लेखक परिचय

ललित गर्ग

ललित गर्ग

स्वतंत्र वेब लेखक

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Acharyatulsiआचार्य तुलसी निर्वाण दिवस- 23 जून,

ललित गर्ग

अपनी आवाज की डोर से लाखों-करोड़ों लोगों में मानवीयता का जुनून भर दे और यह अहसास दिला दे कि ये कायनात उतनी ही नहीं जितनी हमने देखी हैं- सितारों से आगे जहां और भी है- आज के दौर में यह आवाज आचार्य तुलसी की हैै। आचार्य तुलसी ने बहुत बोला है और पूरी दुनिया ने सुना है- किसी ने दिल थाम कर तो किसी ने नाराज होकर। लेकिन उनकी आवाज सब जगह गूंजी है और मेरा और मेरे जैसे हजारों-लाखों लोगों का जीवन तो उसी से गुंजायमान है। मेरा अनुभव है कि जितना उन्होंने बोला है उसका निचोड़ बस इतना ही है कि आदमी अपनी असलियत से रू-ब-रू हो जाए। स्वयं से स्वयं का साक्षात्कार कराना ही आचार्य तुलसी के जीवन का हार्द रहा है और मेरी दृष्टि में उनकी यही प्रेरणा लाखों-लाखों लोगों के जीवन में नये आत्मविश्वास का संचार करती रही है। जीवन को संवारने, रिश्तों में सौहार्द स्थापित करने, अनेक छिपी प्रतिभाओं को उभारने, निखारने या उनमें जोश भरने में उनकी प्रेरणा ने संजीवनी का कार्य किया है। प्रेरणा केवल औपदेशिक होती तो उतनी प्रभावी नहीं होती, लेकिन यह प्रायोगिक रही। यह द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव और व्यक्ति को देखकर बदलती रही।

आचार्य तुलसी की प्रेरणाएं इतनी विविधमुखी थी कि उनसे जीवन का कोई भी क्षेत्र अछूता नहीं रहा। चाहे वह आपसी संबंध हो, सामाजिक संबंध हो, आर्थिक संबंध हो या राजनीतिक संबंध हो- हर तरह के जीवन को उन्होंने प्रेरक बनाने का उपक्रम किया। वे कभी घटना से, कभी शब्दों से, कभी क्रिया से, कभी पत्रों से, तो कभी किसी उदाहरण या संस्मरण से व्यक्ति की चेतना को झकझोर कर आदर्श और ज्ञान के प्रति अनुराग और जोश जगाते थे। वे इस कला में निष्णात थे कि कब किसको किन शब्दों में उचित प्रेरणा दी जाए। साध्वीप्रमुखा कनकप्रभा ने आचार्य तुलसी की इन्हीं विशेषताओं को मार्मिक ढंग से इस प्रकार अभिव्यक्ति दी है- आचार्यश्री की प्रेरणा में कहीं प्रबोधन का प्रद्योत उगता दिखाई देता है तो कहीं प्रोत्साहन का दरिया लहरा रहा है। कहीं आह्नान का नाद सुनाई देता है तो कहीं उत्साहवर्धन की प्रयोगधर्मिता दृष्टिगत होती है। कहीं इतिहास और परम्परा को सहेजकर रखने की हिदायतें हैं तो कहीं नई लकीरें खींचने का साहस जगमगा रहा है।

मुझे आचार्य तुलसी के साथ सुदूर क्षेत्रों की यात्राएं करने और उनके अणुव्रत आंदोलन और अन्य गतिविधियों और कार्यक्रमों से जुड़कर सक्रिय रूप से कार्य करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। जीवन का वह दौर सबसे सुखद रहा जब मैंने उनको बहुत नैकेट्य से देखा। जीवन के छोटे-छोटे मसलों पर जब वे अपनी पारदर्शी नजर की रोशनी डालते थे तो यूं लगता था जैसे कुहासे से भरी हुई राह पर सूरज की किरणें फैल गईं। मन की बदलियां दूर हो गई और निरभ्र आकाश उदित हो गया हो। उनका चेहरा याद आते ही उस पर छायी शांति का अनुभव होने लगता है। शंात चेहरा और तेजपूर्ण आंखें। अपने साध्य को पा लेने का अहसास भी हम उनके चेहरे पर महसूस करते थे। अपने शिष्यों और अनुयायियों को या यूं कहें कि अपने विचारों की चमक से दुनिया को प्रकाशित करने वाले आचार्य तुलसी ही हो सकते हैं।

