लेखक परिचय

सिद्धार्थ शंकर गौतम

सिद्धार्थ शंकर गौतम

ललितपुर(उत्तरप्रदेश) में जन्‍मे सिद्धार्थजी ने स्कूली शिक्षा जामनगर (गुजरात) से प्राप्त की, ज़िन्दगी क्या है इसे पुणे (महाराष्ट्र) में जाना और जीना इंदौर/उज्जैन (मध्यप्रदेश) में सीखा। पढ़ाई-लिखाई से उन्‍हें छुटकारा मिला तो घुमक्कड़ी जीवन व्यतीत कर भारत को करीब से देखा। वर्तमान में उनका केन्‍द्र भोपाल (मध्यप्रदेश) है। पेशे से पत्रकार हैं, सो अपने आसपास जो भी घटित महसूसते हैं उसे कागज़ की कतरनों पर लेखन के माध्यम से उड़ेल देते हैं। राजनीति पसंदीदा विषय है किन्तु जब समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का भान होता है तो सामाजिक विषयों पर भी जमकर लिखते हैं। वर्तमान में दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, हरिभूमि, पत्रिका, नवभारत, राज एक्सप्रेस, प्रदेश टुडे, राष्ट्रीय सहारा, जनसंदेश टाइम्स, डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट, सन्मार्ग, दैनिक दबंग दुनिया, स्वदेश, आचरण (सभी समाचार पत्र), हमसमवेत, एक्सप्रेस न्यूज़ (हिंदी भाषी न्यूज़ एजेंसी) सहित कई वेबसाइटों के लिए लेखन कार्य कर रहे हैं और आज भी उन्‍हें अपनी लेखनी में धार का इंतज़ार है।

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बाबा की राजनीतिक कुंठा सामने आ रही है

बाबा रामदेव जो न करें कम ही है| कभी पुणे में सांकेतिक भाषा में कहते हैं कि यदि उनका ९ अगस्त का आंदोलन सफल होता है तो वे २०१४ के लोकसभा चुनाव में सक्रिय भूमिका निभा सकते हैं तो कभी कहते हैं कि उनका धेय मात्र व्यवस्था परिवर्तन ही है, न कि राजनीति करना| हाल ही में भोपाल में कांग्रेसियों ने बाबा रामदेव की गाड़ी पर जमकर किया| वे बाबा द्वारा राष्ट्रीय महासचिव दिग्विजय सिंह के खिलाफ दुर्ग में कहे गए अपशब्दों से आहत थे| हालांकि बाबा को भी इतने कड़े प्रतिरोध का अंदाज नहीं था किन्तु जब सिर मुंढाते ओले पड़े तो बाबा को स्पष्टीकरण देना पड़ा| और स्पष्टीकरण क्या, खुद तो पाक साफ़ साबित करना उनकी मजबूरी बन गई थी| फिर बाबा की राजनीतिक समझ तो देखिए कि उन्होंने कांग्रेस माता और युवराज के लिए जो आत्मीय संबोधन इस्तेमाल किया उससे खुद कांग्रेसी चकमा खा गए| चकित तो लोग भी हैं कि जो बाबा कांग्रेस को देश की दुर्गति का कारण बताते नहीं अघाते, वे माता और युवारज के प्रति इतने असहष्णु क्यों हैं? खैर बता दें कि बाबा को भी अपने आर्थिक हितों की परवाह है जिसके लिए वे किसी भी हद तक जा सकते हैं|

