लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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-प्रमोद भार्गव-
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संसद से दागियों को बाहर करने का नरेंद्र मोदी का बयान

भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने संसद को राजनैतिक आपराधियों से मुक्त करने का संकल्प जताया है। उनके इस बयान को व्यापक राजनीतिक स्वीकार्यता मिलनी चाहिए। क्योंकि अपराध मुक्त राजनीति के लिए दलों के प्रभावषाली नेताओं को ही पहल करनी होगी। हालांकि दलीय स्तर पर मोदी को इस पहल की शुरूआत करने की जरूरत थी, क्योंकि सोलहवें आम चुनाव में सबसे ज्यादा दागी प्रत्याशी भाजपा ने ही खड़े किए है। ऐसोसियेशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म की रिपोर्ट के मुताबिक भाजपा उम्मीदवारों में 17 प्रतिशत उम्मीदवारों पर गंभीर मामले दर्ज है। यह संख्या पिछले लोकसभा चुनाव से दो फीसदी ज्यादा है। यही नहीं खुद मोदी के गृह प्रदेश गुजरात में भाजपा के 28 फीसदी विधायकों पर आपराधिक मामले दर्ज हैं। दरअसल, राजनीतिक दल दागियों को प्रत्याशी बनाने की पहल सिर्फ जिताऊ व्यक्ति होने का आकलन करके करते हैं, जो भारतीय राजनीति का दुर्भाग्यपूर्ण पहलू है। हालांकि शीर्ष न्यायालय की न्यायमूर्ति आरएस लोढ़ा की अध्यक्षता वाली खण्डपीठ इसी साल मार्च में निचली अदालतों को निर्देश दे चुकी है कि जनप्रतिनिधियों से जुड़े मामलों में आरोप तय होने से एक साल के भीतर फैसला हो जाना चाहिए।
नरेद्र मोदी ने राजनीतिक दलों की कमजोरी को स्वीकारते हुए कहा कि हम चाहते हुए भी शत-प्रतिशत राजनीति का शुद्धिकरण नहीं कर सकते। इसलिए एक नागरिक के नाते मुझे उपाय सुझता है कि चुनाव परिणाम के बाद जो संसद बनेगी, उसमें सांसदों के शपथ-पत्रों के आधार पर जो आपराधिक मामले सांसदों पर दर्ज हैं, उन्हें सुप्रीम कोर्ट के हवाले करेंगे और कहेंगे कि इन मामलों को एक साल के भीतर निपटाया जाए। इसी तर्ज पर विधायकों के सिलसिले में कानूनी प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जाएगा। जाहिर है, मोदी जो बात कह रहे थे, सुप्रीम कोर्ट उस परिप्रेक्ष्य में पहले ही समय सीमा का निर्धारण कर चुकी है। फिर भी मोदी यदि देश के प्रधानमंत्री बनते हैं तो उन्हें इस बयान के आधार पर कार्यवाही के लिए बाध्य होना पड़ेगा। यह अनुकरणीय पहल होगी। इस त्वरित न्याय का एक पहलू तो यह होगा कि एक साल के भीतर ही सांसद और विधायक जेल के सींखचों में होंगे, दूसरे जिन जनप्रतिनिधियों को झूठे मामलों में षड्यंत्र रचकर फंसाया गया है, वे इस तय समय-सीमा में दोश मुक्त हो जाएंगे। जाहिर राजनीति एवं निर्वाचन में सुधार की दृश्टि से किए जा रहे बदलावों में यह एक अहम् पहल होगी ।
सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिए हैं कि ऐसे मामलों में सुनवाई रोजाना हो। बाई-दवे यदि अदालतें सुनवाई पूरी करने में विफल रहती हैं तो उन्हें उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को वाजिब कारण बताना होगा। तभी समय-सीमा बढ़ सकेगी। शीर्ष न्यायालय ने यह आदेश ‘पब्लिक इंटरेस्ट फाउंडेशन’ नामक एक एनजीओ की जनहित याचिका पर दिया था। याचिका में कानून निर्माताओं से जुड़े मामलों की सुनवाई में तेजी लाने की मांग की गई थी। एनजीओ की दलील थी कि सांसद और विधायक अदालती कार्यवाही लंबी चलने के कारण संसद और विधानसभाओ में सदस्य बने रहने के साथ, ऐसे कानूनों के बनाए जाने में रोड़ा अटकाते हैं, जो विधायिका की पवित्रता बहाल करने वाले होते हैं।
मालूम हो, सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल जुलाई में दागी जनप्रतिनिधियों पर नकेल कसने की दृष्टि से दो असरकारी फैसले लिए थे। इनमें एक था, ऐसे सांसद या विधायक जिनके खिलाफ दो साल से अधिक की सजा सुनाई गई होगी, वे फैसले के दिन से ही अयोग्य घोषित मान लिए जाएंगे। दूसरा था कि जेल में रहते हुए कोई आरोपी चुनाव नहीं लड़ सकता है। न्यायालय ने इस बाबत संविधान की भावना के अनुरुप दोहरे मानदण्डों को परिभाशित करते हुए सिर्फ जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 8(4) को खारिज कर दिया था। लेकिन दागियों का वजूद बनाए रखने के लिए देश के सभी परस्पर धुर विरोधी दल एकमत से अदालत के इस फैसले को संसद में अध्यादेश लाकर बदलने को तैयार हो गए थे। किंतु नाटकीय अंदाज में राहुल गांधी ने एक पत्रकार वार्ता में अचानक अवतरित होकर दागियों को सुरक्षा कवच देने वाले इस अध्यादेश को फाड़कर रद्दी की टोकरी में डाल दिया था। यदि राहुल ऐसा न करते तो चारा घोटाले में सजा पाए लालू प्रसाद यादव भी लोकसभा का चुनाव लड़ रहे होते ? राहुल के इस कृत्य द्वारा संसद की सर्वोच्चता को ठेंगा दिखाने के बावजूद, व्यापक लोक मान्यता और राजनीतिक स्वीकार्यता मिली थी। किंतु राहुल जैसी यह इच्छाशक्ति देश की राजनीति का स्थायी भाव ना होने के कारण माननीय दागी राजनीति में भागीदारी बने हुए हैं ? इसी कड़ी में अब मोदी जुड़ गए है।
