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प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो

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-लक्ष्मी प्रसाद जायसवाल-

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केन्द्र में एनडीए सरकार का एक वर्ष का कार्यकाल पूर्ण होने के अवसर पर सर्वत्र चर्चा व बहस हो रही है। विपक्ष मुख्यतः कांग्रेस के नेता कह रहे हैं कि सरकार ने एक वर्ष में कुछ नही किया अर्थात सभी मोर्चे पर सरकार विफल सिद्ध हुई है। मीडिया भी सरकार की डी.एन.ए. टेस्ट कर रही है। स्वतंत्रता के पश्चात यह पहली सरकार है जिसके काम काज की समीक्षा शपथ ग्रहण के तुरन्त बाद से ही शुरू हो गई थी। कारण स्पष्ट हैं कि चुनाव पूर्व नरेन्द्र मोदी ने जनता को बहुत सारे सपने दिखाए थे जिसके कारण जनता की अपेक्षाएं अत्यधिक है। लम्बे समय से कांग्रेस के कुशासन से त्रस्त जनता शीघ्रताति शीघ्र अच्छे दिन देखने को आतुर है। विगत 15 वर्षो तक नरेन्द्र मोदी को घेरने की विपक्ष की कोशिश नकाम रही। बहुराष्ट्रीय कंपनियों तथा कारपोरेट घरानों के द्वारा संचालित मीडिया भी मोदी रथ रोक नहीं सकी। विदेशी शक्तियां जो भारत को शक्तिशाली देश के रूप में नही देखना चाहती थी, उन्हें भी मुंह की खानी पड़ी। ये सब मिलकर अब जनता के मनोभावनाओं की उभारने में जी जान से लगी है। हैरत है छाज तो छाज छलनी भी बोलने लगी है। जिस कांग्रेस ने 57 वर्षो में और विशेषकर विगत दस वर्षों में देश को खोखला कर दिया वही कांग्रेस सरकार पर ऐसा ओछा प्रहार कर रही है मानों एक वर्ष में भारत से राम राज्य समाप्त होकर रावण राज्य स्थापित हो गया । कांग्रेस के भीतर नेतृत्व संकट उत्पन्न होने के कारण कभी न मुॅह खोलने वाला नेतृत्व संसद के बाहर और भीतर इन दिनों बेशर्मी का परिचय देते हुए भांेड़े आरोप लगाकर सरकार को न चलने देने तथा देश को अस्थिरता की ओर ढकेलने का बचकानी कोशिश कर रही ।

सरकार पांच साल के लिए चुनी आती है उस सरकार के लिए जनता से किए गये वायदे को पूरा करने का समय 5 साल होता है परन्तु मोदी सरकार से पांच साल का हिसाब एक साल में लेने की कोशिश हो रही है। जिस एक पार्टी की सरकार 57 साल रही उसके 57 साल से यदि निष्पक्ष रूप से एक साल की तुलना की जाए तो पता चलता है कि इस सरकार की गति कितनी तीव्र है। विडम्बना यह है कि सरकार की तेज गति भी आलोचना का मुददा बन रहा है। जिस सरकार का मुखिया 24 घंटे में से 18 घंटे काम करता हो जिसने एक साल में एक घंटे का भी अवकाश नही लिया हो क्या उसकी प्रशंसा नही की जानी चाहिए। 100 दिनों में महंगाई कम करने का वायदा मनमोहन सिंह ने किया था, क्या उन्होंने उस वायदों को पूरा किया। मोदी सरकार को कांग्रेस के युवराज ने 10 में से शून्य अंक दिया है, वास्तव में उनके दृष्टि से ठीक प्रतीत होता है क्यों कि एक साल में अभी तक एक भी घोटाला सामने नही आया है जबकि विगत दस वर्षो में आए दिन घोटाले ही घोटाले प्रकट हुआ करते थे।
आरोप लगाया जा रहा है यह सरकार किसान एवं गरीब विरोधी तथा पूॅजीपतियों व उद्योगपतियों की सरकार है और हास्यास्पद आरोप सूट बूट वाली सरकार है। जिस पार्टी के प्रथम प्रधानमंत्री जिनका जीवन घोर विलासिता पूर्ण था जिनके बारे में कहा जाता था कि उनके कपड़े पेरिस से धुल कर आते है उस पार्टी का नेता सूट बूट पर आपत्ति उठाएं, इससे अधिक भौंड़ा आरोप कोई हो नही सकता। तथाकथित सूट के नीलामी से 4.31 करोड़ रूपये देश को मिला। सूट बूट पहन कर नरेन्द्र मोदी ने किसी किसान की जमीन नही हड़पी है, उन्होंने सूट बूट पर देश का एक पैसा भी खर्च नहीं किया है।

