लेखक परिचय

मा. गो. वैद्य

मा. गो. वैद्य

विचारक के रूप में ख्‍याति अर्जित करनेवाले लेखक राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ के प्रवक्‍ता और 'तरुण भारत' समाचार-पत्र के मुख्‍य संपादक रहे हैं।

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images (1)भारत की सार्वभौम संसद पर हमले के सूत्रधार अफजल गुरु को ९ फरवरी को तिहाड जेल में फॉंसी दी गई. सर्वोच्च न्यायालय ने, निचले न्यायालय ने दी सज़ा पर मुहर लगाई. उसके बाद भी पुन: अफजल गुरु की ओर से सर्वोच्च न्यायालय में पुनरीक्षण याचिका दाखिल की गई थी. उसका भी फैसला अफजल गुरु के विरोध में गया; और उसकी फॉंसी की सज़ा पक्की हुई. उसके बाद उसकी दया की अर्जी राष्ट्रपति के पास गई. वह अनेक वर्ष वैसी ही पड़ी थी. उस पर निर्णय नहीं हो रहा था. सामान्य जनता और अनेक सियासी पार्टिंयों की भी मांग थी कि, अफजल गुरु को फॉंसी होनी ही चाहिए. मुंबई पर के बम हमले में का जिंदा पकड़ा गया एकमात्र हमलावर अजमल कसाब को फॉंसी पर चढ़ाने के बाद भी अफजल गुरु के मामले का फैसला – मतलब राष्ट्रपति की ओर से उसकी दया की अर्जी पर का फैसला प्राप्त नहीं हो रहा था. अजमल कसाब की फॉंसी के करीब तीन माह बाद वह फैसला आया और ९ फरवरी २०१३ को उसे फॉंसी दी गई.

कॉंग्रेस के लिए प्रश्‍न

इसमें भारत की मतलब भारत सरकार की या भारत के न्यायव्यवस्था की क्या गलती है?

संसद पर जिहादी आतंकवादियों का हमला २००१ के दिसंबर में हुआ था. दिल्ली के न्यायालय ने इस अपराध में शामिल रहने के लिए अफजल गुरु को २००२ में फॉंसी की सज़ा सुनाई थी. उस सज़ा पर के अपील के दरम्यान हर स्तर पर सब प्रक्रिया पूरी होने के बाद, सर्वोच्च न्यायालय ने २००५ में फॉंसी की सज़ा पर मुहर लगाई थी. उसके बाद भी पुनरीक्षण की अर्जी की गई. उस पर भी विचार होकर २००७ में उसे निरस्त किया गया. सर्वोत्तम बात यह होती कि, उसे तुरंत फॉंसी पर लटकाते. राष्ट्रपति के पास दया की अर्जी देने का प्रावधान हमारी व्यवस्था में है. उस व्यवस्था का लाभ उठाते हुए अफजल ने दया की अर्जी दी. उस पर फैसला होने के लिए पॉंच वर्ष से अधिक समय लगा. क्यों? सत्तारूढ कॉंग्रेस पार्टी ने इस प्रश्‍न का उत्तर देना चाहिए. कारण यह प्रश्‍न पूँछने का जनता को अधिकार है; और सत्तारूढ पार्टी उस जनता का ही प्रतिनिधित्व कर रही है.

