लेखक परिचय

इक़बाल हिंदुस्तानी

इक़बाल हिंदुस्तानी

लेखक 13 वर्षों से हिंदी पाक्षिक पब्लिक ऑब्ज़र्वर का संपादन और प्रकाशन कर रहे हैं। दैनिक बिजनौर टाइम्स ग्रुप में तीन साल संपादन कर चुके हैं। विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में अब तक 1000 से अधिक रचनाओं का प्रकाशन हो चुका है। आकाशवाणी नजीबाबाद पर एक दशक से अधिक अस्थायी कम्पेयर और एनाउंसर रह चुके हैं। रेडियो जर्मनी की हिंदी सेवा में इराक युद्ध पर भारत के युवा पत्रकार के रूप में 15 मिनट के विशेष कार्यक्रम में शामिल हो चुके हैं। प्रदेश के सर्वश्रेष्ठ लेखक के रूप में जानेमाने हिंदी साहित्यकार जैनेन्द्र कुमार जी द्वारा सम्मानित हो चुके हैं। हिंदी ग़ज़लकार के रूप में दुष्यंत त्यागी एवार्ड से सम्मानित किये जा चुके हैं। स्थानीय नगरपालिका और विधानसभा चुनाव में 1991 से मतगणना पूर्व चुनावी सर्वे और संभावित परिणाम सटीक साबित होते रहे हैं। साम्प्रदायिक सद्भाव और एकता के लिये होली मिलन और ईद मिलन का 1992 से संयोजन और सफल संचालन कर रहे हैं। मोबाइल न. 09412117990

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इक़बाल हिंदुस्तानी

राष्ट्रीय पर्वों पर रस्म अदायगी नहीं गहन चिंतन होना चाहिये!

ऐसा क्या हुआ कि 15 अगस्त 1947 को जो सपना इस देश के लोगों ने मिलकर देखा था कि जब गोरे अंग्रेज़ इस देश से चले जायेंगे तो हम सब मिलकर एक आदर्श भारत बनायेंगे । उसको बिखरने में कुछ ही साल लगे। सच यह है कि वही कहावत चल निकली कि भाग रे गुलाम फौज आई और गुलाम कहता है कि मैं भाग कर क्या करूंगा मैं तो अब भी गुलाम और तब भी गुलाम। शायद ऐसा ही कुछ हमारे देश के अधिकांश लोगों के साथ हुआ है। आज सरकार अनाज को सड़ाने को तैयार है लेकिन गरीबों में निशुल्क बांटने को तैयार नहीं है। ऐसे ही सरकार गरीबों को रोजगार देने के बजाये निशुल्क मोबाइल फोन बांटकर उनका मज़ाक उड़ा रही है। इससे सरकार की जनविरोधी सोच पता चलती है। आज हमारी संसद में 302 करोड़पति सांसद बैठे हैं। उनको क्या पता गरीबी किसे कहते हैं।

जाहिर है कि आज चुनाव लड़ना जितना महंगा हो चुका है उससे शेष 243 सांसद भी ऑनपेपर करोड़पति भले ही न हो लेकिन उनकी हैसियत भी करोड़पति के आसपास ही होगी। राजनेता यह भी बहाना करते हैं कि महंगाई केवल हमारे देश में ही नहीं बढ़ रही बल्कि यह वैश्विक समस्या है। सरकार का यह दावा भी रहा है कि हमारा संसैक्स, विदेशी निवेश और अमीरों की तादाद बढ़ रही है जिससे देश के बजट से अधिक चंद उद्योगपतियों का टर्नओवर हो चुका है। साफ्टवेयर क्षेत्र की जानी मानी हस्ती एन आर नारायणमूर्ति ने इस बात पर चिंता जताई है कि सार्वजनिक जीवन में ईमानदार और मेहनती लोगों की संख्या लगातार कम होती जा रही है। उनका कहना है कि लोग विशेष रूप से नौजवान बिना मेहनत और समर्पण के ना केवल आगे बढ़ना चाहते हैं बल्कि उनके रोल मॉडल भ्रष्ट लोग बन रहे हैं।

