लेखक परिचय

डा. राधेश्याम द्विवेदी

डा. राधेश्याम द्विवेदी

Library & Information Officer A.S.I. Agra

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डा. राधेश्याम द्विवेदी
आगरा की सुरक्षा घेरा एक समान नहीं रहीं। यह समय समय पर आवश्यकता के अनुकूल बदलती रही। प्रथम सुरक्षा घेरा शेरशाह सूर के पुत्र सलीम शाह सूर के समय हुई थी। उस समय यहां 16 दरवाजों से शहर के सुरक्षा की जिम्मेदारी निभाई जाती थी। द्वितीय सुरक्षा घेरा अकबर के समय देखी गयी जब 6 दरवाजे महत्वपूर्ण बने। उत्तर मुगलकाल में मुहम्मदशाह रंगीले के समय में आगरा का सूबेदार आमेर के राजा जयसिंह थे। उन्होंने अपने कार्यकाल 1719- 48 ई. के मध्य शहर की चहारदीवारी पुनः बनवाई। इससे आगरा का क्षेत्रफल 11 वर्ग मील हो गया था। बाद में पुलिस की सिपारिश से व्रिटिश काल में 1813 ई. में शहर की चहारदीवारी पुनः बनवाई गयी। स्वतंत्रता आन्दोलन से घबड़ाये ब्रिटिश अधिकारियों ने उक्त चहारदीवारी 1881 ई. में तोड़वा दिया था।
कारलाइल की रिपोर्ट :- भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के लिए सर्वेक्षण करने वाले पुराविद श्री ए. सी. एल. कारलाइल ने 1871-72 में सर्वे किया था। उनकी यह सर्वे रिपोर्ट प्रथम संस्करण के रूप में 1874 में सामने आई। श्री कारलाइल ने लिखा है कि “मैंने आगरा की चाहरदीवारी चाहे वह मौजूद है या बर्बाद हो चुकी है, का पूरा सर्वेक्षण और नापतौल की है। इसके मूल के बहुत कम अवशेष बचे हैं। सबसे ज्यादा विचारणीय अवशेष आगरा पश्चिम के गोकुलपाड़ा जो लोहामंडी क्षेत्र का हिस्सा में हैं। गोकुलपुरा के पीछे ही कंस गेट और गणगौर गेट के अवशेष मिले हैं। यह लोहामण्डी का एक भाग था। जबकि इसके दोनो ओर इसके व नदी के बीच का घेरा नष्ट हो चुका है। किले के उत्तरी पूर्वी किनारे से जाफर खां के मकबरे तक जाते हैं, फिर पश्चिम की ओर मुड़कर दक्षिण को पुनः किले के तरफ आते हैं। इस प्रकार शहर का घेरा नदी से खटिक बाग तक 9200 फिट ऊपर तक आता है। यहां से जफर खां का मकबरा थोड़ी ही दूर रह जाता है। यहां 566 फिट की दीवाल 1872 के सर्वेक्षण के दौरान पायी गयी थी। जाफर खां के के मकबरे से बाहर जाने पर जालमा कुष्ट आश्रम के पीछे तक आने पर एक पेड़ की शाखाओं में हनुमानजी की मूर्ति है। वहां से आगे सुल्तानगंज तक जाते है। उसे छोड़ते हुए बाहर वजीरपुरा तक आते हैं। वजीरपुरा को बाहर छोड़ते हुए सेन्ट्रल जेल (संजय प्लेस) तक आते हैं। वहां से दिल्ली गेट जाते है। मथुरा मार्ग को क्रास करते हुए आलमगंज बाजार के गेट, वहां से फतेह मोहम्मद गेट को एक तरफ छोड़ते हुए, वहां से वापस लोहामण्डी आते हैं। फिर भरतपुर मार्ग को क्रास करते हुए छंगा मोदी गेट पहुंचते हैं। वहां पीछे हिजड़ों की मस्जिद छूट जाती है। वहां से फूटा फाटक और फिर वहां से गोकुलपुरा के पीछे आते हैं। वहां से गणगौर गेट और फिर आगे कंस गेट, वहां से छोटा ग्वालियर गेट पहुंचते हैं। वहां से अजमेर गेट पहुचते हैं। अब शाहगंज मार्ग को नाघते हैं। फिर ईदगाह मस्जिद पडती है। वहां से नामनेर होते हुए आगे बालूगंज आते हैं। वहां से लक्ष्छीपुरा को पीछे एक तरफ छोड़ते हुए आगे गरीपुरा और फिर वहां से हाजीपुरा ( जो ताजमहल से 2 मील की दूरी पर है) तक पहुंचते हैं। इसके आगे अन्य कोई अवशेष दीवाल का नहीं प्राप्त हुआ।“
कारलाइल के समय में आगरा शहर का क्षेत्रफल : – आगरा की चाहरदीवारी की नापजोख आगरा किला के नजदीक खटीक बाग से शुरू होती है। यह बाग यमुना किनारे के जफर खान के मकबरे के पास है। आगरा के चारों तरफ घूमती हुई दिल्ली गेट और अजमेर गेट जो ताजमहल के पास हैं, जाकर खत्म होती है। 1872 के सर्वेक्षण में यह हिस्सा, औसतन कुल 6,548 फुट 9 इंच लंबा मिला है। यदि कुल बिलुप्त चाहरदीवारी की गणना करें तो करीब 32,689 फुट से कम नहीं बैठेगी। कारलाइल ने आगरा की पश्चिम से पूर्व तक की चौड़ाई की भी गणना की है। यह छिंगा मोदी गेट, भरतपुर रोड से पॉंटून ब्रिज (वर्तमान में हाथीघाट के नजदीक वाला पुल) तक मापी गई है। आगरा की लंबाई आगरा के उत्तर से दक्षिण की मापी गई है। यह खटीक बाग (नजदीक जफर खां का रोजा) यमुना का उत्तरी आखिरी किनारा से हाजीपुरा, (ताजमहल से दो मील दक्षिण में है) तक मापा है। सन 1871-72 के तथ्य के आधार पर कुछ प्रमुख माप इस प्रकार हैं। आगरा की लंबाई उत्तर से दक्षिण खटीक बाग से हाजीपुरा 18,700 फुट है। आगरा की चौड़ाई पूरब से पश्चिम छिंगा मोदी गेट से पॉटून ब्रिज तक 11,500 फुट है। आगरा जनपद की परिधि 9.5 मील है तथा आगरा जनपद का क्षेत्रफल 5,500 वर्ग मील है।
चाहरदीवारी वाला आगरा शहर :- यद्यपि आगरा को खुला शहर कहा जाता है परन्तु एसा नहीं है। सुरक्षा की दृष्टि से यह एक चहारदीवारी से घिरा शहर था। इसके अवशेष जगह जगह पर विखरे देखे जा सकते हैं। यह 4 से 5 फिट मोटा था। आगरा किले से अलग एक कंसघेरा भी था। इसे हम नगर दुर्ग भी कह सकते हैं। अकबर के समय नगर के चारो ओर चहारदीवारी नहीं थी, अपितु गहरी खाइयां थीं। जिन्हें इन 6-7 दरवाजों के माध्यम से पार किया जाता था। इन दरवाजों के नाम निम्नलिखित हैं-1 मदर गेट, 2. चचर्सु गेट, 3. नीम दरवाजा, 4.बांस दरवाजा, 5. पुत्तू दरवाजा ,6. केस गेट तथा 7. इलाही गेट आदि।
गोकुलपुरा की चहारदीवारी व उसका विनाश :- 1857 ई. की क्रांति के समय गोकुलपुरा प्रतिष्ठित व सम्पन्न लोगों की आबादी से भरपूर थी। यहां के सोमेश्वर मंदिर में तात्या टोपे का बहुत लम्बे समय तक छिपे रहे। जब अंग्रेजों को यह पता चला तो वहां के लोगों से प्रतिशोध लेने के उद्देश्य से उसे नष्ट करवा दिया गया। इसके साथ ही साथ आगरा कालेज पर विद्रेहियों के हमले व अंग्रेजों की हत्या से बौखलाये अंगेज कलेक्टर ने गोकुलपुरा को तोपों से तहस नहस करने का आदेश दे डाला था। आगरा कालेज के प्रो. सालिगराम , मलखान सिंह व शंकरलाल ने बड़ी मुश्किल से एसा करने से कलैक्टर को मनाया था। गोकुलपुरा तो बच गया पर उसकी मजबूत चहारदीवारी व परकोटा तोपों से उड़ा दिया गया। छंगामोदी का पुल तथा कंस दरवाजा उसी चहारदीवारी के अवशेष है।
आगरा के प्रमुख प्राचीन बचे हुए दरवाजे :- आमतौर पर जाना जाता है कि फतेहपुर सीकरी चाहरदीवारी वाला शहर था,ऐसी मान्यता आगरा शहर के बारे में नहीं है। आगरा भी चाहरदीवारी वाला शहर था। दिल्ली गेट इसी चाहरदीवारी के प्रमुख दरवाजों का जीता जागता प्रमाण है। छिंगा मोदी गेट और कंस गेट भी इसी की गवाही देते हैं। आगरा के नगर की चहारदीवारी पर सलीम शाह सूर के समय पर 16 गेट व अनेक मीनारें और बुर्जियां बनी हुई थीं। उस समय आगरा का गवर्नर राजा जय सिंह हुआ करते थे जो शहर तथा राजधानी की सुरक्षा व व्यवस्था के लिए अनेक गेट व दीवालें बनवाये थे।
1. ताजगंज का दक्षिणी गेट :- ताजमहल से एक किमी. दूर मुख्यद्वार तथा सीडीगेट के सिधाई में ताजगंज के बीचोबीच मे यह संरक्षित दरवाजा स्थित है। यह लाखैरी ईंटों तथा चूने के गगारे से बना है। इसके ऊपरी आवरण पर लाल पत्थर की चिनाई की गयी है। यह शाही ताज रोजा तथा मुमताजाबाद के बीच जुड़ा हुआ प्रवेशद्वार , जो पहचान स्वरुप यह बतलाता है कि दिल्ली लाहौर अजमेर तथा प्रमुख शहरों तथा भारत के उत्तर भाग में जाने के लिए इसी गेट से होकर जाना पड़ता था। इस दरवाजे के निर्माण का संभावित समय 1630-48 ई. है।
2.ताजगंज के चार कटरों के दरवाजे :- ताजगंज में चार कटरे तथा चार दरवाजे बने हुए हैं जो भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षणके अधीन संरक्षित हैं।
2.(1) उमरखां कटरा का दरवाजा – ताजमहल के बाहरी दीवार के दक्षिण पश्चिम में सिडी गेट के पश्चिम में यह स्थित है। यह मूलतः चूने व सुर्खी से तथा बाह्य आवरण लाल बलुए पत्थरों से निर्मित हुआ है। कटरा उमर खां का यह प्रवेशद्वार भी है। मूलरुप से ताजमहल के निर्माण में लगे श्रमिकों के लिए यह बना था। संभव है यह क्षेत्र पच्चीकारों का आवास स्थल रहा हो। इसका संभावित समय 1631- 52 ई. है। दरवाजे पर उर्दू में ‘कटरा उमर खां’ लिखा हुआ है।
2.(2) फुलेल कटरा का दरवाजा – ताजमहल के बाहरी दीवार के दक्षिण पूरब में सिडी गेट के पूरब में यह स्थित है। यह मूलतः चूने व सुर्खी से तथा बाह्य आवरण लाल बलुए पत्थरों से निर्मित हुआ है। कटरा फुलेल का यह प्रवेशद्वार भी है।मूलरुप से ताजमहल के निर्माण में लगे श्रमिकों के लिए यह बना था। संभव है यह क्षेत्र पच्चीकारों का आवास स्थल रहा हो। इसका संभावित समय 1631- 52 ई. है। दरवाजे पर उर्दू में ‘कटरा फुलेल’ लिखा हुआ है।
2.(3) रेशम कटरा का दरवाजा – यह दरवाजा ताजगंज डाकखाने के पश्चिम तथा थान्हें के दक्षिण पूरब में स्थित है। यह मूलतः चूने व सुर्खी से तथा बाह्य आवरण लाल बलुए पत्थरों से निर्मित हुआ है। यह रेशम कटरा का प्रवेशद्वार भी है। इसका संभावित समय 1631-52 ई. है। दरवाजे पर उर्दू में ‘कटरा रेशम’ लिखा हुआ है।
