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प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो

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-विजय कुमार-
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चुनाव के इस दौर में सब ओर शासन की ही चर्चा है। कोई वर्तमान शासन को ‘कुशासन’ बताकर उसे बदलना चाहता है, तो कुछ उसे ‘सुशासन’ कहकर बनाये रखने के पक्षधर हैं। कुछ इस व्यवस्था को ही ‘दुःशासन’ मानकर इसे पूरी तरह बदलना चाहते हैं। यद्यपि इसके बदले वे कौन सी व्यवस्था लाएंगे, इसका कोई मानचित्र उनके पास नहीं है। किसी समय दूरदर्शन पर हास्य कलाकार असरानी बिजली के एक बल्ब का विज्ञापन करते हुए कहते थे – सारे घर के बदल डालूंगा। इसी तर्ज पर ये ‘अराजकतावादी’ नेता भी सब कुछ बदलने की बात कह रहे हैं।

कुछ तमाशेबाज इस बहती गंगा का लाभ लेकर अपने दाम बढ़ा रहे हैं। कुछ चुनाव में खड़े हो गये हैं, तो कुछ ने अपनी निजी दुकानें खोल ली हैं, जिसे वे ‘राजनीतिक दल’ कहते हैं। बेसिर पैर की बातें बोलकर, अपने ही प्रायोजित लोगों से चांटे या मुक्के खाकर, और फिर माफ करके यदि मीडिया में निःशुल्क प्रचार मिले, तो क्या बुरा है ? जैसे विवाह में बच्चों से लेकर बूढ़ों तक सबको कमर मटकाने का अधिकार होता है, ऐसे ही लोकतंत्र के इस महापर्व में सबको मनमानी करने का हक है। जनता भी इसका पूरा मजा ले रही है। लोकतंत्र का ऊंट किस करवट बैठेगा, इसका अनुमान तो सबको है; पर अंतिम रूप से तो यह 16 मई को ही पता लगेगा। लेकिन शासन की इस होड़ में सब लोग ‘अनुशासन’ को भूल रहे हैं, जिसके बिना कोई भी शासन जनहितकारी नहीं हो पाता। यदि समाज अनुशासित न हो, तो शासन की उपयोगी योजनाएं भी व्यर्थ हो जाती हैं। भारत में यही हो रहा है। इसलिए अरबों-खरबों रु. की देशी-विदेशी सहायता और कर्ज के बावजूद सर्वत्र अव्यवस्था, भ्रष्टाचार, कामचोरी और विचारहीनता व्याप्त है।

शासन और अनुशासन में शब्दों का मामूली हेरफेर है; पर उसकी भावना में धरती-आकाश का अंतर है। शासन ऊपर से थोपा जाता है। अतः उसके लिए डंडा जरूरी है, जबकि स्वयंप्रेरित होने के कारण अनुशासन का पालन लोग स्वयं करते हैं। प्राचीन काल में राज्यारोहण के समय राजा गद्दी पर बैठकर तीन बार कहता था, ‘अदंडयोस्मि’ (मुझे कोई दंड नहीं दे सकता। मैं दंड विधान से ऊपर हूं।) इस पर धर्मगुरु एक पलाश की लकड़ी का डंडा उसके सिर से छुआकर तीन बार कहता था, ‘धर्म दंडयोसि’ (धर्म तुम्हें भी दंड दे सकता है।) अर्थात धर्म या नैतिकता की सत्ता (अनुशासन) को राजसत्ता (शासन) से ऊपर माना गया है।

शासन के लिए कठोरता निःसंदेह आवश्यक है। चाणक्य, भीष्म, भृर्तहरि, व्यास और विदुर जैसे प्राचीन विद्वानों ने भी शासन का आधार दंड को माना है। जर्मनी के एकीकरण के पुरोधा बिस्मार्क का कथन है, ‘policy cannot succeed through speeches & songs; it can only be carried out through blood & iron’. 1962 में जब प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू चीन के षड्यन्त्रों की ओर से आंखें मूंदे हुए थे, तब हिन्दी काव्य मंचों के सिरमौर गोपाल सिंह ‘नेपाली’ ने लिखा था –
ओ राही दिल्ली जाना तो कह देना सरकार से
चरखा चलता हाथों से शासन चलता तलवार से।

