लेखक परिचय

पंडित दयानंद शास्त्री

पंडित दयानंद शास्त्री

ज्योतिष-वास्तु सलाहकार, राष्ट्रीय महासचिव-भगवान परशुराम राष्ट्रीय पंडित परिषद्, मोब. 09669290067 मध्य प्रदेश

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केसे बने वास्तु सम्मत आपका व्यवसाय/बिजनेस /कारोबार ????—-

आज के आधुनिक युग में प्रत्येक व्यक्ति आर्थिक प्रगति की दौड़ में शामिल है। विश्व की आर्थिक विषमताओं के चलते किसी भी व्यवसाय या कारोबार को प्रारम्भ करने से पूर्व उसकी सुदृढ योजना आवश्यक है।

किन्तु बडे-बडे योजना विशेषज्ञों के होने के बावजूद भी व्यवसाय तथा कारोबार अपेक्षित प्रगति नही कर पाता है। तथा कभी-कभी तो व्यवसायी दुर्भाग्य के ऐसे अन्धे गर्त में पहुँच जाता है जहाँ से निकलना उसके लिए संभव नहीं होता है। कभी-कभी तो व्यवसाय में अनेक परेशानियाँ जैसे, मशीनों की टूट-फूट, कर्मचारियों का भाग जाना, वित्तिय सहायता का बंद हो जाना, बाहरी कर्जों का बढ़ना माल या कन्साईनमेंट का रिजेक्ट हो जाना, स्टाफ का रूक जाना आदि। हानि इतनी अधिक बढ़ जाती है कि या तो व्यवसाय को बंद करना पढ़ता है अथवा हानि और कर्ज से पीडि़त व्यवसाय स्वामी कभी-कभी तो आत्महत्या तक के लिए सोचने लगता है। अब सवाल यह उठता है कि धन, योजना, श्रम, भूमि,उद्यम होने के बावजूद भी अमुक व्यवसाय क्यों नहीं चल सका इसका सीधा तथा सरल उत्तर है की व्यवसाय स्थल का वास्तु व्यवसाय के अनुकूल न था। इसलिए व्यवसाय से सम्बन्धित किये गये सभी कार्य का परिणाम शून्य हो गया। इसलिए किसी भी नये उद्योग, व्यापार को प्रारम्भ करने से पूर्व वहाँ के वास्तु पर पर्याप्त ध्यान देना चाहिए।

नीचे वास्तु के कुछ आधारभूत सिद्धांत दिये गये हैं। जिन्हें प्रयोग में लाने से आपका व्यवसाय निश्चित रूप से दिन दूनी तथा रात चैगुनी प्रगति करेगा तथा व्यवसायी सभी सुख सुविधाओं से सम्पन्न समृद्धिशाली होगा।

1. व्यवसाय की भूमि —किसी भी प्रकार के उद्योग की स्थापना से पूर्व व्यवसाय स्थल का आकार, प्रकार, आकृति, चारों ओर के रास्ते, खड़े वृक्ष,

बहती नदी या नाले, जमीन का ढलाव, भूमि परिक्षण, जल तथा बिजली की आपूर्ति की प्रयाप्तता आदि बातों पर विशेष विचार करना चाहिए।

2. निर्माण कार्य—

— व्यवसाय स्थल पर आफिस , फैक्ट्री शैड का निर्माण करते समय उत्तर-पूर्व में अधिक खुली जगह छोडनी चाहिए तथा इस स्थान पर हरियाली, बगीचा, गार्डन तथा पानी का फव्वारा लगाना चाहिए।

–स्थल के पश्चिम तथा दक्षिण में कम जगह छोडनी चाहिए तथा इस तरफ मोटी तथा भारी दीवार बनानी चाहिए तथा ऊचे तथा भारी वृक्ष इसी दिशा में लगाने चाहिएं।

–फर्श का ढलाव दक्षिण तथा पश्चिम दिशा में ऊँचा तथा पूर्व व उत्तर दिशा में नीचा ढलाव वाला होना चाहिए।

— छत या शैड का ढलाव उत्तर या पूर्व की ओर झुका होना चाहिये जिससे की बरसात का पानी उत्तर या पूर्व दिशा में गिरे इससे व्यवसाय में समृद्धि बनती है।

3. मुख्य प्रवेश द्वार—

भूमि के यदि उत्तर तथा पूर्व में रास्ते हों तब मुख्य दरवाजा पूर्व/उत्तर/उत्तर-पश्चिम में बनाया जा सकता है। यदि भूमि के दक्षिण की ओर रास्ता हो तब मुख्य दरवाजा दक्षिण पूर्व में बनाना चाहिये इससे मानसिक शांति मिलती है। यदि भूमि के पश्चिम की ओर रास्ता होता तब पश्चिम दिशा की भूमि

को नाप कर उसके नौ बराबर भाग करके दूसरे अथवा तीसरे भाग में मुख्य दरवाजा बनाना चाहिये, दरवाजे के बीचों बीच चैखट या फ्रेम में किसी भी प्रकार का अवरोध नहीं होना चाहिये।

4. आफिस/कार्यालय —

व्यवसायी अथवा मालिक का कार्यालय कार्य स्थल से नीचे ढलाव की भूमि पर होना चाहिये, आफिस चाहे किसी भी दिशा में बनाया जाये किन्तु उसका ईशान कोण (उत्तर-पूर्व दिशा) हमेशा खुली तथा हल्की होना चाहिये।

