लेखक परिचय

बालमुकुन्द द्विवेदी

बालमुकुन्द द्विवेदी

माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल से पत्रकारिता में स्नातकोत्तर [मास्टर ऑफ़ जर्नलिज्‍म] की उपाधि प्राप्‍त करने वाले बालमुकुन्‍द जी २००६ से पत्रकारिता क्षेत्र में सक्रिय हैं. शुरूआत आपने नवभारत समाचार पत्र सतना म.प्र. से की इसके बाद दो अन्य संस्थानों मेंकम किया। वर्तमान में आप हिदुस्थान समाचार बहुभाषी समाचार समिति की भोपाल शाखा मे बतौर संवाददाता कार्यरत हैं।

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वर्तमान में समाचारों और विचारों को जानने के कई जरिए तैयार हो चुके हैं। इनमें से एक है वेब माध्यम जो वर्तमान में बड़ी तेजी से प्रचलित हो रहा है। जिन्हें खबरों और विचारों को जानने की जल्दी होती है, उनकी पहली पंसद अब इंटरनेट बन रहा है। इसकी मुख्य वजह यह है कि न्यूज चैनलों में समाचारों की अपेक्षा मनोरंजन तथा द्वयम दर्जे के न्यूज प्रोग्राम अधिक परोसे जा रहे हैं। जबकि समाचार पत्रों में समाचार ढूढने में वक्त लग जाता है। इसके अलावा जो एक बार छप जाता है वही यथावत रहता है, उसकें अपडेट के लिए अगले अंक का इंजतार करना पड़ता है। इन सब के बीच इंटरनेट एक ऐसा माध्यम है, जो समाचारों को हमारे सामने हाजिर करने के साथ ही हर खरब की अपडेट भी देता रहता है।

इंटरनेट समाचारों के अन्य माध्यम जैसे प्रिंट, ब्राडकॉस्ट और इलेक्ट्रानिक माध्यमों के बाद आया है। लेकिन यह जल्द ही लोगों की पसंद बन गया, जिसके चलते इसके दायरे में लगातार इजाफा हो रहा है। हालांकि शुरूआती तौर पर माना जा रहा था कि इंटरनेट की पत्रकारिता ज्याद समय तक नहीं टिक पाएगी। क्योंकि प्रारंभ में वेब पत्रकारिता के मार्ग में कई उतार चढ़ाव आए जिससे इसकी स्थिति डांवाडोल होती दिखी। लेकिन पिछले दस साल से भारत में इसका जाल लगातार बढ़ता ही जा रहा है। यह बात भी मननी होगी कि तकनीक आधारित किसी नई चीज के भविष्य का निर्धारण करने के लिए दस साल पर्याप्त समय नहीं होता है। रेडियो, टेलीवीजन में न्यूज चैलनों और समाचार पत्रों से हम कई वर्षों से परिचित हैं, इसलिए हमें इनमें स्थायित्व नजर आता है, जबकि वेब पत्रारिता अभी अपनी बाल्यावस्था से निकल किशोरावस्था में है और इसके जवान होन में अभी समय लगेगा क्यों कि इस क्षेत्र में अभी बहुत कुछ होना शेष है। ध्यान देने योग्य बात यह है कि इंटरनेट पर खबर पढ़ने और देखने वाले, अखबार और टीवी पर समाचार पढ़ने और देखने वालों की तुलना में ज्यादा समृध्दा, शिक्षित और तजुरवेदार होते हैं, खास बात यह भी है कि इंटरनेट का उपयोग करने वलों में युवा गर्व की संख्या ज्यादा है। वैश्विक परिवेश में देखा जाए तो इंटरनेट उपभोक्ताओं की तादात में लगातार इजाफा हो रहा है। इंटरनेट पर खबरों तथा अन्य जानकारियों को जानने वालों की संख्या के चलते इसके ट्रैफिक में वृद्धि हो रही है। इंटरनेट की एक सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें सूचनाओं तथा समाचारों को हम पढ़, देख और सुन सकते हैं, जिसके कारण हमें अखबार, रेडियो और टेलीवीजन की कमी का अहसास नहीं होता। इन सबके अलावा इंटरनेट पर हम अपनी प्रतिक्रया भी तुरंत ही दे सकते हैं।