यह बात ठीक है कि एक वर्ष के कामों की समीक्षा की जानी चाहिए। समीक्षा करने का अधिकार मीडिया तथा विपक्ष को हैं परन्तु समीक्षा मात्र विरोध के लिए नही सकारात्मक होनी चाहिए । सरकार भी स्वयं अपने कामों की समीक्षा कर रही है तथा देश के सामने अपना रिपोर्ट कार्ड प्रस्तुत कर रही है। शायद यह पहली सरकार है जो अपनी रिपोर्ट जनता के समक्ष खुले मन से तथ्यों के आधार पर प्रस्तुत कर रही है। देश के नवनिर्माण हेतु आधारभूत संरचना खड़ी करने में एक साल का समय नगण्य है विशेष कर जब विरासत में घोटाले ही घोटाले मिले हों। देश के भीतर निराशा का वातावरण छाया था। विश्व पटल पर देश की छवि शर्मनाक बन गई थी। अर्थव्यवस्था जर्जर हालत में थी तथा सभी क्षेत्रों में नीतिगत पंगुता थी। 26 मई को सरकार बनते ही सभी मोर्चे पर दू्रत गति से एक साथ काम शुरू हो गया। सरकार बनते ही नयी कार्यसंस्कृति का प्रारंभ हुआ, नौकरशाहों को संदेश दिया गया कि देश हित में निर्भीकता के साथ निर्णय ले, मंत्रियो को जवाबदेह बनाया गया तथा जर्जर व कालवाहय् कानून जो अवरोध बन रहे है उन्हें चिन्ह्ति कर समाप्त करने का काम शुरू हुआ है।

शपथ के दिन सार्क देशों को आंमत्रित कर विश्व को एक गंभीर संदेेश देने का काम पहली बार हुआ। 15 अगस्त के लाल किले के प्राचीर से प्रधानमंत्री ने आम जनता से जुड़े अति सामान्य परन्तु अति महत्वपूर्ण विषय स्वच्छ भारत मिशन का श्री गणेश किया। 67 सालो में पहली बार किसी प्रधानमंत्री ने शौचालय बनाने का आह्वान किया। सभी सांसदों से एक गांव गोद लेने की भी अपील की। जनधन योजना जैसी एक अनोखी योजना प्रारंभ हुई जिसमें 15.44 करोड़ लोगों ने बैंकों में अपना खाता खुलवाया। गैस सब्सिडी तथा अन्य सब्सिडी सीधे लाभार्थी के खातें में जमा कराने का निर्णय हुआ। प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना, प्रधानमंत्री जीवन बीमा योजना तथा अटल पेंशन योजना शुरू की गई जिसका प्रत्यक्ष लाभ गरीबों को मिलेगा। योजना शुरू होते ही करोड़ों लोग योजना में सहभागी बने। । महंगाई की दर में नवंबर 2014 से लगातार गिरावट के बाद थोक महंगाई दर भी छः महीने के न्यूनतम स्तर तक पहुंच गई है। बेटी बचाओं बेटी-पढ़ाओ एवं कन्या समृद्धि योजना आदि अनेक योजनाएं शुरू हुई हैं। क्या ये सभी योजनाएं पूंजीपतियों के लिए है या गरीबों व किसानों के लिए है?

