लेखक परिचय

अंकुर विजयवर्गीय

अंकुर विजयवर्गीय

टाइम्स ऑफ इंडिया से रिपोर्टर के तौर पर पत्रकारिता की विधिवत शुरुआत। वहां से दूरदर्शन पहुंचे ओर उसके बाद जी न्यूज और जी नेटवर्क के क्षेत्रीय चैनल जी 24 घंटे छत्तीसगढ़ के भोपाल संवाददाता के तौर पर कार्य। इसी बीच होशंगाबाद के पास बांद्राभान में नर्मदा बचाओ आंदोलन में मेधा पाटकर के साथ कुछ समय तक काम किया। दिल्ली और अखबार का प्रेम एक बार फिर से दिल्ली ले आया। फिर पांच साल हिन्दुस्तान टाइम्स के लिए काम किया। अपने जुदा अंदाज की रिपोर्टिंग के चलते भोपाल और दिल्ली के राजनीतिक हलकों में खास पहचान। लिखने का शौक पत्रकारिता में ले आया और अब पत्रकारिता में इस लिखने के शौक को जिंदा रखे हुए है। साहित्य से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं, लेकिन फिर भी साहित्य और खास तौर पर हिन्दी सहित्य को युवाओं के बीच लोकप्रिय बनाने की उत्कट इच्छा। पत्रकार एवं संस्कृतिकर्मी संजय द्विवेदी पर एकाग्र पुस्तक “कुछ तो लोग कहेंगे” का संपादन। विभिन्न सामाजिक संगठनों से संबंद्वता। संप्रति – सहायक संपादक (डिजिटल), दिल्ली प्रेस समूह, ई-3, रानी झांसी मार्ग, झंडेवालान एस्टेट, नई दिल्ली-110055

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-अंकुर विजयवर्गीय-
Afghans Talibans in poppy field(Source of opium)

अफगानिस्तान में सुरक्षा संबंधी हालात जैसे-जैसे बेहतर होते जाएंगे, वैसे-वैसे तालीम और हुनर के मामले में यह मुल्क दुनिया के बेहतरीन देशों में शुमार होता जाएगा। फिलहाल अफगानिस्तान में कितने लोग अनपढ़ हैं, इसका प्रामाणिक आंकड़ा नहीं है, लेकिन एक अनुमान है कि करीब 70 फीसदी आबादी अनपढ़ है। ऐसा इसलिए कि यह मुल्क दशकों से जारी अंदरूनी जंग से बुरी तरह पस्त रहा है। खास तौर पर इकोनॉमी, समाज, सियासत व तालीम के हलकों में इसका बेहद खराब असर पड़ा। तालीम के मामले में गौर करें, तो तालिबान का दौर अंधेरों से भरा हुआ था। उस वक्त मुल्क के स्कूल-कॉलेजों की पढ़ाई पर पाबंदी लगी हुई थी। लड़कों को मदरसे जाने की इजाजत तो थी, मगर लड़कियों को इनसे भी दूर रखा जाता था। इसमें कोई दोराय नहीं कि तालिबान हुकूमत के खत्म होने के बाद लाखों लड़कियां स्कूल जा पाईं। अब ऐसी उम्मीद जताई जा रही है कि अफगानिस्तान की नई पीढ़ी काफी होनहार है और अपने मुल्क का मुस्तकबिल वह खुद लिखेगी।

इधर, अमेरिका ने स्पष्ट कर दिया है कि उसके नेतृत्व वाली विदेशी सेना इस साल के बाद भी अफगानिस्तान में मौजूद रहेगी और वह इराक की तरह काबुल पर अपनी मजबूत पकड़ बनाई रखेगी। अमेरिका के इस रुख से तालिबान परेशान है और झुंझलाहट में इस आतंकवादी संगठन ने अफगानिस्तान में हमले तेज कर दिए हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा और अफगानिस्तान के राष्ट्रपति हामिद करजई के बीच 2014 के बाद अमेरिकी नेतृत्व वाली उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) सेना की काबुल में मौजूदगी को लेकर एक तरह से शीतयुद्ध चल रहा था। अमेरिका एक रणनीति के तहत अफगानिस्तान में बना रहना चाहता है। इसके लिए अमेरिका तर्क देता रहा कि 2014 में अपनी सेना की वापसी के बावजूद वह काबुल की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए नाटो की कुछ टुकड़ियों के साथ वहीं रहना चाहता है। उसका कहना है कि अफगानिस्तान अभी बहुत सुरक्षित नहीं है और विदेशी सेना की वापसी के बाद तालिबान फिर सिर उठाएगा, इसलिए उसे कुचलने के लिए अमेरिकी सैनिक अफगानि सैनिकों को प्रशिक्षण देते रहेंगे। राष्ट्रपति करजई अमेरिकी प्रस्ताव से असहमत थे और कहते रहे कि उनका देश स्वयं की सुरक्षा में सक्षम है।

