लेखक परिचय

शैलेन्द्र चौहान

शैलेन्द्र चौहान

कविता, कहानी, आलोचना के साथ पत्रकारिता भी। तीन कविता संग्रह ; 'नौ रुपये बीस पैसे के लिए'(1983), श्वेतपत्र (2002) एवं, 'ईश्वर की चौखट पर '(2004) में प्रकाशित। एक कहानी संग्रह; नहीं यह कोई कहानी नहीं (1996) तथा एक संस्मरणात्मक उपन्यास पाँव जमीन पर (2010) में प्रकाशित। धरती' नामक अनियतकालिक पत्रिका का संपादन। मूलतः इंजीनियर। फिलहाल जयपुर में स्थायी निवास एवं स्वतंत्र पत्रकार।

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raghuuram rajanशैलेन्द्र चौहान
हाल ही में बीजेपी के राज्यसभा सांसद सुब्रह्मण्यम स्वामी ने रघुराम राजन की आलोचना की थी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से कहा था कि उन्हें गवर्नर के रूप में दूसरा कार्यकाल ना दें. दरअसल भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी जिस दिन राज्य सभा के सांसद बने, उसी दिन उन्होंने सबसे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चिट्ठी लिखी कि रघुराम राजन को दूसरा मौका नहीं दिया जाना चाहिए. स्वामी ने अपनी चिट्ठी में नरेंद्र मोदी को संबोधित करते हुए लिखा है, “आपके प्रभावशाली नेतृत्व में ही भाजपा सत्ता में आई. मैं कोई वजह नहीं देखता कि यूपीए सरकार की ओर से नियुक्त किए व्यक्ति को उसके पद पर रखा जाए, जो देश की अर्थव्यवस्था के ख़िलाफ़ काम कर रहा है. हमारे पास रिजर्व बैंक के गवर्नर पद के लिए कई राष्ट्रवादी विशेषज्ञ मौजूद हैं.” इसके पीछे राजनीति ये है कि संघ और भाजपा के अंदर एक हिस्सा ऐसा है जो सोचता है कि भारतीय रिज़र्व बैंक की मौजूदा नीति देशहित में नहीं है. ये उनकी राय है क्योंकि भारतीय रिज़र्व बैंक ब्याज दर कम नहीं कर रहा है. इसीलिए लोग कर्ज नहीं ले रहे और निवेश नहीं कर पा रहे हैं. इससे उनके चाहते पूंजीपतियों, बिल्डरों, दलालों को उचित लाभ नहीं मिल पा रहा। स्वामी आजकल संघ के बहुत नजदीक माने जाते हैं। उन्होंने राजन को हटाने की अपनी मांग को कई बार दुहराया है. मीडिया और सार्वजनिक सभाओं में इसकी चर्चा की है. उन्होंने आरोप लगाया है कि रघुराम राजन मानसिक रूप से पूरी तरह भारतीय नहीं हैं और उन्होंने जानबूझ कर भारतीय अर्थव्यवस्था को नुक़सान पहुँचाया है. सुब्रमण्यम स्वामी ने ये भी इल्ज़ाम लगाया कि दो सालों में सरकारी बैंकों का ‘बैड लोन’ बढ़कर साढ़े तीन लाख करोड़ हो गया है. स्वामी ने राजन को तुरंत हटाए जाने की मांग करते हुए कहा कि उनके पास ग्रीन कार्ड है, जिसे रिन्यू कराने के लिए वो अमरीका भी गए थे. जबकि स्वामी को ये बात भली भांति पता है कि ग्रीन कार्ड अमरीका में बेरोकटोक रहने और काम करने के लिए विदेश से आए लोगों को दिया जाता है. ग्रीन कार्ड किसी के अमरीका का नागरिक होने का प्रमाण नहीं है. मजेदार बात यह है कि स्वामी स्वयं भी बड़े अमेरिका भक्त रहे हैं। रघुराम राजन ने दिल्ली के एक स्कूल से पढ़ाई की थी और फिर अमरीकी विश्वविद्यालयों में पढ़ने के बाद वो यूनिवर्सिटी ऑफ़ शिकागो में अर्थशास्त्र के प्रोफ़ेसर हैं और आजकाल वह विश्वविद्यालय से अवकाश पर भारतीय रिज़र्व बैंक के गवर्नर हैं. रघुराम राजन की नीति के समर्थक कहते हैं कि आज कच्चे तेल के दामों में गिरावट के बावजूद सरकार महंगाई को क़ाबू नहीं कर पा रही है. आज महंगाई बढ़ रही है. दाल, टमाटर, आलू के दाम बहुत बढ़ गए. थोक मूल्य सूचकांक कम होता रहा लेकिन उपभोक्ता को कोई राहत नहीं मिली. कई अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यदि इस समय भारतीय रिज़र्व बैंक अर्थव्यवस्था में बहुत सारा पैसा डाल देगी तो ये देश के हित में नहीं होगा. अर्थव्यवस्था की इस हालत के लिए केवल भारतीय रिज़र्व बैंक ही ज़िम्मेदार नहीं है, बल्कि भारत सरकार भी ज़िम्मेदार है.भारत की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए रघुराम राजन ने जितने भी क़दम उठाए हैं, यदि नहीं उठाते तो महंगाई इससे भी ज़्यादा होती. इसके अलावा उन्होंने जो भी कोशिशें की, उसमें वे थोड़े-बहुत सफल भी रहे. उन्होंने एनपीए यानी नॉन-परफॉर्मिंग ऐसेट को ख़त्म करने की बात की. एनपीए मतलब ऐसे ऋण जिन्हें लोग बैंक से लेते तो हैं लेकिन वापस नहीं करते. ऐसे ऋण बड़े बड़े पूंजीपति, बड़े बड़े कॉरपोरेट घराने के मालिक और बड़ी बड़ी कंपनियां लेती हैं, जैसे कि विजय माल्या की कंपनी. रघुराम राजन ने सारे बैंको को कहा कि वे अपनी बैलेंस शीट, अपना खाता साफ़ करें. ये बात बड़े बड़े पूंजीपति और बड़े बड़े कॉरपोरेट घरानों के मालिकों को पसंद नहीं आई, जिन पर उंगली उठाई गई. इस सारे विवाद के बाद रघुराम राजन ने कहा है कि 4 सितंबर 2016 को अपना कार्यकाल पूरा होने के बाद अकादमिक क्षेत्र में लौट जाएंगे. उन्होंने कहा कि जब भी देश को उनकी सेवा की जरूरत होगी, वो इसके लिए तैयार रहेंगे. रघुराम राजन ने कहा है कि वो गवर्नर बने रहने के लिए ‘तैयार’ थे लेकिन ‘गहन चिंतन और सरकार से चर्चा’ के बाद उन्होंने ये क़दम उठाया है. स्वामी एक के बाद एक चिट्ठी लिख रहे हैं कि रघुराम राजन विदेशी एजेंट हैं या अमरीकी षडयंत्र का हिस्सा हैं. इसीलिए जो फैसला रघुराम राजन ने किया, उससे मैं हैरान नहीं हूं. रघुराम राजन ने रिजर्व बैंक के अपने सहयोगियों को एक पत्र लिखा था. इस पत्र में उन्होंने अपने कार्यकाल की अहम बातों का विस्तार से जिक्र किया है. उन्होंने पत्र में जिक्र किया है कि जब वो आए तो अर्थव्यवस्था किस बुरे हाल में थी, मुद्रास्फीति बढ़ रही थी रुपया नीचे जा रहा था और विकास दर नीचे जा रहा था. पत्र में रघुराम राजन ने कहा है कि आरबीआई ब्याज दर में 150 बेसिक पॉइंट की कमी कर पाया, मुद्रा स्थिर हुई, विदेशी मुद्रा भंडार रिकॉर्ड स्तर तक बढ़ा और अब भारत दुनिया की ते़ज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है. विवादों को हवा देकर चर्चा में बने रहना स्वामी का शगल है। वह विवादास्पद बयानों में पूरी महारत रखते हैं. स्वामी की विशेषता यह कि वे चुप नहीं रह सकते चाहे उनकी छवि किातनी भी धूमिल और साख कितनी भी कम न हो जाए। कांग्रेस पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी, तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता और रिज़र्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन ये सभी अलग-अलग कारणों से भारतीय जनता पार्टी के राज्यसभा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी के निशाने पर हैं. उनके जयललिता और सोनिया गांधी के पीछे पड़ने का कारण कथित भ्रष्टाचार है. दिलचस्प बात ये है कि भाजपा में स्वामी को अधिकतर नेता पसंद नहीं करते। वित्त मंत्री अरुण जेटली खुद राजन के पक्ष में सामने आते दिखे. जबकि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने स्वामी को सार्वजनिक तौर पर समर्थन नहीं दिया और प्रधानमंत्री ने गवर्नर की प्रशंसा की है. अब इन सबके भाजपाई मायने क्या हैं ये तो कोई उनका विश्वस्त नेता ही बता पाएगा लेकिन इस विवाद से फिर एक बार भाजपा की वित्तीय समझ पर सवाल पैदा हुआ है।
शैलेन्द्र चौहान
हाल ही में बीजेपी के राज्यसभा सांसद सुब्रह्मण्यम स्वामी ने रघुराम राजन की आलोचना की थी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से कहा था कि उन्हें गवर्नर के रूप में दूसरा कार्यकाल ना दें. दरअसल भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी जिस दिन राज्य सभा के सांसद बने, उसी दिन उन्होंने सबसे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चिट्ठी लिखी कि रघुराम राजन को दूसरा मौका नहीं दिया जाना चाहिए. स्वामी ने अपनी चिट्ठी में नरेंद्र मोदी को संबोधित करते हुए लिखा है, “आपके प्रभावशाली नेतृत्व में ही भाजपा सत्ता में आई. मैं कोई वजह नहीं देखता कि यूपीए सरकार की ओर से नियुक्त किए व्यक्ति को उसके पद पर रखा जाए, जो देश की अर्थव्यवस्था के ख़िलाफ़ काम कर रहा है. हमारे पास रिजर्व बैंक के गवर्नर पद के लिए कई राष्ट्रवादी विशेषज्ञ मौजूद हैं.” इसके पीछे राजनीति ये है कि संघ और भाजपा के अंदर एक हिस्सा ऐसा है जो सोचता है कि भारतीय रिज़र्व बैंक की मौजूदा नीति देशहित में नहीं है. ये उनकी राय है क्योंकि भारतीय रिज़र्व बैंक ब्याज दर कम नहीं कर रहा है. इसीलिए लोग कर्ज नहीं ले रहे और निवेश नहीं कर पा रहे हैं. इससे उनके चाहते पूंजीपतियों, बिल्डरों, दलालों को उचित लाभ नहीं मिल पा रहा। स्वामी आजकल संघ के बहुत नजदीक माने जाते हैं। उन्होंने राजन को हटाने की अपनी मांग को कई बार दुहराया है. मीडिया और सार्वजनिक सभाओं में इसकी चर्चा की है. उन्होंने आरोप लगाया है कि रघुराम राजन मानसिक रूप से पूरी तरह भारतीय नहीं हैं और उन्होंने जानबूझ कर भारतीय अर्थव्यवस्था को नुक़सान पहुँचाया है. सुब्रमण्यम स्वामी ने ये भी इल्ज़ाम लगाया कि दो सालों में सरकारी बैंकों का ‘बैड लोन’ बढ़कर साढ़े तीन लाख करोड़ हो गया है. स्वामी ने राजन को तुरंत हटाए जाने की मांग करते हुए कहा कि उनके पास ग्रीन कार्ड है, जिसे रिन्यू कराने के लिए वो अमरीका भी गए थे. जबकि स्वामी को ये बात भली भांति पता है कि ग्रीन कार्ड अमरीका में बेरोकटोक रहने और काम करने के लिए विदेश से आए लोगों को दिया जाता है. ग्रीन कार्ड किसी के अमरीका का नागरिक होने का प्रमाण नहीं है. मजेदार बात यह है कि स्वामी स्वयं भी बड़े अमेरिका भक्त रहे हैं। रघुराम राजन ने दिल्ली के एक स्कूल से पढ़ाई की थी और फिर अमरीकी विश्वविद्यालयों में पढ़ने के बाद वो यूनिवर्सिटी ऑफ़ शिकागो में अर्थशास्त्र के प्रोफ़ेसर हैं और आजकाल वह विश्वविद्यालय से अवकाश पर भारतीय रिज़र्व बैंक के गवर्नर हैं. रघुराम राजन की नीति के समर्थक कहते हैं कि आज कच्चे तेल के दामों में गिरावट के बावजूद सरकार महंगाई को क़ाबू नहीं कर पा रही है. आज महंगाई बढ़ रही है. दाल, टमाटर, आलू के दाम बहुत बढ़ गए. थोक मूल्य सूचकांक कम होता रहा लेकिन उपभोक्ता को कोई राहत नहीं मिली. कई अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यदि इस समय भारतीय रिज़र्व बैंक अर्थव्यवस्था में बहुत सारा पैसा डाल देगी तो ये देश के हित में नहीं होगा. अर्थव्यवस्था की इस हालत के लिए केवल भारतीय रिज़र्व बैंक ही ज़िम्मेदार नहीं है, बल्कि भारत सरकार भी ज़िम्मेदार है.