गौरतलब है कि ‘नेशनल इलेक्षन वॉच’ द्वारा 2013 में कराए एक सर्वेक्षण के मुताबिक लोकसभा के 543 में से 162 सांसदों के खिलाफ आपराधिक मामले निचली अदालतों में लंबित हैं। इनमें 76 यानी 14 प्रतिशत के खिलाफ गंभीर और महिला उत्पीड़न से जुड़े मामले हैं। राज्यसभा के कुल 232 सांसदों में से 40 के खिलाफ आपराधिक और 16 के विरुद्ध जघन्य अपराधों से जुड़े मामले दर्ज हैं। इसी तरह कुल 4032 विधायकों में से 1238 मसलन 31 फीसदी के खिलाफ आपराधिक और 15 फीसदी के खिलाफ गंभीर मामले दर्ज हैं। अदालतों में मामले लंबे समय तक विचाराधीन बने रहने के कारण, आपराधिक पृष्ठभूमि के 65 फीसदी यही राजनेता दोबारा – तिबारा जीतकर विधायिका में अपना हस्तक्षेप बनाए रखने में कामयाब बने रहते हैं। ‘एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म’ के सर्वे के अनुसार 369 सांसद-विधायकों पर महिलाओं को प्रताड़ित व यौन उत्पीड़ित करने के मामले थानों में दर्ज हैं। जांच लंबित होने के कारण इन मामलों के चालान ही अदालतों में पेश नहीं किए जा रहे हैं।
दरअसल, हमारे यहां विडंबना यह है कि अपराध भी अपराध की प्रकृति के अनुसार तय न किए जाकर, व्यक्ति की हैसियत के मुताबिक पंजीबद्ध किए जाते हैं। व्यक्ति के पद व पहुंच के प्रभाव से ही मामला कानूनी और न्यायिक प्रक्रिया से गुजरता है। इसीलिए कभी-कभी तो यह भी अहसास होने लगता है कि यह वैधानिक प्रक्रिया दोषी ताकतवर को निर्दोषी साबित करने की मानसिकता से आगे बढ़ रही है। यही वजह है कि दागी छवि वाले निर्वाचित प्रतिनिधियों की संख्या में लगातार बढ़ोत्तरी होती रही है। ऐसे में देश के आम आदमी की मानसिकता में यह भ्रम भी बना रहता है कि राजनीति का अपराधीकरण हो रहा है या अपराध का राजनीतिकरण ?
इस परिप्रेक्ष्य में गौरतलब यह भी है कि अदालतों द्वारा दोषी ठहराए जाने वाले जनप्रतिनिधियों की संख्या बेहद कम होती है। जबकि लंबित प्रकरणों की संख्या बेहद ज्यादा होती है। शक्तिशाली राजनेताओं से जुड़े होने के कारण इनमें से अधिकांश मामले तो पुलिस जांच प्रक्रिया में ही अटके रहते है, जो अदालत तक पहुंच भी जाते हैं, उन्हें ‘दंड प्रक्रिया संहिता’ में वैकल्पिक धाराओं को आधार बनाकर लंबा खींचने का काम धनबल के बूते चलता रहता है। कभी-कभी सुप्रीम और हाईकोर्ट के विरोधाभासी फैसलों की आड़ में भी दागियों को बचा लिया जाता है। ये फैसले न्यायिक प्रक्रिया में रुलिंग का काम करते हैं। तय है, कानूनी विकल्प मामलों को दीर्घकाल तक खींचने का काम करते है। लिहाजा वैकल्पिक कानूनों को भी एक सीधी रेखा में परिभाषित करने की जरूरत है।
चुनाव सुधार से जुड़ा अदालत का फैसला ठीक उस वक्त आया था, जब निर्वाचन आयोग ने चुनाव की घोषणा की थी। जो नरेंद्र मोदी अब संसद को दागियों से मुक्त करने की बात कर रहे हैं, यदि वे थोड़ी मजबूत इच्छाशक्ति दिखाते तो कम से कम भाजपा की सूची में तो दागी प्रत्याशी नहीं होते? राहुल गांधी ने आध्यादेश फाड़ने का साहस तो दिखाया लेकिन दागियों की उम्मीदवारी नहीं रोक पाए? कथनी और करनी में यही भेद नेता के प्रति जनता में अविश्वास का कारण बनता है। दरअसल, अदालत के फैसले को मोदी और राहुल को एक अवसर के रूप में भुनाने की जरूरत थी। वे टिकट मांग रहे दागियों से कह सकते थे कि जब फैसला एक साल के भीतर आ ही जाना है तो टिकट क्यों ? यदि ऐसा होता तो एक साथ दो फायदे होते। एक तो सर्वोच्च न्यायालय का सम्मान बरकरार रहता, दूसरे विधायिका से दागियों के बाहर हाने का सिलसिला शुरू हो जाता। फिर भी दागियों के विरूद्ध असरदार नेताओं की मंशा मुखर हो रही है तो यह लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत है।

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