दोनों पक्षों के बीच लंबे समय तक चली तनातनी के बाद हाल में पुर्तगाल की राजधानी लिस्बन में नाटों के एक शिखर सम्मेलन में स्पष्ट किया गया कि 2014 के बाद भी अफगानिस्तान में नाटो की सेना मौजूद रहेगी। इस सम्मेलन में नाटो तथा अफगानिस्तान के बीच एक घोषणा पत्र पर भी हस्ताक्षर हुए हैं, जिसमें कहा गया है कि नाटो अफगानिस्तान को अपना महत्वपूर्ण साझेदार स्वीकार करता है। समझौते के अनुसार नाटो के चार्टर में स्पष्ट कहा गया है कि वह सदस्य देश को आवश्यक सुरक्षा सहायता उपलब्ध कराएगा। अफगानिस्तान अब तक अमेरिका पर बराबर यह दबाव बनाता रहा है कि 2014 के बाद काबुल को उसके हाल पर छोड़ा जाना चाहिए। राष्ट्रपति करजई लंबे समय तक ओबामा प्रशासन पर इसके लिए हस्ताक्षर करने की पेशकश करते रहे, लेकिन अमेरिका हिन्दकुश क्षेत्र में दबदबा कम नहीं होने देना चाहता है, इसलिए वह राष्ट्रपति करजई की पेशकश लगातार ठुकराता रहा और उल्टे अफगानिस्तान पर दबाव बनाए रखता रहा कि वह नाटो सेना की पूरी वापसी की हठ नहीं करें। करजई उन्हें विश्वास दिलाते रहे कि 2014 के बाद काबुल अपनी सुरक्षा करने में सक्षम है, इसलिए विदेशी सेना को अफगानिस्तान छोड़ देना चाहिए।

बाद में लिस्बन शिखर सम्मेलन में अमेरिका ने स्पष्ट कर दिया कि काबुल को फिलहाल उसके हाल पर नहीं छोड़ा जा सकता है। नाटो अपने सदस्यों को सुरक्षा प्रदान करने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस दिशा में काबुल कदम बढ़ाने पर सहमत हुआ है, इसलिए अमेरिका चाहता है कि उसने इराक में सेना की वापसी के बाद जो व्यवस्था की है, उसी तरह की व्यवस्था का सफलातपूर्वक संचालन अफगानिस्तान में भी किया जाना चाहिए, ताकि नाटो सेना अफगानिस्तान में सेना के लिए लगातार प्रशिक्षण कार्य चलाकर आतंकवाद के खिलाफ अपनी कार्रवाई को जारी रख सके। नाटो सम्मेलन में यह भी स्पष्ट किया गया कि तालिबान बहुत सक्रिय है और जब तक यह विश्वास नहीं होता है कि अलकायदा अब कार्रवाई करने की स्थिति में नहीं है, नाटो सेना अफगानिस्तान नहीं छोड़ेगी। सम्मेलन में कहा गया कि जब तक तालिबान का खतरा अफगानिस्तान पर मंडराता रहेगा, अमेरिकी नेतृत्व वाली सेना तालिबान के खिलाफ लड़ाकू कार्रवाई जारी रखेगी।

असली सवाल यह है कि अमेरिकी सेना प्रशिक्षण के बहाने कब तक अफगानिस्तान में मौजूद रहेगी। यह अनुमान लगाना कठिन है कि तालिबान का खतरा कब तक कायम रहेगा। अनिश्चय के इस माहौल में यही नजर आता है कि अमेरिका ने लंबे समय तक हिन्दकुश क्षेत्र में अपनी सेना की मौजूदगी को पक्का कर लिया है। राष्ट्रपति बराक ओबामा ने पहले कहा था कि वह 2014 के बाद अफगानिस्तान छोड़ देंगे, लेकिन बाद में उन्होंने रणनीति बदल दी। अमेरिका लगातार अफगानिस्तान के अपने सैन्य अड्डों को उन्नत बना रहा है। नए-नए सैनिक अड्डे तैयार कर रहा है और उन पर करोड़ों रुपए खर्च कर रहा है। सम्मेलन में उसने अपनी इस धारणा को और मजबूत कर दिया है कि नाटो का लक्ष्य सिर्फ उनके 28 सदस्य देशों की सुरक्षा सुनिश्चित करना नहीं है, बल्कि वह इराक तथा अफगानिस्तान जैसे देशों के सहारे पूरी दुनिया पर अपना दबदबा कायम करना चाहता है। यह सभी जानते हैं कि सोवियत संघ का प्रभाव रोकने के लिए अमेरिका ने नाटो का गठन किया था। इससे उसका राजनीतिक और सामरिक प्रभाव कई देशों तक पहुंचा। बाद में सोवियत संघ बिखर गया, तो नाटो अब निर्बाध रुप से विकासशील देशों में हस्तक्षेप करके अपनी भूमिका का विस्तार कर रहा है।

हालांकि, अभी अफगानिस्तान को मीलों जाना है। यह भी बताया जा रहा है कि सरकारी दफ्तर में न केवल कर्मचारियों की किल्लत है, बल्कि जो कर्मचारी हैं, वे अपने कामकाज से ज्यादा उम्मीदें नहीं बंधाते। इस हालात के लिए खराब तालीम ही कसूरवार है। नई तकनीकों की पढ़ाई ही इस तकलीफ को दूर कर सकती है। जिन लोगों को बाहरी मुल्कों से तालीम हासिल करने का मौका मिला, वे खुद को मुल्क के हालात में ढाल नहीं पाते। वहीं जो इसमें माहिर और तजुर्बेकार हैं, वे अधिक पगार और नौकरी के बेहतर माहौल की मांग करते हैं। इन सारी वजहों से सरकारी इदारों का कामकाजी रवैया ढीला-ढाला बना रहता है। हालांकि, नौकरशाहों की ट्रेनिंग के लिए कई सारे प्रोग्राम जारी हैं। ये प्रोग्राम मुल्क के अंदर और बाहर, दोनों जगहों पर चल रहे हैं। लेकिन यह उम्मीद लगाना गलत होगा कि बेहद कम वक्त में हालात बदल जाएंगे। कम से कम 15-20 साल तो लगेंगे ही। अफगान सुरक्षा बलों की तरक्की के रास्ते में भी निरक्षरता और खराब शिक्षण-व्यवस्था सबसे बड़ी मुसीबत बनी हुई है।

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