लेखक परिचय

विश्‍वमोहन तिवारी

विश्‍वमोहन तिवारी

१९३५ जबलपुर, मध्यप्रदेश में जन्म। १९५६ में टेलीकम्युनिकेशन इंजीनियरिंग में स्नातक की उपाधि के बाद भारतीय वायुसेना में प्रवेश और १९६८ में कैनफील्ड इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलाजी यू.के. से एवियेशन इलेक्ट्रॉनिक्स में स्नातकोत्तर अध्ययन। संप्रतिः १९९१ में एअर वाइस मार्शल के पद से सेवा निवृत्त के बाद लिखने का शौक। युद्ध तथा युद्ध विज्ञान, वैदिक गणित, किरणों, पंछी, उपग्रह, स्वीडी साहित्य, यात्रा वृत्त आदि विविध विषयों पर ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित जिसमें एक कविता संग्रह भी। १६ देशों का भ्रमण। मानव संसाधन मंत्रालय में १९९६ से १९९८ तक सीनियर फैलो। रूसी और फ्रांसीसी भाषाओं की जानकारी। दर्शन और स्क्वाश में गहरी रुचि।

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विश्वमोहन तिवारी (पूर्व एयर वाइस मार्शल)

हम बड़े गर्व से कहते हैं कि हैं कि हम हरित क्रांति तथा दुग्ध क्रांति के युग में जी रहे हैं। हमें नहीं मालूम कि आज मानवों और कीटों के बीच भयंकर युद्ध हो रहा है। और चाहे हमारा अहंकार यह न मानने दे, किन्तु हम यह युद्ध उन कीड़े मकोड़ों से हार रहे हैं – विश्व में लाखों टनों के प्रतिवर्ष नये नये कीटनाशकों की बमबारी इसे सिद्ध करती है। यह भी संयोग है कि यह युद्ध उसी समय प्रारंभ हुआ था जब सारे विश्व पर हिटलर आक्रमण कर रहा था। वह सिद्ध करना चाहता था कि विश्व में केवल उसकी ही जाति को रहने का अधिकार है। और उसी समय डीडीटी नामक नवीन कीटनाशक हथियार का आविष्कार हुआ था। और डीडीटी के आक्रमण से कीट संहार हुआ, सफल हुआ – अचानक उपज में वृद्धि होने लगी थी। चमत्कृत विश्व मान रहा था कि डीडीटी का असर केवल कीटों पर पड़ेगा। कशेरुकी जीवों (मानव सहित) पर नहीं। और जैसा कि तत्पश्चात बार बार सिद्ध हुआ है कि यह ‘मान्यता’ गलत है। सारे जीव एक अकाट्य जैव बन्धन से बंधे हुए हैं।

पाँचवे दशक के प्रारंभ की बात है। अमेरिका में कपास की खेती का विशेष महत्त्व था, डीडीटी ने कपास के तथाकथित शत्रु ‘कीट’ मारे, कपास की उपज बढ़ी और कम्पनियों ने उसके विजय गीत सारे विश्व में गाये। किन्तु दूसरे वर्ष ही कपास का एक नया शत्रु – एक छोटा सा अनजान पतंगा हेलिओथिस विरेन्सिस लाखों की संख्या में आ धमका। हुआ यह था कि डीडीटी से न केवल कपास के शत्रु–कीट मरे थे, अन्य कीट भी मरे थे और साथ साथ असंख्य पक्षी भी। ‘हेलियोथिस विरेन्सिस’ भी काफी संख्या में हताहत हुए थे, किन्तु उन छोटे से कुछ पतंगों में डीडीटी से लड़ने की क्षमता भी थी तो वे बच गये, तथा उन प्रभावित क्षेत्रों में डीडीटी की कृपा से उनकी संख्या पर नियंत्रण रखने वाले अन्य कीट और विशेषकर पक्षी भी लगभग नगण्य बचे थे। अतएव ‘हेलियोथिस विरेन्सिस’ का अब अक्षत साम्राज्य स्थापित हो गया था। फलस्वरूप इधर कपास की फसल का बहुत नुकसान हुआ, और उधर हिटलर का अन्त हुआ और इधर वैज्ञानिकों तथा किसानों की खुशी का अन्त। इस युद्ध की हार में किसान का सर्वाधिक नुकसान हुआ। कम्पनियों ने तो लाखों डालर बना लिये थे, और भविष्य में उनसे भी दुगने चौगुने बनाने की योजना भी तैयार थी।

