लेखक परिचय

संजीव पांडेय

संजीव पांडेय

छात्र राजनीति से पत्रकारिता में आये संजीव पाण्डेय ने कई अखबारों के लिए काम किया है. हाल-फिलहाल तक अमर उजाला में कार्यरत थे. वर्तमान में चंडीगढ़ में रहकर स्वतंत्र पत्रकारिता और लेखन.

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इन दिनों एक गरम खबर चर्चा में है। खबर है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी के बीच तनाव बढ़ रहा है। दोनों के बीच तनाव की एक लकीर खींच गई है। हालांकि इसके कई कारण बताए जा रहे है। पर इन कारणों में कितनी सच्चाई है इसके बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता है। दूसरी बार प्रधानमंत्री के तौर पर अपनी पारी शुरू करने के बाद जिस सिंह को बकरी के तौर पर लिया जा रहा था वो अब सिंह की तरह गरज रहा है। कई फैसले अपने मर्जी से मनमोहन सिंह ने लिए है। इसमें सोनिया गांधी की सहमति नहीं बतायी जा रही है। कुछ फैसलों पर तो सोनिया गांधी ने नाराजगी भी जतायी है। कह सकते है कि पार्टी में एक बार फिर सता को लेकर विवाद की शुरूआत हो सकती है। हालांकि यह भी कयास लगाया जा रहा है कि कुछ शरारती कांग्रेसियों ने मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी के बीच दूरी बढ़ाने के लिए यह अफवाह फैलायी हो।

कुछ जगहों पर खबर लगी है कि सोनिया गांधी मनमोहन सिंह के कुछ लिए गए फैसलों से नाराज है। इन फैसलों में संत सिंह चटवाल को पदमश्री देना, शर्म अल शेख में कांग्रेस पार्टी की लाइन से अलग जाकर पाकिस्तान के साथ जारी ज्वाइंट स्टेटमेंट में भारत के हितों की अनदेखी करना और बीटी बैंगन को लेकर मनमोहन सिंह का स्टैंड है। बताया जाता है कि इन सारे मामलों में मनमोहन सिंह ने अपनी मर्जी से फैसला लिया है। इस फैसले से सोनिया गांधी नाराज है। निश्चित तौर पर यह कारण ताजा विवाद के कारण हो सकते है। पर विवाद की शुरूआत यहां से नहीं हुई है। इससे पहले भी प्रधानमंत्री ने कुछ फैसले लिए थे जो सोनिया गांधी को पसंद नहीं थे।

प्रधानमंत्री ने 2009 में जब दूसरी बार अपनी पारी शुरू की तो मंत्रीमंडल के गठन के वक्त ही एक विवाद हो गया था। वो विवाद था अंबिका सोनी और पवन बंसल को केंद्रीय मंत्रीमंडल में लिए जाने को लेकर। सोनिया गांधी दोनों को केंद्रीय मंत्रीमंडल में लिए जाने के विरोध में थी। लेकिन प्रधानमंत्री ने मौके पर दोनों का नाम अपनी तरफ से डलवा दिया। दोनों मंत्रियों के बिजनेस साझीदारी को लेकर सोनिया गांधी के पास शिकायत थी और सोनिया गांधी ने इन शिकायतों को काफी गंभीरता से लिया था। लेकिन मनमोहन सिंह ने दोनों को अपने साथ रखा। दूसरी बार प्रधानमंत्री के तौर पर पद हासिल करने के बाद मनमोहन सिंह के व्यवहार में एक और परिवर्तन आया है। ये परिवर्तन यह है कि वे दस जनपथ में हाजिरी लगाना या हर फैसले पर सोनिया गांधी से सलाह लेना छोड़ चुके है। जबकि पिछले कार्यकाल में वे हर फैसले से पहले सोनिया गांधी की सहमति लेते थे। ये एक गंभीर व्यवहार परिवर्तन है।

यह तय है कि मनमोहन सिंह ने अपना एक ग्रुप कांग्रेस में बनाया है। इस ग्रुप में अंबिका सोनी या पवन बंसल ही नहीं है, बल्कि कई और लोग है। बहुत ही चालाकी से मनमोहन सिंह ने अपने खास लोगों को कई पदों से नवाजा है। साथ ही एक कम्युनिटी विशेष के लोगों को महत्वपूर्ण पदों से भी नवाजा है। यह कम्युनिटी विशेष उनकी ही खत्री सिख बिरादरी है। उन्होंने अपनी बिरादरी से दो गर्वनर लगा दिया। इकबाल सिंह को पांडिचेरी का गर्वनर लगाया तो पूर्व आर्मी चीफ जेजे सिंह को नार्थ इस्ट में गर्वनर लगा दिया। साथ ही मोटेंक सिंह को भी महत्वपूर्ण पद देकर अपनी पकड़ वे बनाए हुए है। पर सबसे विवादास्पद फैसला हाल ही में संत सिंह चटवाल को लेकर मनमोहन सिंह ने लिया है। संत सिंह चटवाल भी मनमोहन सिंह की तरह ही पाकिस्तान के रावलपिंडी से आए है और मनमोहन सिंह की बिरादरी से संबंधित है। यही नहीं वे अमेरिकी प्रशासन के भी नजदीक है। सारा देश संत सिंह चटवाल को फ्राड के तौर पर जानता रहा है। उनपर भारत में सीबीआई ने मामला दर्ज किया है और बैंको के लिए कर्ज संत सिंह चटवाल ने नहीं लौटाए है। इसके बावजूद मनमोहन सिंह ने उन्हें पदमश्री दिलवाया।