प्रश्‍नों की मालिका

मुंबई पर हुए बम हमले उसके बाद की घटना थी. भारतीय न्यायव्यवस्था की ओर से जो सुविधा अफजल गुरु को उपलब्ध थी, वही सुविधा अजमल कसाब को भी उपलब्ध थी. उसने भी उन सब सुविधाओं का लाभ लिया. उसने भी राष्ट्रपति के पास दया की अर्जी भेजी थी. लेकिन वह नामंजूर की गई और उसे फॉंसी फर लटकाया गया. अजमल को फॉंसी, अफजल को क्यों नहीं, यह प्रश्‍न स्वाभाविक ही जनता के मन में निर्माण हुआ. उस प्रश्‍न का उत्तर ९ फरवरी को मिला. लेकिन उस उत्तर से भी कुछ प्रश्‍न निर्माण हुए ही. एक प्रश्‍न ऐसा निर्माण हुआ कि इतने विलंब से अफजल को फॉंसी क्यों दी गई? उसे तुरंत फॉंसी क्यों नहीं दी गई? संसद पर हमला यह कोई सामान्य बात नहीं थी. संसद भवन भारतीय जनतंत्र का एक श्रेष्ठ प्रतीक है. आतंकियों का कारस्थान सफल होता, तो कितने सांसदों की बलि जाती, यह कोई बता सकता है? यह घटना भी अमेरिका के गौरवस्थान पर के २००१ के सितंबर में हुए हमले के समान ही थी; और उस निघृण कारस्थान का अफजल गुरु मुखिया था. पाकिस्तान के गौरव प्रतीक पर ऐसा हमला होता, तो अफजल को जो सुविधाए मिली वह उस हमले के मुखिया को मिलती? इस प्रश्‍न का उत्तर मन ही मन देने के पूर्व, किसी समय पाकिस्तान के प्रधानमंत्री रह चुके झुल्फिकार अली भुत्तो का मुकद्दमा कैसे निपटा गया और कैसे उन्हें फॉंसी पर लटकाया गया, इसकी जानकारी का ब्यौरा ले; और फिर इन दो देशों की न्यायव्यवस्था की तुलना करे.

तर्क या तर्कट?

ऐसी स्थिति होते हुए भी, कई वर्ष बीत जाते है और सज़ा पर अमल नहीं होता, इस बात का किसे ताज्जुब लगे तो क्या आश्‍चर्य है? उस सज़ा पर विलंब से ही सही अमल हुआ. स्वाभाविक ही जनता के मन में प्रश्‍न निर्माण हुआ कि, अभी ही यह फॉंसी क्यों दी गई? इसके पीछे क्या राजनीति है? लोगों ने अपने तर्क चलाए. किसी ने कहा, लोकसभा का चुनाव २०१४ के बदले २०१३ में ही होने जा रहा है. किसी दूसरे ने कहा, चुनाव प्रचार में विरोधी पार्टी भाजपा को, कॉंग्रेस की आलोचना करने के लिए मुद्दा न मिले, इसलिए इस समय सज़ा पर अमल किया गया. सच क्या है यह सरकार ही जानती है. मेरा मत यह है कि, फॉंसी तुरंत अमल में लाई जाती, तो भी कश्मीर के घाटी के अलगाववादी, पाकिस्तानपरस्त मुसलमानों की प्रतिक्रिया में कोई फर्क नहीं पड़ता.