कीटनाशक कम्पनियों ने एक के बाद एक तीव्र से तीव्रतर कीटनाशकों का उत्पादन किया, जीत का विश्वास दिलाया और ‘साइक्लोडियोनैस’, ‘आर्गेनोफास्फेट’, कार्बामेट्स इत्यादि इत्यादि आयुधों का निर्माण किया। किन्तु हमेशा, जुए के प्रारम्भिक खिलाड़ी की तरह प्रारम्भ में उनकी जीत होती थी और फिर वह उससे भयंकर हार में बदल जाती थी। लगभग साठ वर्षों के अनवरत युद्ध में हारों के भुगतने के बाद भी, इस अजेय (?) समझी जाने वाली मानव जाति द्वारा तीव्रतर आयधों का निर्माण हो रहा है – इस समय ‘पाइरेथ्राइड्स’ का जबर्दस्त प्रचार हो रहा है। किन्तु इस तथाकथित ‘अटमबम’ का भी वही हस्र हो रहा है। किसान अब हताश हो रहे हैं किन्तु वे कीटनाशकों के दुष्चक्र में बुरी तरह फँसे हैं।

मानव का अहंकार आसानी से पराजय मानने वाला नहीं। वैज्ञानिकों ने एक विशेष निर्देशित प्रक्षेपास्त्र–विष का आविष्कार किया है। उन्होंने गहन अध्ययन कर पता लगाया कि मस्तिष्क की नाड़ियों में ‘सिग्नलों’ (संकेतों) के वहन के लिये एक विशेष पथ होता है जिसे ‘सोडियम–पथ’ कहते हैं। जीवन की विकास यात्रा में इस सोडियम–पथ का विकास करोड़ों वर्ष पूर्व हुआ था। इसलिये यह सभी जीवों में समानरूप से कार्य करती है। वैज्ञानिकों ने सोचा कि इस सोडियम–पथ पर आक्रमण करने से, एक तो, उन्हें ऐसा आयुध मिल जायेगा जो सभी कीटों पर आक्रमण करेगा। और दूसरे, इस अत्यंत प्राचीन विकास कार्य के प्रतिरोध में, कीट गुण–क्रांति (म्यूटेशन) कर नये विजेता–जीन्स (वंशाणु) पैदा नहीं कर पायेंगे। इस ध्येय–पूर्ति के लिये विकसित ‘पाइरैथ्राइड’ नामक विष एक ऐसा ही शक्तिशाली निर्देशित प्रक्षेपास्त्र है। इस ब्रह् मास्त्र के द्वारा वे मामूली सी अदना ‘घरेलू मक्खी’ पर आक्रमण कर रहे हैं, क्योंकि इस अदना मक्खी पर वे एक से एक तीव्र हथियारों – डीडीटी, ‘डियेल्ड्रिन’, ‘आर्गेनोफॉस्फेट’ आदि का आक्रमण कर निराश हो चुके हैं। और इन मक्खियों ने, प्रारम्भिक हार के बाद, इन सब का प्रतिरोध पैदा कर, अपने आपको निरापद (अजेय ?) सिद्ध कर दिया है। दृष्टव्य है कि रसायनज्ञों तथा कम्पनियों का यह ब्रह्मास्त्र भी हार गया।

हो यह भी रहा था कि जैसे जैसे ये कीटनाशक यूएसए में न केवल असफल सिद्ध होते, वरन हानिकारक भी, वैसे वैसे वहां उनके विक्रय तथा उपयोग पर प्रतिबन्ध लग जाता था। किन्तु ये पूंजीवादी कम्पनियां उनका विक्रय विकासशील देशों में करने लगीं। इस समय भारत में लगभग चार हजार कारखाने विभिन्न कीटनाशकों का निर्माण करते हैं। और हम मूर्ख खुश रहते हैं जबकि इन कारखानों के दस हजार से अधिक कार्मिक प्रतिवर्ष भयंकर बीमारियों – कैंसर, )दय रोग, प्रजनन क्षमता में कमजोरी, गर्भस्थ शिशु में विकृतियां, दुर्बलता, रोगों से लड़ने की क्षमता में ह्रास आदि आदि – से पीड़ित होते हैं, और प्रतिवर्ष औसतन 30–40 श्रमिकों की मृत्यु भी होती है। भारत सरकार कितने बलिदानों के बाद चेतेगी? वैसे तो हम भोगवाद में अमेरिका की नकल कर खूब नाचते हैं, किन्तु इस जीवन–मरण प्रश्न के ऊपर हम उनसे सीखेंगे कब?

