लेखक परिचय

प्रवक्‍ता ब्यूरो

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-हृदयनारायण दीक्षित

प्रत्यक्ष स्वयं प्रमाण होता है। इसे सिध्द करने की आवश्यकता नहीं होती। लेकिन सारा प्रत्यक्ष देखा और जाना नहीं जा सकता। सृष्टि विराट है। इंद्रियबोध की सीमा है। यों प्रत्यक्ष का सीधा अर्थ प्रति-अक्ष यानी आंख के सामने होता है। भारतीय विवेक में ‘अक्ष’ का अर्थ इंद्रियां है। इंद्रियबोध की समझ ही यहां प्रत्यक्ष कहलाती है। लेकिन इस प्रत्यक्ष और हमारी समझ के बीच इंद्रियों की दलाली है। हमारी मूल चेतना और प्रत्यक्ष का सीधा सामना नहीं होता। आंख, कान, नाक आदि इंद्रियों द्वारा दी गई सूचना को अपनी समझ के अनुसार स्वीकार करते हैं। आंखों देखा भी अक्सर सच नहीं होता। यहां आंख की क्षमता और समझ की मध्यस्थता है। फिर सुने और सूंघे को पूरा सत्य मानने में ढेर सारी कठिनाईयां हैं। योग दर्शन के सूत्रकार पतंजलि ने ज्ञान के लिए ‘प्रमाण’ पर जोर दिया है। उन्होंने योग सूत्र (1.7) में प्रमाण के तीन स्रोत (1) प्रत्यक्ष (2) अनुमान और (3) आगम – वेदवचन, पूर्वजों के अध्ययन निष्कर्ष बताए हैं। यहां प्रत्यक्ष का तात्पर्य बिना किसी मध्यस्थ के ही प्राप्त हुआ बोध है। दूसरा प्रमाण सूत्र है ‘अनुमान’। अनुमान प्रत्यक्ष बोध नहीं है। अनुमान में तर्क, संदेह और प्रश्नाकुलता है। सृष्टि की सुसंगत व्यवस्था और लयबध्दता के आधार पर तर्क दिए जाते हैं कि इसके पीछे कोई सर्जक या ईश्वर होना ही चाहिए। यहां ईश्वर प्रत्यक्ष नहीं है। सिर्फ अनुमान है, इस अनुमान के पीछे सुसंगत तर्क भी हैं। लेकिन इसका उल्टा भी है।

प्रकृति की कार्यवाही सुसंगत है। सबकुछ बंधे बंधाए नियमों में चलता है। सर्जन और विसर्जन भी नियम आबध्द हैं। एक तर्क यह भी है कि ऐसी सुसंगत स्वचालित व्यवस्था के लिए किसी प्रबंधक, सृष्टा या ईश्वर की आवश्यकता ही क्या है ? दोनो पक्षों के अपने तर्क हैं। पक्ष और भी हो सकते हैं लेकिन ऐसा प्रमाण अनुमान आधारित ही होगा। ज्ञान का तीसरा प्रमाण है श्रुति/आगम/बोध पाए पूर्वजों के अनुभव। यूनान सहित दुनिया के किसी भी दर्शन में इस तीसरे तत्व को प्रमाण सूची में नहीं गिना गया। लेकिन भारतीय चिंतन में इसकी खास भूमिका है। भारत का अध्ययन, चिंतन, विवेक और विज्ञान दर्शन हजारों वर्ष प्राचीन हैं। ज्ञान-विज्ञान के सूत्र ही यहां वैदिक मंत्र बने, रामायण, महाभारत, पुराण सहित समूचा लोक सृजन ज्ञान अनुभूतियों का अनमोल खजाना है। हजारी प्रसाद द्विवेदी ने (विचार वितर्क पृष्ठ – 211) बिल्कुल सही लिखा है, लोक साहित्य परंपरा प्राप्त साहित्य है। उससे हमारे पुराने इतिहास की कड़ियां जुड़ती हैं, मनुष्य की मानस ग्रंथियों पर प्रकाश पड़ता है और सामाजिक विकास के स्तरों को समझने में सहायता मिलती है। सभी संविधान आधुनिक काल के धर्मग्रंथ/आचार नियम संग्रह हैं लेकिन भारत के 0.5 प्रतिशत लोग भी संविधान नहीं जानते। लेकिन वैदिक साहित्य, रामकथा और श्रीमद्भागवत की कथाएं गांव गली तक चर्चित हैं। इसका मूल कारण इन कथाओं के विवेक से पैदा आस्था है।

