लेखक परिचय

विनोद उपाध्याय

विनोद उपाध्याय

भगवान श्री राम की तपोभूमि और शेरशाह शूरी की कर्मभूमि ब्याघ्रसर यानी बक्सर (बिहार) के पास गंगा मैया की गोद में बसे गांव मझरिया की गलियों से निकलकर रोजगार की तलाश में जब मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल आया था तब मैंने सोचा भी नहीं था कि पत्रकारिता मेरी रणभूमि बनेगी। वर्ष 2002 में भोपाल में एक व्यवसायी जानकार की सिफारिश पर मैंने दैनिक राष्ट्रीय हिन्दी मेल से पत्रकारिता जगत में प्रवेश किया। वर्ष 2005 में जब सांध्य अग्रिबाण भोपाल से शुरू हुआ तो मैं उससे जुड़ गया तब से आज भी वहीं जमा हुआ हूं।

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-विनोद उपाध्याय-       black-panther1
भोपाल। प्रदेश में 20 से 27 जनवरी तक चली वन्य प्राणियों की गणना में प्रारंभिक तौर पर जो तथ्य सामने आए हैं वह चौकाने वाले हैं। अभी तक जो जानकारी आई है उसके मुताबिक अभयारण्यों में बाघ (टाइगर) के होने के तो बहुत सबुत मिल रहे हैं, लेकिन तेंदुए (पैंथर) के पगमार्क बहुत कम मिल रहे हैं। इससे वन अधिकारियों के होश उड़े हुए हैं। अब तक मिले संकेतों के आधार तेंदुए के अलावा अन्य कई मांसाहारी प्राणियों की संख्या घटने का अंदेशा है,जबकि शाकाहारियों की संख्या में ईजाफा देखने को मिल रहा है। गिनती के बाद सारी जानकारी और डाटा देहरादून स्थित वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया को भेजा जाएगा। वहां से आधिकारिक तौर पर प्रदेश में के वन्य प्राणियों की संख्या की जानकारी जारी होगी।
मांसाहारी वन्य प्राणियों की गणना के अंतिम दिन तक जो आंकड़े सामने आए हैं, उसने वन विभाग की नींद उड़ाकर रख दी है। अभी तक की गणना में जो तथ्य सामने आ रहे हैं, उससे प्रदेश के जंगलों से तेंदुओं की बादशाहत खत्म होने की संभावना बलवती हो गई है। वन विभाग के तीन दशक पूर्व के आंकड़ों पर यदि नजर दौड़ाई जाए तो वर्ष 1990 तक प्रदेश में बाघ का राज्य कायम रहा। बाघ की बादशाहत खत्म होने के बाद तेंदुओं की संख्या में जबरदस्त इजाफा हुआ और बाघ के बाद तेंदुओं ने जंगल की कमान सम्हाल ली। वर्ष 2008- 2009 में की गई वन्य प्राणियों की गणना में 912 तेंदुए पाए गए थे। 2011 के आंकड़ों के अनुसार मध्य प्रदेश 1,010 तेंदुए थे। मध्यप्रदेश छहों टाइगर पार्क कान्हा किसली राष्ट्रीय उद्यान, बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान, सतपुड़ा राष्ट्रीय उद्यान, पेंच राष्ट्रीय उद्यान, पन्ना राष्ट्रीय उद्यान एवं संजय राष्ट्रीय उद्यान के अलावा प्रदेश के अन्य वन क्षेत्रों में बाघ, तेंदुआ, चीतल, सांभर, गौर, जंगली सुअर, भालू, काला हिरण, उडऩ गिलहरी, मूषक मृग, नील गाय, चिंकारा, जंगली कुत्ता इत्यादि बहुतायत में पाए जाते थे। लेकिन 20 से 27 जनवरी तक वन्य प्राणियों की गणना में तेंदुओं के पगमार्क, मल आदि ऐसे कम चिन्ह नहीं मिले हैं जो तेंदुओं की मौजूदगी का अहसास करा रहे हों। संचालक बांधवगढ़ क्षेत्र सुधीर कुमार कहते हैं कि तेंदुओं की असली संख्या वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के बाद ही बताया जा सकता है।