हमारे प्राकृतिक पर्यावरण के लिये तो ये कीटनाशक पर्यावरण विनाशक सिद्ध हो रहे हैं– चारों तत्त्व – आकाश, पृथ्वी, जल तथा वायु – प्रदूषित हो रहे हैं। वायु प्रदूषित होने से बीमारियां न केवल प्रयोक्ताओं को होती हैं, वरन दूर दूर तक मार करती हैं। मैने गौर किया कि दिल्ली के आसपास आजकल गिद्धों की संख्या कम हो गई है। पता चला कि सारी जगहों में जहां जहां कीटनाशकों का उपयोग हो रहा है गिद्ध संकट में हैं। ये गिद्ध जो हमारे निशुल्क सफाई कर्मचारी हैं, जो मृत जानवरों का सड़ा गला मांस खाते हैं, उनमें अत्यधिक मात्रा में कीटनाशक विष पाया जाता है। उनके अंडों के छिलके इन कीटनाशकों के कारण इतने पतले हो जाते हैं कि जब भी मादा उन पर सेने बैठती है, वे टूट जाते हैं। यह कीटनाशक विष भोले भाले जानवरों को उनकी खाद्य वनस्पति से मिलता है जिसपर ये कीटनाशक विषों की बम वर्षा की जाती है। यहां तक भारतीय माताओं के दूध में भी डीडीटी मिलने लगा है। किन्तु भारतीय इतने सहनशील हैं कि सब बरदाश्त करते रहते हैं। तभी तो विश्व में भारतीय अपने शरीर में पाए जाने वाले कीटनाशकों की मात्रा में सर्वप्रथम हैं – चलिये कहीं तो भारत प्रथम है!!

खैरियत है कि अब रसायनज्ञों ने कीट नाशकों के साथ इस युद्ध में अपनी हार मान ली है। उन्होंने विकास–जैववैज्ञानिकों (एवाल्यूशनरी बायोलाजिस्ट) से सहायता माँगी है। एक ऐसे जैव वैज्ञानिक डा. मार्टिन टेलर ने इस पतंगे के युद्ध के फलस्वरूप क्रमशः उन्नततर होते उसके विकास का अध्ययन किया है और उस पतंगे -‘हेलियोथिस’ – की एक अद्भुत शक्ति का पता लगाया है। जब भी उस पतंगे पर किसी भी कीटनाशक का आक्रमण होता है, उसके जीन्स (वंशाणु) उस विष का ‘काट’ पैदा कर निरापद (इम्म्यून) हो जाते हैं। उसके बाद उनकी संतान में यह शक्ति पैदायशी हो जाती है। यह पढ़कर मुझे रामायण के पात्र बाली की याद आ रही है – उसे यह वरदान था कि युद्ध करते समय सामने के शत्रु की आधी शक्ति स्वयं ही उसमें (बाली में) आ जाती थी।

यहां ऐसी कोई बात नहीं है कि ऐसा वरदान केवल ‘हेलियोथिस’ पतंगे को ही मिला हो। यह अद्भुत वरदान असंख्य कीटों को प्राप्त है। अर्थात अब यह युद्ध रसायन–युद्ध न होकर, जैव–युद्ध हो गया है। हम शायद इसे जैव–आतंकवाद कहना पसन्द न करें।