दुनिया की कोई भी कौम प्राचीन साहित्य और दर्शन को कण्ठहार नहीं बना सकी। दुनिया में छपाई की मशीनों के बाद ही साहित्य संरक्षण और प्रसार का काम चला लेकिन भारत में वैदिक मंत्रों को रटा गया, बार-बार दोहराया गया, दीर्घकाल तक वाचिक परंपरा चली। कथा सुनाने वाले अपने काम में ही आनंदमगन थे, पारिश्रमिक की चिंता नहीं थी। सुनने वाले उनके बोले शब्दों और उन पर मोहित थे। रथकार समाज के सूत बोलते थे, विद्वत समाज शौनक कथा श्रवण में जिज्ञासु थे। कथा वाचन की यही परंपरा तुलसीदास की रामकथा में सरस सलिल प्रवाह बनी है। यहां काग भुशुंडि और गरूण कथा वाचक व श्रोता है, शिव-पार्वती भी कथा श्रोता हैं। महाभारत में ढेर सारे पशु-पक्षी भी गूढ़ रहस्यों के वाचक हैं। पातंजलि जैसे महान वैज्ञानिक ने आगम/प्राचीन बोध को ठीक ही प्रमाण का दर्जा दिया है। प्रत्यक्ष, अनुमान और आगम के ‘प्रमाण’ से बने भारतीय विवेक को ‘आस्था’ की संज्ञा मिली। भारतीय आस्था किसी देवदूत, पैगंबर द्वारा की गई घोषणा नहीं है। यहां प्रश्न और संदेह करना भी आस्था है। यहां आस्था और विवेक पर्यायवाची है। विज्ञान भी आस्था है, अनेक लोग विज्ञान में आस्था रखते भी हैं। आस्था शब्द का ‘स्थ’ स्थिरिता बोधक-धु्रव है जैसे गृह में स्थिर गृहस्थ, स्व में स्थित स्वस्थ वैसे ही संपूर्णता में स्थिर आस्था।

श्रीराम आस्था हैं। श्रीराम इतिहास में हैं। उनका आचरण मंगल भवन अमंगल हारी है। जांचे परखे श्रीराम भारत की आस्था बने। श्रीकृष्ण भी आस्था हैं। आस्था का अर्थ अंधविश्वास नहीं होता। भारत का मन लोकमंगल अभीप्सु है, भारतीय इतिहास में लाखों प्रेरणा पुरूष हैं। ऐसे प्रेरणा पुरूषों के बारे में करोड़ो आखों, करोड़ो कानों ने बहुविधि संवेदन वाले अनेक विवेचन किये हैं। इसी विवेचन विश्लेषण और विवेक की कसौटी से बनी है भारतीय आस्था। आस्था और संवेदना भारतीय सृजन परंपरा की मूल चेतना है। भारतीय सृजन और साहित्य में ‘मनोरंजन के गुण’ वास्तविक प्रेरणा नहीं हैं। बेशक उनसे मनोरंजन भी होता है लेकिन यहां मूल तत्व लोकमंगल की ही प्रेरणा है। तुलसीदास के सृजन कर्म का उद्देश्य सुस्पष्ट है – ‘सुरसरि सम सबका हित होई’। दर्शन और विज्ञान का प्रेरक तत्व है ‘अतिरिक्त जिज्ञासा’। ‘ऋग्वेद’ से लेकर बाद के संपूर्ण साहित्य में अतिरिक्त जिज्ञासा है।