इस बार 20 जनवरी से शुरू हुई वन्य प्राणियों की गणना में अभी तक इंदौर में 6, देवास में 27, रतलाम में 2, मंदसौर में 10, भोपाल में 4 तेंदुए के होने के संकेत मिले हैं। वहीं झाबुआ, नीमच, उज्जैन, शाजापुर, चित्रकूट, मझगवां सतना, नागौद, उचेहरा, सिंहपुर और बरौंधा में तेंदुए के पगमार्क नहीं मिले हैं लेकिन ग्रामीणों ने देखने की पुष्टि की है। हालांकि वन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि हो सकता है कि बारिश की वजह से पगमार्क और अन्य चिन्ह मिट गए हों। तेंदुओं की संख्या में कमी हो सकती है लेकिन मौजूदगी होने के पूरे चान्स हैं।
वन्य प्राणियों की गणना से जो रुझान अब तक प्राप्त हुए हैं, उसके मुताबिक मांसाहारी वन्य प्राणियों की संख्या में तेजी से कमी आ रही है तो वहीं शाकाहारी जीव जन्तु प्रदेश के जंगलों में बहुतायत मात्रा में दिखाई दे रहे हैं। सतना, मैहर, नागौद और सिंहपुर, नागौद, बरौंधा, चित्रकूट में बंदर, जंगली सुअर, सांभर, नीलगाय, खरगोश, हिरण, चिंकारा, भेड़की आदि शाकाहारी के मौजूद होने की जानकारी गणना कार्य में लगे कर्मचारी दे रहे हैं। बताया जाता है कि इस क्षेत्र में भालू को स्पष्ट रूप से तो नहीं देखा गया है लेकिन पेड़ों और जमीन पर खुरचने के निशान मिले हैं जिससे संभावना जताई जा रही है कि यहां पर भालू मौजूद है।
गणना के मापदंड
पंजे के निशान। पेड़ पर खरोंच के निशान। जंगल कितना घना है, जहां बाघ या तेंदुए रह सकते हैं। हिरण या मवेशियों की संख्या, जिनको खाकर वह जीवित रहता हो। गाय या भैंस के मारने के प्रकरण, आदि जानकारी देहरादून भेजी जाती है। वैज्ञानिक तरीके से पता लगाया जाता है कि क्षेत्र में कितने बाघ या तेंदुए हो सकते हंै। इस तरह की गणना 2005, 2008 में और अब 2014 में हुई है।
हर माह दो तेंदुओं की मौत
मध्यप्रदेश के वनों से बाघ की घटती संख्या से चिंतित सरकार को अब तेंदुए की कम होती संख्या ने परेशानी में डाल दिया है। प्रदेश में हर माह औसत दो तेंदुओं की मौत हो रही है। आंकड़े बताते हैं कि वर्ष-2002 से लेकर 2012 तक के दस सालों में मध्यप्रदेश में 155 तेंदुओं की मृत्यु रिकॉर्ड की गई, जिनमें से 98 अवैध शिकार के खाते में गए। केवल 2011 में 43 तेंदुए मरे, जिनमें से 21 तस्कर-शिकार के घाट उतर गए।
वन्यजीव विज्ञानी विद्या आत्रेय कहती हैं, अंतरराष्टीय स्तर पर तेंदुओं की खाल और हड्डियों की भारी मांग है। चीन में बाघ की हड्डियों का इस्तेमाल पारंपरिक दवाइयों में किया जाता है। इस समय बाघ संरक्षित जीव हैं, इसलिए इसकी हड्डियों को पाना काफी मुश्किल है। दूसरी तरफ, तेंदुआ आसानी से उपलब्ध हो जाता है। तेंदुए और बाघ की हड्डियों में अंतर बता पाना काफी मुश्किल होता है। अंतर सिर्फ इतना है कि तेंदुए की हड्डियां छोटी होती हैं, इसलिए अवैध शिकारी इन्हें बाघ के शावक की हड्डियां कहकर बेचते हैं।
डब्ल्यूपीएसआई के मुताबिक वर्ष 2010 में अवैध शिकार के चलते देश में 180 तेंदुओं की मौत हुई थी। डब्ल्यूपीएसआई के मुख्य परिचालन अधिकारी टीटो जोसफ कहते हैं कि इंसान के साथ हुए संघर्ष के बाद हुई मौतों के आंकड़े को भी जोड़ लें तो यह संख्या 328 तक पहुंच जाती है। इस साल के पहले 6 महीनों में अभी तक अवैध शिकार के चलते 79 मौत हो चुकी हैं, जबकि आबादी में घुसने के कारण 90 तेंदुओं को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा।
सरकार की उदासीनता
दुर्भाग्य से सरकार को इनकी कोई फिक्र नहीं है। वन्य जीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की अनुसूची-1 के तहत तेंदुआ एक संरक्षित प्राणी है। इसके बावजूद बाघों की तुलना में सरकार ने तेंदुओं के संरक्षण के लिए कोई कार्यक्रम तैयार नहीं किया है। डीएसपी मेरिल लिंच के पूर्व चेयरमैन और अब वाइल्डलाइफ कंजरवेशन ट्रस्ट चला रहे हेमेंद्र कोठारी कहते हैं, हम पहले से ही बाघ परियोजना चला रहे हैं। तेंदुओं की सुरक्षा के लिए भी यही सिद्धांत अपनाया जाना चाहिए। एक अलग परियोजना के बजाय हमें जंगलों को संरक्षित करने की जरूरत है।