पर जनतंत्र में वोट के माध्यम से प्राप्त राजदंड जब सत्ताधीशों की तानाशाही स्थापित करने का उपकरण बन जाए, तो फिर जनता उसे उलटने में देर भी नहीं लगाती। 1975 के आपातकाल में इंदिरा गांधी, संजय गांधी और उनकी दुष्टमंडली ने शासन के सब सूत्र अपने हाथ में ले लिये थे। जब राज्य की संचालक तीनों शक्तियां (विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका) एक व्यक्ति, परिवार या समूह के हाथ में आ जाएं, तो उसे ही ‘तानाशाही’ या ‘फासिज्म’ कहते हैं। ऐसे दिन भारत ने अंग्रेजों के समय में भी नहीं देखे थे। विरोधी पक्ष के नेताओं को जेल में डाल दिया गया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे देशभक्त संगठन पर प्रतिबंध लगा दिया गया। सारे देश में श्मशान जैसी शांति छा गयी। जनता भी भयवश चुप बैठ गयी।
यह देखकर इंदिरा गांधी ने गर्वोक्ति करते हुए कहा कि आपातकाल लगने पर कहीं एक कुत्ता भी नहीं भौंका। लोग कार्यालयों में समय से आने लगे हैं। रेलगाड़ियां समय से चलने लगी हैं… आदि। गांधी जी के शिष्य, मौनप्रिय, कांग्रेसी साधु विनोबा भावे ने भी जब मुंह खोला, तो आपातकाल को ‘अनुशासन पर्व’ कहा; पर यह सारा ‘अनुशासन पर्व’ तब धरा रह गया, जब इंदिरा गांधी ने लोकसभा के चुनाव घोषित कर दिये। उनके निजी जासूसों ने उन्हें कहा कि इस समय देश का वातावरण बहुत अच्छा है। अनुशासन की शीतल और सुगंधित बयार सर्वत्र बह रही है। चुनाव में बहुमत पाकर इस निरंकुशता पर जनतंत्र की मोहर लगवायी जा सकती है। इससे विदेशों में हमारी खराब छवि भी ठीक हो जाएगी। जनादेश पाकर विरोधियों का दमन और भी अच्छी तरह से हो सकेगा। राजनीतिक उठापटक में माहिर और परदे के पीछे कूटनीतिक चालबाजी में अत्यन्त शातिर इंदिरा गांधी धोखा खा गयीं और उन्होंने 1977 में लोकसभा के चुनाव घोषित कर दिये।

इस चुनाव पर दुनिया भर की निगाहें लगीं थीं। अतः विपक्षी नेताओं को जेल से छोड़ना पड़ा। जनता को भी कुछ छूट देनी पड़ी; पर तानाशाही डंडे के कुछ नरम होते ही चुप बैठी जनता ने ‘नृसिंह अवतार’ धारण कर लिया और इंदिरा गांधी चारों खाने चित्त हो गयीं। दक्षिण ने उनकी कुछ लाज बचायी; पर उत्तर प्रदेश में तो उनका एक भी सांसद नहीं जीत सका। इंदिरा गांधी और उनके महान सपूत संजय गांधी, जो उन दिनों असली शासक बने हुए थे, दोनों ही खेत रहे। तानाशाही शासन को ‘अनुशासन’ समझ लेने का कैसा दुष्परिणाम होता है, 1977 के चुनाव इसका प्रत्यक्ष प्रमाण हैं।
आपातकाल के बाद कुछ समय तो सब ठीक चला, फिर ‘हम भारत के लोग’ उसी ढर्रे पर आ गये और वातावरण क्रमशः खराब ही होता गया। कामचोरी और भ्रष्टाचार मानो हमारे खून में मिल गये हैं। लोग सब देखते हुए भी सहने को मजबूर हैं। तो क्या भारत के लोग ‘अनुशासनहीन’ हैं ? गहराई से सोचें, तो ऐसा नहीं लगता। वस्तुतः यदि लोगों को लगेगा कि गलत काम करने पर सजा मिलेगी और शीघ्र मिलेगी, तो वे गलती नहीं करेंगे; पर हमारी न्याय प्रणाली नेत्रहीन होने के साथ ही कछुए की पीठ पर भी सवार है। इसलिए लोग निश्चिन्त हैं। हां, पिछले दिनों कुछ बड़े नेता, मंत्री, सरकारी अधिकारी, उद्योगपति और तथाकथित धर्मनेताओं के जेल जाने से कानून का भय कुछ व्याप्त हुआ है। यदि इसकी गति तेज हो जाए, तो शासन व्यवस्था सुधर जाएगी।

