लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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संदर्भ:- केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश का सत्याग्रह के साथ करार।

प्रमोद भार्गव

महात्मा गांधी ने कहा था कि जब राज्य की शक्तियां देश के गरीब व वंचितों के हित साघने का काम न करें तो उसे नियंत्रित करने की क्षमता पैदा कर अहिंसक विरोघ किया जाना चाहिए। इसी विरोध का पर्याय था समग्र भूमि सुघार के लिए राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 3 पर दिल्ली की और कूच कर रहा जन सत्याग्रह मार्च। फिलहाल आगरा में केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश और एकता परिषद् के अध्यक्ष पी बी राज गोपाल के बीच जो लिखित अनुबंध हुआ है उससे तो लगता है कि सरकार आंदोलन के आगे विवश थी और उसने आंदोलन को टालने के लिए मजबूरी में दिल्ली की ओर बढ़ रहे सत्याग्रहियों की मांगें मान लीं। लेकिन लगता नही है कि विदेशी पूंजी निवेश के लिए कानूनी रास्ता साफ कर रही मनमोहन सरकार राष्ट्रीय भूमि सुधार नीति में वंचितों के हक में कोई कारगर पहल करेगी।

इस अनूठे अहिंसक और अनुशासित मार्च में करीब पांच सौ से भी ज्यादा जन अंादोलनों की भागीदारी रही। वैसे मौजूदा दौर में हकीकत यह है कि देशभर में भूमि आधिग्रहण के खिलाफ करीब 1700 आंदोलन चल रहे हैं। जाहिर है, केंद्र व राज्य सरकारें किसान व वंचितो के प्रति उतनी चिंतित नहीं हैं, जितनी वे उद्योग व उद्योगपतियों के लिए प्रत्यक्ष चिंतित दिखाई दे रहीं हैं। एक तरफ मघ्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान अमेरिका से सत्यग्रहियों को मोबाइल से संबोधित करते हुए उनकी सभी मंागों का जयाज ठहारते हैं और फिर देश आकर आंदोलन में सिरकत भी करते है। किंतु, दूसरी तरफ उनका अमेरिका जाने का मकसद ही विदेशी निवेशको और विश्व बैंक को लुभाना था। चाल, चरित्र और चेहरे का यही दोगलापान राजनीति के स्तर पर पूरे देश में किसानों को ठग रहा है।

राष्ट्रीय एकता परिषद् के अध्यक्ष पीवी राजगोपाल के नेतृत्व में इस यात्रा की शुरूआत अनेक टुकडि़यो में 2 अक्टूबर 2011 को दक्षिण के छोर कन्याकुमारी से शुरू हुई थी। जिसमें दलित और वंचितो से जुड़े करीब पांच सौ जन आंदोलनों के लोगों ने देश के कोने – कोने से एक साल पहले ग्वालियर के लिए पैदल मार्च शुरू कर दिया था। अब 2 अक्टूबर 12 से करीब एक लाख लोगों को यह जन – समुद्र्र ग्वालियर से दिल्ली के सफर पर था, परंतु जयराम रमेश और राजगोपाल के बीच हुए समझौते के चलते फिलहाल इस पैदल मार्च के पैर थम गए हैं। यदि सरकार आगरा में यह करारनामा नहीं करती तो दिल्ली पहुंचने पर आंदोलनकारी बेमियादी धरने पर बैठ जाते। यदि ऐसा होता तो अस्तित्व के संकट से जूझ रही सरकार की और छीछालेदर होती।

हकीकत में इस आंदोलन की पृश्ठभूमि में केंद्र सरकार है जो पांच साल पहले एकता परिशद से किए वादों से मुकर रही है और भूमि सुधार संबंधी विधेयक को टालती जा रही है। 2007 में एकता परिषद ने यही यात्रा जनादेश यात्रा के नाम से की थी और यात्री ग्वालियर से पैदल चलकर दिल्ली के रामलीला मैदान पहुंचे थे। तब इन्हीं प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह और और इन्हीं ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने तात्कालिक दबाव में आकार सम्रग भूमि सुधार की दृष्टि से राष्ट्रीय भू-सुधार परिषद् और राष्ट्रीय भू – सुधार समिती का गठन किया था। लेकिन बीतें पांच सालों में परिषद् द्वारा बार – बार आग्रह करने के बावजूद केंद्र्र सरकार भूमि सुघार के लिए एक कदम भी आगे नहीं बढ़ी। लिहाजा मजबूरन पीवी राजगोपाल को इस दीर्घकालिक कठिन यात्रा को अंजाम देने को विवश होना पड़ा। यह कैसी विडंबना है कि जिस देश में 70 प्रतिशत आबादी खेती – किसानी से आजीविका चलाने पर निर्भर है, उसके जमीनी हक और रोजी – रोटी के साधनों की परवाह तो सरकार वायदा करने के वाबजूद कुटिलतापूर्वक नजरअंदाज कर जाती है और इसके उलट अमेरिकी दबाव में देशी विदेशी कंपनियो को लाभ पहुंचाने के लिए आर्थिक सुधारों के बहाने पूंजी निवेश के नए नए द्वार खोलती है। जबकि इन कथित सुधारों के राष्ट्रघाती दुष्परिणाम लगातार सामने आ रहे है। गरीब भूमि से बेदखल हो रहे हैं और कृषि आधारित बेरोजगारों की संख्या बढ़ रही है। ऐसे में संदेह पैदा होता है कि जो सरकार पांच साल में एक कदम भी आगे नहीं बढ़ी, वह सरकार छह माह के भीतर जमीन के हक से जुड़े दस मुद्दों को कैसे कानूनी रुप दे पाएगी ?

