लेखक परिचय

अरविन्‍द विद्रोही

अरविन्‍द विद्रोही

एक सामाजिक कार्यकर्ता--अरविंद विद्रोही गोरखपुर में जन्म, वर्तमान में बाराबंकी, उत्तर प्रदेश में निवास है। छात्र जीवन में छात्र नेता रहे हैं। वर्तमान में सामाजिक कार्यकर्ता एवं लेखक हैं। डेलीन्यूज एक्टिविस्ट समेत इंटरनेट पर लेखन कार्य किया है तथा भूमि अधिग्रहण के खिलाफ मोर्चा लगाया है। अतीत की स्मृति से वर्तमान का भविष्य 1, अतीत की स्मृति से वर्तमान का भविष्य 2 तथा आह शहीदों के नाम से तीन पुस्तकें प्रकाशित। ये तीनों पुस्तकें बाराबंकी के सभी विद्यालयों एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं को मुफ्त वितरित की गई हैं।

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अरविन्द विद्रोही

हमको अपना सामाजिक कर्त्तव्य किस प्रकार निभाना चाहिए और हमारे सामाजिक कर्त्तव्य क्या है? कौन सा काम किया जाय और किस प्रकार किया जाय कि वो समाज के लिए सार्थक व उपयोगी सिद्ध हो, यह प्रश्न मेरे जेहन में वर्षों से कौंधता रहता था| अपनी आत्म संतुस्ति के लिए कुछ सामाजिक काम किये, कुछ के आयोजन में सहभागिता की और अपनी इन चंद उपलब्धियों पर निश्चित तौर पर मानवोचित कमजोरी का शिकार होकर आत्म मुग्धता शिकार भी हुआ| हमारा सामाजिक सरोकार, इसका उत्तर तलाशते-तलाशते कई सवालों के चक्रव्‍यूह में मैंने अपने को घिरा पाया| पता नहीं कितने लोगों ने मुझसे कहा कि पहले अपने परिवार के प्रति जिम्मेदारी, उनके लिए अच्छा भोजन व सुख-सुविधा का प्रबंध करिए तब समाज की सोचिये| पहले अपनी व अपने परिजनों की फिक्र करिए, अपने तरक्की की सोचिये फिर किसी की मदद की सोचिये| इन बातों ने हमको भौचक्का कर दिया| अमूमन हम बहस नहीं करते सिर्फ सुनते है और सामने वाले के कथन में सत्य वचन को ग्रहण करने की चेष्टा करते है लेकिन जब भी कोई यह बात हमसे कहता है तब हम जम कर बहस करते है| हमको तो यही समझ में आया है कि अपना काम तो सभी करते ही है, लेकिन समाज के कामों को चन्द लोग| अगर यह चन्द लोग भी सिर्फ पारिवारिक दायित्व के निर्वाहन मात्र व समाज में सर्व व्यापी हो चुके पूंजीवाद के फेर में पड़ जाय तो क्या होगा?

अभी विगत वर्षों में मुझे सामाजिक कर्त्तव्य निर्वाहन की एक सार्थक दिशा मिली| जनपद बाराबंकी की तहसील फतेहपुर के रामनगर मार्ग पर पचघरा के किसानों की बेशकीमती कृषि भूमि के मनमाने अधिग्रहण के खिलाफ संघर्षरत किसानों से, उनकी समस्या से जुड़ना हुआ| बड़ी दुविधा और असमंजस की परिस्थितियों में फंसे पचघरा के ये किसान अपनी बेश कीमती कृषि भूमि को उप मंडी के निर्माण के लिए अधिग्रहित कर लिए जाने से टूट कर बिखर से गये थे| वर्षों के आन्दोलन और संघर्ष के बाद पचघरा के इन किसानों को उनके ही किसान नेतृत्व ने प्रशासनिक दबाव व मिलीभगत के चलते धोखा भी दिया, अपनी भूमि के मनमाने अधिग्रहण से बेजार पचघरा के किसान अपने नेता के दगाबाजी से भूमि से बेदखल किये जाने की आशंका से भयाक्रांत हो गये| प्रशासनिक अमले के साथ मिल कर उस भ्रष्ट किसान नेता ने जबरन सहमति पत्र पर किसानों के हस्ताक्षर करवाने की पुरजौर कोशिस की| यह कुत्सित प्रयास पचघरा के किसानों ने अपने आत्मबल के बूते विफल किया और इसी संकट की घडी में किसानों के बीच से ही एक किसान जिसकी अपनी भूमि भी अधिग्रहित की गयी है उसने अंगद की तरह अपना पाँव जमा दिया| पुराने संगठन से तत्काल इस्तीफा देकर पचघरा के साहसी किसानों ने अपना संगठन पचघरा भूमि अधिग्रहण विरोधी मोर्चा गठित कर के अपने हक के लिए लड़ना जारी रखा| मोर्चा के मुखिया का दायित्व ख़ुशी राम लोधी राजपूत को और संरक्षण का दायित्व फतेहपुर के वरिष्‍ठ अधिवक्ता यादवेंद्र प्रताप सिंह यादव को सौपा गया| पचघरा के किसानों के इस संगठन ने अपनी हर बैठक में आने और खबर लिखने का दायित्व हमको दिया| भूमि अधिग्रहण के खिलाफ संघर्ष कर रहे किसानों ने अपनी भूमि को अधिग्रहण से मुक्ति और भू अभिलेखों में अपना नाम दर्ज करवाने के लिए अपनी बात हर स्तर के अधिकारी व समस्त राजनितिक दलों तक पहुचाई है| पचघरा के इन किसानों ने विभिन्न क्रान्तिकारियो के जन्मदिन व बलिदान दिवस पर बैठक आयोजित करना शुरु कर दिया| मशहूर धन्नाग तीर्थ के विकास के लिए पैदल यात्रा पे निकले यात्रिओं का स्वागत डॉ भीम राव अम्बेडकर स्मृति पार्क-पचघरा में करके वही पर सभा करवाने तथा रात्रि विश्राम महादेव तालाब मंदिर परिसर में करवाने का सराहनिए काम इन किसानों ने किया| रात्रि भोजन व प्रातः जल पान की व्यवस्था भी पचघरा भूमि अधिग्रहण विरोधी मोर्चा ने किया| आज पचघरा के ये किसान अपने हक की व्यक्तिगत लड़ाई लड़ते-लड़ते सामाजिक स्तर पर सबसे जुड़ते चले जा रहे है| खेती किसानी के दुष्कर काम को करने के साथ ही साथ पचघरा के किसान स्थानीय मुद्दों पर अपने विचार प्रकट करने लगे है| अभी १८ जून को जब फतेहपुर के समस्त पत्रकार मुंबई के दिवंगत पत्रकार ज्योतिर्मय डे की हत्या की सी बी आई जाँच और अन्य मांगो को लेकर काला दिवस मानाने और ज्ञापन देने के लिए तहसील परिसर में एकत्र हुए तब पचघरा के किसानों ने तहसील परिसर में आ कर पत्रकारों का साथ दिया| २४ जून को अपनी बैठक में पुनः जे डे की याद में इन किसानों ने २ मिनट का मौन रखा |