बेव पत्रकारिता की शुरूआत को अभी अधिक वक्त नहीं हुआ सन् 1995 में सबसे पहले हिंदू अखबार ने अपना इंटरनेट संस्करण जारी किय था। इसके बाद कुछ सालों में कई समाचार पत्रों की खबरें इंटरनेट पर उपलब्ध हो गईं। वर्तमान की बात करें तो लगभग सभी प्रमुख समाचार पत्रों, समाचार पत्रिकाओं और टेलीविजन चैनलों के नेट संस्करण मौजूद हैं। वर्तमान दौर में यदि हम कहें कि बेव पत्रकारिता अपने बाल्यावस्था से निकल कर तरुणाई की ओर अग्रसर हो रहा है तो अतिश्योक्ति नहीं होगी।

ज्यादातर अखबारों ने भले ही अपने नेट संस्करण चालू कर दिए हैं, लेकिन इनमें वही सामग्री होती है जो समाचार पत्रों पर रहती है। ये साइटें दिन में एक बार ही अपडेट होतीं है, वो भी इनमें समाचारों की बजाए विशेष स्टोरी या फिर एजेंसियों की खबरें रहती हैं। औसतन देखें तो तकरीबन 60 फीसदी सामग्री वेब संस्करण में प्रिंट से ली जाती है। यह पध्दति बेव पत्राकारिता की प्रगति के लिहाज से घातक है, क्यों कि जो इंसान नेट पर नई खबरों की तलाश में बैठा है उसे यदि बसी खबर मिलेगी तो उसका रुझान इसके प्रति घटेगा। हालांकि इसके पीछे की एक बजह यह भी है, कि उन्हें डर सताता है कि उनका प्रतिस्पर्धी समाचार पत्र कहीं उनकी स्टोरी का उपयोग न कर ले। ऐसे बहुत कम समाचार पत्रों के नेट संस्करण हैं जो अपनी खबरों को चौबीस घंटे अद्यतन करते हैं।

वहीं कुछ समाचार पत्र एसे भी हैं, जो अपनी कार्य पध्दति में परवर्तन करते हुए वेबसाइट एवं प्रिंट संस्करण के लिए अलग-अलग तरीके से समाचार, फीचर और सूचनाएं तैयार कर रहे हैं। इसकी शुरुआत जहां अंग्रेजी अखबारों में टाइम्स ऑफ इंडिया से हुई है, वहीं हिन्दी में यह पहल वेब दुनिया और प्रभासाक्षी ने की। आमतौर पर जब अखबारों के बेव संस्करण में प्रिंट माध्या से सामग्री ले लेते हैं तो इसके लिए अलग से संपादकी विभाग की जरूरत ही नहीं रह जाती है। लेकिन कुछ अखबारों ने अपने आनलाइन संस्करण के लिए अगल से संपादकीय विभाग रखा है, इनका प्रिंट संस्करण से कोई सरोकार नहीं रहता है। इसके लिए टाइम्स ऑफ इंडिया, वेब दुनिया, प्रभासाक्षी और बीबीसी हिंदी की वेबसाइट बेहतर उदाहरण हैं। हालांकि समाचार पत्रों में इंटरनेट संस्करण के लिए पर्याप्त टीम नहीं रखी जाती है, जो इस नई पत्रकारिता के लिए उचित नहीं है। लेकिन जो संस्थान पूरी तरह वेब पत्रकारिता में ही हैं, उन्होंने कई जगह अपने संवाददाता रखे हैं और बेहतर लेखकों की सेवाएं भी ले रहे हैं। जिस तरह वेब पत्रकारिता का विस्तार हो रहा है उससे रोजगार के नए अवसर भी बन रहे हैं।

वेब पत्रकारिता ने समाचार और सूचना संसार में बड़ा परिवर्तन किया है। नई तकनीक के आने से वेब पत्रकारिता ने तुरंत की संस्कृति को जन्म दिया है। तकनीक में हो रहे परिवर्तन ने वेब पत्रकारिता को जोरदार गति दी है। एक वेब पत्रकार जब चाहे वेबसाइट को अपडेट कर सकता है। यहां एक व्यक्ति भी सारा काम कर सकता है। प्रिंट में अखबार चौबीस घंटे में एक बार प्रकाशित होगा और टीवी में न्यूज का एक रोल चलता रहता है जो अधिकतर रिकॉर्ड होता है, जबकि वेब के माध्यम से हर सैंकेड की नई और ताजा खबर दी जा सकती है। दूसरे किसी भी माध्यम में यह संभव नहीं है।