2.(4) जोगीदास कटरा का दरवाजा – यह दरवाजा चौक कघजन के दक्षिण पश्चिम तथा ताजंगज पोस्टआफिस के पीछे की तरफ स्थित है। सके अन्दर के क्षेत्र को जोगीदास कटरा कहा जाता है। इसका संभावित समय 1631-52 ई. है। दरवाजे पर उर्दू में कटरा जोगीदास लिखा हुआ है।
3. दिल्ली गेट :- आगरा शहर में दिल्ली दरवाजों की संख्या तीन थी। इनका समय और स्थान अलग अलग रहे हैं।
3.(1) पुराना दिल्ली दरवाजा – प्रसिद्ध इतिहासविद् आई पी. गुप्ता ने 16वी 17वीं शताब्दी के आगरे के आगरे के मानचित्र में दयालबाग क्षेत्र में पुराना दिल्ली दरवाजा दर्शाया है। उस समय यहां सिटी वाल भी थी। अकबराबाद लिखा हुआ माइलस्टोन भी यहां लगा हुआ था। प्रतीत होता है नदी के रास्ते शहर में प्रवेश की सहूलियत के लिए यह संकेत तथा दरवाजा बना हुआ था। प्रतीत होता है कि पोइया बन्दरगाह तथा घाट होकर ही इस समय शहर में प्रवेश होता रहा है।
3.(2) आगरा किला स्थित दिल्ली द्वार – आगरा किला में शहर की ओर का दिल्ली द्वार, चारों में से भव्यतम है। इसके अंदर एक और द्वार है, जिसे हाथी पोल कहते हैं, जिसके दोनों ओर, दो विशालाकार पाषाण हाथी की मूर्तियां हैं, जिनके सवार रक्षक भी खड़े हैं। एक द्वार से खुलने वाला लकड़ी का पुल है, जो खाई पर बना है व एक चोर दरवाजा, इसे अजेय बनाते हैं। स्मारक स्वरूप दिल्ली गेट, सम्राट का औपचारिक द्वार था, जिसे भारतीय सेना द्वारा (पैराशूट ब्रिगेड) हेतु किले के उत्तरी भाग के लिये छावनी रूप में प्रयोग किया जा रहा है। यह भारत सरकार द्वारा संरक्षित द्वार है। दिल्ली द्वार जन साधारण हेतु खुला नहीं है। यह द्वार 1566 ई 1568-69 में बनकर पूर्ण हुआ है। इस द्वार के दोनेा ओर दो बड़े बड़े अष्टकोणीय गुम्बद हैं। इसे नौबतखाना के रुप में प्रयोग में लाया जाता था। इन पर सुन्दर जड़ाऊ काम हुआ है। इसे चारो ओर संगमरमरों से अलंकृत किया गया है। द्वार के दोनो ओर छतरीदार विशाल कई मंजली अट्टालिकायें हैं। इनमें पत्थर की कटाई, रंगीन चित्रकारी, चूने का अलंकरण एवं रंगीन टाइल्स का प्रयोग हुआ है। प्रवेशद्वार के बाहरी दूसरी ओर अष्टकोणाकार मीनारों में दो ऊंचे हाथी बने हुए हैं। इनपर जयमल और पत्ता नामक दो बीरों को सवारी करते हुए दिखाया गया है। इसे ऊंचाई देने के लिए दोमंजिला प्रवेशद्वार बनाया गया है। बुर्जों के बीच ब्रेकटों में बालकनी बनी हुई है। निचली मंजिल में प्रवेशद्वार के सिवाय कोई खाली जगह नहीं है। प्रवेशद्वार की सजावट बड़ा दिलचस्प है। पत्थर की कटाई के काम के अतिरिक्त मेहराबों और पैनलों पर लाल बलुए पत्थरों के आधार पर संगमरमर जड़कर सुन्दर डिजाइनों से सजाया गया है। इस पर रंगीन चित्रकारी, चूने के अलंकरण, रंगीन टाइल्सों से परदार सांप, हाथी, फूल पत्तियां और चिड़ियों की डिजाइनें बनाई गई हैं।
