लेखक परिचय

विपिन किशोर सिन्हा

विपिन किशोर सिन्हा

जन्मस्थान - ग्राम-बाल बंगरा, पो.-महाराज गंज, जिला-सिवान,बिहार. वर्तमान पता - लेन नं. ८सी, प्लाट नं. ७८, महामनापुरी, वाराणसी. शिक्षा - बी.टेक इन मेकेनिकल इंजीनियरिंग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय. व्यवसाय - अधिशासी अभियन्ता, उ.प्र.पावर कारपोरेशन लि., वाराणसी. साहित्यिक कृतियां - कहो कौन्तेय, शेष कथित रामकथा, स्मृति, क्या खोया क्या पाया (सभी उपन्यास), फ़ैसला (कहानी संग्रह), राम ने सीता परित्याग कभी किया ही नहीं (शोध पत्र), संदर्भ, अमराई एवं अभिव्यक्ति (कविता संग्रह)

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      महाभारत का युद्ध कौरवों और पांडवों के बीच नहीं था। यह धृतराष्ट्र और पाण्डवों के बीच था। युद्ध के पहले भी धृतराष्ट्र ही हस्तिनापुर के राजा थे और युद्ध में अगर कौरवों की जीत हो जाती, तो वे ही राजा बने रहते। वनवास से लौटने के बाद इन्द्रप्रस्थ का राज्य युधिष्ठिर को वापस देने का वचन उन्होंने ही दिया था और उनके ही वचन-भंग का परिणाम महाभारत था। महाभारत के पूर्व भी उन्होंने कई कुटिल योजनायें बनाईं। पाण्डवों को लाक्षागृह में भेजकर जीवित जला देने की योजना उनके ही अनुमोदन के बाद बनी। भरी सभा में द्रौपदी का चीरहरण उनके ही सामने हुआ। वे आंखों से अंधे थे लेकिन अंधा होने का अर्थ यह कदापि नहीं था कि उनकी इच्छायें भी समाप्त हो गई थीं। वे दुर्योधन के माध्यम से सबकुछ देखना चाहते थे और अपनी सारी दबी हुई इच्छाओं की पूर्ति करना चाहते थे। वे इतने स्वार्थी थे कि अपने पुत्र को भी नहीं बक्शा। बड़ी चालाकी और सफ़ाई से उन्होंने अपने दुष्कृत्यों के लिये दुर्योधन को जिम्मेदार ठहराया। श्री मद्भागवद्गीता के अन्त में संजय ने युद्ध के परिणाम की भविष्यवाणी करते हुए यह स्पष्ट कर दिया था कि जहां योगेश्वर श्रीकृष्ण और गाण्डीवधारी अर्जुन हैं, विजय वही होगी। अन्धे धृतराष्ट्र की आंखें फिर भी नहीं खुलीं। वे मृगतृष्णा के पीछे भागते रहे और युद्ध कराकर ही दम लिया। युद्ध के उपरान्त युधिष्ठिर सम्राट बने और वृद्ध धृतराष्ट्र को आजीवन जंगल में निवास करना पड़ा।

      सत्ता की मृगतृष्णा के पीछे बीजेपी के लौह पुरुष लाल कृष्ण आडवानी भी धृतराष्ट्र बन गये हैं। बन्द आंखों से वे उन्हें सिर्फ़ प्रधानमंत्री की कुर्सी दिखाई पड़ती है। ईश्वर ने उन्हें लंबी उम्र दी है लेकिन यह उम्र आश्रम-व्यवस्था के अनुसार संन्यास ग्रहण करने की है। नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता से सोनिया जलें, राहुल जलें या केजरीवाल जलें, इसमें अस्वाभाविक कुछ भी नहीं। लेकिन आडवानी का जलना अनेक प्रश्नचिह्न खड़े करता है। मोदी का बीजेपी के चुनाव-अभियान का राष्ट्रीय संयोजक चुने जाने के तत्काल बाद आडवानी का कोप-भवन में जाना उनकी छोटी सोच का परिचायक था। नरेन्द्र मोदी को बीजेपी ने जब प्रधानमंत्री पद के लिये अपना उम्मीदवार घोषित किया, तो वे पुनः कोप-भवन में गये। अनुशासनहीनता की सारी सीमायें तोड़ते हुए उन्होंने पार्टी अध्यक्ष को विरोध-पत्र लिखा और उसे भी राजनाथ सिंह को देने के पहले मीडिया को दे दिया। उनकी जगह किसी और ने यह कृत्य किया होता, तो पार्टी उसे कबका बाहर का रास्ता दिखा चुकी होती। लेकिन आगामी आम चुनाव में पार्टी की संभावनायें धूमिल न हों, इसलिये पाटी ने सख्ती नहीं बरती। लेकिन अब तो पानी सिर के उपर बह रहा है। आडवानी और उनकी चाण्डाल-चौकड़ी की हर संभव कोशिश हो रही है कि बीजेपी १६० क्लब में उलझी रहे। ऐसी स्थिति में नीतिश, ममता और नवीन पटनायक के समर्थन से प्रधानमंत्री की कुर्सी पा जाने का दिवास्वप्न आडवानी आज भी देख रहे हैं। लोकसभा के लिये गांधीनगर के बदले भोपाल की सीट का चुनाव करना इसी रणनीति का हिस्सा था। वे मतदाताओं और अपने समर्थकों को स्पष्ट संदेश देना चाहते थे कि मोदी उन्हें पसन्द नहीं हैं और मोदी पर उन्हें विश्वास भी नहीं है। मोदी उन्हें गांधीनगर से हरवा भी सकते हैं। बीजेपी के १६० क्लब के लिये यह उनका आखिरी प्रयास था। दिन-रात चुनाव प्रचार में व्यस्त नरेन्द्र मोदी के अभियान में बाधा डालना ही इसका उद्देश्य था। काफी मान-मनौवल के बाद पार्टी ने इस समस्या को सुलझा लिया, लेकिन मतदाताओं में यह संदेश भेजने में आडवानी सफल रहे कि पार्टी में सबकुछ ठीकठाक नहीं है। धृतराष्ट्र की दृष्टि रखने वाले आडवानी चुनाव के बाद भी किस महाभारत की योजना बनायेंगे, यह भविष्य के गर्भ में है। परन्तु इतना तो सत्य है ही कि उनके इन कृत्यों के कारण उनके समस्त पुण्य क्षीण हो चुके हैं। धृतराष्ट्र जन्मान्ध थे, आडवानी स्वार्थान्ध हैं। महाभारत के बाद धृतराष्ट्र को घनघोर जंगल में गुमनामी के दिन काटने पड़े। मृगतृष्णा के पीछे भाग रहे इक्कीसवीं सदी के धृतराष्ट्र के साथ भी ऐसा ही कुछ हो, तो आश्चर्य नहीं होना चाहिये।

