लेखक परिचय

अरविन्‍द विद्रोही

अरविन्‍द विद्रोही

एक सामाजिक कार्यकर्ता--अरविंद विद्रोही गोरखपुर में जन्म, वर्तमान में बाराबंकी, उत्तर प्रदेश में निवास है। छात्र जीवन में छात्र नेता रहे हैं। वर्तमान में सामाजिक कार्यकर्ता एवं लेखक हैं। डेलीन्यूज एक्टिविस्ट समेत इंटरनेट पर लेखन कार्य किया है तथा भूमि अधिग्रहण के खिलाफ मोर्चा लगाया है। अतीत की स्मृति से वर्तमान का भविष्य 1, अतीत की स्मृति से वर्तमान का भविष्य 2 तथा आह शहीदों के नाम से तीन पुस्तकें प्रकाशित। ये तीनों पुस्तकें बाराबंकी के सभी विद्यालयों एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं को मुफ्त वितरित की गई हैं।

Posted On by &filed under हिंद स्‍वराज.


अरविन्द विद्रोही 

लम्बी मुगलकालीन दासता के पश्चात् ब्रितानिया हुकूमत की गुलामी की बेड़ियों को काटने के अनवरत संग्राम का सुखद परिणाम 15 अगस्त ,1947 को भारत वासियों के सम्मुख आया था । अखंड भारत के विभाजन के विष को आत्मसात करते हुए , दंगों की भयावह परिस्थितियों के मध्य भारत के नागरिकों ने ब्रितानिया हुकूमत की गुलामी से मुक्ति पाई और भारत एक लोकतान्त्रिक गणराज्य के रूप में स्थापित हुआ ।
भारत एक ग्राम्य आधारित राष्ट्र रहा है और है भी । मुग़ल विजेता सामंत प्रवृत्ति के थे ,देशी राजाओं पर विजय हासिल करने के पश्चात् भी मुगलों ने भारतीय ग्राम्य समाज की परम्परागत व्यवस्था में कोई मौलिक परिवर्तन न करते हुए उसे ही अपना आधार बना लिया था । परन्तु कालांतर में व्यापार करने भारत-भूमि में आये ब्रितानियों ने जब भारत में अपना साम्राज्य स्थापित किया और विजेता बने तब ब्रिटिश हुक्मरानों ने भारतीय ग्राम्य व्यवस्था के आधार चरखे और करघे दोनों को तोड़ डाला । सामंती युग की समाप्ति के साथ साथ ब्रिटिश शासकों ने भारत में पूंजीवादी वर्ग- समाज के हितों की पूर्ति हेतु शासन स्थापित किया था । जंग-ए-आजादी के सिपाहियों का लक्ष्य दासता से मुक्ति के साथ-साथ एक जनकल्याण कारी , समता मूलक , भेदभाव रहित , समाजवादी राष्ट्र की स्थापना करना था । ब्रितानिया हुकूमत के खिलाफ भारतियों द्वारा छेड़ी गई 1857 की जंग ने ब्रितानिया हुकूमत की चूलें हिला दी थी तथा भारत में ब्रितानिया हुकूमत और पूंजीवादी ताकतों के स्याह पृष्ठों को उजागर किया था ।
गुलाम भारत के नागरिकों में राष्ट्रीय भावना उत्पन्न करने वालों में राजा राम मोहन राय ,राज नारायण बसु के साथ-साथ हेनरी लुई विवियन डिरोजियो का नाम प्रमुख है । राष्ट्रीयता के उभार व प्रचार में ब्रह्म समाज , प्रार्थना समाज ,आर्य समाज , राम कृष्ण मिशन और थियोसोफिकल सोसायटी का महती योगदान रहा है । यही नहीं 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के पहले भारत में वकील , शिक्षक ,पत्रकार ,संपादक के रूप में आये गैर सरकारी अंग्रेजों ने भी भारत वंशियों में राष्ट्रीय भावना भरने का कार्य किया । इन लोगों ने ब्रिटिश इंडिया सोसायटी बनाकर ईस्ट इंडिया कंपनी सरकार के खिलाफ जनमत तैयार करने की कोशिश के ही तहत 1 जनवरी , 1841 को ब्रिटिश इन्डियन एडवोकेट नामक अख़बार निकाला जिसका सूत्र वाक्य था ,– ” भारत के साथ न्याय , इंग्लैंड की संपन्नता , दासों की स्वतंत्रता । ” सोसायटी में व्यापारी जोसेफ पीस , लेखक विलियम हाविट , थामस क्लार्कसन, जॉर्ज थांपसन , सर चार्ल्स फारबेस , राबर्ट मांट गोमरी मार्टिन , मेजर जनरल जान ब्रिग्स , लार्ड ब्राम , अवध के नवाब इकबालुद्दौला , टीपू सुल्तान के पुत्र इमामुद्दीन , सतारा राजा के प्रतिनिधि मीर अफज़ल खां , मीर कासिम अली , आई नौरोजी , एच मेर बानजी तथा व्यापारी डॉ मैन्चर जी संस्थापक सदस्यों में थे । जनवरी 1843 में द्वारकानाथ ठाकुर के साथ कलकत्ता आये जॉर्ज थाम्पसन को भारत में राजनैतिक शिक्षा का जनक कहा गया । थाम्पसन ने कंपनी राज के खिलाफ और अपने अधिकारों के लिए लड़ने के लिए भारत वासियों का आह्वाहन किया और कहा ,— ” जब तुम खुद आगे आओगे तभी तुम्हारा भाग्य बदलेगा और वह दिन अवश्य आयेगा जब कोई भारतीय देश भक्त आगे आकर कहेगा :— अबसे मैं जिऊंगा खुद अपने लिए नहीं , बल्कि अपनी जन्मभूमि के लिए और अपने प्यारे देश के लिए । ” बंगाल में ब्रिटिश इण्डिया सोसायटी की स्थापना के लिए सोसायटी फार दि एक्वीजिशन ऑफ़ जनरल नालेज , पैट्रियाटिक एसोसिएशन और देश हितैषिणी सभा ने बड़ा काम किया ।
स्याह मध्य रात्रि में आजाद हुए  भारत में भारत की आज़ादी का जश्न मनाना भी औपचारिकता रह गया है । आने वाले स्वतंत्रता दिवस पर भी लाल किले पर ध्वजारोहण , राज्यों की राजधानियों में ध्वजारोहण ,प्रभात फेरियों , सरकारी-अर्ध सरकारी कार्यालयों पर ध्वजारोहण , शिक्षण संस्थाओं में ध्वजारोहण , विद्यालयों में ध्वजारोहण व रंगारंग कार्यक्रम , राजनैतिक-सामाजिक संगठनों के कार्यालयों में ध्वजारोहण व व्याख्यान आदि संपन्न होगा । इन आयोजित होने वाले कार्यक्रमों में अब नीरसता , एकाकीपन , रस्म अदायगी व कार्यक्रम आयोजन के उद्देश्यों के प्रति भटकाव स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है । ब्रितानिया हुकूमत की गुलामी के खिलाफ जंग ए आजादी लड़ने वाले माँ भारती के वीर सपूतों ने ब्रितानिया हुकूमत द्वारा ढाये जाने वाले अमानवीय अत्याचारों से त्रस्त होकर आत्मोत्सर्ग की पवित्र महान भावना से अभिभूत होकर अपने प्राणों का बलिदान जंग ए आजादी की बलि वेदी पर हँसते हँसते न्यौछावर किया था । अब तो आजाद भारत में आयोजित होने वाले कार्यक्रमों में सिर्फ और सिर्फ इन माँ भारती के वीर सपूतों के , क्रांति के मतवालों के जीवन संघर्षों पर -उनके चरित्र पर -उनके विचारों पर आधारित कविता पाठ , नाटक मंचन , साहित्य लेखन-प्रकाशन -वितरण व व्याख्यान श्रृंखला ही आयोजित होना चाहिए । राष्ट्रीय पर्वों का दिन अब अवकाश का न होकर क्रांतिकारियों के जीवन संघर्ष गाथा को सुनने-देखने का पर्व बन जाना चाहिए । अपने राष्ट्रीय नायकों का स्मरण व उनके विचारों का अनुपालन करना राष्ट्र का स्वभाव बनना अति आवश्यक है । दे दी हमें आजादी बिना खड्ग बिना ढाल सरीखे गीतों का बजना भारत भूमि की गुलामी की बेड़ियों को काटने में अपने प्राणों को ब्रितानिया हुकूमत की गोलियों व फाँसी के फंदों पर झूलकर देने वाले देशभक्तों-क्रांतिकारियों की पवित्र आत्मा को लहूलुहान कर देने सरीखा दुर्भाग्यपूर्ण कृत्य है । क्या हमें १८५७  का सशस्त्र स्वतंत्रता संग्राम विस्मृत हो चुका है ? क्या हमें मंगल पांडे की शहादत याद नहीं ? इतिहास साक्षी है कि साम्राज्यवादी अंग्रेजों और भारत की आम जनता के मध्य प्रारंभ से ही सशस्त्र संघर्ष जारी था । भारत के विभिन्न समुदायों ने अंग्रेजों के विरुद्ध स्वतंत्रता की जंग बार-बार लड़ी ।  