यह तय है कि मनमोहन सिंह आने वाले दिनों में सोनिया गांधी की परेशानी और बढ़ाएंगे। ये ठीक सीताराम केसरी की तरह ही व्यवहार करेंगे। सीताराम केसरी ने नरसिम्हाराव से इसी तरह का व्यवहार किया था। हालांकि सोनिया गांधी नरसिम्हा राव नहीं है। वे एक मजबूत है और नेहरू परिवार की वारिस है। पर यहां पर खतरा और है। मनमोहन सिंह सोनिया गांधी की पसंद बेशक न हो पर अमेरिका की पसंद है। भारत जैसे देश में मनमोहन सिंह जैसे लोगों को प्रधानमंत्री बनाए रखना अमेरिकी प्रशासन अपने हितों के लिए ज्यादा उचित समझता है। पिछले छ सालों के कार्यकाल मे मनमोहन सिंह ने अमेरिकी हितों में कई कदम उठाए। तभी अमेरिकी इशारे पर पार्टी लाइन से अलग हटकर पाकिस्तान से बातचीत शुरू की। हालांकि यह बातचीत गलत है और शांति की बातचीत है। पर शांति अगर अमेरिका के इशारे पर बहाल हो तो यह भारत के हित में नहीं है। बीटी बैंगन को लेकर मनमोहन सिंह जयराम रमेश को किनारे लगा चुके है। जयराम रमेश सोनिया गांधी के नजदीक है। पर मनमोहन सिंह उन्हें पसंद नहीं कर रहे है। पर समस्या आने वाले दिनों में कुछ और कारणों से गंभीर होगी।

राहुल गांधी सारे संगठनात्मक कामों से अगले साल के मध्य तक मुक्त हो जाएंगे। उनकी एनएसयूआई और यूथ कांग्रेस का गठन तबतक हो जाएगा और उनकी टीम तैयार हो जाएगी। पर इसके बाद राहुल गांधी क्या करेंगे। इस पर गंभीर विचार कांग्रेस में शुरू हो गया है। वे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की टीम में काम नहीं करेंगे यह तय है। वे अपने हिसाब से टीम तैयार कर रहे है। फिर राहुल गांधी के पास तो एक ही विकल्प रहेगा। वो विकल्प होगा प्रधानमंत्री का पद। इसके लिए मनमोहन सिंह को 2011 में प्रधानमंत्री की कुर्सी से उतारना होगा। क्या इसके लिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह तैयार हो जाएंगे। फिर उस समय अमेरिका क्या चाहेगा यह भी देखना होगा। क्योंकि अब तो हमारे देश में प्रधानमंत्री कौन होगा इसके फैसले में अमेरिका की भूमिका भी तो महत्वपूर्ण होती है। और तो और मंत्रीमंडल में कौन होगा इसका फैसला भी अमेरिका ही लेता है। नटवर सिंह की छुट्टी इसका उदाहरण है।

राहुल गांधी की एक और परेशानी है। झारखंड चुनाव में कांग्रेस को खास सफलता नहीं मिली। अब बिहार चुनाव होना है। बिहार चुनाव में अगर कांग्रेस को उम्मीद से ज्यादा सफलता नहीं मिली तो राहुल गांधी की सारी चमक फीकी पड़ जाएगी। इसलिए कांग्रेस में गांधी नेहरू परिवार के भक्त यह नहीं चाहते कि राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए 2014 का इंतजार किया जाए। उनकी यही इच्छा है कि जल्द से जल्द राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाया जाए ताकि 2014 का चुनाव राहुल गांधी की उपल्बिधयों पर लड़ा जाए। पर क्या सरदार मनमोहन सिंह यह होने देंगे। यह तो समय ही बताएगा।

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1 Comment on "आखिर सिंह तो गरजेगा ही – संजीव पांडेय"

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shubhra
Guest

बहुत ही अच्छा आलेख

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