लेखक परिचय

डा. राधेश्याम द्विवेदी

डा. राधेश्याम द्विवेदी

Library & Information Officer A.S.I. Agra

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agraडा. राधेश्याम द्विवेदी
आगरा उत्तर प्रदेश प्रान्त का एक महानगर, ज़िला शहर व तहसील भी है। इतिहास में पहला ज़िक्र आगरा का महाभारत के समय से माना जाता है, जब इसे अग्रबाण या अग्रवन के नाम से संबोधित किया जाता था। कहते हैं कि पहले यह नगर आयॅग्रह के नाम से भी जाना जाता था। तौलमी पहला ज्ञात व्यक्ति था जिसने इसे आगरा नाम से संबोधित किया। विश्व का अजूबा ताजमहल आगरा की पहचान है और यह यमुना नदी के किनारे बसा है। आगरा 27.18° उत्तर 78.02° पूर्व में यमुना नदी के तट पर स्थित है। समुद्र-तल से इसकी औसत ऊँचाई क़रीब 171 मीटर (561 फ़ीट) है। आगरा उत्तर प्रदेश का तीसरा सबसे बड़ा शहर है।आगरा एक ऐतिहासिक नगर है, जिसके प्रमाण यह अपने चारों ओर समेटे हुए है। वैसे तो आगरा का इतिहास मुख्य रूप से मुगल काल से जाना जाता है लेकिन इसका सम्बन्ध महर्षि अन्गिरा से है जो 1,000 वर्ष ईसा पूर्व हुए थे। आगरा शहर को सिकंदर लोदी ने सन् 1506 ई. में बसाया था। आगरा मुगल साम्राजय की चहेती जगह थी। आगरा 1526 से 1658 तक मुग़ल साम्राज्य की राजधानी रहा। आज भी आगरा मुग़लकालीन इमारतों जैसे – ताज महल, लाल किला, फ़तेहपुर सीकरी आदि की वजह से एक विख्यात पर्यटन-स्थल है। ये तीनों इमारतें यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल की सूची में शामिल हैं। बाबर (मुग़ल साम्राज्य का जनक) ने यहाँ चौकोर (आयताकार एवं वर्गाकार) बाग़ों का निर्माण कराया।
केन्द्रीय कारागार:-देश में यह एक मात्र पहला प्रदेश है, जिसके अन्तर्गत आगरा में सर्वप्रथम केन्द्रीय कारागार सन् 1844 में स्थापित किया गया था। इसके बाद वर्ष 1848 में केन्द्रीय कारागार बरेली, वर्ष 1867 में केन्द्रीय कारागार लखनऊ, वर्ष 1868 में केन्द्रीय कारागार फतेहगढ़, वर्ष 1869 में केन्द्रीय कारागार, नैनी (इलाहाबाद) तथा वर्ष 1877 में केन्द्रीय कारागार वाराणसी की स्थापना की गयी।
बंदियों के लिये कल्याण कार्यक्रम:- बंदियों को हिस्ट्री टिकट दिये जाते है। जिनमें उनसे सम्बन्धित विवरण उल्लिखित किये जाते है। प्रत्येक सोमवार को अधीक्षक द्वारा बंदियों की परेड करायी जाती है, जिसमें बंदी अपनी कठिनाइयों को बता सकता है। अधिकांशतया कारागारों में योग, ध्यान एवं धार्मिक प्रवचन, खेल–कूद एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन विभिन्न स्वयं सेवी संगठनों के सौजन्य से किया जाता है। प्रत्येक कारागार में पब्लिक एड्रेस सिस्टेम की स्थापना की गयी है, जिसके माध्यम से प्रतिदिन प्रात: व सांयकाल सर्वधर्म भाव–भजन कीर्तन तथा समय–समय पर संदेश/उपदेश आदि का प्रचार–प्रसार किया जाता है।
सीलिंग पंखा :-बंदियों की सुविधा के लिये नव निर्मित होने वाली सभी बैरकों में पंखा लगाये जाने का निर्णय लिया गया है। इस परिप्रेक्ष्य में कारागार के अधिकांश पुरानी बैरकों में सीलिंग पंखों की स्थापना की गयी है। अवशेष बैकों में भी सीलिंग पंखों की व्यवस्था की जा रही है। प्रत्येक कारागार में कैन्टीन की सुविधा उपलब्ध है। जहाँ से प्रत्येक बंदी माह में रू. 600/– प्रति धनराशि का सामान अपने प्रयोग के लिये क्रय कर सकता है।