3.(3) शहर मध्य स्थित दिल्ली द्वार – इसे सलीमशाह सूरी के 16 दरवाजों में गिना जाता है। राजामण्डी रेलवे स्टेशन तथा क्वीन विक्टोरिया स्कूल इसके पास ही में है। यह आगरा की मुगलकालीन चाहरदीवारी का सबसे महत्वपूर्ण द्वार था। इससे मथुरा, दिल्ली और लाहौर की ओर कूच किया जाता था। ईंट तथा चूने के गारे से मूल रुप से निर्मित इस द्वार पर आज पत्थरों का आवरण भी है। दरवाजे के ऊंचाई से करीब 5 फिट छोटी एक सुरक्षा दीवार भी बनी हुई है। दरवाजे के ऊपर चार चार स्तम्भों वाली दो छतरियां भी बनी हुई हैं। इनके बीच में छोटी छोटी सुन्दर कलाकृति की लाल गुमटियां बनी हुई हैं। दरवाजे के बगल मे अतिक्रमणकर मस्जिद और दूकान बना ली गयी हैं जो द्वार की छवि को प्रभावित करती हैं। दिल्ली मार्ग पर थोड़ी-थोड़ी दूर पर कोस मीनार बनाईं गईं थीं। हर कोस मीनार के पास यात्रियों के ठहरने की व्यवस्था और एक कुआं होता था। दिल्ली गेट लाल पत्थर से निर्मित है। यहां पर शिलालेख में हिंदी, अंग्रेजी में ‘दिल्ली दरवाजा’ लिखा है। वर्तमान में नगर में आने-जाने की सुविधा को ध्यान में रखकर ज्यादा चौड़ा रोड बगल में अलग से बना दिया गया है। यह इमारत भारतीय पुरातत्व विभाग द्वारा 22 दिसम्बर 1920 को संरक्षित घोषित किया गया है।
4. अजमेरी गेट :- ब्रिटिश काल में डूमंड रोड (वर्तमान में महात्मा गांधी रोड) पर सुभाष पार्क के सामने पचकुइंयां की ओर जाने वाले मार्ग पर अजमेरी गेट था। यह आगरा की चाहरदीवारी के प्रमुख 16 दरवाजों में से एक था। सन 1867 में अंग्रेजों द्वारा कोठी मीना बाजार में उत्तर पश्चिम प्रांत की लगाई गई प्रदर्शनी में सामान लाने-लेजाने में दिक्कत होने के कारण इसे ध्वस्त कर दिया गया। आगरा से फतेहपुर सीकरी, भरतपुर, जयपुर जाने के लिए यह प्रमुख मार्ग था। जयपुर से मुगल सल्तनत के करीबी संबंध थे। अकबर की पत्नी और जहांगीर की मां आमेर (जयपुर) की राजकुमारी थी।
5. कंस दरवाजा :- भगवान श्री कृष्ण का सगा मामा लेकिन अत्याचारी शासक कंस के नाम पर भी एक ऐतिहासिक गेट आगरा में है। आमतौर पर माना जाता है कि आगरा महाभारतकाल में कंस का जेलखाना था। यहां पर लोगों को यातना और सजा देने के लिए निरुद्ध किया जाता है। उसी परम्परा को जीवित रखने के लिए गोकुलपुरा की दक्षिणी चहारदीवारी के पास कंस नाले के ऊपर कंस गेट का निर्माण किया गया था। एसा विश्वास किया जाता है कि अकबर के शासन काल में गुजरात से आये गोकुल नामक ‘नागर’ ब्राह्मण ने इसे बनवाया था। मोहम्मदशाह के समय आगरा के तत्कालीन गवर्नर राजा जय सिंह द्वारा भी इसे बनवाने की बात कही जाती है। कंस द्वार का नाम कैसे पड़ा, इसके पीछे भी एक काफी रोचक दास्तान है। होली की पड़वा को इस गेट पर कंस का पुतला बनाया जाता था। मंसा देवी मंदिर से भगवान श्रीकृष्ण की सवारी आकर उस पुतले का वध करती थी। इस अवसर पर यहां एक बड़े मेले का आयोजन किया जाता है। इसीलिए इसका नाम कंस गेट पड़ गया। यह दरवाजा भारतीय पुरातत्व विभाग द्वारा 22 दिसम्बर 1920 को संरक्षित घोषित किया गया है। गेट