुड़ी परिस्थितियों का आता है। ‘75 का आंतरिक आपातकाल और उसके पहले और बाद की चुनौती भरी उत्तेजक राजनीतिक परिस्थितियों का दौर कुछ अलग ही था। यह एक अलग प्रकार की लड़ाई का दौर था और शायद तब बाकी सब कुछ स्थगित करके सड़कों पर उतर आना ही हरीश जी की तरह के आम जनों के बीच जीने वाले कवि और कविता की मजबूरी थी। उस दौरान बीकानेर की जेल में बंद अपने साथियों के पास रोज हाजिरी भरने और जेल के अंदर तक जाकर कवि सम्मेलन कर आने वाले हरीश जी की उत्तेजना और तेज को हमने देखा था। इसीने ‘रोटी नाम सत है’ के गीतों के रचयिता, हरीश भादानी के एक नये नुक्कड़कवि के रूप को जन्म दिया। ‘रोटी नाम सत है’ के जुझारू गीतों ने जन कविता के अपने एक अलग ही इतिहास की रचना की। हरीश जी ने अपने साहित्यिक-राजनीतिक जीवन के प्रारंभिक दौर में ‘भारत की भूखी जनता को अपना लेफ्टिनेंट चाहिए’ की तरह के कई जोशीले जन-गीत और रूबाइयां आदि लिखी थी। ‘रोटी नाम सत है’ के गीतों को उसी हरीश भादानी का कहीं ज्यादा चेतनासंपन्न, कल्पनाप्रवर और परिपक्व पुनर्जन्म कहा जा सकता है। ‘रोटी नाम सत है’, ‘राज बोलता सुराज बोलता’ तथा ‘बोल मजूरे हल्ला बोल’ की तरह के उनके गीतों की पंक्तियां आपातकाल के खिलाफ देश भर के जनवादी आंदोलन के नारे बन चुकी थी।

 

आज सोच कर अचरज होता है कि जिस काल में हरीश जी में 60 और 70 के दशक के तमाम आवेगों के प्रति ‘नष्टोमोह’ की तरह की कविता के बीज पनप चुके थे, उसी काल में आंतरिक आपातकाल की भीषण मार ने उनमें एक नये जनकवि को जन्म दिया। लेकिन हरीश जी 60-70 के दशक की अपनी अनुभूतियों को अलविदा कहने के लिये तैयार हो चुके थे, इसका एक बड़ा प्रमाण ‘वातायन’ पत्रिका का प्रकाशन हमेशा के लिये बंद होजाना भी है। एक रूमानी, स्वप्नदर्शी और प्रतिबद्ध कवि हरीश जी के साहित्यिक क्रिया-कलापों की पहचान ‘वातायन’ पत्रिका, जो उनके संपादन में ‘60 के जमाने से लंबे काल तक नियमित मासिक और फिर कुछ दिनों तक अनियतकालीन रूप में निकली, उसे ‘73 तक आते-आते पूरी तरह बंद कर दिया गया। अन्य जानकार इस पत्रिका के बंद होने के कई सामाजिक-आर्थिक कारणों को गिना सकते हैं, और शायद वो सच भी हो, लेकिन लगभग डेढ़ दशक तक लगातार निकली इस पत्रिका से हरीश जी के इसप्रकार मूंह मोड़ लेने का कितना संबंध उनके ‘नष्टोमोह’ की पृष्ठभूमि से था, यह सचमुच एक गवेषणा का विषय है।

 

यहीं आकर मेरा ध्यान उनके प्रारंभिक दो दशकों के रचनाकाल के बाद के अंतिम तीन दशकों के रचनाकाल की ओर चला जाता है। यह कम महत्वपूर्ण बात नहीं है कि लगभग तीन दशक पहले ही जिस कवि की शख्सियत की एक संपूर्ण प्रतिमा विकसित होकर लोगों के दिलों में रच-बस गयी थी, जिसने समाज को ढेरों अमर रचनाओं की सौगात दी, वह कवि बाद में और तीन दशकों तक अपनी ही उस विशाल प्रतिमा की छाया तले लिखता रहा, लगातार लिखता रहा और गौर करने लायक है कि अपने अतीत से मोहाविष्ट होकर खुद को ही दोहराते हुए नहीं, बल्कि उससे बिल्कुल भिन्न परिदृश्य और संदर्भों के साथ एक नये आवेग और नयी भाषा में, किसी और ही नये सत्य के संधान का संकेत देता हुआ लिखता रहा।

 