इन सशस्त्र संघर्षों में इतिहास प्रसिद्ध बंगाल आर्मी में हुए पहले विद्रोह जो कि १७६४ में हुआ था और जिसमे १६ सिपाहियों को छपरा और ६ को बैरकपुर में तोप के मुँह से बांध कर उड़ा दिया गया था ।  १८०६ में वेर्लार विद्रोह हुआ । १८२४ में बैरकपुर में हुए विद्रोह में लगभग १५० सिपाही अंग्रेजों द्वारा मारे गए । १८१० – ११ में गृहकर के खिलाफ बनारस में नागरिकों की व्यापक हड़ताल हुई तथा बरेली में पुलिस टैक्स के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष हुआ ।
१८५७ के स्वतंत्रता संग्राम के पहले हुए सशस्त्र संघर्षों में विजयनगर के विजयराम राजे की बगावत (१७९४ ) , केरल के पायभस्मी राजा की बगावत (१७९९ ) ,अवध के नवाब वजीर अली का विद्रोह (१७९९ ) , गंजाम के जमींदारों का संघर्ष (१८०० – ३४ ) , दक्षिण के किलेदारों का संग्राम ( १८०१ – ५ ) , वेलू थंपी के नेतृत्व में मैसूर विद्रोह (१८२४ ) , असम में गदाधर सिंह और कुमार रूपचंद्र के नेतृत्व में विद्रोह ( १८२८ – ३० ) , कुर्ग का मोर्चा ( १८३३ – ३४ ) , संभल पुर में सुरेन्द्र साईं के नेतृत्व में विद्रोह (१८३९ – ६२ ) , बुंदेलखंड में मधुकर शाह बुंदेला का विद्रोह और भूमिया आंदोलन ( १८४२ ) , सावंतवाडी के सामंतों की बगावत ( १८४४ – ५९ ) और आन्ध्र में नरसिंह रेड्डी का विद्रोह ( १८४६ ) । इन सभी विद्रोहों में सामंत वर्ग की मुख्य ताकत सैन्य शक्ति के रूप में किसान वर्ग ही रहा था ।  किसान विद्रोहों में गोरखपुर का विद्रोह ( १७७८ – ८१ ) , रंगपुर का विद्रोह (१७८३ ) , सुबांदिया विद्रोह ( १७९२ ) , बरासात के तीतू मीर का विद्रोह ( १८३० – ३१ ) , मैसूर की रैयत का विद्रोह ( १८३० – ३१ ) , फरीदपुर जिले का फराज़ी विद्रोह (१८३८ – ४७ ) , महाराष्ट्र का सर्वेक्षण हंगामा (१८५२ ) , कटक के पाईकों का विद्रोह (१८१७ ) , पश्चिम घाट के कोलियों का विद्रोह (१८२४ – ५० ) , पूना के रमोसियों की बगावत (१८२६ – २९ ) , और कोल्हापुर का गडकरी विद्रोह (१८४४ ) प्रमुख थे । इसके अतिरिक्त आदिवासी किसानों ने आज़ादी की अनवरत जंग लड़ी जिसमे प्रमुख रूप से बांकुड़ा और मेदिनीपुर जिले के चोआड़ विद्रोह ( १७९८ – ९९ ) , भील विद्रोह ( १८१८ – ३१ ) , सिंह पुरी में ही आदिवासियों का विद्रोह ( १८२० – २१ ) , गारी विद्रोह ( १८२५ – ३३ , १८४६ – ६६ ) , खसिया विद्रोह ( १८२९ – ३३ ) , सिंगफो विद्रोह ( १८३० – ३१ ) , छोटा नागपुर में कोल विद्रोह ( १८३१ – ३२ ) , संभलपुर में गोंड विद्रोह ( १८३३ ) , उड़ीसा में खोंड विद्रोह ( १८४६ ) , असम में अबोरों ,लुशाईयों और नागाओं के विद्रोह (१८४८ – १९०० ) और संथाल विद्रोह ( १८५५ – ५६ ) हैं । उस दौर में जब अभिजात्य वर्ग के लोग वैधानिक तौर-तरीकों से कुछ अधिकार प्राप्ति का आन्दोलन कर रहे थे तब भारत भूमि की किसान शक्ति ने ब्रिटिश सरकार ,उनके संरक्षण में पलने वाले जमींदारों ,साहूकारों और सूदखोरों के खिलाफ संघर्ष कर रहे थे ।ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ आम जन को व्यापक पैमाने पर तैयार करने वाले संघर्षों में नील विद्रोह ( १८५९ – ६० ) , जयंतिया विद्रोह ( १८६० – ६३ ) , कूकी विद्रोह ( १८६० – ९० ) , फुलागुड़ी का दंगा (१८६१ ) , कूका विद्रोह (१८६९ – ७२ ) , पबना का किसान विद्रोह (१८७२ – ७३ ) , महाराष्ट्र के किसानों का मोर्चा (१८७५ ) , पूना में वासुदेव बलवंत फड़के के नेतृत्व में विद्रोह (१८७९ ) और रंपा विद्रोह (१८७९ – ८० ) प्रमुख हैं ।
१८५७ में भारतीयों के द्वारा छेड़े गये स्वतंत्रता संग्राम में भारतीयों की पराजय के पश्चात् भारत में युवा वर्ग में क्रांति की भावना भड़कने लगी । सशस्त्र क्रांतिकारी आन्दोलन का भारत में प्रारंभ सितम्बर १८७१ में वहाबियों द्वारा कलकत्ता में चीफ जस्टिस नार्मन की हत्या और फरवरी १८७२  में अंडमान में वाइसराय मेयो की हत्या से हुआ । देश के स्वाधीनता संग्राम में क्रांति मार्ग पर अपने प्राणों की आहुति देकर क्रांतिपथ को आलोकित करने वालों में , क्रांतिकारियों को सर्वप्रथम संगठित करने वालों में महाराष्ट्र के चाफेकर बन्धुओ का नाम आता है । व्यायाम मंडल की स्थापना करने वाले दामोदर हरि चाफेकर , बालकृष्ण चाफेकर , वासुदेव चाफेकर , महादेव विनायक रानाडे , नाटू बंधुओं का नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित है । महाराष्ट्र के ही सावरकर बंधुओं क्रमशः गणेश दामोदर सावरकर , विनायक दामोदर सावरकर , नारायण दामोदर सावरकर ने अभिनव भारत से तमाम क्रांतिकारियों को जोड़ा था और तमाम क्रांतिकार्य को किया । बंगाल में अनुशीलन समिति के प्रमथनाथ मिश्र , चितरंजन दास , अरविन्द घोष , सुरेन्द्र नाथ ठाकुर , बहन निवेदिता , बारीन्द्र घोष , अविनाश भट्टाचार्य , पंडित सखाराम गणेश देउस्कर , रवीन्द्रनाथ ठाकुर , गुरुदास बनर्जी , विपिनचंद पाल , खुदीराम बोस ,प्रफुल्ल चाकी का बलिदान व सशस्त्र – आध्यात्मिक क्रांति में अविस्मरणीय योगदान रहा है । अधिकांश क्रांतिकारी ग्रामीण पृष्ठभूमि के / किसान परिवार के ही थे । पंजाब के क्रांतिकारी सरदार अजीत सिंह , लालचन्द फ़लक , सूफी अम्बा प्रसाद , लाला हरदयाल आदि ग़दर पार्टी के क्रांतिवीरों का बलिदान कतई विस्मृत नहीं कर सकते । करतार सिंह सराभा , रासबिहारी बोस के बलिदान -संघर्ष की गौरवशाली परंपरा का निर्वाहन भगत सिंह – सुभाष चन्द्र बोस सरीखे क्रांतिवीरों ने बखूबी किया । अनगिनत आन्दोलनों में ब्रिटिश हुकूमत की दरिंदगी से भारत के लाडलों का रक्त सड़को पर प्रवाहित हुआ ,उनकी जिंदगी कारागार की दीवारों के मध्य बीती और हँसते-हँसते वन्देमातरम का उद्घोष करते ना जाने कितने इस क्रांति पथ पर अपने को समर्पित कर गये ।
भारत भूमि को ब्रिटिश हुकूमत से मुक्ति क्रांति-पथ पर चलकर मिली जिसमे अन्नदाता किसान -नौजवान – देश के हर वर्ग ने अपनी कुर्बानी दी । नई पीढ़ी को इनके संघर्षों के विषय में जागरूक करने के लिए इनके सम्मान में अब इनका दैनिक स्मरण शिक्षण संस्थानों में होना अनिवार्य करना ही एकमात्र विकल्प है ।

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz