लेखक परिचय

वासुदेव त्रिपाठी

वासुदेव त्रिपाठी

पत्रकारिता में स्‍नातकोत्तर की पढ़ाई कर रहे वासुदेवजी विभिन्‍न मुद्दों पर राष्‍ट्रीय दृष्टिकोण से विमर्श करने के लिए जाने जाते हैं।

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वासुदेव त्रिपाठी 

imagesकल्पना करिए कि 2 मई 2011 को जब अमेरिका ने एक दशक के प्रयासों व संघर्ष के बाद अमेरिकी सम्मान के प्रतीक ‘वर्ल्ड ट्रेड टावर’ पर हमले के सूत्रधार ओसामा बिन लादेन को पाकिस्तान के ऐबटाबाद में घुसकर मार गिराया था और जिस तरह से उसकी लाश को समुद्र में बहा दिया था, उस पर यदि अमेरिका में किसी समुदाय अथवा विचाधारा के तथाकथित ठेकेदार मानवाधिकार अथवा किसी अन्य अधिकार के नाम पर बयानबाजी, विरोधप्रदर्शन या दुआ-प्रार्थना करते तो अमेरिका की ऐसे लोगों के प्रति प्रतिक्रिया क्या होती?

अमेरिका विश्व का सबसे पुराना लोकतन्त्र कहा जाता है और आधुनिक लोकतन्त्र का जन्मदाता भी! किन्तु कहने की आवश्यकता नहीं कि लोकतन्त्र के नाम पर अमेरिका ओसामा के लिए दुआ पढ़ने व रैली निकालने की अनुमति नहीं देता, न ही विश्व का अन्य कोई लोकतन्त्र! किन्तु भारत में जब सात साल की मशक्कत के बाद भारतीय लोकतन्त्र के प्रतीक संसद पर हमले के सूत्रधार आतंकी अफजल गुरु को फांसी होती है तो लोकतन्त्र के नाम पर ही उसकी वकालत करने वाले खुले आम उतर पड़ते हैं.! कितना विचित्र होता है जब जेहादी आतंकवाद में पला-बढ़ा और उसकी विषबेल को सींचने वाला अलगाववादी यासीन मलिक पाकिस्तान जैसे देश में, जहां सेना व आईएसएआई के पंजों में छटपटाता लोकतन्त्र रोज पचासों शियाओं अथवा अल्पसंख्यकों के बहते खून का गवाह बनता है, हाफिज़ सईद जैसे अंतर्राष्ट्रीय आतंकवादी से सीना जोड़कर कहता है कि अफजल की फांसी भारत के लोकतन्त्र पर एक धब्बा है.! उसी यासीन मलिक की पूंछ थामकर कश्मीर में उपद्रवियों की बेकाबू भीड़ भड़क उठती है और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में बेधड़क अफजल के लिए नमाज़ अदा की जाती है.! देश में एक आतंकी के लिए यह इश्क अलगाववादी अथवा जेहादी मानसिकता तक ही सीमित नहीं है, दिल्ली के जंतर-मंतर पर जेएनयू डीयू आदि के कई वामपंथी संगठन भी इस फांसी के विरोध भारतीय न्याय-व्यवस्था व तंत्र को शर्म करने का नारा बुलंद करते हैं तथा “हम भी अफजल हैं” की तख्तियाँ लहराते हैं.!

अमेरिका में आतंकियों के सक्रिय अथवा वैचारिक समर्थकों को ढूंढ निकालने के लिए अमेरिकी एजेंसियां संदेहास्पद व्यक्तिओं के व्यक्तिगत जीवन तक घुस जाती हैं जैसा की एक अमेरीकन पुलिस कमिश्नर रेमंड केली ने स्वयं स्वीकारा था किन्तु भारत में यह सब सरकार की नाक के नीचे होता है! क्या यह स्पष्ट नहीं करता कि भारत विरोधी मानसिकता की विषवेल काफी गहरे तक फैल चुकी है और हमने ही इसे फैलने का खुला अवसर दिया है?

लोकतन्त्र की संकल्पना का प्राथमिक व चरम उद्देश्य है- राष्ट्र के समस्त नागरिकों की भागीदारी के साथ अंतर व बाह्य परिसंकटों से उनकी सुरक्षा निर्धारित करते हुए सम्पूर्ण संप्रभुतात्मक राष्ट्र का विकास। ऐसे में यदि किसी प्रकार की अव्यवस्था से बचने के लिए अफजल गुरु की दया याचिका अस्वीकृत होने की पूर्वघोषणा न करते हुए गोपनीयता पूर्वक फांसी दे दी जाती है तो इसमें लोकतन्त्र अथवा मानवाधिकार का शोर क्यों मचाया जाना चाहिए? जिनके अनुसार अफजल को ट्रायल कोर्ट, हाइकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट, सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका, राष्ट्रपति के पास दयायाचिका के बाद भी एक और अवसर मिलना चाहिए था, उन्हें लगता है कि आतंक के गुरु को किसी भी हाल में जिंदा रहना चाहिए था! जहां तक कानूनी अधिकार का विषय है तो कानून अपराध की गंभीरता के अनुसार काम करता है, अपराध की गंभीरता व प्रकार के अनुरूप परिवर्तनशील कानून ही परिपक्व हो सकता है। विशेष मामलों के लिए विशेष अदालत अथवा शीघ्र निस्तारण अदालतें बनाए जाने की आवश्यकता भी इसीलिए होती है। अतः अफजल जैसे आतंकवादी को सम्पूर्ण न्याय व्यवस्था से गुजरने के बाद भी और अधिक अवसर मिलना चाहिए था, इस बात का कोई प्रयोगिक अर्थ नहीं है। वास्तव में मानवाधिकार के नाम पर ऐसी मांग करने वाले भी भलीभाँति जानते हैं कि जिस जघन्य अपराध में अफजल गुरू दोषी सिद्ध हुआ था उसके लिए भारतीय न्याय व्यवस्था में फांसी की सजा को टाला ही नहीं जा सकता था, वे अपनी वैचारिक अथवा भावनात्मक आकांक्षा के चलते मात्र मामले को टालना चाहते थे। यदि इन अफजल समर्थकों अथवा वामपंथियों का आग्रह न्याय को लेकर ही है तो इन्होंने सात साल से गृहमंत्रालय के पास लटकी दया याचिका के शीघ्र निस्तारण की आवाज बुलंद क्यों नहीं की? शायद यह ये भलीभाँति जानते थे कि, जब भी होगा, क्या निर्णय होगा!