वापसी का मौका खो दिया कांग्रेस ने

मध्यप्रदेश में कांग्रेस जिस तरह भाजपा के सामने नतमस्तक हुई है उससे कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व जहां भौचक है तो भाजपा केंद्रीय नेतृत्व की बांछे खिल गई हैं| प्रदेश की वर्तमान राजनीति को देखते हुए इतना तो तय है कि शिवराज सरकार तीसरी बार जोरदार वापसी करने वाली है| कांग्रेस के २ विधायकों के निलंबन को जहां पूरी पार्टी भुना सकती थी वहीं मृतप्रायः संगठन में भी प्राण फूंक सकती थी किन्तु दोनों विधायकों ने विधानसभा अध्यक्ष को हस्तलिखित माफीनामा भेजकर मट्टी पलीत कर दी| अब भाजपा सरकार विशेष सत्र बुलाने की तैयारी में है और कानूनविदों की राय से दोनों का निलंबन समाप्त करवाने की जुगत में है| वैसे सुनने में आ रहा है कि प्रदेश के कांग्रेसी विपक्ष में बैठकर भी सत्ता रुपी सुख भोग रहे हैं| प्रदेश अध्यक्ष के करीबियों को प्रदेश सरकार जमकर उपकृत कर रही है और चहुँओर मैनेज स्थिति नज़र आ रही है| ऐसे में कौन सरकार को नाराज करना चाहेगा?

मराठा राजनीति में वापसी की जद्दोजहद

सुना है शरद पवार इन दिनों कांग्रेस से नाराज चल रहे हैं| वजह बताई जा रही है कि वे वरिष्ठता क्रम के लिहाज से सरकार में २ नंबर का पद चाहते हैं और सरकार है कि उन्हें यह पदवी देना नहीं चाहती| दूसरे पवार महाराष्ट्र में कांग्रेस-एनसीपी की संयुक्त सरकार में अपने कोटे के मंत्रियों द्वारा किए गए भ्रष्टाचार से हलाकान हैं और आलाकमान पर दबाव बना रहे हैं ताकि उनके सिपहसालारों पर जांच की आंच न आए| खैर ये तो हुई परदे के सामने की राजनीति| परदे के पीछे की जो वजह बताई जा रही है वह यह कि पवार महाराष्ट्र की राजनीति में अपनी पार्टी को दोबारा जिन्दा करने की जद्दोजहद में लगे हैं| उनके भतीजे अजित पवार भी मुख्यमंत्री पद की लालसा में दुबले हुए जा रहे हैं| चाचा-भतीजे का सोचना है कि देश भर में इन दिनों कांग्रेस के खिलाफ लहर चल रही है उसे महाराष्ट्र में भुनाया जाए| वैसे भी पिछली बार शरद एंड पार्टी का अपने ही गृहराज्य में प्रदर्शन अपेक्षानुरूप नहीं रहा था| अब जबकि केंद्र सरकार बिन पेंदी के लोटे की मानिद हिचकोले खा रही है और जैसे-तैसे सहयोगी दलों से समर्थन की बैसाखी पर सांसें गिन रही है तो पवार की राजनीतिक समझ यही कहती है कि सियासी मोर्चे पर हाथ का साथ देने से बेहतर है अपने घर को दुरुस्त किया जाए| देखा जाए तो संयोग ही है कि एक ओर उद्धव की एंजियोप्लास्टी ने राज को मातोश्री पहुंचा दिया तो पवार को मराठा राजनीति में अपने गढ़ की याद आ गई| दोनों ही स्थितियां कांग्रेस के लिए महाराष्ट्र में फूल की जगह कांटें बिछा रही हैं|

फैसलों को बदलना तो कोई यूपी की राजनीति से सीखे

खबर है कि सूबे के मुखिया अखिलेश यादव ने आठ जिलों के नाम बदलकर उनका नया नामकरण संस्कार कर दिया है| ये वही जिले हैं जिनका नाम बदल माया सरकार ने दलित अस्मिता को कथित श्रद्धांजलि दी थी| वैसे यह कोई पहला मौका नहीं है जब सपा सरकार ने माया सरकार के फैसलों को बदला हो| सूबे की सियासत की पहचान बनता जा रहा है यह बदलाव| माया आती हैं तो पूरवर्ती सपा सरकार के फैसलों को बदल देती हैं और सपा सरकार आती है तो माया सरकार के फैसलों पर पलटवार होता है| सुना है सूबे के अफसर अब हर सियासी आदेश हेतु दो फाईलें बनवा रहे हैं| एक पूरवर्ती सरकार के आदेश के दुरुस्तीकारण की तो दूसरी नई सरकार के आदेश की तामीली की| क्या पता कब सरकार के दिन पूरे हों और कब कोई पुरानी थाली में नए चावल सजा जाए? हाँ, एक बात काबिलेगौर है, अफसर इस बात से निश्चिन्त हैं कि सरकार सिर्फ सपा या बसपा की ही आनी है| कांग्रेस और भाजपा तो सूबे में दिखाई ही नहीं देती|

