लेखक परिचय

लिमटी खरे

लिमटी खरे

हमने मध्य प्रदेश के सिवनी जैसे छोटे जिले से निकलकर न जाने कितने शहरो की खाक छानने के बाद दिल्ली जैसे समंदर में गोते लगाने आरंभ किए हैं। हमने पत्रकारिता 1983 से आरंभ की, न जाने कितने पड़ाव देखने के उपरांत आज दिल्ली को अपना बसेरा बनाए हुए हैं। देश भर के न जाने कितने अखबारों, पत्रिकाओं, राजनेताओं की नौकरी करने के बाद अब फ्री लांसर पत्रकार के तौर पर जीवन यापन कर रहे हैं। हमारा अब तक का जीवन यायावर की भांति ही बीता है। पत्रकारिता को हमने पेशा बनाया है, किन्तु वर्तमान समय में पत्रकारिता के हालात पर रोना ही आता है। आज पत्रकारिता सेठ साहूकारों की लौंडी बनकर रह गई है। हमें इसे मुक्त कराना ही होगा, वरना आजाद हिन्दुस्तान में प्रजातंत्र का यह चौथा स्तंभ धराशायी होने में वक्त नहीं लगेगा. . . .

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लिमटी खरे

तीस से चालीस बरस सरकार की सेवा करने के बाद सेवानिवृत हो जाते हैं सरकारी कर्मचारी। इसके बाद भी इनका मन नहीं भरता। आम क्लर्क या निचले दर्जे के कर्मचारी तो सेवानिवृत्ति के उपरांत भगवान में ध्यान रमाने लगते हैं पर आला अधिकारियों का सुविधाओं का मोह समाप्त नहीं होता है। सेवानिवृति के उपरांत पुर्ननियुक्ति या किसी आयोग, निगम मण्डल आदि में उनकी सेवाएं लेकर उन्हें उपकृत करने की परांपर समाप्त होना चाहिए। अमूमन देखा गया है कि सेवानिवृति के करीब आते ही अफसरों द्वारा नियम कायदों को नेताओं के घर की लौंडी बना दिया जाता है। आला अधिकारियों द्वारा अपने आकाओं को सिद्ध करने के चक्कर में चापलूसी की सारी हदें पार कर दी जाती हैं। देखा जाए तो रिटायरमेंट के बाद चैन से पैंशन लेकर सम्मान के साथ जीवन जीना चाहिए अफसरान को। वस्तुतः पहली पंक्ति के अधिकारी एसा करते नहीं हैं।

समूचे देश में भारतीय प्रशासनिक, पुलिस और न्याय विभाग के आला अधिकारियों की सेवानिवृति के बाद दी जाने वाली पदस्थापनाओं पर देश व्यापी बहस की आवश्यक्ता है। देखा जाए तो रिटायरमेंट के बाद पुर्ननियुक्ति के प्रलोभन में अधिकारी अपने सेवाकाल में ही सत्ता या संगठन में बैठे राजनेताओं को खुश करने में लग जाते हैं। राजनेता भी बड़े चालाक होते हैं वे भी सेवानिवृति के कगार पर पहुंचने वाले अफसरान को इसका लालच देकर मनमाफिक काम करवाने से नहीं चूकते हैं।

लोगों का मानना है कि अधिकारियों को सम्मान और नैतिकता के साथ नौकरी करना चाहिए और सम्मान के साथ ही रिटायर होना चाहिए। यह सच है कि बिना मांगे या लाबिंग के बिना सरकार में अच्छे पद नहीं मिल पाते हैं। ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ लोकसेवक की पूछ परख कहीं भी नहीं होती है। अब तो कहा जाने लगा है कि जिलों में कलेक्टर और एसपी के पद भी बिकने लगे हैं।

देखा जाए तो जिम्मेदार अफसरान का एक काडर तैयार किया जाना चाहिए। सेवानिवृत अफसरों को कुर्सी या सुविधाओं का लोभ तजना आवश्यक है। रिटायर्ड अफसरों को लोभ लालच को छोड़कर मार्गदर्शक की भूमिका में आना चाहिए। दरअसल सत्तर से उपर वाले आज सांसद विधायक बनकर ठाठ कर रहे हैं जिन्हें देखकर इन आला अफसरान का मन मचल जाता है। रिटायर्ड अफसरों को अपने जीवनकाल के अनुभवों का लाभ आने वाली युवा पीढ़ी को देना चाहिए। युवा पीढ़ी में अनेक लोग हैं जो ईमानदार, मेहनती और कर्तव्यनिष्ठ हैं।

