लेखक परिचय

वीरेंदर परिहार

वीरेंदर परिहार

स्वतंत्र वेब लेखक व ब्लॉगर

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सच्चाई यह है कि संघ आरंभ से हिन्दू समाज की आत्महीनता को दूर करने तथा हिन्दुओं में व्याप्त भेदभाव एवं छुआछूत की भावना को दूर करने को प्रयासरत है। यहां तक कि संघ के प्रचारक अमूमन अपने नाम के आगे जाति नहीं लिखते और संघ में न तो जाति पूछी जाती है न वहां जाति का पता ही चलता है। सभी जातियों के लोग वहां एकरस होकर काम करते हे। इसी को दृष्टिगत रखते हुए संघ के द्वितीय सर संघचालक माधव सदाशिवराव गोलवलकर ने विश्व हिन्दू परिषद की नीव डाली थी और 1969 में उड्पी के विश्व हिन्दू परिषद के सम्मेलन में धर्माचार्यों एवं संतों के माध्यम से ‘हिन्द व सोदरा सर्वे’ यानी सभी हिन्दू भाई है यह मंत्र फूंका था।

अंग्रेजों ने जब भारत में शासन करना शुरू किया तो उन्होंनंे ‘फूट डालों और राज करों’’ की नीति का अवलम्बन लिया। इसके लिए उन्होने आर्य-द्रविण संघर्ष का सिद्धांत तो प्रचारित ही किया, आदिवासियो को भी हिन्दुओं से अलग बताना शुरू किया। जबकि इस संबंध में डाक्टर अम्बेडकर का स्पष्ट रूप से कहना था कि वेदों में आर्य-द्रविण संघर्ष तो दूर की बात है, उनका अलग-अलग होने का भी कोई उल्लेख नहीं है। इसी तरह से उनका यह भी कहना था कि वेदो में छुआछूत का भी कोई उल्लेख नहीं है। उनका यह भी कहना था कि हिन्दू शास्त्रों में वर्ण व्यवस्था का उल्लेख है, पर वर्णभेद का नहीं। जिस मनुस्मृति की इतनी निंदा बहुत लोग करते है, उसमें स्पष्ट तौर पर लिखा है –

‘‘विप्राणां ज्ञानते ज्येष्ठ उपं तू वीर्यतः

वैश्यानां धान्य धनतः, शुद्राणमेव जन्मातः।

अर्थात ब्राह्मणों को विद्या से, क्षत्रियो को बल से, वैश्यो को धन से और शूद्रो को जन्म से ही श्रेष्ठ माना गया है। सर्वभूतेहितरतः यानी सभी प्राणियो का कल्याण ही हिन्दुत्व का मूल उद्घोष है। गीता में भगवान कृष्ण ने स्वतः कहा है कि –

‘चतुर्वणे मया सृष्टे गुणकर्म विभागशः’

यानी चार वर्णो की रचना मैने गुण और कर्म के आधार पर की है। स्पष्ट है कि उस दौर मंे जाति का निर्धारण जन्म के आधार पर नहीं होता था, बल्कि गुण-कर्म के आधार पर होता था। यह बताने की आवश्यकता नहीं कि हिन्दुओं के सभी तीर्थ पवित्र नदियों या सरोवरों के किनारे है, जहां हर जगह स्नान करने के लिए घाट है, और इन स्नान घाटांे में सभी लोग मिल जुलकर स्नान करते हैं। इसी तरह तीर्थो में अलग-अलग दर्शन की भी कोई व्यवस्था नहीं है। कुल मिलाकर यहां सारा स्वरूप एकात्मक है।