सरकार को संप्रग से एक कमजोर लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था विरासत में मिली थी जो सृदृढ़ हो रही है। पहले जी.डी.पी. में लगातार गिरावट तथा महंगाई दर में वृद्धि हो रही थी। संप्रग सरकार के अंतिम दो वर्ष में सकल पूंजी विनिर्माण में हृास हुआ और विगत कई वर्षो में पहली बार 30 प्रतिशत से नीचे आ गई। वर्तमान में केन्द्र सरकार ने स्वयं 7.8 प्रतिशत विकास दर का लक्ष्य रखा है। अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष और विश्व बैंक ने भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि दर 7.5 प्रतिशत रहने का अनुमान बताया है। संयुक्त राष्ट्र ने भी यही संकेत दिए हैं। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार 2015-16 में भारत की आर्थिक विकास दर 8.1 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया है। 1 मई को विदेशी मुद्रा भंडार 6.89 अरब डालर से बढ़कर 327.15 अरब डालर हो गया । यदि देश की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ होती है तो निश्चित रूप से निर्धन वर्ग ही अधिक लाभान्वित होंगे। मेक इन इंडिया मात्र नारा नही हैं बल्कि यह एक दृष्टि है जो भारत के विकास का आधार बन सकेगा। एक साल में 18 देशों की यात्रा एक कीर्तिमान है। इससे भारत में विदेशी पूंजी निवेश के लिए वातावरण बना है, भारत दुनिया के विकसित देशों के बराबर खड़ा हुआ है तथा भारत की घोषित गुट निरपेक्षता की नीति और मजबूत हुई है। प्रधान मंत्री की क्षमता का लोहा मानना पड़ेगा कि 365 दिनों में 52 दिन विदेशी दौरे में उन्होंने बिताएं। विदेशी दौरे का ही परिणाम है कि यमन में फंसे 48 देशों के नागरिकों सहित भारत के हजारों नागरिकों को संकट से बाहर निकाला जा सका। तमिलनाडू के फांसी की सजा भुगत रहे मछुआरों को स्वदेश लाया गया। इराक में फंसे लोगों को भी सकुशल वापस ला सके। संप्रग सरकार एक सरबजीत को पाकिस्तान के जेल से छुड़ा नही सकी थी। नेपाल में भूकंपग्रस्त नागरिकों को सबसे पहले राहत देने का काम भारत ने किया। आश्चर्य की बात है कि भूकंप की जानकारी सबसे पहले नेपाल के प्रधानमंत्री को नरेन्द्र मोदी ने ही दी। भारत सरकार की सक्रियता का सर्वोतम उदाहरण है।