मनोरंजन एवं ज्ञानार्जन की सुविधा:-बंदियों के मनोरंजन, ज्ञानवर्धन तथा सामाजीकरण की दृष्टि से सभी कारागारों की बैरकों में टेलीविज़न सेट तथा प्रत्येक कारागार में एक–एक नग बी0सी0सी0 और जन संचार प्रणाली उपलब्ध कराये गये है। महिला कारागारों/आहातों तथा किशोर बंदी आहातों में अलग से रंगीन टेलीविज़न सेट उपलब्ध कराये गये है। बंदियों के लिये खेलकूद की सुविधायें उपलब्ध है।
कारागार में पुस्तकालय की व्यवस्था:-प्रत्येक कारागार में एक पुस्तकालय कार्यशील है, जिसमें बंदियों के उपयोगार्थ विभिन्न प्रकार के पर्याप्त संख्या में पुस्तकें, साहित्य एवं पवित्र धार्मिक ग्रन्थ यथा रामचरितमानस, भागवतगीता, कुरान और बाइबिल के चार–चार सेट आदि की व्यवस्था उपलब्ध है। पुस्तकालयों में उक्त पवित्र धार्मिक ग्रन्थों का सम्मान पूर्वक पृथक रख–रखाव किया गया है। इसके अतिरिक्त प्रत्येक कारागार में दैनिक समाचार–पत्र भी उपलब्ध कराये जाते है।
शिक्षा की व्यवस्था:-सभी कारागारों में निरक्षर बंदियों को साक्षर बनाये जाने हेतु ‘नया सवेरा योजना’ संचालित है। इस योजना के अन्तर्गत सफल बंदियों को 15 दिन का विशेष परिहार महानिदेशक द्वारा स्वीकृत किया जाता है। इसके अतिरिक्त स्वयं सेवी संगठनों के सहयोग से भी बंदियों की साक्षरता हेतु विशेष अभियान चलाये जाते है।
बंदी के मानवाधिकारों का संरक्षण:- कारागारों में दण्ड स्वरूप बंदियों को बेड़ी एवं हथकड़ी लगाने और कृषि फर्मो पर कार्य करने वाले बंदियों के पैरो में कडि़याँ डालने की व्यवस्था समाप्त कर दी गयी है। बंदियों के मानव अधिकारों के संरक्षण एवं राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग द्वारा संदर्भित मामलों के अनुश्रवण आदि के लिये शासन स्तर पर मुख्यालय स्तर पर मानव अधिकार प्रकोष्ठ गठित है। बंदियों की मृत्यु के मामलों में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग से प्राप्त नोटिसों एवं सामान्य शिकायतों की जांच तत्परतापूर्वक करायी जाती है।
बंदियों द्वारा अर्जित पारिश्रमिक का बैंक खातों में रख–रखाव:-कारागारों में बंदियों को उनके द्वारा सम्पादित कुशल, अद्र्धकुशल एवं अकुशल श्रम के लिये क्रमश: 18/–, 13/–एवं 10/– की दरों से पारिश्रमिक का भुगतान किया जाता है। शासन द्वारा बंदियों के पारिश्रमिक की दरों में समय–समय पर संशोधन किये जाने की भी प्रक्रिया अपनायी जाती है। कारागारों में निरूद्ध सिद्धदोष बंदियों द्वारा अर्जित पारिश्रमिक का सम्बन्धित कारागार के वरिष्ठ अधीक्षक/ अधीक्षक के नाम खुले बैंक खाते में रखे जाने तथा इनकी लेजर में अद्यावधिक प्रविष्टि अंकित किये जाने और प्रत्येक कारागार में प्रत्येक बंदी के सम्बन्ध में श्रम उपस्थिति पंजिका अर्जित पारिश्रमिक की धनराशियों की लेजर में प्रविष्टियों एवं पासबुकों का अद्यावधिक रख–रखाव नियमित रूपेण किये जाने की व्यवस्था की गयी है।
कारागारों में पर्यावरण सुधार:-कारागारों में पर्यावरण सुधार की दृष्टि से प्रदेश की समस्त कारागारों में वृक्षों का रोपण कराया जा रहा है। पालीथीन के प्रयोग के शत् प्रतिशत निर्मुक्तिकरण हेतु कारागारों में इसके उपयोग से होने वाली हानियों के प्रति बंदियों में जागरूकता उत्पन्न किये जाने के निमित्त कारागारों में प्रचारों वाक्यों (श्लोगनों) का पटल–लेखन कराये गये है। पालीथीन बैग के प्रयोग का शत् प्रतिशत उन्मूलन करने के निमित्त वैकल्पिक व्यवस्था के अन्तर्गत प्रथम चरण में जिला कारागार सहारनपुर, कानपुर तथा आदर्श कारागार लखनऊ में कागज के थैलों का निर्माण कराये जाने की व्यवस्था आरम्भ की गयी।