नारायणमूर्ति की बात सही है लेकिन यह सिक्के का केवल एक ही पहलू है। सवाल यह है कि ऐसे हालात क्यों पैदा हुए? दरअसल हमारे समाज के बुजुर्गांे से लेकर नेता, उद्योगपति, अधिकारी, व्यापारी, चिकित्सक, शिक्षक , वकील, पत्रकार, इंजीनियर, लेखक, कलाकार, अभिनेता और लगभग हर क्षेत्र के पेशेवर किसी भी कीमत पर अधिक से अधिक से धन कमा लेना चाहते हैं। हालत यह है कि राजनेता, अधिकारी और कारपोरेट सैक्टर के बीच एक कॉकस बन गया है। इसका एक नमूना पिछले दिनों नीरा राडिया के टेप से सामने भी आया था। यह तो एक बानगी है। इससे पहले टू जी घोटाले में पूर्व दूरसंचार मंत्री राजा ही नहीं अनेक अधिकारी और कारपोेरेट सैक्टर के कई दिग्गज जेल जा चुके हैं।

अब यह बात किसी से छिपी नहीं रह गयी है कि नेता पूंजीपतियों से थोक में चंदा लेते हैं और बदले में उनके पक्ष में सरकारी नीतियां बनाकर एक तरह से सत्ता के दलाल की भूमिका में काम करते हैं। ऐसे ही बड़े उद्योगपति मोटी रकम ख़र्च कर राज्यसभा में सीधे एन्ट्री लेने लगे हैं। जहां तक बाहुबलियों का सवाल है उनको भी पैसे के बल पर पहले वोट दिलाने का ठेका दिया गया, जब उनको लगा कि जो काम वे नेताओं के लिये कर रहे हैं क्यों ना खुद अपने लिये इसी तरह से वोट जुटाकर सांसद और विधायक बन जायें ? इसके बाद माफिया सीधे एमपी और एमएलए बनने लगे। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि राजनेताओं और उद्योगपतियों के बीच एक अघोषित गठबंध्न बन चुका है जो आम आदमी के हितों के खिलाफ मनमाने तरीके से देश को लूट रहा है।

चाहे किसानों की ज़मीन सरकार के द्वारा जबरन अधिग्रहण करारक उसे कौड़ियों के भाव कब्ज़ाने का सवाल हो या फिर आदिवासियों को ज़मीन और जंगल से वंचित कर एक सुनियोजित तरीके से उनको तबाह और बर्बाद करने की बात हो एक अमानवीय अभियान लंबे समय से देश में चल रहा है। जब आदिवासी अपनी आवाज़ शांतिपूर्ण तरीके से उठाते हैं तो उनकी सुनवाई नहीं होती और जब वे हिंसक हो जाते हैं तो उनको माओवादी और नक्सलवादी बताकर सरकार सुरक्षाबलों के द्वारा लाठी गोली से कुचलने का दुष्प्रयास करती है। खुद सरकार के आंकड़े बता रहे हैं कि देश के 80 प्रतिशत लोग 20 रुपये रोज़ से कम पर गुज़ारा कर रहे हैं। आम आदमी की मौत कुत्ते बिल्ली की तरह हो जाती है। सरकारी कार्यालयों में उसका कोई काम बिना चक्कर कटाये, दुत्कारे और जेब गर्म किये नहीं होता जिससे उसे आज़ादी का मतलब समझ में नहीं आता।