पाकिस्तानपरस्त का चरित्र

पाकिस्तान के कदमों में अपनी निष्ठा अर्पित करने वालों की पर्याप्त संख्या कश्मीर की घाटी में है. उन्हें कश्मीर का भारत में हुआ शामिलीकरण मान्य ही नहीं. इन अलगाववादियों में भी तीन प्रमुख गुट है. लेकिन उन सब का, कश्मीर भारत में न रहे, इस बारे में एकमत है. एक गुट को लगता है कि कश्मीर स्वतंत्र राज्य हो, दूसरे को लगता है कि वह पाकिस्तान में विलीन हो. इन सब गुटों के पाकिस्तान की सरकार और फौज के साथ संबंध है, यह सर्वविदित है. हाल ही में इसके सबूत भी मिले है. फिलहाल श्रीनगर में नज़रबंद गिलानी तो खुल्लमखुल्ला पाकिस्तान में कश्मीर का विलीनीकरण चहने वाले है. जिन्हें ऐसी खुल्लमखुला पाकिस्थानपरस्ति मान्य नहीं, उनका अलग गुट है. उसके प्रमुख है मीरवाईज उमर फारूख. वे सौम्य वृत्ति के है, ऐसी धारणा समाचारपत्रों ने जनता के बीच निर्माण की है. लेकिन फिलहाल वे कहॉं है? – पाकिस्तान मे है! किसके साथ सलाह-मश्‍वरा कर रहे है? – मुंबई पर हुए हमले का सूत्रधार, जिसे हमारे हवाले करो ऐसी मांग निरंतर भारत कर रहा है, और जिसका समर्थन अमेरिका ने भी किया है, उस हाफिज सईद के साथ. तीसरा गुट है यासीन मलिक का. उनके गुट का नाम ही ‘जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट’ मतलब जम्मू-कश्मीर के मुक्ति का मंच, है. मुक्ति किससे? अर्थात् भारत से. वे तो सीधे हफीज सईद के साथ एक ही मंच पर उपस्थित हुए है. सारी दुनिया को पता है कि, पाकिस्तान में सही में सत्ता फौज के हाथों में रहती है. बीच-बीच में कुछ समय के लिए जनतांत्रिक व्यवस्था का ढकोसला कहे, या आभास, निर्माण किया जाता है. लेकिन उस व्यवस्था से आई सरकार फौज के विरोध में कोई भी निर्णय नहीं कर सकती. किसी ने ऐसी हिंमत की तो उसे तुरंत सत्ता से बाहर कर दिया जाता है. जनरल अयूबखान, जनरल याह्याखान, जनरल झिया-उल-हक्, जनरल मुशर्रफ ने अपने-अपने अधिकार के समय उस देश के नागरी मुखौटों की सरकारें कुछ ही क्षणों मे नष्ट की और वर्षों तक फौजी ताकत के बल पर अपना शासन चलाया. अब जनरल कयानी की बारी है. उनकी कृपा, और अमेरिका के समर्थन से जरदारी की सरकार चल रही है. हुरियत कॉन्फरन्स के सौम्य वृत्ति के नेता के रूप में जिनकी पहचान है, वे मीरवाईज, जनरल कयानी के साथ गुफ्तगूँ कर रहे है. इन लोगों के पीछे रहने वाली कश्मीरी जनता ने अफजल को फॉंसी देने के लिए रोष प्रकट करने पर कोई आश्‍चर्य नहीं.

मूल्यों की बात

हम ऐसी कल्पना करे कि, कश्मीर में की जनता अफजल को फॉंसी देने से बहुत ही क्षुब्ध हुई है. हमने उन्हे यह मौका नहीं देना चाहिए था. लेकिन मेरा प्रश्‍न यह है कि, अनेक वर्षो के बाद कश्मीर में प्रथम ही स्थानीय संस्थाओं के चुनाव हुए. कश्मीर में की जनता ने ही मतदान में भाग लिया. घाटी के बारे में कहे तो, वहॉं के मुसलमानों ने ही मतदान कर अपने प्रतिनिधि चुनकर दिए और उनके हाथों में कारोबार सौपा. वहॉं अब ९९ प्रतिशत मुसलमानों की ही बस्ती है. यह इन पाकपरस्त मुसलमानों को क्यों नहीं सुहाता? उनकी हत्या क्यों की जाती है? कौन है उन पर खूनी हमला करने वाले. ये वही अलगाववादी लोग है; जिन्हें जनता के प्रतिनिधियों के हाथों में सत्ता नहीं देनी. उनका एक ही लक्ष्य है, कश्मीर पाकिस्तान में शामिल हो; और दु:ख की बात यह है कि, वहॉं इन्हीं लोगों की धाक है. उन्हें मानवी मूल्यों से कोई लेना-देना नहीं. ऐसा होता, तो पाकिस्तान की फौज ने, नियंत्रण रेखा पर, दो भारतीय सैनिकों को पकडकर उनकी हत्या की और उनमें से एक का सिर काट कर ले गये, तब उनके इस क्रूर कृत्य से भी उनमें रोष फूट पड़ता. वे पाकिस्तान का निषेध करने के लिए, कुछ घंटे ही सही, कश्मीर में बंद का आयोजन करते. पाकिस्तान से इतनी तो बिनती करते कि, मारे गए सैनिक का सिर पाकिस्तान की फौज वापस लौटाए. मैं १९९९ के कारगिल युद्ध के समय के पाकिस्तान के क्रौर्य की याद नहीं करा दे रहा. अभी हाल ही में घटित क्रौर्य का उल्लेख कर रहा हूँ. पाकिस्तान के बारे में इन्हें इतना प्रेम है? पाकिस्तान की प्रतिमा, एक अच्छे, न्याय से चलने वाले राज्य की बने, ऐसा इन पाक समर्थक लोगों को लगता है? तो मीरवाईज उमर फारूख ने इस घटना का उल्लेख जनरल कयानी के साथ चर्चा करते समय किया?

