लेखक परिचय

विजय कुमार

विजय कुमार

निदेशक, विश्व संवाद केन्द्र सुदर्शन कुंज, सुमन नगर, धर्मपुर देहरादून - २४८००१

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विजय कुमार

हर व्यक्ति के जीवन में छात्र जीवन का बड़ा महत्व है। इस समय एक दौर ऐसा भी आता है, जब लोग प्रायः कविहृदय हो जाते हैं। डायरी में गुलाब का फूल रखने से लेकर रोमांटिक शेर लिखना तक उन दिनों आम बात होती है।

कविता और शेरो शायरी का रोग बढ़ जाए, तो युवक और युवतियां कविता लिखने लगते हैं। भारत में जितने भी कवि हैं, वे मानते हैं कि उनके माता-पिता ने उनका नाम ठीक नहीं रखा। अतः वे सबसे पहले इस गलती को सुधार कर कोई उपनाम रख लेते हैं। फिर वे चाहते हैं कि लोग उन्हें इसी नाम से पुकारें। घायल, पागल, हुल्लड़, कुल्हड़, मनहूस, फंटूश आदि ऐसे ही उपनाम हैं।

शर्मा जी के जीवन में जब यह दौर आया, तो उन्होंने अपना नाम ‘निराधार’ रख लिया। वैसे वे अच्छे खाते-पीते घर के थे। पिताजी उनके लिए गांव में एक मकान और खेत के साथ अच्छा बैंक बैलैंस भी छोड़ गये थे; पर माता-पिता की छत्रछाया सिर पर न होने के कारण शर्मा जी खुद को ‘निराधार’ ही समझते रहे।

छात्र जीवन समाप्त हुआ तो वे नौकरी करने लगे; पर यह नौकरी अस्थायी थी। शर्मा जी की निराधरता के लिए यह तर्क पर्याप्त था। इस चक्कर में कोई लड़की वाला भी उनके दरवाजे नहीं आता था। जैसे-तैसे नौकरी पक्की हुई और कुछ समय बाद शर्मा जी के घर में शहनाई भी बज गयी। मेरे जैसे उनके फक्कड़ मित्रों को कभी-कभी शर्मानी मैडम के हाथ की गरम चाय मिलने लगी।

पर शर्मा जी ने अपना नाम नहीं बदला। वे कहते थे कि किराये के मकान का क्या भरोसा; कब मकान मालिक नोटिस दे दे। इसलिए वे अब भी ‘निराधार’ ही रहे।

नौकरी में पदोन्नति के साथ-साथ शर्मा जी के घर की जनसंख्या दो से बढ़कर पांच हो गयी। उन्होंने शहर में एक मकान बनाकर उसका नाम भी ‘निराधार’ ही रख लिया। पूरा परिवार एक साथ कहीं आ-जा सके, इसके लिए एक कार भी खरीद ली। अब हमें लग रहा था कि वे अपना नाम बदल लेंगे; पर दो साल पहले अचानक शर्मानी मैडम उन्हें सदा के लिए छोड़ गयीं। इस दुर्घटना से शर्मा जी फिर ‘निराधार’ हो गये।

फिर भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। अब तक बच्चे भी बड़े हो गये थे। उन्होंने बेटी और फिर बड़े बेटे का विवाह कर दिया। बहू ने कुछ समय तो उनकी सेवा की, फिर अचानक एक दिन बेटा और बहू एक दूसरा मकान लेकर वहां रहने चले गये।

शर्मा जी का छोटा बेटा विदेश में पढ़ता था। उसने सलाह दी कि वे मकान बेचकर किसी वृद्धाश्रम में चले जाएं, क्योंकि उसका इरादा अब विदेश में ही घर बसाने का है। शर्मा जी गहरे असमंजस में फंस गये और इसी बीच उनके अवकाश प्राप्ति की तारीख भी आ गयी।

कहते हैं कि नाम के अनुरूप गुण-अवगुण जीवन में आ ही जाते हैं। शर्मा जी को लगा कि हो न हो, यह ‘निराधार’ उपनाम उनके जी का जंजाल बना है; पर इससे पीछा छुड़ाना भी समस्या थी।

जब सरकार ने देश के सभी वैध-अवैध नागरिकों की स्थायी पहचान के लिए ‘आधार’ योजना प्रारम्भ की, तो शर्मा जी बहुत प्रसन्न हुए। उन्हें लगा कि जीवन के इस तीसरेपन में उन्हें कम से कम एक पक्का आधार मिल जाएगा, जिसके सहारे वे शेष जीवन काट सकेंगे।

इसलिए जिस दिन उन्हें मोहल्ले में आधार कार्ड बनाने वालों के शिविर की सूचना मिली, उन्होंने सब पड़ोसियों से इसे शीघ्र बनवाने को कहा। अवकाश प्राप्ति के बाद वे शरीर सज्जा के प्रति उदासीन हो गये थे; पर आज उन्होंने ठीक से दाढ़ी खुरची। सुगंधित साबुन से नहाये। बहुत दिन बाद शर्मानी मैडम की पसंद से सिलवाया हुआ सूट पहना और सबसे पहले लाइन में जाकर खड़े हो गये।

पते और पहचान की पुष्टि के लिए उनके पास राशन कार्ड, बैंक की पासबुक, लाइसेंस, वोटर कार्ड आदि कई प्रमाण थे। 15 मिनट में फोटो से लेकर उंगली, अंगूठे और आखों के निशान जैसी सब कार्यवाही पूरी हो गयी। एक महीने बाद डाक से उन्हें एक कार्ड मिला, जिस पर उनकी ‘आधार’ संख्या लिखी थी।

पर पिछले दिनों आधार संख्या संबंधी संसदीय समिति ने नंदन नीलकेणी के नेतृत्व में बनी इस पूरी योजना को ही निरस्त करने की सिफारिश कर दी। गृहमंत्री चिदम्बरम् भी इसकी निरर्थकता पर संसद में बोल चुके थे। इससे इस योजना पर संकट के बादल छा गये।

शर्मा जी समझ नहीं पा रहे थे कि इस आधार कार्ड को ओढ़ें या बिछाएं ? जैसे-तैसे उन्होंने 15 अंक वाला यह नंबर याद किया था; पर अब सरकार इसे व्यर्थ की कवायद बता रही है। इस पर अरबों रुपया खर्च हो चुका है। जनता द्वारा अपने खून-पसीने की कमाई में से दिये गये टैक्स को मिट्टी होते देख उनका पारा चढ़ गया।

काश, कोई शर्मा जी को बताए कि प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठे जिस व्यक्ति का ही कोई निजी आधार नहीं है। जो किसी और की कृपा से, किसी और के लिए गद्दी घेर कर बैठा है। जो विदेशियों की खुशी के लिए देश के व्यापारियों के मुंह से रोटी छीनने को तैयार है, जो हिन्दुओं को सदा के लिए दो नंबर का नागरिक बनाने के लिए कानून लाने की बात कर रहा हो, उसके हाथ से कोई अच्छा काम कैसे हो सकता है ?

शर्मा जी ने गुस्से में आकर आधार कार्ड को आग लगा दी और एक बार फिर ‘निराधार’ हो गये।

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