पूरे प्रदेश-देश में कृषि भूमि के अधिग्रहण ने भयावह हालत उत्पन्न कर दिया है| किसानों के हक की लड़ाई में साथ देने की जगह राजनेता किसानों की दुर्दशा व मौतों पर अपना स्वार्थ सिद्ध करने हेतु नाना प्रकार की नौटंकी कर रहे है| इन राजनेताओ के कदाचरण व भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज बुलंद करने वालो को शासन सत्ता अपने जुल्म से दबाने का प्रयास कर रही है| एक तरफ सत्ता की दबंगई और दूसरी तरफ राजनेताओं की नौटंकी, आम आदमी एक ज्वालामुखी की तरह सुलग रहा है| तमाम जगह के किसानों की तरह पचघरा के किसान आज भी सत्याग्रह पर है ,आंदोलित है| अन्ना हजारे और बाबा रामदेव दोनों के अनशन पर पचघरा भूमि अधिग्रहण विरोधी मोर्चा के संरक्षक यादवेन्द्र प्रताप सिंह यादव ने साथियो के साथ सहभागिता की है| आज पचघरा का किसान आन्दोलन स्वामी अग्निवेश की भी जानकारी में आ चुका है| पचघरा के किसानों के साथ उनकी भावना है| आन्दोलन के किसी वक़्त वो सहभागिता करेंगे यह उन्होंने कहा है| स्वामी अग्निवेश ने मुझसे मुलाकात के दौरान कहा कि लोकशक्ति को एकत्र करना जारी रखना ही सामाजिक कार्यकर्ताओं का काम है| यह बात मेरे मन में समा चुकी है| पचघरा के किसान अपनी शक्ति के बूते अपनी अधिग्रहित भूमि अपने नाम वापस दर्ज करवाने के लिए प्रयास रत है, लोग साथ डे रहे है| जिनकी दलाली व कुत्षित षड्यंत्र के मनसूबे विफल हो गये थे वो अब विकास का राग अधिकारिओ के सामने आलाप रहे है,यह वही है जिन्होंने इसी भूमि के अधिग्रहण को वापस लेने की मांग के समर्थन में जमकर राजनीती चमकाई है| किसानों के हक के लिए म़र मिटने की बात सभाओं में की और अब सौदेबाज़ी कर के किसानों को विभाजित कर मुआवजा दिलाने में रात दिन एक किये है| एक बात और क्या कोई ऐसा है जो विकास ना चाहता हो? हां,यह अवश्य है कि आम जनता – किसान की बलिवेदी पर कोई भी कंक्रीट की ईमारत विकास की परिचायक नहीं हो सकती, यह मानने वाले किसानों की कृषि भूमि का अधिग्रहण समाप्त करने की बात कहते है|

यह दुर्भाग्यपूर्ण विडम्बना है कि जब तक कोई मजलूम, किसान आत्महत्या नहीं कर लेता या सरकारी दमन का शिकार नहीं हो जाता तब तक उसकी हक कि बात कहने तो दूर की बात है, उनकी बात सुनने के लिए भी आज के भांड सरीखे नौटंकी बाज़ नेता आते नहीं है ना ही उनके चाटुकार| संभवतया यह नौटंकीबाज़ नेता किसानों की मौत का इंतज़ार करते है जिससे वो सत्ताधारी दल को कठघरे में खड़ा कर अपना वोट-बैंक बढ़ा सके|

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1 Comment on "अधिग्रहित कृषि भूमि किसानों के नाम भू अभिलेखों में वापस दर्ज हो"

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Awadhesh Pandey
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उम्दा लेख, जैसे लगता है, माननीय उच्चतम न्यायालय ने आपकी बात सुन ली. सादर.

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