लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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presidentप्रमोद भार्गव

सात माह के कार्यकाल में केंद्र सरकार द्वारा अध्यादेशों के जरिए कानून बनाने की प्रक्रिया पर राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने गंभीर चिंता जताई है। राष्ट्रपति देश के प्रथम नागरिक होने के नाते अभिभावक की भूमिका में भी रहते हैं। इसलिए उनकी चिंता पर गौर करने की जरूरत है। महामहिम ने केंद्रीय विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों के गुरूजनों व छात्रों द्वारा पूछे गए सवालों के जबाव में कहा है कि ‘अध्यादेश के जरिए कानून बनाना ठीक नहीं है। यह सभी दलों की जिम्मेबारी है कि मिलकर कोई हल निकालें ताकि भविष्य में ताबड़तोड़ अध्यादेश लाने की जरूरत न पड़े। संविधान में केवल असाधारण या आपात परिस्थितियों में ही अध्यादेश लाने का प्रावधान है।‘ राष्ट्रपति की नसीहत में एक बात खास है कि उन्होंने अध्यादेश के लिए केवल सत्तारूढ़ दल को दोषी नहीं ठहराया है,बल्कि विपक्ष और क्षेत्रीय दलों को भी ऐसे हालात निर्माण के लिए बराबर का दोषी ठकराया है। जाहिर है,सभी पक्षों को मिलकर अधिकतम सहमति के ऐसे आधार बनाने की जरूरत है,जिससे नए कानून बनाते समय सत्ताधारी दल को अध्यादेश के मार्फत कानून बनाने की नौबत से न गुजरना पड़े। साफ है,विपक्षी दलों को हंगामा खड़ा करके बहूमत की मंशा को दबाना नहीं चाहिए।

जैसे-जैसे हमारी संसद की उम्र बढ़ रही है,उसकी गरिमा का क्षरण हो रहा है। हो-हल्ला के बीच काम के घंटे घट रहे हैं। नतीजतन राष्ट्रपति का चिंतित होना एक स्वाभाविक बेचैनी की अभिव्यक्ति है,जो राष्ट्रप्रमुख होने के नाते होनी भी चाहिए। यही चिंता जागरूक मतदाता और देश के बुद्धिजीवियों की भी हैं। मीडिया समेत अन्य लोकतांत्रिक मंचों से भी यह चिंता प्रगट भी होती रही है। इसलिए राष्ट्रपति की चिंता भी वाजिब है। प्रणब मुखर्जी ने कहा है,‘हंगामा बरपाने वाले अल्पमत को यह अनुमति नहीं होनी चाहिए कि वह सहनशील बहुमत का गला घोंट दे।‘ राष्ट्रपति की इस टिप्पणी से आषय निकलता है कि विपक्ष को बेवजह रोड़ा अटकाने की इजाजत नहीं दी जा सकती है। विपक्ष को तार्किक विरोध जताने,निर्माणाधीन कानून पर सवाल उठाने और यदि संसद में संख्या बल है तो बहुमत से प्रक्रिया को खारिज करने का अधिकार भी है। साफ है,संसद के कर्णधारों का लक्ष्य राष्ट्रहित होना चाहिए। किंतु जब राजनीतिक दल पूर्वग्रही मानसिकता के चलते संसद में हरेक संसदीय प्रक्रिया की अवहेलना करते हैं तो यह स्थिति संसद और संविधान की उपेक्षा प्रगट करती है।

राष्ट्रपति ने अपनी बात इतने तटस्थ और निर्विवाद अंदाज में कही है कि उनकी तथ्यात्मक सीख से सभी दलों को सबक लेने की जरूरत है। सत्तापक्ष को नसीहत देते हुए महामहिम ने कहा है कि ‘विद्यायिका में सहमति नहीं बनने पर कार्यपालिका को असाधारण या आपात स्थितियों में ही अध्यादेश लाने का संविधान में सीमित अधिकार है।‘ साफ है,यह टिप्पणी केंद्र सरकार की तात्कालिक कार्यशैली पर अंगुली उठाती है। क्योंकि संसद में नए कानूनों के निर्माण और पुराने कानूनों में फेरबदल पर सहमति नहीं बनने पर मोदी सरकार संविधान और संसद की अवज्ञा करते हुए लगातार 10 अध्यादेश लाई है। जबकि वह लोकसभा में स्पश्ट बहुमत में है। हां,राज्यसभा में जरूर उसके पास बहुमत नहीं है। लेकिन हर मुद्दे पर विपक्ष द्वारा शोर-षराबा खड़ा करने पर न तो विधेयको के मसविदों पर सार्थक बहस हो पाई और न ही उन्हें संपूर्ण संवैधानिकता हासिल हो पाई। यही वजह रही कि मोदी सरकार को कानून बनाने की शुरूआत ही अध्यादेश की लचारगी से करनी पड़ी।