दोनों तरफ एक एक बुर्जी एवं मेहराबदार प्रवेशद्वार के साथ बना हुआ है। गेट के छत के ऊपर एक सकरी गली है। प्रत्येक कोण के सामने की ओर लाल बलुए पत्थरों के छज्जे बढ़े हुए हैं। प्रवेशद्वार के दक्षिणी तरफ मेहराबदार कंगूरे बने हुए हैं। इस गेट का मुख्य मेहराबें मुगलों के चार मेहराबों से अलग प्रकार का है। यह अजमेर की अढ़ाई दिन की झोपड़े की तरह मेहराब की तरह दिखता है। इसका स्थापत्य गुजरातकाल 1600-22 ई. के प्रभाव से युक्त दिखाई देता है। इस द्वार के ऊपर दो, चार-चार खम्भों पर आधारित छतरियां बनी हैं। द्वार पर एक शिलालेख में हिंदी, अंग्रेजी और उर्दू में ‘कंस दरवाजा’ उत्कीर्णित है। उसके पीछे गहराई में एक नाला है। कंस दरवाजे से लगी दीवार को सन 1858 में तत्कालीन अंग्रेज जिलाधिकारी द्वारा तोपों से ध्वस्त कर दिया गया था। इसकी वजह यहां सोमेश्वर नाथ मंदिर में सन 1857 के प्रसिद्ध स्वतत्रंता सेनानी तात्या टोपे ने जो शरण ली थी। इसकी सूचना ब्रिटिश भारत के अधिकारियों को लगने पर अंग्रेज फौज उनको जिंदा या मुर्दा गिरफ्तार करने पहुंची। अंग्रेज फौज के यहां पहुंचने से पहले ही स्थानीय नागरिकों के सहयोग से तात्या टोपे फरार हो गए थे। तत्कालीन शासन की क्रोधाग्नि से इस ऐतिहासिक बाउंड्री एवं द्वार को झुलसा दिया। भारतीय पुरातत्व विभाग ने इस द्वार की बड़े पैमाने पर मरम्मत कराई है।
6. छिंगा मोदी गेट :– यह शेरशाह सूर के पुत्र सलीम शाह सूर के समय के 16 दरवाजों में से एक है। छिंगा मोदी गेट, दिल्ली गेट और कंस गेट के अलावा मौजूद गेट में से एक है। यह दरवाजा नीचे ज्यादा ढलान होने की वजह से पुल छिंगा मोदी कहा जाता है। यह आगरा के पश्चिम में लोहा की मंडी में स्थित है। इस द्वार से कोठी मीना बाजार की ओर जाने का रास्ता है। इस द्वार का निर्माण शेरशाह सूरी के पुत्र सलीम शाह सूरी ने करवाया था। इस गेट के अंदर एक हाथ में छह अंगुली वाला रसद पहुंचाने वाला व्यापारी रहता था। उसने अपनी मौजूदगी में दिन-रात का समय देकर इस द्वार को बनवाया था। अतएव छिंगा मोदी दरवाजे के नाम से जाना जाने लगा। सिटीवाल के एक अंग के रुप में इसका बड़े पैमाने पर जीर्णोद्धार मोहम्मदशाह के समय 1721-30 में आगरा के मुगल सूबेदार सवाईं जयसिंह द्वारा कराया गया। यह अपने समय के खूबसूरत दरवाजों में से एक है। यह मुख्यतः ककैया ईंट और चूने के प्लास्टर से बना है। इसके मेहराब लाल बलुआ पत्थर के बने हैं। बांयी ओर ऊंची दीवार है और उसके ऊपर एक गोलाकार छोटी छतरी सा गुम्बदनुमा प्रांगण है। जिसे नाले के ऊपर निगरानी के रुप में प्रयोग में लाया जाता था। इस दरवाजे पर ‘पोल छंगा मोदी’ लिखा हुआ है।