यह एक ऐतिहासिक सच है कि पासी, चर्मकार, डोम, सतनामी, काछी, शाक्य, पाल, यादव, जाट, गूजर, निषाद आदि जातियां अंग्रेजों के पूर्व शासक जातिया थी और इनके कई जगह पर छोटे-बडें राज्य थे। 1034 में महमूद गजनवी के भांजे सैयदसालार मसूद जिसे गाजी मियां भी कहा जाता है, को सतरिख के मैदान में महान हिन्दू योद्धा महाराज सुहलदेव राजभर पासी ने मारा था। बाद में जब महमूद गजनवी विजयी हुआ तब उनके वंशजों को बलात अछूत बनाया। ऐसे ही रविदास अथवा रैदास के वंशज जो ब्राम्हण माने जाते थे, और गुरूआई का काम करते थे, उन्हे सिकन्दर शाह लोदी ने जबरन अछूत बनाया। यह इसी से समझा जा सकता है कि रविदास स्वतः मीराबाई के दीक्षा-गुरु थे। सतनामियों में हर बिरादरी के लोग थे, जो सतनाम का जाप करते थे। इनकी औरंगजेब से भंयकर लड़ाई हुई। लड़ाई में ये बड़ी संख्या में मारे गए और जो बचे वह छत्तीसगढ़ के जंगलो में भाग गए। इस तरह से उन्हे औरंगजेब ने अछूत बनाया। इसी तरह से पन्द्रहवी शताब्दी में बीदर के नबावों ने महार कौम का निर्माण किया था। जिसका उल्लेख डॉ. अम्बेडकर ने ‘अछूत कौन और कैसे’ पुस्तक में किया है। महाभारत में स्पष्ट है कि कुम्हार या कुभ्भकार भार्गव वंश से संबंधित रहे है, तो विश्वकर्मा देव शिल्पी थे, और पांचाल क्षेत्र के ब्राह्मण थे। अवस्ता और राजतारिणी के अनुसार मौर्य, यादव, कुर्मी, पाल, लोध यह सब मूलतः क्षत्रिय थे। निषाद जाति का संबंध ब्राह्मण से रहा है। निषाद कन्या सत्यवती का पराशर ऋषि से विवाह और उससे व्यास की उत्पत्ति तो प्रमाणित ही है, जिनके वंशज कौरव और पांडव थे। जहां तक सूत जाति का सवाल है तो यह भी ब्राह्मण ही थे और ब्राह्मण पुरूष और क्षत्रिय कन्या से उत्पन्न थे। परशुराम का पूरा कुल इसी तरह का था। बहुत सी अनुसूचित जातियों के गोत्र बड़गूजर, चैहान, भदौरिया, चंदेल, यदुवंशी, गलहोत, आदि हैें। कहने के तात्पर्य यह कि ये जातियां मूलतः क्षत्रिय है। बहुत सी अनुसूचित कही जाने वाली जातियों ने इसलिए सुअर पाला ताकि वह मुसलमानों के प्रकोप से बचे रहें।

यह भी एक बड़ा सच है कि भंगी शब्द संस्कृत साहित्य में कहीं भी नहीं पाया जाता और न उस दौर में घरो में शौचालय बनवाए जाते थे। इनका प्रचलन तो मुसलमानों के आने से शुरू हुआ। शौचालयो की सफाई के लिए मुसलमानो के काल में मानभंग के लिए ब्राह्मणो को लगाया गया। जियाउद्दीन बर्नी ने ‘तारीखे फीरोजशाही’ में लिखा है कि खूत मुकद्दम   और चैधरी के घरों की स्त्रियां मुसलमानों के घरों में काम करने को विवश की गईं। वस्तुतः गोमांस भक्षण और आदमियों द्वारा मैला उठाने की परपरा के चलते हिन्दू समाज में छुआछूत का प्रवेश हुआ। पर ये दोनो रोग मुसलमानो और अंग्रेजों की देन है। यह तथ्य भी विचारणीय है कि मुसलमानों के आने के पूर्व यदि इस देश में छुआछूत होती तो भगवान महावीर और भगवान बुद्ध, जिन्होने हिन्दुत्व में आई अति हिंसा और पांखण्ड के विरूद्ध इतनी बडी क्रांति खड़ी की थी, क्या छुआछूत के विरूद्ध अभियान न छेड़ते। यह तथ्य भी उल्लेखनीय है कि जहां सवर्णो की संख्या अधिकतम है, जैसे नेपाल हिमाचल एवं उत्तरांचल वहां अछूत कही जाने वाली जातियों की संख्या मात्र 5 से 7 प्रतिशत है, और उनकी सामाजिक हैसियत भी शिल्पकार की है। वैसे भी शूद्र का शाब्दिक अर्थ है शिल्पी या कुशल कलाकार होता है। प्र्रो0 के0एस0 लाल के अनुसार अनुसूचित जातियां एवं जनजातिया हमारे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी है, जो आक्रांताओ से हारने के बाद जंगलों में चले गए और वहां से गुरिल्ला लड़ाई लडते रहे थे।

पर उपरेाक्त बातों के होते हुए भी हम विदेशियांे के षड़यंत्र के शिकार होकर अपने भाई -बधुओं से अमानवीय व्यवहार करते हुए उनका उत्पीडन करते ही रहे, बल्कि उनको इन्सान ही नहीं माना। तभी तो स्वामी विवेकानन्द को कहना पड़ा था कि हिन्दू धर्म ही ऐसा धर्म है जो एक ओर तो मानवता का उद्घोष करता है, तो दूसरी ओर निर्धन और निम्न जातियो का घोर निर्ममता से गला दबाता है। उनसे जीने का हक छीनकर उन्हें कीडें़-मकोडें की तरह रंेगने-मरने के लिए विवश करता है। उन्हांेने यह भी कहा कि सच तो यह है कि हम हिन्दुओं का धर्म मात्र चूल्हा-चैका और छूने-न छूने में ही सीमित हो गया है। जिसका परिणाम है कि इतनी महान पंरम्परा और विरासत के बावजूद हम गुलामी का जीवन जी रहे है।