शहीद सैनिकों अथवा उनके परिजनों के मानवाधिकार पर आँखें मूंदने वाले तथाकथित मानवाधिकारवादी मानवाधिकार के जिस विकृत स्वरूप का दुराग्रह करते हैं वह केवल आतंकवादियों एवं नक्सलियों की वकालत में ही मुखर होता है, कश्मीरी पण्डितों से लेकर दंतेवाड़ा के शहीदों तक यह मानवाधिकार लकवाग्रस्त व चेष्टाहीन बना रहता है। यदि इन मानवाधिकारियों के तर्क को आधार माना जाए तो संसद पर हमले के समय मारे गए पाँच आतंकवादियों तथा 26/11 के आतंकी अजमल कसाब के मानवाधिकार का भी हनन किया गया! तय मानिए यदि कसाब हाथ में बंदूक लिए सरेआम न पकड़ा गया होता तो इस देश में उसके लिए भी हमदर्दों की एक बड़ी फौज खड़ी हो गयी होती! हाँलाकि केरल में फिर भी कुछ लोग उसके लिए दुआ पढ़ने के लिए निकल ही आए! किन्तु छत्तीसगढ़, झारखंड अथवा कश्मीर में मरने वाले सैनिकों पर ठीक से अखबारों में खबर भी नहीं बन पाती! यदि आंकड़ों के आधार पर बात करें तो साउथ एशिया टेररिज़्म पोर्टल संस्था के अनुसार 1988 से जनवरी 2013 तक कश्मीर में, अफजल भी जहां की पैदावार था, 14656 नागरिक व 6033 सैनिक आतंकवाद के शिकार होकर अपनी जान गंवा चुके हैं। वहीं वामपंथ आतंकवाद के लाल शिकंजे में 2005 से अब तक 2459 नागरिकों व 1543 सुरक्षाबलों की जान जा चुकी है। दुर्भाग्य व आश्चर्य यह है कि कभी इनके मानवाधिकार की बात करने वाले सामने नहीं आते!

समस्या की जड़ जितनी अधिक अतिवादी विचारधारा में निहित है उतनी ही लचर व अवसरवादी राजनीति में! तुष्टीकरण और विभाजन की राजनीति की इससे अधिक चरमसीमा और क्या होगी कि जिस आतंकी अफजल के निशाने पर संसद में बैठे नेता थे, वही नेता अफजल की फांसी को सात साल तक टाँगे रहे, और जब देश के दबाब में फांसी का फैसला लेना ही पड़ा तो भी अफजल के लिए आँसू बहाने से नहीं चूके! कश्मीर में उमर अब्दुल्ला व महबूबा मुफ़्ती अलगाववादियों के साथ अफजल पर शोक मानते व भारत सरकार की आलोचना करते नजर आए, सीपीएम व सीपीआई ने फैसले की निंदा की और कॉंग्रेस के मणिशंकर अइयर ने फांसी को दुखद बताया! ऐसे में क्या यह स्पष्ट नहीं होता कि लोकतन्त्र के नायक ही लोकतन्त्र के सबसे बड़े दुश्मन के रूप में कार्य कर रहे हैं? क्या यह नहीं माना जाना चाहिए कि इन राजनैतिक दलों अथवा नेताओं की न ही भारत की अखंडता में कोई आस्था है और न ही लोकतान्त्रिक न्याय व्यवस्था में कोई विश्वास?

जिस अफजल गुरु के लिए अलगाववादी अपनी छाती कूटते हैं, पाकिस्तान जिसका समर्थन करता है, मोस्ट वांटेड आतंकी हाफिज़ सईद जिसके लिए इस्लामाबाद में सभा करता है और लश्कर-ए-तैयबा व जैश-ए-मोहम्मद जिसकी मौत का भारत से बदला लेने के लिए इस्लामाबाद में इकट्ठा होकर कसम खाते हैं, उसी अफजल गुरु के रहनुमा यदि भारत की राजनैतिक पार्टियों से लेकर विश्वविद्यालयों तक में बैठे हैं तो निश्चित रूप से हमें मानना पड़ेगा कि आतंकवाद के जहरीले जाल की जकड़न से अभी हम मुक्त होने की स्थिति में नहीं हैं! पाकिस्तान में इकट्ठा हुए कश्मीरी अलगाववादियों व पाकिस्तानी आतंकियों का यह कहना कि अफजल की फांसी भारत के काम नहीं आएगी, संभवतः सही ही है क्योंकि भारत में आतंक के पैरोकारों के स्वर बुलंद हैं किन्तु सरकार हाफिज़ सईद से मुंहजोड़ इश्क़ करके आने वाले यासीन मालिक के लिए लड़खड़ाती जुबान में बस इतना कहने की हिम्मत जुटा पाती है कि हम मामले में गौर करेंगे.!!

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2 Comments on "आतंक के पैरोकार"

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shaily tripathi
Guest

your article readable.

वासुदेव त्रिपाठी
Guest

Thanks Shaily…!!

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