रोजगारपरक व्यावसायिक प्रशिक्षण की व्यवस्था:-बंदियों को उनके सफल सामाजिक पुर्नवासन हेतु विभिन्न रोजगारपरक उद्यमों में प्रशिक्षण प्रदान करने तथा कारागारों की आवश्यकतानुरूप विभिन्न औद्योगिक उत्पादनों के दृष्टिगत कतिपय प्रमुख उद्योग केन्द्रीय कारागारों–आगरा, बरेली, फतेहगढ़, नैनी व वाराणसी, आदर्श कारागार लखनऊ तथा जिला कारागार उन्नाव में ही संचालित किये जा रहे हैं। प्रमुख उद्योगों में बुनाई, साबुन एवं फिनायल, जूता एवं चप्पल, कम्बल, दरी एवं कपड़ा, काष्ठकला, लौह उद्योग, बन्दीरक्षक यूनीफार्म सिलाई उद्योग, एनामल पेन्टस, कालीन, पीतल, तम्बूख् रंगाई, छपाई, निवाड़, चिक, पावरलूम, कागज विनिर्माण, प्रिटिंग प्रेस, गमछा, बस्ता, बेडशीट, सिलाई, कढ़ाई, बुनाई, लूम कारपेट, आसनी, फल संरक्षण, उद्योग तथा मसाला पिसायी उद्योग आदि उल्लेखनीय है। बंदियों द्वारा उत्पादित वस्तुओं का उपयोग सामान्यतय: कारागारों की आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु किया जाता है। आवश्यकता से अधिक उत्पादों का विक्रय लखनऊ स्थित जेल डिपों के माध्यम से किया जाता है। केन्द्रीय कारागार, फतेहगढ़ द्वारा उत्पादित टेण्ट तथा छोलदारी की आपूर्ति प्रदेश के पुलिस व वन विभाग के अतिरिक्त अन्य प्रदेशों में की जाती है। सभी केन्द्रीय कारागार व जिला कारागार, उन्नाव में बंदीरक्षकों के यूनीफार्म व बंदी वस्त्रों की सिलाई की जाती है। समय–समय पर विभिन्द्र पुरोनिधानित योजनाओं के अन्तर्गत विभिन्न कारागारों में एक से अधिक श्रेणी के विविध रोजगारपरक उद्यमों में व्यावसायिक प्रशिक्षण कार्यक्रमों के संचालन की व्यवस्था की जाती है।
महिला बंदियों के लिये सुविधायें:-महिला बंदियों के लिये सैनिटरी नैपकिन की व्यवस्था समस्त कारागारों में की गयी है। महिला बंदियों द्वारा स्वयं भोजन प्रबन्धन की व्यवस्था चरणबद्ध रूप से की जा रही है। जेल मैनुअल में विहित प्राविधानानुरूप महिला बंदी अपने साथ 06 वर्ष तक की आयु के बच्चों को साथ में रख सकती है। बच्चों के लिये प्रदेश की 10 कारागारों में क्रेच भी स्थापित है। इसके अतिरिक्त नारी बंदी निकेतन, लखनऊ की महिला–बंदियों के बच्चों के लिये पब्लिक स्कूलों में शिक्षण की भी व्यवस्था की जा रही है। बंदियों को फल संरक्षण, सिलाई, कढ़ाई, बुनाई, क्रोशिया आधारित बुनाई, अचार व चटनी बनाने की विधि आदि रोजगारपरक उद्यमों में प्रशिक्षण दिलाया जाता है।
आध्यात्मिक उन्नयन के कल्याणपरक कार्यक्रम:आध्यात्मिक उन्नयन हेतु योग, ध्यान प्रशिक्षण तथा हवन यज्ञ आदि के आयोजन और बंदियों के चिकित्सा परीक्षण व उपचार के सम्बन्ध में स्वास्थ्य परीक्षण शिविर, नेत्र परीक्षण शिविर तथा उनके बच्चों के लिये पोलियो कैम्प व टीकाकरण कार्यक्रमों का आयोजन समय–समय पर किया जाता है। विभिन्न स्वयं सेवी संस्थाओं द्वारा महिला बंदियों के लिये शाल आदि तथा बच्चों के लिये गर्म वस्त्र, जूते व मोजे आदि की व्यवस्था की जाती है। प्रत्येक सोमवार को स्वयं सेवा संस्था द्वारा मेडिकल तथा स्वास्थ्य सम्बन्धी व्याख्यान दिलाये जाने तथा एड्स एवं गम्भीर बीमारियों के बारे में जानकारी दिये जाने की व्यवस्था की गयी है। विभिन्न स्वयं सेवी संगठनों के तत्वाधान में साक्षरता शिविरों का आयोजन किये जाने और प्रत्येक निरक्षर महिला बंदियों को कार्यरत महिला अध्यापिका द्वारा साक्षर बनाये जाने की व्यवस्था भी समय–समय पर की जाती है।