बिड़म्बना यह है कि स्वतंत्र भारत में कानून और जागरूकता के चलते जहां एक ओर छुआछूत में कभी आई, जातीय जड़ता की दीवारें कुछ हद तक टूटी, वहीं दूसरी ओर चुनावी राजनीति के चलते समाज में जातिवाद की दंश और बढ़ता गया। पचासों साल इस देश में राज करने वाली कांग्रेस पार्टी अपनी चुनावी सफलता के लिए जातियों की संख्या के आधार पर उम्मीदवार बनाने लगी, जिसका असर पूरे राजनीति तंत्र में कुछ ऐसा हुआ कि देश में जाति के नेताओ की बहुत सी पार्टिया बन गई। खास तौर पर उत्तर प्रदेश और बिहार मे ंमुलायम सिंह यादव, मायावती और लालू यादव इसके जीवंत उदाहरण है। यह सिलसिला 2014 के लोकसभा चुनावो में एक हद तक टूटा, जब भाजपा के प्रधानमंत्रंी पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी के पक्ष में कमोबेश पूरे देश में जाति की दीवारें टूटीं। पर रास्ता अभी बहुत लम्बा है, क्योंकि हिन्दू समाज के सामने जहां ईसाइयों के धनबल की चुनौती है, वहीं इस्लाम के कट्टरता से जूझना है। बांग्लादेशी घुसपैठियो और दूसरे कारणों से देश में जनसंख्यात्मक परिवर्तन का संकट पैदा हो गया हैं। निःसन्देह यदि इन चुनौतियो की ओर ध्यान नहीं दिया गया तो हिन्दुओ ंको अपने ही देश में द्वितीय श्रेणी का नागरिक बनने का खतरा सामने है। काश्मीर घाटी इसका वीभत्स उदाहरण है। इसलिए संघ का यह आह्वान निश्चित ही सामयिक और सार्थक है कि सभी हिन्दुओं को चाहे वह जिस जाति के हो, उनका एक ही मदिर, कुअंा और श्मसान हो। क्योकि बिडम्बना यह है कि स्वतंत्र भारत में इतने वर्षो बाद भी जहा अछूत कही जाने वाली जातियों को मंदिर प्रवेश अब भी समस्या है, वहीं उनका कुओं से पानी लेना भी दुष्कर नहीं तो कठिन अवश्य है। जहां तक श्मसान का सवाल है तो निम्न जातियों के लिए अब भी बड़ी समस्या होती है और अधिकांश देखने में यह आता है कि उन्हे अपने मृतक संबंधियों को कहीं दूर-दराज जंगल या नदी किनारे ले जाकर जलाना पड़ता है। ऐसी स्थिति में जैसा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लाल किले की प्राचीर से 15 अगस्त को आह्वान किया-

‘‘संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनासि जानताम

देवा भागे यथा पूर्वे संजानाना उपासते।;

अर्थात हम सभी मिलकर चले, सभी एक स्वर में बोले तथा समान मन वाले होकर विचार करे, जैसा कि प्राचीन समय में देवता किया करते थे। वस्तुतः यह समान मन या सामूहिकता और संगठन की भावना ही राष्ट्र का बचाव भर नहीं करेंगी बल्कि एक महान संपन्न और शक्तिशाली भारत के निर्माण का पथ भी प्रशस्त करेगी।

–विरेन्द्र सिंह परिहार

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1 Comment on "एक कुआं, एक मंदिर, एक श्मसान के मायने"

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sureshchandra.karmarkar
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sureshchandra.karmarkar
हम भारतीय अभी भी अपनी खोल से बाहर आने के लिए उत्सुक लगते नहीं। महान परंपरा ,साहित्य ,भाषा ,आचार विचार के होते अपने स्वार्थों के लिए उंच नीच,बनाये रखे हैं. और अब तो राजनेता इस गन्दगी में और कचरा डालते जा रहे हैं. ”जाट”,गुजर ,पिछड़ा ,मराठा ,दलित ,अगड़ा , के आधार पर कई राजनेताओं की रोटियां सिक रही हैं. चुनावों के टिकट जातिगत आधार पर दिए जाते हैं. किसी ने दलित कार्ड हाथ में रखा है,किसी ने यादव कार्ड,किसी ने मुस्लिम कार्ड,जाट कार्ड ,मराठा कार्ड , यानि की चुनावों के वक्त आप देखें तो मतदाताओं का जातिगत विशलेषण ही प्रभावशाली… Read more »
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