‘नष्टोमोह’ का विक्षुब्ध और आवेशित कवि, कहता है कि उनके हाथ जगन्नाथ/उनके पांव वामन/उनका रोम-रोम समझदार/वे तीनों गुण/वे ढउंपसजवरूगुण/वेझ पांचों तत्व/वे संदीपन द्रोणाचार्य/चाणक्य बिस्मार्क/वे कलाएं और विज्ञान/जनक जननी भी/रिश्ते-अ-रिश्ते भी वे/औचित्य अनौचित्य भी वे/वे इकाई में दहाइयां/और मैं-/एक मान लिया गया कुछ भी नहीं…एक पैमाना उठाए/समझाने लगते हैं वे मुझे/एक फार्मूला-दहाई का गुणक/गुणनफल ढउंपसजवरूगुणक/गुणनफलझ बटा मियादी हुंडी/या चैक/बराबर जीवित शरीर…अगवानी थाली/निहोरे और बिछौना/गदराया शरीर/आदि अनादि भूखों की /भौतिक अधिभौतिक/सभी संक्रामक व्याधियों की रामबाण दवा/मिलती है उसे/ आता हो जिसे /लीलावती रचित भिन्न/लंगड़ी भिन्न हल कर लेना, उसे खनखना देना। और इनके मोह से मुक्त हो जिसे अपने वास्तविक रूप और कत्र्तव्य का बोध हो गया है, वह संशयमुक्त कवि विद्रोह की तमाम परंपराओं का खुद को अंशी मानते हुए भी अंत में कहता हैं कि मुझे ही बनना है/आदमी के लिये/आदमी की सभ्यता, उसकी संस्कृति/और जब करने लगूंगा रचाव/आदमी: आरम्भ/मुझ जैसी दुनियाओं के लिये/हम खयाल अजीज!/तुम्हें ही दूंगा आवाज/संयोग लिये/गर्भा लिये जाने मेरे वर्तमान से /समय नहीं/शरीर नहीं/ रोशनी! शब्द! संबोधन!

 

जरूरत इस नयी रोशनी, शब्द और संबोधन के साथ खुद ही आदमी की सभ्यता और संस्कृति बनने का हौसला रखने वाले कवि की लगभग तीन दशकों तक फैली परवर्ती रचनाशीलता को टटोलने की भी है। इसे यदि उनकी पूर्व की रचनाशीलता का विपरीत न भी कहा जाए तो पूर्व से भिन्न तो कहना ही होगा, और इसीलिये यह बेहद गंभीर, जरूरी और जिम्मेदारीपूर्ण जांच की मांग करता है। इसके अभाव में कवि हरीश भादानी के कृतित्व का एक बहुत बड़ा हिस्सा अव्याख्यायित रह जायेगा और उनके व्यक्तित्व का कभी भी समग्र आकलन नहीं हो पायेगा।

 

नष्टोमोह के दो वर्ष बाद ही 1981 में हरीश जी के गीतों का एक नया संकलन प्रकाशित होता है, ‘खुले अलाव पकाई घाटी’। तीन भागों में विभाजित इस संकलन के पहले भाग का शीर्षक है – अपना ही आकाश…, लेकिन अपना ही आकाश बुनूं मैं गीत दूसरे भाग में शामिल है। नष्टोमोह में मुझे ही बनना है/आदमी के लिये/आदमी की सभ्यता, उसकी संस्कृति का जो संकल्प जाहिर किया गया है, ‘अपना ही आकाश बुनूं’ उसीका आगे फैलाव है। इस गीत की पंक्तियां हैं सूरज सुर्ख बताने वालो/सूरजमुखी दिखाने वालो/…पोर-पोर/ फटती देखू मैं/केवल इतना सा उजियारा/रहने दो मेरी आंखों में/…तार-तार/ कर सकू मौन को/केवल इतना शोर सुबह का/भरने दो मुझको सांसों में/ स्वर की हदें बांधने वालो/पहरेदार बिठाने वालो/…अपना ही/ आकाश बुनूं मैं/केवल इतनी सी तलाश ही/भरने दो मुझको/ पांखों में/मेरी दिशा बांधने वालो/दूरी मुझे बताने वालो।

 

सवाल उठता है कि हरीश जी यहां किन बंधनों, वर्जनाओं और निर्देशों से अपनी मुक्ति की मांग कर रहे हैं? यह एक सौ टके का सवाल हो सकता है, जो हरीश जी के परवर्ती सृजन और उनकी रचनाशीलता की ऊर्जा और दिशा को जानने की कुंजी भी बन सकता है। दरअसल यह नकार का नकार था। हरीश जी की सारी ऊर्जस्विता और उनकी रचनाओं के सौन्दर्य का स्रोत किसी भी रूमानी कवि की तरह हमेशा तमाम बाधाओं और बंधनों को नकारने में रहा है, लेकिन उम्र के इस नये मुकाम पर अब पुन: वे किस चीज को नकार कर फिर एक बार अपनी मुक्ति की कामना करते हैं, यह सवाल हरीशजी के पूरे व्यक्तित्व और उनकी कविताओं के किसी भी अध्येता के लिये काफी तात्पर्यपूर्ण है।