इस ‘वरदान’ के अनेकों उदाहरण दिये जा सकते हैं, किन्तु यहां कुछ ही पर्याप्त होना चाहिये। ‘फ्लाइंग स्केल’ कीटों ने मात्र छः संततियों में ‘ब्यूक्विनोलेट’ नामक भयंकर विष का प्रतिरोध पैदा कर लिया है। भेड़ की आँतों में रहने वाली ‘नेमाटोड’ कृमियों ने तो मात्र तीन संततियों में ‘थियाबैंडाज़ोल’ विष का प्रतिरोध पैदा कर लिया है। और भेड़ के ऊपर आवासी ‘चिंचड़ियों’ (‘टिक्स’) ने तो मात्र दो ही à ��ंततियों में शक्तिशाली (एच सी एच ‘डियेल्ड्रिन’ का प्रतिरोध पैदा कर लिया है।

मानव हैरान है कि राई बराबर इन मच्छड़–पहलवान कीटों के पास कौन–कौन से अचूक दाँव–पेँच हैं कि उन सरीखा सर्वबुद्धिमान, सर्वशक्तिमान तथा सर्वश्रेष्ठ मानव उन क्षुद्र जन्तुओं से युद्ध में हार जाता है।

पहला तो यही कि अधिकाश कीट विषाक्त क्षेत्रों से दूर ही रहते हैं। दूसरे, ‘डायमन्ड बैक’ पतंगों सरीखे कीट, यदि विषाक्त पौधों पर बैठ जाएं तो वे अपनी विष–प्रभावित टाँगों का ही परित्याग कर देते हैं। क्या हम कीटनाशक विषों से प्रभावित सब्जियों, फलों आदि का त्याग कर सकते हैं? नहीं न, तब तो हमें तब तक रुकना पड़ेगा जब तक गर्भस्थ शिशु अपनी माँ का त्याग कर दे, या क्रोध में विकृत हो जाए। फिर, ‘क्यु�¤ �ैक्स पिपिएन्स’ जाति के मच्छड़ सरीखे कीट अपने विशेष किण्वों (एन्ज़ाइम्स) ‘एस्टरेसीज़’ की सहायता द्वारा ‘आर्गेनोफॉस्फेट’ सरीखे तीव्र विषों को पचा डालते हैं। किंतु पक्षी तथा मानव उन विषों के कारण रोगों से ग्रस्त होते रहते हैं।

डा. मार्टिन टेलर ने खोज की है कि जब भी किसी कीट पर आत्यन्तिक खतरा आता है, उनके वंशाणुओं (जीन्स) में गुणक्रान्ति (म्यूटेशन) की गति भी बहुत अधिक बढ़ जाती है, और वे नये–नये जीन्स पैदा करते हैं। अधिकांश नये जीन्स असफल ही होते हैं किन्तु अन्ततः कोई नया जीन्स उस आत्यन्तिक खतरे के विरोध में सफल हो जाता है, और फिर उसके वंश वाले पुनः फलने–फूलने लगते हैं। पक्षिवैज्ञानिक पीटर तथा रोज़मैरी ग्रा�¤ �्ट तथा उनके शिष्यों ने ‘दाफ्नि मेजर’ नामक द्वीप में ‘डारविन–फिन्चों’ (‘डारविनी चटक’) के विकास पर लगातार वर्षों शोध किया है (पुस्तक – द बीक आफ़ द फ़िन्च – जोनैथन वाइनर)। यह द्वीप गैलापैगस द्वीप समूहों का एक द्वीप है। इस द्वीप समूह में चाल्र्स डारविन ने चटकों (फ़िन्चैज़) पर शोध किया था, अतएव इन चटकों के कुल का नाम ही ’डारविनी–चटक’ रखा गया है। शोधकर्ताओं ने अथक दुष्कर शोधकार्य कर यह वैज्ञानिक सत्य खोजा है कि आत्यन्तिक खतरा, प्राणघातक प्राकृतिक या मानव कृत खतरा, होने पर इन चटकों के वंशाणुओं (जीन्स) में गुणक्रांति (म्यूटेशन) की दर एकदम बढ़ जाती है। ऐसे खतरे आने पर अनेक पुरानी तथा नयी जातियां या तो बहुत कम बचती हैं या नहीं बचती हैं। किन्तु कुछ पुरानी जातियां तथा कुछ नई जातियां बच जाती हैं और उन खतरों के बावजूद पनपती रहती हैं।डा . टेलर की, अपनी खोज के आधार पर, यह निश्चित मान्यता है कि जैव–वैज्ञानिक ऐसा विष नहीं बना सकते जो उस कीट के भविष्य के जीन्सों को भी मार सके। निर्देशित प्रक्षेपास्त्र विमान को सफलतापूर्वक मार सकते हैं क्योंकि वे उस विमान की भविष्य की स्थिति का सही अनुमान लगा सकते हैं। इस तरह कीट के भविष्य के जीन्स का सही पता या अनुमान नहीं लगाया जा सकता क्योंकि वह नया जीन्स तो टक्कर के बाद पैदा होता है। और उसकी दिशा या ‘स्वरूप’ का विकास ‘यादृच्छिक’ (रैन्डम) होने के कारण नहीं मालूम किया जा सकता। अर्थात कीटों से युद्ध करने में हमारी हार अन्ततः निश्चित है। तब हम क्यों पक्षियों तथा मानवों पर उन विषों द्वारा संकट पैदा करते जा रहे हैं?