आज के समय में उच्च पदों पर बैठे अफसरों को देखकर यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि जो अधिकारी नेताओं की चौखट चूमकर उनके इशारों पर ठुमके लगता है उसे ईनाम के बतौर अच्छी पदस्थापना या पुर्ननियुक्ति दे दी जाती है। सरकारी कर्मचारी की पुर्ननियुक्ति उसके पुनर्वास के साथ ही साथ उसका पारितोषक भी है। इस तरह सरकार के नुमाईंदे एक युवा का हक मारते हैं। हद तो तब हो जाती है जब सेवानिवृत कर्मचारी को कहीं नियुक्ति देकर उसे मंत्री पद का दर्जा दिया जाता है। यह हर दृष्टिकोण से संविधान की भावना का अनादर ही माना जाएगा। अभी लोग इस बात को भूले नहीं होंगे कि पूर्व में लाल कृष्ण आड़वाणी को कैबनेट मंत्री का दर्जा देने का विरोध और किसी ने नहीं सिद्धांतों पर अडिग रहने वाले रष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने किया था।

नेता भी अपने निहित स्वार्थ के लिए किसी भी हद तक चले जाते हैं। 1993 से 2003 तक मध्य प्रदेश पर लगातार राज किया था राजा दिग्विजय सिंह ने। इस दौरान अफसर भी कांग्रेसी हो चले थे। 2003 दिसंबर में जब चुनावों के बाद जनता ने कांग्रेस को उठाकर सत्ता के गलियारे से बाहर फेंका तब तेज तर्रार फायर ब्रांड साध्वी उमा भारती के मुख्यमंत्री बनते ही एमपी काडर के भारतीय प्रशासनिक और पुलिस सेवा के अफसरों ने प्रतिनियुक्ति पर दिल्ली की दौड़ लगा दी थी। उस वक्त का दिल्ली का नजारा देखकर लगने लगा था मानो दिल्ली में भी मध्य प्रदेश का राज्य सचिवालय वल्लभ भवन बन गया हो।

जनता द्वारा जनादेश देकर नेताओं को व्यवस्था को सुचारू तौर पर चलाने की जिम्मेदारी सौंपी जाती है। अपने हितों की खातिर नेता इन व्यवस्थाओं के सामने आत्म समर्पण कर देते हैं। नौकरशाही को लोगों द्वारा लोक हितैषी कभी नहीं माना गया है। जीवन भर पद का सुख भोगने वाले अफसरों द्वारा सेवानिवृत होते ही जोड़ तोड़ कर राजनैतिक पद हथिया लिया जाता है। यह उस कार्यकर्ता के हक पर सीधा सीधा डाका है जो अपना समूचा जीवन पार्टी के कामों में उसके झंडे बेनर बांधने में प्रोग्राम में दरी फट्टा उठाने, नेताओं की जय जयकार करने में बिता देता है। नौकरशाह वैसे भी जनता के बीच नहीं रहते और जनता से उनका कोई सरोकार नहीं होता है। वे जब जिस जिले में पदस्थ होते हैं वह जिला उनका अपना परिवार हो जाता है और तबादले के बाद कम ही अफसर हैं जो मुड़कर अपनी पदस्थापना वाले जिलों में जाते हैं।

प्रशासनिक सेवा और न्यायिक सेवा के सेवानिवृत अफसरों को निगम मण्डल या आयोगों में रखकर लाल बत्ती से नवाजा जाना उचित नहीं है। इसके लिए आवश्यक्ता है कि सरकार कानून बनाए और इसे रोके। वैसे देश में दो बार से ज्यादा चुनाव लड़ने पर भी रोक लगना आवश्यक है। जब इस तरह की पुर्ननियुक्ति की बात आती है तो किसी अफसर से भला ईमानदारी के साथ नौकरी करने की उम्मीद कैसे की जा सकती है। यह काम वाकई लोकतंत्र के साथ मजाक से कम नहीं है।

नेताओं में सत्तर साल की उमर के बाद भी कुर्सी से चिपके रहने की ललक समझ में आती है किन्तु नौकरशाहों में इस तरह की प्रवृति का पनपना दुखद है। नौकरशाह जब भी पुर्ननियुक्ति पाते हैं वे अपने रौब और प्रभाव का प्रयोग कर अधीनस्थों को खुलकर काम नहीं करने देते हैं। मध्य प्रदेश में ही मुख्य सचिव रहे राकेश साहनी को बिजली विभाग में नियुक्ति दी गई। इतना ही नहीं उन्हें मंत्री पद का दर्जा भी मिला। बाद में उन पर गंभीर आरोप लगे। कुल मिलाकर इस तरह की प्रवृति रोकने के लिए देश व्यापी बहस के साथ ही साथ कड़े कानून की महती आवश्यकता महसूस होने लगी है।

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