 

इस सवाल के साथ जब हम हरीश जी के परवर्ती रचनाकर्म की ओर नजर डालते हैं तो उसमें साफ तौर पर जो तीन चीजें दिखाई देती हैं, उनमें पहली है- गहरा विषाद। ‘अपना ही’ आकाश बुनने की जिद में खुद पर लाद लिये गये अकेलेपन और सन्नाटे का ऐसा घटाटोप जिसमें सदा उत्साहित रहने वाले, समाज को बदलने का आह्वान करने वाले रचनाकार की सांसे घुट रही है, लेकिन वह उससे मुक्त होने के लिये तैयार नहीं है। यही समय उनके बार-बार जयपुर जाने और दाना-पानी का जुगत बैठाने की जद्दोजहद का समय था। इस अकेलेपन और सन्नाटे की अनुभूति उनमें व्यर्थताबोध के एक प्रकार के अद्भुत, सम्मोहक सृजन का हेतु बनती है। ‘खुले अलाव पकाई घाटी’ के गीतों को देखिये। ‘याद नहीं है’ गीत में कवि कहता है- चले कहां से /गए कहां तक/याद नहीं है/…रिस-रिस झर-झर ठर-ठर गुमसुम/ झील होगया है घाटी में/हलचलती बस्ती में केवल/एक अकेलापन पांती में/ दिया गया या/ लिया शोर से / याद नहीं है/। इसी संकलन में विषाद के चरम क्षणों का एक गीत है : टूटी गजल न गा पाएंगे। सांसों का/ इतना सा माने/स्वरों-स्वरों/ मौसम दर मौसम/हरफ-हरफ/ गुंजन दर गुंजन/ हवा हदें ही बांध गई है/ सन्नाटा न स्वरा पाएंगे/ यह ठहराव न जी पाएंगे/…आसमान उलटा उतरा है/ अंधियारा न आंज पाएंगे/…काट गए काफिले रास्ता/ यह ठहराव न जी पाएंगे।

 

गौर करने लायक दूसरी बात यह है कि इस दमघोंटू ठहराव की तीव्र अनुभूतियों के बीच से ही हरीश जी अपने नये संबंधों के विकास और सोच की नयी दिशाओं के निर्माण की ओर प्रवृत्त होते हैं। ये नये संबंध है मरुभूमि और उसके खास परिवेश के साथ नये संपर्कों के संबंध। मौसम ने रचते रहने की /ऐसी हमें पढ़ाई पाटी/…मोड़ ढलानों चौके जाए/आखर मन का चलवा/अपने हाथों से थकने की/कभी न मांडे पड़वा/कोलाहल में इकतारे पर/एक धुन गुंजवाई घाटी या सुपरणे उड़ना मन मत हार की तरह के भावबोध के साथ सन्नाटे में भी निरंतर रचनाशील बने रहने की अपनी नैसर्गिकता को कायम रखने के संघर्ष में ही उनके इन नये संबंधों और विचार के नये क्षेत्रों का उन्मेष होता है। और, देखते ही देखते, सन्नाटे और अकेलेपन के उपरोक्त अनोखे, मन को गहराई तक छू देने वाले गीतों के साथ ही सामने आता है हरीश जी की रचना शक्ति का एक और उत्कृष्ट नमूना – रेत में नहाया है मन। इन तटों पर कभी/धार के बीच में/डूब-डूब तिर आया है मन/…गूंगी घाटी में/ सूने धोरों पर‘ एक आसन बिछाया है मन/…ओठ आखर रचे/ शोर जैसे मचे/ देख हिरणी लजी/ साथ चलने सजी/ इस दूर तक निभाया है मन। /। धोरों की धरती के सौन्दर्य पर इससे खूबसूरत आधुनिक गीत क्या होगा! इसी दौर में हरीश जी ने रेत को केंद्र में रख कर कई रचनाएं लिखी, जिनमें ‘कलम’ पत्रिका में प्रकाशित हुई, इसे मत छेड़ पसर जायेगी/रेत है रेत बिफर जायेगी की भी अलग से चर्चा की जा सकती हैं।

 

अब तक ‘शहरीले जंगल’ में खोयेे मन के इस प्रकार अपनी धरती के रेत के समंदर में डूबने-तिरने, उस पर आसन बिछा कर खोजाने का यह सारा उपक्रम, हरीश जी के जीवन और रचनाओं में घर कर बैठे सन्नाटे को एक नयी सृजनात्मक दिशा में मोड़ता है और हम पाते हैं सन्नाटे के शिलाखंड पर(1982), एक अकेला सूरज खेले, आज की आंख का सिलसिला(1985), विस्मय के अंशी हैं (1988) कविता संकलन और पितृकल्प(1991) तथा मैं-मेरा अष्टावक्र(1999) की तरह की लंबी कविताओं का एक विशाल रचना भंडार।

 

कहना न होगा कि लगभग अढ़ाई दशकों तक फैली हरीश जी की रचनाशीलता का यह तीसरा दौर अपनी जड़ों की तलाश की उनकी लंबी यात्रा का दौर है। उनके सरोकार बदलते है और साथ में रचना का शिल्प और भाषा भी। ‘बांथा में भूगोल’ (1984), खण-खण उकल्या हूणियां तथा जिण हाथां आ रेत रचीजै की तरह के राजस्थानी भाषा की कविताओं के संकलन सामने आते हैं और हिंदी की कविता भी स्थानीय भाषा और संदर्भों तथा निहायत निजी प्रसंगों से लबरेज होकर अपना एक अलग संसार गढ़ लेती है, जिसे मैंने इस लेख के शुरू में गालिब की अरबी-फारसी शायरी वाला हिस्सा कहा है। इस काल के हरीश भादानी की रचनाएं हिंदी के साधारण पाठक के लिये बहुत कुछ अपनी भाषाई संरचना की वजह से ही जैसे एक अबूझ पहेली बन कर रह गयी हैं।

 

अपना आकाश से शुरू होकर अपनी भाषा, अपनी धरती और अपना परिवेश का यह तीव्र आग्रह उन्हें किंचित अपनी ‘सांस्कृतिक जड़ों’ की ओर भी खींचता है जिसे इस नये दौर का तीसरा उल्लेखनीय पहलू कहा जा सकता है। एक अच्छे-खासे समय तक वे प्राचीन पौर्वात्य साहित्य, वेदों, उपनिषदों और मिथकीय आख्यानों में डूबते-उतरते रहे और शायद उनके रहस्यों में कुछ खो भी गये थे। मिथकों से हरीश जी पहले भी कभी पूरी तरह मुक्त नहीं रहे। बिल्कुल प्रारंभिक ‘सपन की गली’ में रूमानी कविताओं के साथ ही ‘हे शिव प्रथम मनीषी’ की तरह की रचना भी संकलित है। बाद के दिनों में ‘सड़कवासी राम’ और ‘गोरधन’ की तरह के उनके अमर गीत मिथकों के सृजनात्मक नवीनीकरण के महत्वपूर्ण उदाहरण है। लेकिन विस्मय के अंशी हैं के एक अध्याय में जिस प्रकार वेदों की कविताओं का उल्था किया गया है और कुछ अर्सा पहले ही प्रकाशित अखिर जिज्ञासा में उपनिषदों और धर्म-ग्रंथों की प्राचीन कथाओं पर जिसप्रकार की ‘जिज्ञासाएं’ व्यक्त की गयी है, वह उनके व्यक्तित्व में एक सर्वथा नया संयोजन कहलायेगा। हरीश जी के इस नये दौर के गीत, जो पहले अपना घर फूंके का वह हिस्सा जिसमें राम, कृष्ण, बुद्ध, कबीर और रवीन्द्रनाथ के रास्ते पर चलने का आह्वान है, सांस्कृतिक जड़ों की खोज में लगी खास(टिपिकल) रचनाशीलता की ही उपज है। लेकिन हरीशजी अपनी मूलभूत जनोन्मुख प्रकृति के चलते ही इस दिशा में बहुत दूर नहीं जासकते थे। प्राग-ऐतिहासिक मनुष्य की जिज्ञासाओं के रहस्य के बजाय वास्तव में वे रेत के समुद्र में ही गोते लगाते रहे। मुक्ति की किसी और आत्मिक दिशा की ओर, जिसे उनके पिता और दादा की आघ्यात्मिक दिशाओं से भी जोड़ा जा सकता था, कभी प्रवृत्त नहीं हुए। यही वजह है कि गुरुता के बोध से कभी का मुक्त हो चुके हरीश जी हिंदी के एक सच्चे जनकवि के रूप में ही हमसे विदा हुए। लोगों को उनके संत होने का भान जरूर हुआ, लेकिन सचाई सिर्फ यही है कि वे एक आपाद मस्तक सच्चे और ईमानदार मनुष्य और कवि थे। वे कभी किसी से अलग से अपनी सिफारिश क्या करते, क्योंकि पृष्ठ-दर-पृष्ठ वे खुद को ही तो लिखते रहे थे। उनके गीत और कविताएं ही उनका जीवन है। इस जीवन को उन्होंने अपनी ढेरों रचनाओं के जरिये इतना अधिक खोल दिया है कि उसे अब और ज्यादा कैसे खोला जाए!

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