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9 Comments on "आडवानी की मृगतृष्णा"

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सत्यार्थी
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सत्यार्थी
लगता है झाजी इतिहास के कुछ क्षणों को स्थाई बनाने के पक्ष में हैं। स्वयं त्रिकालदर्शी भगवान् श्रीकृष्ण ने कालचक्र को रोकने का कभी प्रयास नहीं किया और समय आने पर स्वयं एक व्याध द्वारा छोड़े गए बाण से विद्ध हो कर मानव शरीर त्याग दिया। अद्वितीय धनुर्धर अर्जुन जिन्होंने महाभारत युद्ध में पांडवों की विजय सुनिश्चित करने में प्रमुख भूमिका निभाई ,अंत में भीलों से गोपिओं की रक्षा नहीं कर सके । आडवाणीजी ने जो भी कुछ २५ साल पहले किया था वह उन्हें आज पार्टी के शीर्ष पद पर बने रहने का कोई अधिकार नहीं दे सकता। पार्टी… Read more »
आर. सिंह
Guest
विपिन किशोर सिन्हा जी ने बहुत कुछ कहने का प्रयत्न किया है,पर इस महाभारत के धृतराष्ट्र(अडवाणी) आँखों के अंधे नहीं है, दुर्योधन(नमो) को बढ़ावादेने में वे कम दोषी नहीं हैं।यह भी सत्‍य है कि वे उम्मीद कर रहे थे कि दुर्योधन उन्हे एक बार और अवसर प्रदान करेगा।यही नहीं,बल्कि वे तो शायद सोच रहे थे कि वह इसमे उनकी मदद करेगा,पर इसबार भी धृतराष्ट्र दुर्योधन की महत्वकांक्षा को नहीं समझ सका और दुर्योधन,दुःशासन(अमित शाह )की मदद से द्रौपदी(राष्ट्र) का चीर हरण करने में शायद सफल हो जायेगा। पर इस बार भी हो सकता है कि कोई कृष्ण द्रौपदी को बचा… Read more »
शिवेंद्र मोहन सिंह
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शिवेंद्र मोहन सिंह

सिन्हा जी ये लिंक देखिये

http://gauravharidwar.blogspot.in/2013/05/cd.html

और इस लेख के अंत में एक और लिंक है उसे भी देखिएगा।

आर. सिंह
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Today I am afraid. It’s not that I am coward. I don’t fear even death, but I am afraid today. Once earlier also I had heard Indira is India and India is Indira, but that time I was not afraid. At that time I just considered it height of sycophancy and laughed at it. But that proved to be disastrous for India.Today when I think of that and remember what happened afterwards, I simply shudder Today when I hear Har Har Modi,instead of HAr HarMahadev, I wonder ,whether same era is coming back. When some leaders become bigger than not… Read more »
सत्यार्थी
Guest
सत्यार्थी
लगता है झाजी इतिहास के कुछ क्षणों को स्थाई बनाने के पक्ष में हैं। स्वयं त्रिकालदर्शी भगवान् श्रीकृष्ण ने कालचक्र को रोकने का कभी प्रयास नहीं किया और स्वयं एक व्याध द्वारा छोड़े गए बाण से विद्ध हो कर मानव शरीर त्याग दिया। अद्वितीय धनुर्धर अर्जुन जिन्होंने महाभारत युद्ध में पांडवों की विजय सुनिश्चित करने में प्रमुख भूमिका निभाई ,अंत में भीलों से गोपिओं की रक्षा नहीं कर सके । आडवाणीजी ने जो भी कुछ २५ साल पहले किया था वह उन्हें आज पार्टी के शीर्ष पद पर बने रहने का कोई अधिकार नहीं दे सकता। पार्टी की बागडोर उस… Read more »
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