गोविन्दाचार्य में सस्ती लोकप्रियता की भूख जाग गई

भाजपा के पूर्व थिंकटैंक गोविन्दाचार्य ने राहुल गाँधी की अपेक्षा दिग्गी राजा को बेहतर प्रधानमंत्री आँका है| उन्होंने नरेन्द्र मोदी तथा नीतीश कुमार को भी सुषमा स्वराज व शरद यादव की अपेक्षा कम नंबर दिए हैं| हालांकि गोविन्दाचार्य को आजकल कोई गंभीरता से नहीं लेता किन्तु उनका दिग्गी प्रेम इन दिनों चर्चा का विषय है| ये वही गोविन्दाचार्य हैं जिन्होंने दिग्गी के दस वर्षों के मुख्यमंत्रित्व काल को उखाड़ फेंकने के लिए उमा को तैयार किया था जिसकी वजह से दिग्गी तो क्या कांग्रेस भी प्रदेश वापसी की आस में सपनों का संसार बुलंद कर रही है| संघ और भाजपा पर प्रहार करने वाले गोविन्दाचार्य कहीं सस्ते प्रचार की भूख तो नहीं मिटाना चाहते? आखिर दिग्गी की तारीफ़ में कसीदे गढ़कर उन्हें क्या मिलेगा?

प्रणब के लिए अफजल की फांसी का मुद्दा जी का जंजाल न बन जाए

नए निर्वाचित राष्ट्रपति प्रणब दा ने सरकार में रहते कई दफा संकटमोचक की भूमिका का निर्वहन किया है पर अब जबकि वे रायसीना हिल्स पहुँच चुके हैं तो सवाल उठता है कि यहाँ उनके लिए संकटमोचक कौन बनेगा? यहाँ लिया गया कोई भी फैसला देशहित को प्रभावित कर सकता है| ऐसे में प्रणब दा की भूमिका बृहत्तर और निष्पक्ष हो जाती है| खैर ताजा मामला यह है कि अभी तो प्रणब दा ने पद एवं गोपनीयता की शपथ भी नहीं ली और बाल ठाकरे ने उनसे समर्थन की कीमत भी मांग ली| और कीमत भी क्या मांगी है, हर देशवासी के लिए नफरत का पर्याय बन चुके संसद हमले के दोषी अफजल की फांसी माफ़ी की याचिका के तुरंत निपटारन का संकेत दिया है| मीडिया में भी अफजल की याचिका चर्चा का विषय बन गई है जिसके बारे में पूछने पर प्रणब दा का कहना है कि वे कुछ नहीं कहेंगे| तो क्या कहा जाए, प्रणब भी प्रतिभा ताई के पदचिन्हों पर चलना चाहते हैं ताकि कांग्रेस अध्यक्षा के प्रति धन्यवाद ज्ञापित कर सकें?

आखिरी दांव

मोदी इन दिनों जापान की यात्रा पर हैं| जापान ने मोदी के इस्तेकबाल में कोई कसर नहीं उठा रखी है| केंद्र सरकार के कैबिनेट रैंक के मंत्री को दिया जाने वाला प्रोटोकॉल मोदी को दिया जा रहा है| मोदी के आर्थिक विकास के मॉडल से जापानी अति-उत्साहित व प्रभावित हैं| २००२ के बाद से अमेरिका जहां मोदी को वीसा देने से इंकार करता रहा है वहीं जापान द्वारा दिया गया सम्मान मोदी की अंतर्राष्ट्रीय लोकप्रियता को इंगित करता है| मोदी के विरोधी; देख रहे हो, मोदी का कद कितना बढ़ गया है|

सिद्धार्थ शंकर गौतम

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