लेकिन डंडे के भय से ‘अनुशासन’ नहीं आ सकता। इसके लिए तो बड़े लोगों को अपना उदाहरण प्रस्तुत करना होगा। ‘महाजनो येन गतः स पंथा’ की बात हमारे ग्रंथों ने कही है। 1965 में पाकिस्तानी आक्रमण के समय हमें अमरीका से गेहूं मंगाना पड़ता था। अमरीका ने पाकिस्तान का पक्ष लेते हुए भारत को धमकी दी। ऐसे में प्रधानमंत्री श्री लालबहादुर शास्त्री ने अन्न उपजाने और बचाने का आह्नान किया। उन्होंने लोगों से सप्ताह में एक दिन रात का भोजन छोड़ने को कहा। सबसे पहले उन्होंने स्वयं ऐसा किया, तो पूरे देश ने उनकी बात मानी। उन दिनों सरकारी अधिकारियों की कोठियों के खाली पड़े लॉनों में भी अन्न उगने लगा था। जहां तक समयपालन की बात है, तो यदि कोई राजनीतिक, सामाजिक या सांस्कृतिक कार्यक्रम चार बजे है, तो लोग उसे अपने आप ही छह बजे मान लेते हैं। कुछ लोग इसे ‘इंडियन टाइम’ कहकर लांछित भी करते हैं; पर जिन संस्थाओं या धार्मिक स्थलों पर कार्यक्रम समय से होते हैं; जहां चप्पल-जूते पंक्तिबद्ध रखे जाते हैं; जहां निर्धारित वेश में ही जाने और निर्धारित स्थान पर ही बैठने की अनुमति होती है, वहां लोग इसका पालन करते हैं। परीक्षा देने या रेलगाड़ी पकड़ने के लिए लोग समय से पहुंचते ही हैं। अर्थात, लोग अनुशासनहीन नहीं हैं; पर खराब माहौल देखकर वे इसी में ढल जाते हैं।

इसलिए यदि अनुशासन लाना है, तो अभिभावक तथा अध्यापक इसका पालन करें। इससे बच्चे स्वयं ही अनुशासित हो जाएंगे। यहां समाचार माध्यमों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। प्रायः वे नकारात्मक समाचारों को अधिक महत्व देते हैं। वे यह तो बताते हैं कि अमुक कार्यक्रम दो घंटे देर से शुरू हुआ; पर जो कार्यक्रम समय से शुरू होते हैं, उनकी बात नहीं होती। विदेश में हम लोग सहर्ष नियमों का पालन करते हैं; पर स्वदेश लौटते ही फिर यहां-वहां कूड़ा डालने लगते हैं; सड़कों पर लालबत्ती पार करने लगते हैं; कार्यालय में देर से आकर जल्दी जाने लगते हैं; और वे सब काम करने लगते हैं, जो अनुशासनहीनता की परिधि में आती हैं। स्पष्ट है कि शासन बाहरी चीज है और अनुशासन भीतरी। शासक अपने सद्व्यवहार से लोगों को अनुशासित कर सकते हैं और अनुशासित लोग अपने तप से शासन को नियन्त्रित कर सकते हैं। परस्पर पूरक और एक सिक्के के दो पहलू जैसे होने के कारण आवश्यकता दोनों की है।

इस दृष्टि से देखें, तो जहां वर्ष 2014 का मई मास नये शासन की ओर बढ़ रहा है, वहां 10 मई, 1857 का प्रसंग वीरता और देशप्रेम के उद्रेक के साथ किंचित अनुशासनहीनता की भी याद दिलाता है। यदि मेरठ छावनी के भारतीय सैनिक कुछ दिन और धैर्य रख लेते, तो स्वाधीनता का सूर्य हम 90 वर्ष पूर्व ही देख लेते; पर इतिहास तो अपनी गति से चलता है। वह किन्तु-परन्तु नहीं जानता। हां, भविष्य हमारे अपने हाथ में ही है। हम चाहें, तो उसे स्वयंप्रेरित अनुशासन से युक्त समर्थ शासन में जरूर बदल सकते हैं।

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