भारतनिष्ठ कश्मिरी जनता के लिए

कश्मीर के घाटी में की सब जनता पाकिस्थान समर्थक नहीं. पाकिस्तान की जनता की स्थिति वे निश्‍चित ही जानते होगे. वहॉं कैसे शियापंथियों को चुन-चुन कर मारा जाता है, इसकी जानकारी उन्हें होेगी ही. शाला में पढ़ने वाली लड़की पर गोलियॉं दागकर उसकी हत्या करने का प्रयास करने वाले तालिबानी कहॉं होगे इसकी कल्पना उन्हें होगी ही. कश्मीर की सरकार ने, जो जनतांत्रिक पद्धति से सत्ता में आई है, इस जनता के भावनाओं की दखल लेनी चाहिए. उनका मनोबल बढ़ाने के लिए कदम उठाने चाहिए. मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कहा है कि, अफजल की फॉंसी के कारण कश्मीर की जनता में भारत प्रति परात्मभाव (alienation) निर्माण होगा. लेकिन किस जनता के बीच? भारतनिष्ठ जनता के बीच वह निर्माण होने का क्या कारण है? क्या उन्हें संसद पर हुआ हमला मान्य है? सर्ंपूण न्यायव्यवस्था की प्रक्रिया पूरी होने के बाद अफजल गुरु को फॉंसी पर लटकाया गया, क्या यह उन्हें पता नहीं? फॉंसी के कारण इस जनता में क्षोभ निर्माण होता होगा तो क्या वह झुल्फिकारअली भुत्तो फॉंसी देने के बाद प्रकट हुआ था? या कश्मीर घाटी के हिंदूओं पर अत्याचार कर उन्हें निर्वासित करने पर उन्हें कभी क्रोध हुआ था? उमर अब्दुल्ला को लगता है कि, घाटी के युवकों को, ऐसे ही अपराध के लिए फॉंसी पर लटकाए मकबूल भट के फॉंसी के बारे में असहज नहीं लगेगा, लेकिन अफजल गुरु की फॉंसी के बारे में ऐसा नहीं है. उमर अब्दुल्ला की पार्टी राज्य में अनेक वर्ष सत्तासीन रही है. उन्हीं के कार्यकाल में यह परायापन क्यों बढ़ा, और वह बढ़ा होगा, तो उसके कारण क्या है इसका वे गहराई और गंभीरता से विचार करे. जिस अपराध के लिए फॉंसी का प्रावधान है, उस फॉंसी के लिए उन्हें जनता का समाधान करते आना चाहिए. यह जैसे नॅशनल कॉन्फरन्स की जिम्मेदारी है, वैसी ही वह विपक्ष पीडीपी की भी है. इस पार्टी के सर्वेसर्वा मुफ्ती महमद सईद भारत सरकार में गृहमंत्री रह चुके है. उनका भी संयम छूटे, यह, बहुत ही सौम्य शब्दों का उपयोग करे तो भी, खेदजनक है.

भारतीय समाचारपत्रों ने भी, समाचार लेख प्रकाशित करते समय संयम और औचित्य का ध्यान रखना चाहिए. अफजल गुरु कोई देशभक्त क्रांतिकारक नहीं, जिसे किसी विदेशी हुकूमत ने फॉंसी पर लटकाया. वह हिंसाचार पर विश्‍वास रखकर चलने वाला एक अतिरेकी आतंकवादी है, इसका विस्मरण नहीं होना चाहिए. इस कारण उसका जेल में का सामान या उसके परिवारजनों को देने की सहुलियतों के बारे में अपने मत व्यक्त करने में कोई मतलब नहीं. हिंसाचारी अतिरेकी को न्याय की प्रक्रिया पूर्ण कर फॉंसी दी गई इसका सबको समाधान होना चाहिए.

(अनुवाद : विकास कुलकर्णी)

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