रोज़गार के नाम पर केवल ग्रामीण क्षेत्रों मे महात्मा गांधी रोज़गार गारंटी योजना ज़रूर शुरू हुयी है जिसका न होने से बेहतर कुछ न कुछ लाभ ज़रूर मिलता दिखाई दे रहा है। साथ साथ यह देखा जाना भी ज़रूरी है कि क्या केवल गांवांे में ही रोज़गार की ज़रूरत है? क्या केवल एक आदमी को साल में सौ दिन ही ज़िंदा रहना होता है जो इसमें सौ दिन काम की बंदिश लगाई गयी है। ऐसा नहीं है कि देश ने आज़ादी के बाद से कोई प्रगति और विकास ही न किया हो लेकिन सबसे बड़ी विडंबना यह है कि इस उन्नति में सबको बराबर की भागीदारी नसीब नहीं हो सकी है जिससे दो देश यानी एक अमीर लोगों का ‘संचित भारत’ और गरीब लोगों का ‘वंचित भारत’ बन गया है। दरअसल यह पूंजीवादी नीतियों का बॉयप्रोडक्ट है। आप न भी चाहें तो भी यह बायडिफाल्ट होना ही था। चीन ने इस समस्या को पहले ही समझ लिया था जिससे उसने अपनी शर्ताें पर विदेशी निवेश को अपने यहां आने दिया है ।

हालांकि चीन की व्यवस्था एक बंद व्यवस्था है और वहां लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्राता नहीं है जिससे हमारे यहां की परिस्थितियों का मुकाबला वहां के हालात से पूरी तरह नहीं किया जा सकता लेकिन अगर पूर्वाग्रह न रखकर देखा जाये तो यह तो मानना ही पड़ेगा कि हमारे यहां विदेशी और देशी पूंजी को जिस तरह से एल पी जी यानी लिबरल, प्राइवेट और ग्लोबल के नाम पर खुलकर खेलने का मौका दिया गया है उससे यही होना था जो आज हो रहा है। गरीब को रोटी कपड़ा और मकान भी मयस्सर नहीं है जबकि शिक्षा और चिकित्सा सबसे महंगे होते जा रहे हैं जिससे गरीब आदमी को यह शक नहीं अब विश्वास हो चला है कि एक सोची समझी रण्नीति के तहत यह सब किया जा रहा है जिससे समाज के एक वर्ग विशेष की इन क्षेत्रों में मोनोपोली बनी रहे।

न गरीब का बच्चा योग्य होने के बावजूद अच्छी और उंूची तालीम ले पायेगा और न ही गंभीर बीमारी में भी धन के अभाव में निजी नर्सिंग होम और प्राइवेट हॉस्पिटल में वह अपने परिवार का इलाज करा पायेगा। सूचना का अधिकार, शिक्षा का अधिकार और भोजन का अधिकार जैसे कुछ कानून ज़रूर सामने हैं जिनसे आशा की किरण जगी है, लेकिन इनके इस्तेमाल में अभी शिक्षा और जागरूकता के साथ नैतिक साहस की ज़रूरत पड़ेगी जिसमें काफी समय लग सकता है। यातायात के हिसाब से देखें तो अंग्रेज़ जितनी रेलवे लाइनें और पुल बना गये थे उनको आज़ादी के 64 साल बाद बढ़ाने में हमारी स्पीड काफी कम है। यही हाल कमोबेश हमारी सड़कों और बिजली उत्पादन का है। हरित क्रांति के बाद भी हम जितना खरगोश की तरह आराम कर चुके हैं वह भी बैकगियर में जाने लगी है।

भ्रष्टाचार का पानी नाक के उूपर पहंुचने के बावजूद जिस तरह से सरकार ने 43 साल बाद बेमन से एक लूला लंगड़ा लोकपाल लाने और अन्ना हज़ारे की टीम को थकाकर ख़त्म करने का अभियान छेड़ा हुआ है उससे नहीं लगता कि अभी हम आज़ादी का मतलब समझ पा रहे हैं। 1947 को आज़ादी मिली सत्ता मिली और 1950 को संविधान मिला लेकिन चंद हाथों में क़ैद होकर रह गये जिससे आज तो यही कहना पड़ता है कि –

क़तरा गर एहतजाज करे भी तो क्या करे

दरिया तो सब के सब समंदर से जा मिले।

हर कोई दौड़ता है यहां भीड़ की तरफ,

फिर यह भी चाहता है मुझे रास्ता मिले।।

 

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