हमारी कीटों से यह हार दुहरी या तिहरी हार है। उन विषों से पक्षी अवश्य संकटग्रस्त होते हैं, ये पक्षी ही वास्तव में उन कीटों पर नियंत्रण कर, प्रकृति में संतुलन बनाये रखते हैं। अर्थात कीटों को मारने के स्थान पर हम इन रासायनिक कीटनाशकों के द्वारा कीटों को भोजन बनाने वाले पक्षियों का ही नाश कर रहे हैं। यह भी सिद्ध हो चुका है कि इन कीटनाशकों ने, सारी सावधानी के बावजूद, मानव स्वास्थ्य पर हमला किया है तथा कैन्सर जैसे अनेक रोगों को बढ़ावा दिया है। चौथे, कीटनाशक विष पृथ्वी को उसकी मिट्टी को, जल को, वायु को, यहां तक कि उसके आकाश को प्रदूषित कर रहे हैं – अर्थात समस्त जीवन को विषाक्त कर रहे हैं।

अध्ययन से ज्ञात हुआ है कि कीटनाशकों के प्रयोग से पहले, अमरीकी किसानों की फसल का ७ प्रतिशत ही कीट खा रहे थे! और आठवें नौवें दशक में जब कीटनाशक छाए हुए थे, तब यह नुकसान, घटा नहीं, वरन बढ़कर १३ प्रतिशत हो गया था!! साथ में कीटनाशकों का खर्च अलग और उनके द्वारा पैदा संकट अलग!

’जी एम’ अर्थात आनुवंशिक संवर्धित बीज, जिनका बड़ा गाना गाया गया है, की भी विशेषता तो कीटों से लड़ने की ही होती है। यह बीज भी एक या दो मुख्य कीटों का ही प्रतिरोध कर सकते हैं। जब मुख्य कीटों को खाने का अवसर नहीं मिलेगा तब कुछ ही अवधि में अन्य कीट बढ़ेंगे और उस जीएम बीज को असफ़ल कर देंगे। जीएम बीज की रणनीति कीटों से युद्ध करने की कोई नितान्त नई रणनीति नहीं है, कीट ऐसी रणनीति के लिये पहले से ही तैयार रहते हैं। जी एम बीज भी पश्चिम की औपनिवेशिक नीति का हथियार है। तब हम अपने प्राणदायक बीजों के लिये पश्चिम की प्रौद्योगिकी पर निर्भर करने लगेंगे या कहना चाहिये उनके गुलाम हो जाएंगे। हमारे यहां अन्य सब्जियों की तरह बैंगन की भी सैकड़ों जातियां हैं। शायद बैंगन को बेचारा समझकर हमारे वैज्ञानिक तथा शासक पश्चिम के दबाव में आकर बीटी (आनुवंशिक संवर्धित) बैंगन को भारत में लाना चाहते हैं। बीटी काटन ने भी किसानों की हत्या की है। हमें‌ नहीं भूलना चाहिये कि प्रथम हरित क्रान्ति कालान्तर में हत्या क्रान्ति साबित हो रही है। इसने न केवल वायु, जल और पृथ्वी का विनाश किया है वरन किसानों की भी हत्या कर रही है। अपने अनुभवों से तथा वैज्ञानिकों के ज्ञान से ही सीखकर हमें इसका पुरजोर विरोध करना चाहिये।