आचार्य तुलसी के परिपाश्र्व में रहने का अवसर तो बचपन से ही मिला, लेकिन जब होश संभाला तो उनके गहन विचारों से परिचय हुआ और मेरी मन-वीणा के तार झंकृत हुए। जीवन के छोटे-छोटे मसलों पर जब वे अपनी पारदर्शी नजर की रोशनी डालते थे तो यूं लगता था जैसे घोर अंधेरों में रोशनी की किरणें फैल गईं। शाम को जब आसमान पर बादल कई-कई रंगें से खिल जाते हैं तो वहां मैं भावों का नृत्य होते देखता हूं, समंदर की लहरों में, वृक्षों में, हवाओं में- भाव, भाव और भाव। आचार्य तुलसी को सुनना भी, उनके जीवन को करीब से देखना भी, उनके पदचिन्हों पर चलना भी, मेरे लिए ऐसा ही है जैसे कि हृदय को कई-कई भंगिमाओं से गुजरने का अवसर देना।

आचार्य तुलसी एक ऐसे पुरुषार्थी पुरुष का महापुरुष के रूप में जाना पहचाना नाम है, जिन्होंने हर इंसान के महान् बनने का सपना संजोया और उसके लिये उनके हाथ में सुनहरे सपनों को साकार होने की जीवनशैली भी सौंपी। इसके लिये उनमें बचपन में ही आत्मविश्वास पैदा हुआ। सुप्त शक्तियां जागीं। स्वयं के अस्तित्व की पहचान की। संभावनाओं को प्रस्तुति मिली। शनैः शनैः विकास के पायदान पर चढ़े। जैसे-जैसे उनका आध्यात्मिक तेज बढ़ता गया, जन-जन को वे उन्नत जीवन की ओर अग्रसर करने के लिये अधिक तत्पर होते गये। हजारों-लाखों लोगों के जीवन को उन्होंने मोड दिया, सकारात्मक दिशा में बदला। वे एक जीनियस थे, आदर्श थे, महामानव थे। उन्होंने अपने आप को सीमित दायरों में नहीं रखा बल्कि जीवन को उन्नत बनाने के नये ढं़ग, नई विधाएं खोजी। वे बहुत ही सृजनात्मक जीवन निर्माता थे।

जब आपने आचार्य के रूप में अनुशासना की बागडोर थामी, विकास की उड़ान और निर्माण का आह्नान आपके कर्तृत्व के नाम चुनौती बन गए। आप केवल कल्पना के पंख लगाकर अंतहीन आकाश में निरुद्देश्य उड़ना नहीं चाहते थे। इसलिए पहले पांखों की ताकत भी परखी और आसमां की सीमाएं भी मापी। तब निर्माण के लिए रखी गई बुनियाद विकास का राजमहल बना सकी।

आचार्य काल के आठ दशक के विकास की अनगिनत उपलब्धियां आज न केवल जैन शासन बल्कि मानवता के उज्ज्वल इतिहास का स्वर्णिम पृष्ठ बन चुकी हैं। आपने शिक्षा, साहित्य, शोध, सेवा, संगठन, संस्कृति, साधना सभी के साथ जीवन-मूल्यों को तलाशा, उन्हें जीवनशैली से जोड़ा और इस प्रकार पगडंडी पर भटकते मनुष्य के लिए राजपथ प्रशस्त कर दिया।

आचार्य तुलसी के पुरुषार्थी जीवन की एक पहचान थी गत्यात्मकता। वे अपने जीवन में कभी कहीं रुके नहीं, झुके नहीं। प्रतिकूलताओं के बीच भी अपने अपने लक्ष्य का चिराग सुरक्षित रखा। इसलिए उनकी हर सांस अपने दायित्वों और कर्तव्यों पर चैकसी रखती थी। खून पसीना बनकर बहता था। रातें जागती थी । दिन संवरते थे। प्रयत्न पुरुषार्थ बनते थे और संकल्प साधना में ढलते थे। यही कारण है कि आज उनके प्रयत्नों से न केवल उनका समाज बल्कि लाखों-लाखों लोगों का जीवन प्रेरक बना है, सार्थक बना है और वे सभी उस महामानव को तहेदिल से याद करते हंै।