तेंदुओं का लगातार मारा जाना चिंता का विषय है लेकिन सरकार के पास देश में कुल तेंदुओं से संबंधित कोई आंकड़ा नहीं है। बाघों की गणना के लिए राष्ट्रीय स्तर पर हर 4 साल में अभियान चलाया जाता है, लेकिन तेंदुओं की गणना के लिए ऐसा कुछ नहीं किया जाता है। डब्ल्यूपीएसआई के मुताबिक बीते 10 साल में 1 बाघ की तुलना में 6 तेंदुओं का अवैध शिकार हो रहा है। इसके बावजूद तेंदुओं की अनदेखी हो रही है।
तेंदुए के शिकार के 160 मामले लंबित
मप्र की विभिन्न अदालतों में बाघ के शिकार के 53 मामले और तेंदुए के शिकार के 160 मामले करीब चार दशकों से लंबित हैं। फैसले के लिए लंबित इन मामलों में 20 प्रकरण मप्र के विभिन्न टाइगर रिजर्व में बाघों के अवैध शिकार के हैं।
इन मामलों में अब तक फैसला नहीं
तेंदुए के शिकार का सबसे पुराना प्रकरण 40 वर्ष पूर्व नौ जुलाई 1973 को प्रदेश के शिवपुरी जिले में दर्ज किया गया था, जो अब तक निर्णय के लिए अदालत में लंबित है। प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले में 39 वर्ष पूर्व 14 फरवरी 1975 से एक और तेंदुए के शिकार का मामला अदालत में अब तक चल रहा है।
बाघों के लिए अच्छी खबर
पन्ना में बाघों की पुनर्बसाहट के अच्छे परिणामों के बाद मध्यप्रदेश को ‘टाइगर स्टेट’ का खोया राष्ट्रीय दर्जा लौटाने की मुश्किल चुनौती का सामना कर रहे वन विभाग के लिए ये ताजा संकेत बेहद अहम हैं। महकमे को प्रदेश के पश्चिमी हिस्से के जंगलों में वन्य प्राणियों की गिनती के दौरान कम से कम चार बाघों की मौजूदगी के निशान मिले हैं। इंदौर रेंज के मुख्य वन संरक्षक (सीसीएफ) आर ओखंडियार ने बताया, जंगली जानवरों की गिनती के दौरान हमें रेंज में कम से कम एक बाघ की उपस्थिति के संकेत मिले हैं। उन्होंने बताया कि वन विभाग कोशिश कर रहा है कि बाघ की मौजूदगी के ज्यादा से ज्यादा सबूत जमा किए जाएं, ताकि रेंज के जंगलों में इस प्राणी की बसाहट की तसदीक करने में आसानी हो।
उज्जैन रेंज के सीसीएफ पीसी दुबे ने बताया कि वन्य प्राणियों की गणना के वक्त नजदीकी देवास जिले के उदय नगर क्षेत्र के जंगलों में कम से कम तीन बाघों की मौजूदगी के पुख्ता सबूत मिले हैं। दुबे ने कहा, इनमें से दो बाघों को तो वन विभाग के कर्मचारियों ने अपनी आंखों से देखा है, जबकि एक अन्य बाघ के पदचिह्न पाए गए हैं। उन्होंने बताया कि उदय नगर क्षेत्र में बाघ की मौजूदगी के बारे में वन विभाग को ग्रामीणों से सूचनाएं प्राप्त होती रही हैं। क्षेत्र में बाघ द्वारा ग्रामीणों के मवेशियों के शिकार के सबूत भी मिले हैं। सीसीएफ ने बताया कि उज्जैन रेंज में बाघों की मौजूदगी के नये संकेतों के मद्देनजऱ वन विभाग इस प्राणी के संरक्षण के लिये नये सिरे से योजना बना रहा है। भारतीय वन्य जीव संस्थान (डब्ल्यूआईआई) की एक रिपोर्ट में मध्यप्रदेश के इंदौर और देवास वन क्षेत्रों में करीब सात बाघों की मौजूदगी का अनुमान पहले ही लगाया जा चुका है। डब्ल्यूआईआई की रिपोर्ट ‘स्टेटस ऑफ टाइगर्स, को प्रेडटर्स एंड प्रे इन इंडिया-2010’ के शीर्षक से जारी की गयी थी।

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