भारत की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए रघुराम राजन ने जितने भी क़दम उठाए हैं, यदि नहीं उठाते तो महंगाई इससे भी ज़्यादा होती. इसके अलावा उन्होंने जो भी कोशिशें की, उसमें वे थोड़े-बहुत सफल भी रहे. उन्होंने एनपीए यानी नॉन-परफॉर्मिंग ऐसेट को ख़त्म करने की बात की. एनपीए मतलब ऐसे ऋण जिन्हें लोग बैंक से लेते तो हैं लेकिन वापस नहीं करते. ऐसे ऋण बड़े बड़े पूंजीपति, बड़े बड़े कॉरपोरेट घराने के मालिक और बड़ी बड़ी कंपनियां लेती हैं, जैसे कि विजय माल्या की कंपनी. रघुराम राजन ने सारे बैंको को कहा कि वे अपनी बैलेंस शीट, अपना खाता साफ़ करें. ये बात बड़े बड़े पूंजीपति और बड़े बड़े कॉरपोरेट घरानों के मालिकों को पसंद नहीं आई, जिन पर उंगली उठाई गई. इस सारे विवाद के बाद रघुराम राजन ने कहा है कि 4 सितंबर 2016 को अपना कार्यकाल पूरा होने के बाद अकादमिक क्षेत्र में लौट जाएंगे. उन्होंने कहा कि जब भी देश को उनकी सेवा की जरूरत होगी, वो इसके लिए तैयार रहेंगे. रघुराम राजन ने कहा है कि वो गवर्नर बने रहने के लिए ‘तैयार’ थे लेकिन ‘गहन चिंतन और सरकार से चर्चा’ के बाद उन्होंने ये क़दम उठाया है. स्वामी एक के बाद एक चिट्ठी लिख रहे हैं कि रघुराम राजन विदेशी एजेंट हैं या अमरीकी षडयंत्र का हिस्सा हैं. इसीलिए जो फैसला रघुराम राजन ने किया, उससे मैं हैरान नहीं हूं. रघुराम राजन ने रिजर्व बैंक के अपने सहयोगियों को एक पत्र लिखा था. इस पत्र में उन्होंने अपने कार्यकाल की अहम बातों का विस्तार से जिक्र किया है. उन्होंने पत्र में जिक्र किया है कि जब वो आए तो अर्थव्यवस्था किस बुरे हाल में थी, मुद्रास्फीति बढ़ रही थी रुपया नीचे जा रहा था और विकास दर नीचे जा रहा था. पत्र में रघुराम राजन ने कहा है कि आरबीआई ब्याज दर में 150 बेसिक पॉइंट की कमी कर पाया, मुद्रा स्थिर हुई, विदेशी मुद्रा भंडार रिकॉर्ड स्तर तक बढ़ा और अब भारत दुनिया की ते़ज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है. विवादों को हवा देकर चर्चा में बने रहना स्वामी का शगल है। वह विवादास्पद बयानों में पूरी महारत रखते हैं. स्वामी की विशेषता यह कि वे चुप नहीं रह सकते चाहे उनकी छवि किातनी भी धूमिल और साख कितनी भी कम न हो जाए। कांग्रेस पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी, तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता और रिज़र्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन ये सभी अलग-अलग कारणों से भारतीय जनता पार्टी के राज्यसभा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी के निशाने पर हैं. उनके जयललिता और सोनिया गांधी के पीछे पड़ने का कारण कथित भ्रष्टाचार है. दिलचस्प बात ये है कि भाजपा में स्वामी को अधिकतर नेता पसंद नहीं करते। वित्त मंत्री अरुण जेटली खुद राजन के पक्ष में सामने आते दिखे. जबकि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने स्वामी को सार्वजनिक तौर पर समर्थन नहीं दिया और प्रधानमंत्री ने गवर्नर की प्रशंसा की है. अब इन सबके भाजपाई मायने क्या हैं ये तो कोई उनका विश्वस्त नेता ही बता पाएगा लेकिन इस विवाद से फिर एक बार भाजपा की वित्तीय समझ पर सवाल पैदा हुआ है।

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