आचार्य तुलसी की आदर्श जीवनशैली की अनेकानेक विशेषताएं रही हैं उनमें मुख्य है कि उन्होंने अपने साध्य को सदा शुद्ध साधन से जोड़े रखा। इसीलिए सत्ता और पद का मद उनको छू न सका। यश और प्रतिष्ठा आपको गर्वित नहीं कर सकी। आलोचना और विरोध आपके कद को छोटा नहीं बना सके। अनुशास्ता होकर भी कभी किसी की अस्मिता पर हक और हुकूमत की शासना नहीं की। गलतियों का परिष्कार किया। सबको ऊंची उड़ान भरने के लिए खुला आसमां दिया। इसलिए आपका अखण्ड व्यक्तित्व नमनीय बन गया। धूप, वर्षा और वृक्ष जैसे व्यक्ति विशेष में बंटते नहीं, वैसे ही आपकी संत-चेतना भी तेरे मेरे की परिधि से मुक्त होकर सबके लिए समरसता बिखेरती रही। आधुनिक धर्मगुरुओं की भीड़ में आचार्य तुलसी ही ऐसे हैं जिन्होंने धर्म को आडम्बर नहीं बनने दिया, धर्म की पिटी-पिटाई बातों को नहीं दोहराया, बल्कि लोगों के जीवन से जुड़ धर्म को जीवनोपयोगी बनाया। जितने भी आचार्य, अवतार, गुरु, स्वामी, भगवान इन शताब्दियों में अवतरित हुए है, या महिमामंडित हुए है, उन्होंने क्या कुछ नया दिया? वेदों, उपनिषदों, भगवद् गीता, रामायण, महाभारत और आगम में कहे को ही निचोड़ते रहे हंै। कैसे नयी जीवनशैली का प्रादुर्भाव हो? आचार्य तुलसी ही एक अनूठा व्यक्तित्व है जो अपने नाम के आगे गुरु विशेषण लगा होने के बावजूद एक महासूर्य की तरह इन सबसे अलग खड़ा दिखाई देता है जिसने इंसान को इंसान बनाने का सफल उपक्रम किया है। निस्संदेह रूप से वे गुरुओं के बाजार में खड़े होकर इसके अंधेरे गलियारों को अपनी रोशनी से भर देना चाहते थे ताकि उस प्रखर रोशनी मे ंलोग देख सके कि उनके जीवन के लिये क्या अच्छा है? इंसानियत के खिलाफ तैरते हुए पाखंड और नकलीपन की लहरों को नेस्तनाबूद कर देने का साहस उनमें था। उन्होंने इंसान की वह नब्ज पकड़ी जिसका शोषण करके तथाकथित गुरु बाजार फल-फूल रहा था और इंसान का जीवन जटिल से जटिलतर होता जा रहा था। यही कारण है कि गांधी की तरह तुलसी ने भी मनुष्य की छोटी-छोटी कमजोरियों से निजात दिलाने के लिये जीवन को ध्येय बनाया और अणुव्रत आन्दोलन जैसा दुनिया का अकेला नैतिक आन्दोलन चलाया।

आचार्य तुलसी ने जो जीवनशैली सौंपी है उसमें मनुष्य को नैतिक एवं चारित्रिक दृष्टि से शक्तिशाली बनाने पर जोर दिया गया है। वे गांधीजी के तीन बंदरों का प्रसंग सुनाकर प्रेरणा देते है कि-‘‘गांधीजी के बंदरों की भांति अनावश्यक मत देखो, अनावश्यक मत सुनो और अनावश्यक मत बोलो। शक्ति का अनावश्यक व्यय न हो इसलिए भावक्रिया का अभ्यास करो। अनावश्यक प्रवृत्ति से बचने वाला इंसान जीवन को सफल और सार्थक बना सकता है। नेपोलियन का कहना था कि संसार में असंभव नाम की कोई चीज नहीं है। आचार्य तुलसी कहते थे-‘‘हर असंभव संभव बन सकता है, यदि उसके साथ पुरुषार्थ और आत्मविश्वास जोड़ दिया जाए। केवल वर्तमान पर्याय के आधार पर किसी व्यक्ति या परिस्थिति के बारे में निर्णय लेकर भविष्य में संभावना के द्वार को बंद नहीं करना चाहिए।’’

हर इंसान में कुछ-न-कुछ विशिष्ट क्षमता एवं सृजन के अंकुर होते हैं। आचार्य तुलसी ने इंसान इन्ही विशेषताओं को समझते हुए और उनकी रुचियों, अभिवृत्तियों, योग्यताओं, क्षमताओं एवं बुद्धि की तरमता को जानकर उसके विकास एवं पल्लवन में सहयोग के लिये एक प्रशस्त जीवनशैली सुपुर्द की, जिससे वह अपने भीतर छिपी दिव्यता का बोध कर सके। यह बोध वर्तमान पीढ़ी के साथ-साथ आने वाली अनेक शताब्दियां करती रहेगी- यही उस महामानव के सार्थक जीवन की निष्पत्ति है। ऐसे महामानव के निर्वाण दिवस पर उनको हार्दिक नमन।

(ललित गर्ग)

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