कुछ विद्वान इसें सलीमशाह सूर के समय का मानते हैं। यहां एक पुराना चूने का पुल भी था। जिसके बाहर की ओर नाला बहता था। इस दरवाजे का दायां वाला भाग बाहरी ओर से खुला था। इसकी दांयें हाथ की गुम्बद वाले भाग के पीछे दीवाल थी तथा वांये वाले भाग में ऊंची दीवार तथा छोटा दरवाजा था। कभी दोनों ओर की दीवारें काफी दूरी तक किसी अन्य दरवाजे से सम्बन्धित थीं। इस दरवाजे के ऊपरी दीवाल पर दोनों तरफ छोर पर दो अर्ध वृत्ताकार छतरी थीं, उनपर गुम्बद भी था। यहां दो अर्द्ध गोलाई लिए मीनारें हैं। इस पूरे भवन की लंबाई 58 फुट 4 इंच और गहराई 12 फुट 4 इंच है। इसके बाहरी मेहराब 16 फुट 8 इंच चौड़े हैं। इसमें 13 फुट 6 इंच लंबा और 6 फुट 10 इंच चौड़ा दालान भी है। यह दालान शुरूआत में 11 फुट 4 इंच का है, जो दरवाजे की तरफ 12 फुट का हो गया है। इस दरवाजे में दो छोटे दरवाजे भी लगे हैं, जो 5 फुट गुणे 4 फुट की छोटी कोठरियों के बगल से हैं।
7.नूरी दरवाजा :- मोखान्निशा के मस्जिद के पास बाग मुज्जफर खां से लगा हुआ नूरी दरवाजा है। यह स्वतंत्रता आन्दोलनकारियों का गढ़ था। यह मकान चित्रा टाकीज के पास भगत सिंह की गली में आज भी मौजूद है। यहां सरदार भगत सिंह ने यहां अपना निवास स्थान बना रखा था। उन्होंने अ्रगेजों का साम्राज्य को उखाड़ फेका था। यहां आठ क्रांतिकारी नाम बदलकर आन्दोलन का संचालन कर रहे थे। ये थे- चन्द्रशेखर आजाद (बलराज) भगत सिंह (रंजीत) राजगुरु (रघुनाथ) बटुकेश्वर दत्त (मोहन) , भगवान दास माहौर (कैलाश) शिव वर्मा (प्रभात) सुखदेव (विलेजर) जयदेव कपूर (हरीश) आदि। यहीं पर राजगुरु ने एक दिन अपने सहनशीलता का प्रदर्शन किया था। वह लोहे के गर्म चिमटे से अपना शरीर को जलाकर दिखाये थे। उनके मुख से आह तक का शब्द भी नहीं निकला था।
8. अमर सिंह/अकबरी/बुखारा गेट:- आगरा किला के इस गेट को लाहौर गेट कहते हैं बाद में लाहौर गेट को अमरसिंह द्वार भी कहा जाने लगा था। दक्षिण में स्थित यह प्रवेशद्वार इस समय आगरा किले का मुख्य प्रवेशद्वार है।यहां आने वाले पयर्टक लाहौर गेट से एंट्री ले सकते हैं। इस गेट के बारे में कहा जाता है कि इस गेट का मुख पाकिस्तान स्थित लाहौर की तरफ होने के कारण इसे यह नाम दिया गया था। इसे अकबर गेट भी कहा जाता रहा है। अकबर दरवाजा को जहांगीर ने नाम बदल कर अमर सिंह द्वार कर दिया था। यह द्वार, दिल्ली-द्वार से मेल खाता हुआ है। इसे आवश्यकतानुसार लकड़ी के पुल को हटाकर बन्द भी किया जा सकता है। इसके 3 भाग हैं। खाई के ऊपर बाह्य प्रवेशद्वार, गढ़ गज के अन्दर प्रवेश करनेवाला प्रथम अन्दरुनी द्वार और आगे उत्तर की ओर चढ़ाई वाला द्वितीय अन्दरुनी द्वार। बाह्य प्रवेशद्वार का निचला भाग आयताकार मेहराबी दिलहों में बटा है। फलक का ऊपरी भाग सादा तथा प्रत्येक बुर्जी पर एक छतरी लगी है। इस पर अर्धवृत्ताकार कमलों का गुम्बज है। इसमें शीशे के टाइल लगे हैं। प्रथम अन्दरुनी द्वार कई मंजिली पूरब की ओर जाती है। इसकी सतह दो मंहराबी दिलहों की परतों से बना है। इसमें संगमरमर के जड़ाउ काम भी देखे जा सकते हैं। द्वितीय अन्दरुनी द्वार लाल बलुए पत्थरों से 3 मंजिला बना है। यह अलंकृत है, इसके द्वितीय तल पर एक चतुभुर्जाकार खिड़की बनी है। इसके तृतीय तल पर तीन तरफ खुलनेवाली वर्गाकार स्तम्भों एवं दीवालगीरों पर आधारित खिड़की बनी हुई है। इसके ऊपर गुम्बदाकार छतरी है तथा दोनों ओर रक्षकों की चौकिया हैं। स्थापत्य कला के दृष्टिकोण से यह स्थल अति महत्वपूर्ण है।