‘ऋग्वेद’ के ऋषि अतिरिक्त जिज्ञासा से लबालब हैं। संसार बड़ा है। आयतन में भी, रूप विविधिता में भी। मानव शिशु जन्म के समय अबोध रहता है। फिर इंद्रिय बोध बढ़ता है, माँ का परिचय आदि अनादि है और प्रगाढ़ है। कमोवेश पिता का भी। शिशु का इंद्रिय बोध संसार में रूप देखता है। शिशु हृदय में जिज्ञासा बोध उगती है। ऋग्वैदिक ऋषियों की जिज्ञासाएं अद्भुत हैं, पूछते हैं कोददर्श प्रथमंजायमान – प्रथम जन्मे परमतत्व को किसने देखा? जो अशरीरी होकर भी विशालकाय संसार का पोषण करता है? (ऋ0 1.164.4) जिज्ञासा है कि सूर्य अपनी किरणें कैसे फैलाते है। (वही, मंत्र 5) फिर पूछते है इस धरती का अंतिम छोर कौन सा है? – पृच्छामि त्वा परमन्तं पृथिव्याः। सभी भुवनों का केन्द्र कहां है? – पृच्छामि यत्र भुवनस्य नाभिः और वाणी का मूल उद्गम क्या है? -पृच्छामि वाचः परमे व्योम। (वही मंत्र, 34) फिर पूछते हैं, अजन्मा प्रजापति के रूप में एक तत्त्व कैसा है? फिर उत्तर देते हैं मैं यह बात नहीं जानता, लेकिन जानकार लोगों से जानना चाहता हूँ। (ऋ0 1.164.6) यहां जानने का अहंकार नहीं, जिज्ञासा की विनम्रता है। सूर्य पूरब से आते हैं, पश्चिम में अस्त होते हैं। क्यों होते है? यह सबकी जिज्ञासा है। ऋग्वेद (1.35.7) में जिज्ञासा है सूर्य रात्रि के समय (इस समय) कहां है? कौन जानता है कि इस समय उसने अपनी किरणें कहां फैलाई हैं?

भारतीय लोकजीवन गहन जिज्ञासा से भरापूरा है। ऋग्वेद में मरुद्गण है। ऋषि जिज्ञासु है कि इनमें वरिष्ठ कौन है? (1.37.6) इंद्र अकेले जाते हैं तो कहां जाते हैं? (1.165.3) इंद्र कहां रहते हैं? (8.1.7) पृथ्वी और जल के बारे में जिज्ञासा है कि भूमि के प्राण कहां है? (1.164.4) जल का प्रथम प्रवाह क्या है? (2.30.) अदिति सर्वशक्तिमान है, देवता ढेर सारे। ऋषि की जिज्ञासा है कि कौन देवता अदिति से मिलवाने में सक्षम है? (1.24.1) हम सब दुखी होते हैं। समाज में शुभ करने वाले परेशान रहते हैं, अच्छे लोग दुखी रहते है। ऋषि अश्विनी देव से पूछते हैं, जो यज्ञ नहीं करते वे क्यों बड़े बन जाते हैं? (1.82.3) यज्ञ सत्कर्म है। सत्कर्मी दुखी हैं, दुष्कर्मी सुख संपन्न? जिज्ञासा स्वाभाविक है। विश्वकर्मा सृष्टि के रचनाकार देवता थे। ठीक बात है लेकिन ऋषि की जिज्ञासा है कि सृष्टि रचना के समय वह कहां बैठे? धरती आकाश को बनाने के लिए इस्तेमाल लकड़ी आदि के लिए उन्होंने किस वृक्ष का इस्तेमाल किया? (10.81.2-4) ऋषि जिज्ञासा किसी को नहीं छोड़ती। न इंद्र को, न अग्नि को न मरूद्गणों को और न विश्वकर्मा को। वैदिक साहित्य में इसी तरह की ढेर सारी जिज्ञासाएं है। फिर इन जिज्ञासाओं के समाधान की तार्किक दार्शनिक यात्रा है। वैदिक साहित्य दार्शनिक अनुभूतियों और वैज्ञानिक निष्पत्तियों से भरा पूरा है। भारतीय पूर्वज प्रश्नाकुल थे। सतत् जिज्ञासा से वैज्ञानिक दृष्टिकोण का जन्म हुआ, प्रकृति रहस्यों के गहन अध्ययन हुए। भौतिक जगत् का निरीक्षण परीक्षण हुआ। अतिसूक्ष्म अदृश्यमान सत्ता की अनुभूति भी सहज प्रतीति बनी। दीर्घकालीन इसी कार्यवाही से भारतीय लोकजीवन की आस्था का निर्माण हुआ।

* लेखक उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री रह चुके हैं।

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