5. वर्कशाप—

कारोबार की वर्कशाप अथवा कार्यस्थल सदैव दक्षिण/पश्चिम/दक्षिण-पश्चिम में स्थित होना चाहिये तथा सभी प्रकार की यंत्र सामग्री, भारी मशीन भी इसी दिशा में होनी चाहिये तथा कर्मचारियों के कार्य करते समय उनका मुख पूर्व/उत्तर/उत्तर-पूर्व में होना अत्यन्त ही शुभ तथा लाभ-दायक माना जाता है।

6. कर्मचारियों का आवास गृह—-

फैक्ट्री, कम्पनी, कारखने में कार्य करने वाले कर्मचारियों के लिए आवास की व्यवस्था अग्नि कोंण (दक्षिण-पूर्व) दिशा अथवा वायव्य कोण (उत्तर-पश्चिम) दिशा में करनी चाहिये, किन्तु आवास स्थल यदि बहुमंजिला बनवाना हो तब उसे दक्षिण- पश्चिम में बनाना उपयुक्त होगा परन्तु इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिये कि आवास स्थल तथा कार्यस्थल में पर्याप्त अंन्तर होना चाहिये।

7. जल का स्त्रोत—

जल-स्त्रोत जैसे पीने का पानी, होज, पानी की टंकी, कुआँ, बोरवेल वगैरह को ईशान कोण (उत्तर-पूर्व दिशा) में जमीन के भीतर स्थापित करें, किन्तु यदि पानी की टंकी या ओवर हैड टैंक ऊपर रखना हो तब दक्षिण/पश्चिम में ही स्थापित करें। ईशान कोण में पानी का फव्वारा सर्वथा ही सैभाग्यशाली

माना जाता है।

8. स्टोर रूम/गोदाम—

स्टोर रूम अथवा सामान रखने का कमरा सदैव दक्षिण-पश्चिम दिशा में ही स्थापित करें तथा इसे हमेशा ही भरा हुआ व भारी रखना चाहिये। यदि कच्चे माल का गोदाम या स्टोर रूम बनाना हो तब भी दिशा (दक्षिण-पश्चिम) उपयुक्त होती है। यदि तैयार माल का स्टोर रूम या गोदाम बनाना हो तब यह

वायव्य कोण अर्थात उत्तर-पश्चिम में उपयुक्त होगा।

9. अन्य उपकरण—

बिजली के अन्य उपकरण जैसे ईजंन, मोटर, भट्ठी, ट्रांसफार्मर, जेनरेटर, बायलर, चिमनी तथा अग्नि से सम्बन्ध रखने वाला प्रत्येक वस्तु को अग्नि कोण (दक्षिण-पूर्व दिशा) में ही स्थापित करना चाहिये। चिमनी का मुख ईशान दिशा की ओर कभी नहीं करना चाहिये।

10. गार्डस रूम—

चैकीदार, गार्डस अथवा कर्मचारी का कमरा सदैव उत्तर-पश्चिम (वायवय दिशा) अथवा दक्षिण पूर्व (अग्नि दिशा) में बनाना चाहिये।

नोट- गार्ड रूम ईशान कोण में कदापि न बनायें।

11. पार्किंग—

व्यवसाय स्थल की वायव्य दिशा की खुली जगह पार्किंग के लिए सर्वथा उपयुक्त होती है, यदि इस दिशा में सम्भव न हो तो ईशान कोण में पार्किंग बनाई जा सकती है, किन्तु यहाँ भारी वाहन जैसे ट्रक, टेलर, डम्पर आदि की पार्किंग वर्जित है।

12. प्रसाधन (टायलेट)—

टायलेट या प्रसाधन की स्थिति मुख्य स्थल से उत्तर-पश्चिम अथवा दक्षिण-पूर्व में स्थित होना चाहिये, पूर्व/उत्तर/उत्तर-पूर्व दिशा में तथा दक्षिण-पश्चिम दिशा में टायलेट का निर्माण करना अशुभ माना जाता है।

13. व्यवसाय का ब्रह्म स्थान—

किसी भी स्थल का केन्द्र उसका ‘हृदय’ उसका ‘‘ब्रह्म स्थान’’ माना जाता है, इसे सदैव खुली तथा हल्का रखना चाहिये। केन्द्र में किसी भी प्रकार का निर्माण कार्य अथवा बीम अथवा स्तम्भ का निर्माण सम्बंधित व्यवसाय के लिए घोर अशुभ माना जाता है। ब्रह्म स्थान अथवा ईशान कोण पर कभी भी स्क्रेप अथवा कूड़ा करकट ना रखें। उद्योग तथा व्यवसाय हमारे जीवन की भौतिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए अर्थ अर्जन करते हैं, अतः इनकी

स्थापना के पूर्व भली-भाँति सोच विचार कर वास्तु निर्णय करना चाहिये।

‘‘स्थापित व्यवसाय के स्थान में बिना तोड़-फोड के भी वास्तु अनुसार परिवर्तन करना संभव है।’’

वास्तु परामर्श के लिए किसी योग्य तथा अनुभवी वास्तुशास्त्री से सम्पर्क करना चाहिए।

 

 

 

 

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