9. आगरा गेट के पश्चिम तरफ की सिटीवाल :- यह सिटी वाल गोकुलपुरा के पीछे गणगौर गेट से कंस गेट के बीच में फैला था। यह आगरा शहर का अहुत ही महत्वपूर्ण अवशेष है। बहुत कुछ संभव है मोहम्मद शाह के समय में 1722 ई. में यह बना होगा। उस समय आगरा का गवर्नर जय सिंह था। सिटीवाल का यह अवशेष यह बतलाता है कि यह शहर से लगे हुए बाह्य दीवाल पर उत्कीर्णित था। कार्लाइल ने आगरा के सिटी वाल के अनेक स्थल खोज निकाले हैं जो बल्केश्वर कालोनी से हाज्जीपुर (निकट ताजमहल) के बीच में थे। इनका संभावित समय 1721-30 ई. था।
10.पचकुइंया कब्रिस्तान की दीवार पर लगा शिलालेख :– यहां जहांगीरकालीन हाजी संलेमान की मस्जिद , अजमेरी गेट] आगरा गेट तथा आगरा सिटीवाल होने के प्रमाण मिलते हैं। आगरा के डूमंड रोड (महात्मा गांधी मार्ग) पर सुभाष पार्क के सामने वाल्मीक वाटिका के पीछे पचकुइंया कब्रिस्तान की दीवार पर शिलालेख लगा था जो खुद इतिहास बताता था। इस पर ‘अकबराबाद’ उत्कीर्णित है। आगरा सिटी वाल व प्राचीन अजमेरी गेट 1866 तक बना हुआ था, जो यहां के पास उत्तर तरफ था। 1867 में शाहगंज का मार्ग चौड़ा करते समय अजमेरी गेट तोड़ा गया था। हाजी सुलेमान ने 1081 हिजरी 1622 ई. में फारसी भाषा में जहांगीर के काल में एक मस्जिद पर इसे लगवाया था। अब वहां अवैध दुकान खुल गई है। जिससे वह ढक गया है। जाहिर है कि अगर कोई इस शिलालेख का फोटो लेने जाएगा, तो दुकानदार अपनी अवैध दुकान बचाने के लिए विवाद की स्थिति पैदा करेगा। एएसआई को अवैध अतिक्रमण हटाकर इतिहास को जीवंत करने की कोशिश करनी चाहिए।
The following is a translation of the whole inscription :—
” God ! there is no God but he ; the living, the self-sub¬” sisting : neither slumber nor sleep seizeth him ; to him “belongeth whatsoever is in heaven, or on earth. Who is he “that can intercede with him, but through his good plea¬” sure ? He knoweth that which is past, and that which “is to come unto them, and they shall not comprehend “anything of his knowledge, but so far as he pleaseth. His “throne is extended over heaven and earth, and the preservation of both is no burden unto him. He is the high, the “mighty.”—(See Sale’s Al Koran, chap. II. p. 31.)
(Persian line.)
“In the time of Nur-ud-din Muhammad, Jahangir the “just, the Padshah, the contemptible slave Haji Salaiman “has built this mosque and dome in the year 1031” (A. D. 1621-22).

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