प्रधानमंत्री द्वारा काला धन विदेश से लाने तथा देशवासियों के लिए अच्छे दिन लाने के वायदे को लेकर भरपूर आलोचना व उपहास हो रहा है। सबसे अधिक शोर वही मचा रहे हैं जिनके कार्यकाल में तथा जिनकी नीतियों के कारण ही सबसे अधिक काला धन भारत से विदेशों में गया और जिन्होंने कालेधन को वापस लाने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखायी। यह स्पष्ट है जिन्होने घपले घोटाले किए उनके ही कालाधन विदेशों में जमा है। यह सरकार ईमानदारी से तथा गंभीरता पूर्वक इस दिशा में प्रयत्नशील है। सर्वोच्च न्यायालय को विदेशी बैंकों में काला धन रखने वालों की उपलब्ध सूची सरकार सौंप चुकी है। माननीय न्यायालय के निर्देशों का पालन करते हुए एसआईटी का गठन भी कर दिया गया है। भविष्य में काला धन जमा नहीं हो इस दृष्टि से काला धन(अघोषित विदेशी आय और संपति) विधेयक पारित भी हो चुका है जिसमें कालाधन अर्जित करने वाले के खिलाफ कठोर दंड का भी प्रावधान है। कालाधन को वापस लाने के मार्ग में अंतर्राष्ट्रीय समझौते अथवा कानूनी अड़चनों को भी दूर करने का ईमानदार प्रयास हो रहा हैं । दूसरा प्रश्न उठता है अच्छे दिन कब आयेंगे? अच्छे दिन का कोई एक मानदंड नही है। व्यक्ति-व्यक्ति के लिए अच्छे दिन की कल्पना भिन्न भिन्न होती है। आमतौर से मँहगाई कम होना, सुरक्षित जीवन, जीवनोपयोगी वस्तुओं की सुलभ उपलब्धता तथा रोजगार की उपलब्धता आदि अच्छे दिन के लक्षण हैं। निःसंदेह मंहगाई कम हुई है, जीवन उपयोगी वस्तुओं की उपलब्धता को बेहतर करने की योजना शुरू हो रही है। मेक इन इंडिया,डिजिटल इंडिया,स्मार्ट शहर के पीछे भाव अच्छे दिन लाना ही है। अच्छे दिन आने का आधार और रोड़मैप तैयार हो रहा हैं। जो योजनाएँ बनी है,ं शुरू हुई या आगे बनेगी उसका परिणाम निकलने में कुछ समय तो लगेगा ही। आम का फल खाना है तो आम का पेड़ तैयार होने तक प्रतीक्षा करना ही पड़ेगा।
अच्छे दिन लाने में सरकार के प्रयास साफ झलक रहे है। नेक इरादे का आभास स्वतः ही हो जाता है, अच्छे दिन आने में सबसे बड़ा बाधक विपक्ष की नकारात्मक भूमिका है तथा उसको हवा देने का काम मीडिया का एक वर्ग कर रहा है। अच्छे दिन लाने के लिए ही तो भूमि अधिग्रहण विधेयक लाने का प्रयास है। जिसके खिलाफ विपक्ष ने संगठित रूप से दूषित अपप्रचार का महाअभियान छेडा़ है और विधेयक लम्बित है। मेक इन इंडिया , स्मार्ट शहरों का निर्माण, नई नहरे,नई सड़के क्या भूमि अधिग्रहण के बिना संभव है।
किसानों को घूम घूम कर उनके घरो में जा-जाकर भड़काने का प्रयास हो रहा है। आँकड़े साक्षी है किस पार्टी की सरकार में किसानों ने सर्वाधिक आत्महत्या की है। किसानों द्वारा आत्महत्या का सिलसिला विगत अनेक वर्षो से चल रहा है। सर्वाधिक आत्महत्याएं किसानों द्वारा महाराष्ट्र हुई जहां सरकार कांग्रेस की रही। किसानों को जितनी राहत मोदी सरकार ने दिया है उतना कभी किसी सरकार में नही मिली। भूमि अधिग्रहण बाजार दर से चार गुना कीमत पर, अधिग्रहण किसी के व्यक्तिगत हित के लिए नही बल्कि राष्ट्रीय महत्व के विकास कार्यो के लिए ही होगा, यह प्रावधान रखा गया है। भूमि अधिग्रहण संशोधन में मुआवजा बढ़ा हैं, सुरक्षा बढ़ी हैं और सब कुछ बढ़ा। किसानों से औने-पौन दाम पर जमीन लेकर निजी बिल्डरों तथा निजी फर्मो को देने का काम सर्वाधिक कांग्रेस के शासन काल में हुआ है। दिल्ली में इंदिरा गांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट को 2010 में कॉमन वेल्थ खेलों से पहले डी थ्री टर्मिनल बनाने की आड़ में सरकार ने जीएमआर ग्रुप की कंपनी डायल को 24 हजार करोड़ की जमीन मात्र 1813 करोड़ की इक्वीटी पर दी गई। दिल्ली एयरपोर्ट का कुल क्षेत्रफल 5106 एकड़ हैं । इसमें से 4608.9 एकड़ जमीन डायल को मात्र सौ रूपय की लीज रैन्ट पर दी गई। सही रैन्ट लगाया गया होता तो डायल को 1461 करोड़ देने पड़ते। इस जमीन से उसको 163557 करोड़ कमाई का अधिकार प्राप्त हो गया। किसानों को खराब मौसम के कारण एक तिहाई फसल खराब होने पर मुआवजा तथा खराब फसल भी सरकार खरीदेगी यह गारंटी मिली है।
इस सरकार को जनता ने विकास और सुशासन के नाम पर चुना है। एक साल में सुशासन तथा विकास दोनों ही मार्ग पर हम बढ़े है। प्रतिदिन 2 कि.मी. के स्थान पर 11 कि.मी. सड़कें बन रही हैं। विकास के मार्ग में रोड़ा अटकाने वाले विदेशों से वित्तपोषित एन.जी.ओ पर भी लगाम लगी है जो पर्यावरण आदि के नाम पर विकास परियोजनाओं में अवरोध खड़ा करने का काम करते थे।कुडनकुलम परमाणु परियोजना पर तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपनी लाचारी प्रकट करते हुए कहा था कि परियोजना का विरोध करने वाले एनजीओ विदेशों से वित्तपोषित है। टैक्स प्रणाली को सरल करने वाली जीएसटी बिल भी विपक्ष के कारण अटका है। विपक्ष का इरादा साफ है इस सरकार के पैर जमने न पाये। विपक्ष को डर है यदि सरकार पांच साल बिना रोड़ा अटकाए चल गई तो निश्चित ही सरकार के पैर जम जायेंगे और विपक्ष का पूर्णतया सफाया हो जाएगा। सत्ता में आने से पहले नरेन्द्र मोदी ने ‘एक भारत श्रेष्ट भारत’ ‘सबका साथ सबका विकास’ का नारा दिया था, उस नारे को सही अर्थो में अमल में लाया जा रहा है। 14वें वित्त आयोग कि रिपोर्ट लागू किये जाने से राज्यों को उनके संसाधनों पर न सिर्फ ज्यादा हक मिल रहा हैं बल्कि आर्थिक स्वायत्तता भी बढ़ी है। राज्यों के टैक्स शेयर में 42प्रतिशत वृद्धि हुई है। राज्यों के साथ भेद भाव नही किया जा रहा है। स्पैक्ट्रम नीलामी तथा कोयला ब्लाक आवंटन में मिली राशि से राज्यों को अप्रत्याशित धन मिला है।