वेबसाइट में स्थानीयता तथा लौकिकता का प्रतिरोधक कम होते हैं। यहां पर ताजी व पुरानी सूचनाएं एक साथ ढूंढी जा सकती है। सूचनाओं को एकत्र करना उन्हें तैयार करना और प्रसार करना नेट पर ज्यादा आसान है। यह माध्यम अन्य माध्यमों से सस्ता भी है। इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया के आंकडे बताते हैं, कि वर्ष 2006 में 390 लाख इंटरनेट उपभोक्ता थे जिनकी संख्या वर्ष 2009 में बढ़कर 710 लाख हो गई है। यदि हम खोजी पत्रकारिता की भी बात करें तो वेब पत्रकारिता का भी इसमें अच्छा योगदान है। इसके बेहतर उदारहण तहलका डॉट कॉम और कोबरा डॉट कॉम है। केंद्र राज्य सरकारों के सभी विभागों ने भी सूचनाएं देने के लिए वेबसाइटों का सहारा लिया है, हालांकि अनेक सरकारी वेबसाइटों में सूचनाएं समय पर अपडेट नहीं होती और इनका रखरखाव भी ठीक ढंग से नहीं किया जाता है।

वेब पत्रकारिता का एक रुप सिटीजन पत्रकारिता भी है। वेब पत्रकारिता आम आदमी को सूचनाएं, समाचार और अपने विचार दुनियां के सामने रखने का अवसर देती है। कोई भी व्यक्ति अपनी वेबसाइट और अब तो ब्लॉग बनाकर अपने पास आने वाली सूचनाओं, समाचारों और विचारों को सभी के सामने रख सकता है, यही सिटीजन पत्रकारिता है। वेब पर अब सिटीजन पत्रकारिता का महत्व बढ़ता जा रहा है। आम आदमी की समाचार और विश्लेषण में भागीदारी ही असल में सिटीजन पत्रकारिता है। अमरीका में 1988 में हुए राष्ट्रपति चुनाव के समय यह पत्रकारिता वजूद में आई। लेकिन इसे लोकप्रियता दक्षिण कोरिया से मिली जहां ओहमाई न्यूज सबसे ज्यादा पढ़ा और देखा जाने वाला ब्लॉग बना। यहां से यह अवधारणा सामने आई कि हर एक नागरिक रिपोर्टर है। इसी तरह थिमपार्कइनसाइडर डॉट कॉम ने अपने पाठकों द्वारा लिखे गए लेख पर पत्रकारिता अवार्ड जीता। भारत में अभी इस तरह की पत्रकारिता छोटे स्तर में है। प्रिंट में संपादक के नाम पाठकों के जो पत्र आते हैं उन्हें भी सिटीजन पत्रकारिता की श्रेणी में रखा जा सकता है। लेकिन अब कई लोगों ने अपने-अपने ब्लॉग बनाकर अपने इलाकों और पसंदीदा विषयों पर जानकारी का आदान प्रदान करने लगे है। देश में तेजी से बढ़ रहा कंप्यूटरीकरण और ब्राड बैंड सेवा वेब पत्रकारिता के विस्तार को बढ़ा रहा है।

क्षेत्रीय और स्थानीय भाषा में बन रहे वेब पोर्टलों और वेबसाइटों के कारण वेब पत्रकारिता से अंग्रेजी का प्रभुत्व धीरे-धीरे खत्म हो रहा है। वेब पत्रकारिता करने वालों का दायरा बहुत बड़ा है, उनकी खबर पलक झपकते ही सारी दुनिया में पहुँच जाती है, जो कि अन्य समाचार माध्यमों में संभव नहीं है। वेब पत्रारिता के सशक्त होने के बावजूद चिंतनीय बात यह है कि अभी भी इंटरनेट की पहुँच बहुत कम है साथ ही कंप्यूटर के दाम भी अभी आम आदमी की पहुँच से दूर हैं। मीडिया का लोकतंत्रीकरण करने में वेब पत्रकारिता भले ही बड़ी भूमिका निभा रहा है, लेकिन अभी भारत में हिंदी वेब पत्रकारिता के क्षेत्र में काफी कुछ किए जाने की जरूरत है।

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