इस क्रम में पहला अध्यादेश ट्राई के नियमों में संशोधन का आया। जिसके तहत प्रधानमंत्री अपनी मन-पंसद के मुख्य सचिव नृपेंद्र मिश्र की नियुक्ति कर सके। दूसरा अध्यादेश तेलगांना राज्य पुनर्गठन कानून में संशोधन किया गया,ताकि पोलावरम परियोजना के तहत विस्थापन का दायरा बढ़ाया जा सके। इसके बाद दो अध्यादेश कोयला खदानों की नीलामी के बाबत लाए गए। पांचवा अध्यादेश बीमा क्षेत्र में विदेशी निवेष की सीमा 26 फीसदी से बढ़ाकर 49 फीसदी करने के लिए लाया गया। छठा अध्यादेश खाध सुरक्षा कानून में बदलाव के लिए लाया गया। जबकि संप्रग सरकार जब अध्यादेश के मार्फत खाद्य सुरक्षा कानून ला रही थी, तो अरुण जेटली का कहना था कि अध्यादेश विधायी शक्तियों का अपमान है। वही अरूण जेटली अब वित्त मंत्री की भूमिका में हैं और प्रतिष्ठित अधिवक्ता एवं संविधान विशेषज्ञ होने के बावजूद अध्यादेशों के धड़ल्ले से प्रारूप बनाकर उन्हें अमलीजामा पहनाने में लगे हैं।

सांतवा अध्यादेश बहुचर्चित भूमि अधिग्रहण विधेयक में संशोधन से जुड़ा है। यही वही विधयक है,जिसे जब मनमोहन सिंह सरकार के दौरान भाजपा विपक्ष में थी,तब विपक्ष की नेता रहीं सुषमा स्वराज और अरुण जेटली ने सबसे ज्यादा सवाल खड़े किए थे और इसे कठोर बनाए जाने संबंधी सुझाव दिए थे। यही नहीं भूमि अधिग्रहण विधेयक का मसौदा जिस संसदीय समीति ने तैयार किया था,उसकी अध्यक्ष सुमित्रा महाजन थी,किंतु अब वही सुमित्रा लोकसभा की अध्यक्ष रहते हुए इसमें किए बदलावों को उचित ठहरा रही हैं। अब न जाने क्यों यह विधेयक भाजपा के गले की हड्डी बन गया है। विरोधाभासी यही विडंबना दलों में परस्पर मतभेद गहरे करने का काम करती है। आठवां अध्यादेश अप्रवासी भारतीयों को आजीवन वीसा देने की कानूनी सुविधा से जुड़ा है। इस पर विपक्ष को सहमत किया जा सकता था,क्योंकि इस पर गहरे मतभेद नहीं थे। यदि ऐसा होता तो इस कानून को संसद के दोनों संदनों से पारित कराकर स्थायी रूप दिया जा सकता था। नवां अध्यादेश दिल्ली की 895 अवैध काॅलोनियों को वैध करने का था। इसका विपक्ष इसलिए विरोध करता,क्योंकि दिल्ली में विधानसभा के चुनाव होने थे और वह अवैध बस्तियों को वैध करके मतदाता को प्रभावित करना चाहती थी। तय है,मतदाता को लुभाने के लिए ही यह अध्यादेश जल्दबाजी में लाया गया है। दसवां विधायक दिल्ली में ई-रिक्शा को अनुमति देने के संबंध में है। इस विधेयक को भी भाजपा जल्दी में चुनाव के मद्देनजर लाई है। जाहिर है,इनमें से कोयला खदानों को नीलामी से जुड़े अध्यादेशों को छोड़ दें तो अन्य कोई ऐसा अध्यादेश नहीं है,जो आपात या असाधारण स्थिति से जुड़ा हो। इसीलिए अध्यादेशों पर हस्ताक्षर करने से पहले राष्ट्रपति ने संबाधित विभागों के मंत्रियों को तलब करके उनकी जरूरत पर सवाल पूछते रहे हैं।