विषों द्वारा प्रकृति के हो रहे विनाश को देखते हुए एक प्रकृति प्रेमी अमेरिकी वैज्ञानिक आल्डो लियोपोल्ड ने मानव जाति, विशेषकर अमेरिकियों से अभ्यर्थना की है, “हम अपनी सामाजिक चेतना में इस ग्रह पृथ्वी को भी सम्मिलित करें।” हजारों वर्ष पूर्व हमारे ऋषियों ने इस रहस्य को समझकर ‘माता भूमिः पुत्रोऽहम् पृथिव्याः’ की प्रकृति प्रेमी संस्कृति को स्थापित किया था। क्या हम भारतवासी इस मंत्र को तोते की ही तरह नहीं दुहराते हैं। जिस तरह से हम ‘गंगा’ का (!) प्रदूषण कर रहे हैं, हिमालय को, भारतमाता को निर्ममता पूर्वक वृक्ष काटकर नग्न कर रहे हैं, उससे तो यही सिद्ध होता है।

अभी भी बहुत देर नहीं हुई है क्योंकि प्रकृति के रक्षक पक्षी अभी भी पर्याप्त जातियों मे तथा संख्या में जीवित हैं। इस समय सैकड़ों जाति के पक्षी ‘संकट ग्रस्त’ हैं, जो देर करने पर डोडो के समान इस पृथ्वी से हमेशा के लिये लुप्त हो जाएंगे। जापान से प्राकृतिक खेती का आन्दोलन प्रारम्भ हो चुका है, प्रयाग के पास भी यह आन्दोलन प्रारम्भ हो चुका है। स्वयं फसलों में कुछ शत्रुकीटों को मारने की शक्ति होती है, अतः इष्टतम (कुछ योग्य चुनिंदा फसलें) फसल–चक्र का उपयोग करें ताकि एक फसल के स्थान पर अनेक फसलें अनेक कीटों का नाश करें। फसल कटने के बाद जो भी वनस्पति वहां बची रहती है उसमें भी कीट रहते हैं, अतः उन्हें जला दिया जाना चाहिये। नीम तो प्राकृतिक कीटनाशक है और अन्य प्राणियों तथा मानव को हानि भी नहीं पहुँचाता लाभ ही पहुँचाता है। भारत के वैज्ञानिकों को नीम के द्वारा उपयुक्त कीटनाशक निर्माण करना चाहिये, और सारे विश्व को बचाना चाहिये। हम सब इस आन्दोलन में भाग लें और पृथ्वी माता की, पक्षियों की, और अन्ततः मानव जाति की रक्षा करें। इस शस्य श्यामला भूमि को रेतीला मरूस्थल बनाने से बचें। विकसित देश की गलतियों से सीखें, न कि उन्हें दुहराएं। उनकी कम्पनियां जो कीटनाशक अपने देश में नहीं बेच सकतीं, वे विकासशील देशों को बेचती हैं!

