लेखक परिचय

अनिल गुप्ता

अनिल गुप्ता

मैं मूल रूप से देहरादून का रहने वाला हूँ! और पिछले सैंतीस वर्षों से मेरठ मै रहता हूँ! उत्तर प्रदेश मै बिक्री कर अधिकारी के रूप मै १९७४ मै सेवा प्रारम्भ की थी और २०११ मै उत्तराखंड से अपर आयुक्त के पड से सेवा मुक्त हुआ हूँ! वर्तमान मे मेरठ मे रा.स्व.सं. के संपर्क विभाग का दायित्व हैऔर संघ की ही एक वेबसाइट www.samvaadbhartipost.com का सञ्चालन कर रहा हूँ!

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dalदेश में इस समय दालों की कीमतों में तेजी को लेकर सरकार पर मंहगाई रोकने में ‘असफल’ रहने के आक्षेप लगते हुए सोशल मीडिया पर लिखा जा रहा है! कुछ टीवी चैनलों पर टमाटर सौ रुपये प्रति किलो हो जाने के ‘समाचार’ दिखाए गए! मैं स्वयं बाजार में सब्ज़ी खरीदने गया तो मैंने पाया कि फुटकर में ठेलों पर अच्छी क्वालिटी का टमाटर चालीस रुपये प्रति किलो बिक रहा है!अन्य सभी सब्ज़ियों के भाव भी लगभग बीस रुपये प्रति किलो ही थे! फूल गोभी, जिसका यह सीजन नहीं है, उसका भाव भी चालीस रुपये किलो था!
जहाँ तक दालों का प्रश्न है, लगातार दो वर्षों तक कम वर्षा होने के कारण दालों का उत्पादन गिरकर १.७० करोड़ टन हुआ है जबकि मांग २.६ करोड़ टन है! दुनिया के अन्य देशों में भी उत्पादन में कमी आई है! ऐसे में भाव बढ़ना स्वाभाविक है! राज्य सरकारों का यह दायित्व है कि वो जमाखोरी को रोकने के लिए ठोस और प्रभावी कदम उठाये!
इस बीच एक अच्छी खबर यह आई है कि प्रधान मंत्री जी स्वयं इस दिशा में गम्भीरता से विचार कर रहे हैं! पडोसी म्यांमार से भी दाल आयात के बारे में बातचीत चल रही है! तथा प्रधान मंत्री के आगामी अफ्रीका प्रवास के समय अनेकों अफ़्रीकी देशों से दालों की आपूर्ति के लिए प्रयास किये जायेंगे! समस्या के दीर्घकालीन समाधान के लिए अफ़्रीकी देशों में दालों की ‘कॉन्ट्रैक्ट खेती’ के लिए भी कूटनीतिक प्रयास किये जायेंगे!यह एक बहुत ही अच्छा प्रयास होगा! केवल दालों के लिए ही नहीं बल्कि अन्य जिंसों की पैदावार के लिए भी इस प्रकार के दीर्घकालीन समझौते दोनों पक्षों के लिए लाभदायक रहेंगे! कुछ साल पूर्व तक अफ्रीका के अनेक देश भुखमरी से पीड़ित थे! अभी भी अफ्रीका के अनेकों क्षेत्रों के लोगों और बच्चों की सूखे तन और कुपोषण की तस्वीरें सामने आती रहती हैं! जबकि धरती और प्राकृतिक संसाधनों की कोई कमी अफ्रीका में नहीं है! लेकिन यहां के अधिकांश देशों में लोग कृषि कर्म ज्ञान से लगभग अनभिज्ञ ही हैं! जबकि भारत में हज़ारों वर्षों से कृषि हो रही है! और यहाँ का कृषक भी बहुत मेहनती है! अमेरिका और कनाडा के जिन क्षेत्रों में भारतीयों ने कृषि को अपनाया है वो वहां अति संपन्न श्रेणी में आते हैं! यदि अफ्रीका के देश भारतीयों को लम्बी अवधि के लिए कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के लिए सुविधा प्रदान करेंगे तो इससे उनका भी बहुत लाभ होगा!
संयुक्त राष्ट्र की जनसँख्या सम्बन्धी समिति ने यह अनुमान व्यक्त किया है कि 2000 की तुलना में 2100 में विश्व की आबादी सात अरब से बढ़कर कम से कम ग्यारह अरब हो जाएगी और इसमें सबसे अधिक वृद्धि अफ्रीका में होगी जहाँ की आबादी 2000 की एक अरब से बढ़कर चार अरब हो जाएगी! ऐसे में वर्तमान से चारगुना आबादी के भरण पोषण तथा अन्य आवश्यकताओं की पूर्ती की व्यवस्था सुनिश्चित करने के लिए अफ़्रीकी देशों को अभी से लम्बी अवधि की योजनाएं बनाकर तैयारी करनी होगी! भारत के साथ कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग इस दिशा में एक ठोस पहल होगी! वैसे तो अन्य क्षेत्रों में भी बढ़ती आवश्यकताओं की पूर्ती हेतु भारतीयों द्वारा बहुत कुछ किया जा सकता है! भारत में युवाओं की अच्छी संख्या होने के कारण भारत मानव संसाधन भी प्रचुर संख्या में उपलब्ध करा सकता है जो अफ़्रीकी लोगों के साथ मिलकर अगली सदी में दुनिया के पटल पर अफ्रीका को एक नयी पहचान दिला सकने में सक्षम होंगे!
दुनिया के अन्य देशों की तुलना में भारत के लोगों का अफ्रीका के प्रति विशेष लगाव है क्योंकि एक तो अफ्रीका की जनजातीय संस्कृति भारतीय संस्कृत के काफी करीब है! वो भी प्रकृति प्रेमी हैं औरभारत भी! अफ्रीका के स्वतंत्रता संघर्ष में महात्मा गांधी समेत सभी भारतीयों का नैतिक और यथासम्भव भौतिक सहयोग रहा है! अफ्रीका में उपनिवेशवाद की समाप्ति पर भारत के लोगों ने भी उतना ही हर्ष मनाया था जितना अफ़्रीकी लोगों ने!मुझे अपने बचपन का याद है कि जब काँगो के महान स्वतंत्रता सेनानी पैट्रिस लुमुम्बा पुर्तगाल की जेल से फरार हुए थे और बाद में उनकी हत्या कर दी गयी थी तो उसके समाचार मै उत्सुकता से पढता था! उस समय मेरी आयु केवल आठ वर्ष थी!
प्रधान मंत्री श्री मोदी जी का आगामी अफ्रीका दौरा उसी अभियान का अगला कदम होगा जो पिछले वर्ष नयी दिल्ली मै ५६ अफ़्रीकी देशों के साथ हुए इंडो-अफ़्रीकी महासम्मेलन से शुरू हुआ था! और जिसकी कड़ी के रूप मै भारत के राष्ट्रपति महामहिम श्री प्रणव मुखर्जी आजकल अफ़्रीकी देशों के दौरे पर गए हुए हैं!

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