अध्यादेश लाना इसलिए चिंताजनक है,क्योंकि एक तो अध्यादेश संविधान व संसद की संपूर्ण प्रक्रिया पूरी नहीं करता। दूसरे, अध्यादेश की उम्र महज छह माह होती है। छह माह के भीतर अध्यादेश को संसद के दोनों सदनों से विधेयक के जरिए कानून के रूप में बदला जाना जरूरी है,अन्यथा यह स्वमेव निरस्त हो जाता है। इसे भी संसद सत्र शुरू होने के 42 दिन के भीतर पेश करना जरूरी होता है। राष्ट्रपति को भी अध्यादेश केवल तीन बार पुनरीक्षित करने का अधिकार है। जाहिर है,अध्यादेश की अपनी कानूनी सीमाएं हैं। इसलिए अध्यादेश द्वारा बनाए कानून को लेकर अनिश्चितता बनी रहती है। गोया,जरूरी नहीं कि बीमा,खाद्य सुरक्षा और भूमि अधिग्रहण संबंधी अध्यादेशों में फेरबदल के जरिए देशी-विदेशी कंपनियों को लुभाने के जो प्रयास किए गए हैं,वे उस मकसद पर खरे उतरें। क्योंकि पूंजी निवेष करने वाले उद्योगपतियों के दिमाग में संशय बना रहेगा ? बहरहाल कलांतर में जो भी स्थिति निर्मित हो, फिलहाल मोदी सरकार ने अध्यादेश लाने की दृष्टि से इंदिरा गांधी सरकार का मुकाबला कर लिया है। अभी तक सबसे ज्यादा 208 अध्यादेश इंदिरा गांधी सरकार के 5,825 दिन के कार्यकाल में लाए गए थे। मसलन औसतन हरेक 28 दिन में एक। जबकि मोदी सरकार के 236 दिन के कार्यकाल में 10 अध्यादेश आ गए है, यानी औसतन प्रत्येक 28 दिन में एक अध्यादेश लाया गया है। जबकि मनमोहन सिंह के 10 साल के कार्यकाल में कुल 61 अध्यादेश आए थे। सब कुल मिलाकर अध्यादेशों के जरिए सरकार चलाना,लोकतंत्र के व्यापक हितों के लिए उचित नहीं है। गोया कि मोदी सरकार को जहां भविष्य में इस लाचारी से बचने की जरूरत है,वहीं विपक्ष को भी अपनी प्रासंगिकता साबित करने की जरूरत है। राष्ट्रपति की चिंता में यही नसीहत अंतर्निहित है।

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1 Comment on "अध्यादेशों पर राष्ट्रपति की चिंता"

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sureshchandra.karmarkar
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sureshchandra.karmarkar
भारतीय राजनीती मैं एक बात स्थाई रूप से घर कर चुकी है की विरोध के लिए विरोध और समर्थन के लिए समर्थन। सत्ता पक्ष के लोग वही रवैया अपनाते हैं ,जो पूर्व मैं मैं विपक्ष सत्तासीन होते हुए अपनाता था। इसका विलोम वपक्ष वही करता है जो वह सत्तसीन होते हुए करता करता था. किसी विधयक को या कानून को लेकर सकारात्मक चर्चा करना ,बहस करना ,तर्क और आंकड़े देना अब गुजरे जमाने की बात है. मधु लिमये/मधु दंडवते /पीलू मोदी/होमी दजी/ अटल बिहारी/ डांगे /नेहरूजी शास्त्रीजी/ मिश्र ऐसे अनेकानेक सांसद हुए हैं जिनका आचरण /बहस /चर्चा एक मिसाल है.
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