शिकायती/पिटीशन बाक्सों की स्थापना:-प्रत्येक कारागार के मुख्य द्वारा के बाहर जन सामान्य की जानकारी हेतु मुलाकात, रिहाई और प्रतिबन्धित वस्तुओं आदि के सम्बन्ध में प्रचलित निदेर्शों व प्रक्रियाओं का प्रदर्शन नोटिस बोर्ड पर किया जाता है तथा महानिदेशक/ जिला जज/ जिलाधिकारी के नाम से पिटीशन/ लोक शिकायत बाक्स स्थापित किया गया है, जिसमें प्राप्त शिकायतों/आवेदनों का नियमानुसार समयबद्ध निस्तारण किया जाता है।
क्रांतिकारियों की स्मृति जीवंत बनाए गए:– चटगांव केस से जुड़े क्रांतिकारी गणेश घोष अपने साथी प्रतुल भट्टाचार्य के साथ बरेली केन्द्रीय कारागार में नजरबंद रखे गए थे। उत्तर प्रदेश के बरेली नगर से आए वरिष्ठ साहित्यकार सुधीर विद्यार्थी ने बताया कि बंगाल के क्रांतिकारी गणेश घोष के नाम पर उन्होंने दो वर्ष पूर्व बरेली के केन्द्रीय कारागार में एक बैरक के द्वार का नामकरण कराने के साथ ही उनकी स्मृति में शिलालेख तथा उनका चित्र भी लगवा दिया है। विद्यार्थी का कहना है कि ऐसा उन्होंने केन्द्रीय कारागारों में रहे देश के क्रांतिकारियों की स्मृति को जीवंत बनाए रखने के अपने उस अभियान के तहत किया है जिसके चलते अब तक बरेली केन्द्रीय कारागार में 11 तथा आगरा के केन्द्रीय कारागार में 10 क्रांतिकारियों की स्मृतिरक्षा का कार्य पूरा कर चुके हैं।
‘तिनका-तिनका’ थीम सॉन्ग जल्द रिलीज होगा:-आगरा केंद्रीय जेल का थीम सॉन्ग ‘तिनका-तिनका..’ तैयार है. यह जल्द रिलीज होगा. जेल के ही 12 कैदियों ने इस गाने को आवाज दी है. कैदी दिनेश कुमार ने दिया है इस गाने को अंतिम रूप दिया है. वर्तिका नंदा अलग-अलग जेल के गानों की सीरीज पर काम कर रहीं. आगरा की केंद्रीय जेल के बारह कैदी दिनेश कुमार गौड़, संजय कश्यप, यशपाल सिंह, वीरेंद्र सिंह, अशोक कुमार, जुगनू, शकील अंसारी, संजीव यादव सोनी, पप्पू चौहान, सुरेश ऐलानी और विजय इन दिनों आगरा के थीम सॉन्ग पर काम कर रहे हैं. दिनेश कुमार गौड़ इस गीत के प्रमुख गायक हैं. उन्होंने ही इस गाने को अंतिम रूप दिया है. ढोल, मजीरे और हारमोनियम के साथ जेल के यह कैदी इस गाने का केंद्रीय जेल के मंदिर के नियमित अभ्यास कर रहे हैं. यह सभी कैदी आजीवन कारावास पर हैं और जेल की गायन मंडली का हिस्सा रहे हैं.
‘तिनका-तिनका आगरा’ शीर्षक का यह गाना जल्द ही रिलीज होगा और यह जेल का थीम सॉन्ग बनेगा. इससे पहले वर्तिका नंदा का लिखा गाना ‘तिनका-तिनका डासना’ उत्तर प्रदेश की डासना जेल का थीम सांग बना था और ‘तिनका-तिनका तिहाड़’ दिल्ली की तिहाड़ जेल का. हालांकि इस बार वर्तिका के आग्रह पर आगरा के गाने को बंदियों ने ही लिखा है और यह तिनका सीरीज का एक बड़ा हिस्सा बनेगा. आगरा के जेलर लाल रत्नाकर कई महीनों से जेल के कैदियों को प्रोत्साहित कर इस गाने के लिए तैयार करवा रहे हैं.वर्तिका नंदा अलग-अलग जेल के गानों की सीरीज पर काम कर रही हैं और यह काम इसका एक प्रमुख हिस्सा होगा. अपराधों पर जागरूकता लाने के लिए वे राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से 2014 में स्त्री-शक्ति पुरस्कार से भी सम्मानित हो चुकी हैं. इसके साथ ही आगरा जेल में ‘तिनका-तिनका आगरा’ की थीम पर वर्तिका नन्दा की लिखी कुछ खास पंक्तियों को भी प्रमुख दीवार पर उकेरा गया है.

 

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