भारत में भले ही मोदी के आलोचक आलोचना करे लेकिन दुनिया के अंदर नरेन्द्र मोदी की छवि एक सक्शत प्रधानमंत्री की बनी है। ब्रिक्स सम्मेलन में ब्रिक्स विकास बैंक की स्थापना नरेन्द्र मोदी के पहल के कारण हुई।संयुक्त राष्ट्र में 177 राष्ट्रों ने मोदी के प्रस्ताव को एक मत से मानते हुए अत्यंत अल्प अवधि में 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के रूप में स्वीकार किया। भारत के महाशक्ति के रूप में बढ़ने का संकेत विश्व को तब मिला जब 24 सितंबर 2014 को मंगलयान ने मंगल ग्रह के कक्ष में सफलता पूर्वक प्रवेश किया। कुल खर्च मात्र 7 रूपये प्रति किमी आया । विश्व में भारत चौथा देश बना जिसने यह गौरव प्राप्त किया। चीन तथा जापान भी इस लक्ष्य को प्राप्त नही कर पाये है। मनमोहन सिंह राजनीतिक रूप से जितना कमजोर थे उतने ही नरेन्द्र मोदी शक्तिशाली है यह तस्वीर उभर कर आयी है। दुनिया की प्रतिष्ठित पत्रिका टाइम मैगजीन के मुखपृष्ठ पर छपी मोदी की तस्वीर यह दर्शाती है कि मोदी एक ताकत का नाम है। टाइम मैगजीन में अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा ने अपने लेख में नरेन्द्र मोदी को ‘रिफॉर्मर इन चीफ’ कहा है। दूसरी ओर 2012 में वाशिंगटन पोस्ट ने मनमोहन के बारे में लिखा था मनमोहन की छवि गिरी है अब वह केवल भ्रष्ट सरकार के प्रमुख के नाते रह गये है। कांग्रेस का आरोप है कि सरकार को अंबानी और अडानी चला रहे हैं। तथ्यों की कसौटी पर यह यतयन्त हास्यस्पद है। 2012 के कैग की ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार सरकार के गलत निर्णय के कारण तीन सबसे अहम क्षेत्र कोयला, ऊर्जा और उड्डयन विभाग में 27 निजी कंपनियों को तीन लाख करोड़ का लाभ हुआ। ये कंपनियां निश्चित रूप से भाजपा से सम्बन्धित नही थी। किसी भी देश के विकास में कृषि और उद्योग दोनों की बराबर की भूमिका रहती है। अतः दोनों में संतुलन चाहिए। उद्योगपतियों को देश का दुश्मन समझना ठीक नही है। वर्तमान में ऐसा ही समझा जा रहा है मानो देश को पँूजी,पूँजीपतिया तथा उद्योगपतिया की आवश्यकता नही है।
सांस्कृतिक विरासत की सुरक्षा के प्रति भी केन्द्र सरकार सजग है रामसेतु नही तोड़ने का निर्णय सरकार ने दृढतापूर्वक लिया है। नमामि गंगा परियोजना सरकार की स्वपनिल योजना है। एक साल की सबसे बडी उपलब्धि यह है कि इस सरकार ने दृढ इच्छाशक्ति के साथ काम करना शुरू कर दिया है। जिसका परिणाम आने में समय लगेगा। सरकार की उपलब्धियों की समीक्षा करने का अवसर देश को पांच वर्ष बाद मिलने वाला है। सरकार ने भी यह दावा कभी नही किया है कि उसका सब काम पूरा हो गया है या देश की सभी समस्याओं का समाधान हो गया है। सरकार के कामकाज का आकलन वास्तविकता के धरातल पर तथ्यों के प्रकाश में तथा विगत सरकार से तुलनात्मक आधार पर करना न्यायोचित होगा। यह सरकार सभी वर्गो तथा सभी क्षेत्रों के हित में सम्यक सोच रख कर काम कर रही है। मूल प्रश्न है कि कांग्रेस की सरकार से यह सरकार बेहत्तर है कि नही, यह विचार करना चाहिए।
विडम्बना है कि सरकार की ढेर सारी उपलब्धियों के बावजूद जैसी छवि बननी चाहिए थी वैसी नही बन रही है। प्रधानमंत्री के अतिरिक्त सरकार के अन्य मंत्रियों,जनप्रतिनिधियों तथा पार्टी के कार्यकर्ताओं द्वारा अच्छे कार्यो की जानकारी जनता तक ठीक ढंग से नही पहुंचायी जा रही है। इस कमी के कारण विपक्ष को जनता को भ्रमित करने का अवसर प्राप्त हो रहा हैं।

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