केरल से मेंढकों का निर्यात करने पर जो चावल का अकाल प्ड़ा था उसे हमने भोगा है। अमेरिकन व्यापारियों ने भारत में लम्बे असफल प्रयास के बाद, अन्ततः केरल की साम्यवादी सरकार (मुख्य मंत्री नम्बूदरीपाद) को मना लिया था कि वे केरल से मेंढकों का निर्यात करें। मिलियनों डालरों की लालच में हिंदू संस्कृति से अज्ञान साम्यवादी सरकार ने, विदेशी मुद्रा कमाने के लिये मेंढकों का निर्यात किया। दूसरे ही वर्ष चावल की फसल सारे कीड़े खा गए। तब कीड़ों पर नियंत्रण करने के लिये कीटनाशकों का आयात किया गया। तब भी फसल खराब रही क्योंकि कीटनाशकों ने मिट्टी पानी को विषाक्त कर दिया था। तब कुछ उर्वरकों का भी आयात किया गया। तब स्थिति कुछ सुधरी किन्तु वह पुरानी बात नहीं हुई। यदि उन्होंने ऋग्वेद का मण्डूक सूक्त पढ़ा होता तो वे कभी भी मेंढकों का निर्यात न करते। या मात्र अपनी संस्कृति पर भरोसा कर जीवों की हत्या न करते, तो चावल के दाम प्रति रुपये दो किलो से बढ़कर दो वर्षों में ही दो रुपये प्रति किलो न हो जाते। मण्डूक सूक्त में वर्षा ऋतु में आश्रम के चारों ओर जब मेंढक अपना गान करते हैं, तब ऋषि उनसे प्रार्थना करते हैं – “हे मण्डूक तुम ऋषियों की तरह ऋचाओं का गान करते हो, तुम हम पर कृपा बनाए रखो, हमारी समृद्धि करो, गौओं की समृद्धि करो, स्वास्थ्य की रक्षा करो।” किन्तु मात्र पाश्चात्‍य पद्धति में पढ़े लोग या साम्यवादी तो इस पर हँसेंगे, या इसे ‘ग्वालों का गान’ कहकर अपनी अहंतुष्टि कर लेंगे। अब मेरा भी मन उन ऋषियों के साथ गाने का मन करता है। किन्तु मैं मेंढकों के साथ पक्षियों से भी वैसी ही प्रार्थना करता हूं। तब हम कम से कम उन अनुभवों से तो सीखें और फिर उस मंत्र को सिद्ध करें – ‘माता भूमिः पुत्रोऽहम् पृथिव्याः’।

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3 Comments on "कितने बलिदानों के बाद, चेतेगी भारत सरकार ?"

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विश्व मोहन तिवारी
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श्री आर सिन्ह जी, गलती से मेरा उत्तर अधूरा ही चला गया। खेद है. दूसरा ध्येय था कि हमें अपना पारम्परिक उपलब्ध ज्ञान भी खँगालना चाहिये, और उसका उपयोग करने के लिये उसे समुन्नत करना चाहिये। जब परमाणु ऊर्जा सरीखा विषय हो तब तो हम पश्चिम से सीख सकते हैं, किन्तु वह भी अंधी नकल नहीं. गोबर सर्वोत्तम खाद है। इसलिये ट्रैक्टर से खेती‌ न कर बैलों से खेती हमारे बहुल आबादी वाले देश के लिये बहुत उपयुक्त है। ट्रैक्टर भूमि को खराब भी करता है, तेल से चलता है और खेती को खर्चीला बनाता है। बौने अनाज की खेती… Read more »
विश्व मोहन तिवारी
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श्री आर सिन्ह जी, आपका धन्यवाद कि आपको लेख रुचिकर लगा और आपने यह लेख ध्यान से पढ़ा। आपका यह कहना भी लगभग सही है कि मैने इस लेख में विक्ल्पों को विशेष महत्व नहीं दिया है। विकल्पों को मैने इंगित ही किया है। पहला तो यही कि पक्षियों को बचाएं, वे कीटों के उचित और उपयोगी ‘काट’ हैं। दूसरा कि कीटों के दूसरे मह्त्वपूर्ण शत्रु ‘मेंढकों को बचाएं। इन दोनों के लिये कीटनाशकों का उपयोग बन्द करना होगा। यही दोनों और चमगादड़ मिलकर कीटों पर उपयुक्त नियंत्रण कर लेंगे; गौर करिये कि कीटों का बिलकुल नाश भी नहीं हो… Read more »
आर. सिंह
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तिवारीजी ,आंकड़े तो आपनेअच्छे पेश किये और इसमे कोई संदेह नहीं की आपने जो लिखा है वह सत्य है . हम नए से नए कीट नाशको के खोज और उनके प्रयोग या दुरुपयोग का फल भुगत रहे हैं पर जब तक इसके बदले में कोई अन्य विश्वसनीय विधि सामने नहीं लाई जाती लोग इसमे फंसते और बर्वाद होते रहेंगे.आवश्यकता है ऐसी खोजो की जो प्रकृति प्रदत चीजों का इस्तेमाल करके कृषि या अन्य उत्पादन बढाये.ऐसा नहीं की ऐसे खोज नहीं हो रहे हैं पर उनको जो व्यापक प्रचार मिलना चाहिए वह नहीं मिल रहा है. दूसरी तरफ ऐसे लोगों की… Read more »
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