विकास के तमाम दावों व किसान हितैशी अनेक योजनाओं को लागू करने के बावजूद चैंकाने वाली हकीकत यह है कि बीते सोलह सालों के दौरान देश में 2.90 लाख अन्नदाताओं ने आत्महात्या की है। किसानों द्वारा जिंदगी से तौबा करने की वजह कंगाली या कई कारणों से आर्थिक बद्हली तथा गरीबी है। यह जानकारी केंद्रीय कृषि राज्यमंत्री हरीश रावत ने बीते मानसून सत्र में राज्यसभा में पूछे गए एक सवाल के जबाव में लिखित में दी थी। रावत ने एडीएसआई ;;दुर्घटना, मौंते और आत्महत्याएंद्ध की रिपोर्ट के आधार पर जानकारी देते हुए कहा था कि 1995 – 2011 के बीच खेती किसानी से जुड़े 2,90,470 लोगों ने खुदकुशी की है। ऐसी हृदय – विदारक थोक घटनाओं के बावजूद प्रधानमंत्री के कानों में जूं तक नहीं रेंगती। जाहिर है केंद्र्र की मंशा में खोट है।

एकता परिषद् अब मूल मसलों का हल किश्तों व टुकड़ों में नहीं चाहती, क्योंकि इस तरह से भूमिहीन और आदिवासियों की समस्याओं का स्थायी समाधान होने वाला नहीं है। इसलिए पीवी राजगोपाल एकमुश्त समग्र भूमि सुधार कानून लाने की जरूरत पर जोर दे रहे थे। भूमि आधिग्रहण कानून में संशोधनों के साथ खनन, वन्य प्राणी एवं अभ्यारण्य और सेज जैसे कानूनों में संपूर्ण बदलाव लाने पर राजगोपाल का दबाव था। भूमिहीनों के लिए जमीन एवं आवास का हक इस करारनामें में दर्ज है। पेशा, भूमि सीलिंग और वनाधिकार कानूनों में संशोधन की मांग मान ली गई है। देश में तमाम किसान, आदिवासी और वंचितों पर केवल इसलिए मुकदमे चल रहे हैं कि जब उनसे भूमि स्वामित्व वाली जमीनें छीनी गईं और उन्हें विस्थापन का दंश झेलने को विवश किया गया तो इस अन्यायकारी एक पक्षीय कारवाई का विरोध करने पर लाखों प्रदर्शनकारियों पर मुकदमें लाद दिए गए हैं। इन मुकदमों को फास्ट टेक अदालतों का गठन कर निपटाने का वायदा जयराम रमेश ने किया है। परिशद् चाहती है कि अब उसे जल, जंगल और जमीन पर तो अधिकार मिले ही, खदानों में गौण खनिजों के उत्खनन, नदी – तलाबों में मत्स्य आखेट का भी का अधिकार मिले। इन मांगो के साथ पांच सौ जन अंादोलनकारी इस यात्रा में शामिल थे और भूमि अधिग्रहण संबधी नीतियों के खिलाफ देश के कोने – कोने में अन्य बारह सौ जो जन आंदोलन सक्रिय हैं, उनका भी समर्थन इस मार्च को हासिल था। जाहिर है, अपने जायज व संवैधानिक आधिकारों के परिप्रेक्ष्य में लोग जागरूक हो गए हैं। सड़क पर उतरे इन अंदोलनों से अनुमान लगाया जा सकता है कि जमीनी स्तर पर कुछ ऐसी गड़बडियां जरूर हैं, जो गरीब, दलित व वंचितों को चैन की नींद सोने नहीं दे रही हैं और वे खुद को ठगा अनुभव कर रहे हैं।

बावजूद इसके एक तार्किक और किसान हितैशी भूमि अधिग्रहण नीति बनती दिखाई नहीं दे रही है। 8 अक्टूबर 2012 को भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास एवं पुनस्र्थापन विधेयक 2011 को अंतिम रूप देने के सिलसिले में मंत्री समूह की बैठक में कोई अंतिम प्रारूप तैयार नहीं हो पाया। पूर्व के अधिग्रहणों और भूमि स्वामियों से जरूरी रजामंदी लेने के मुद्दों पर मंत्री बंटे दिखाई दिए। अनेक मंत्रियों ने किसान हितों का ख्याल रखते हुए उस मूल उपबंध को बरकरार रखने की मांग की, जिसमें कहा गया है कि भूमि अधिग्रहण के लिए 80 फीसदी लोगों की सहमति लेना जरूरी है। नए प्रारूप में इस 80 फीसदी वाले उपबंध को बदलकर इसे अधिग्रहण के लिए दो तिहाई, मसलन 66 प्रतिशत भूमि स्वामियों की रजामंदी से जोड़ दिया गया है। बहरहाल मंत्री समूह में मतभेद के चलते कृशि मंत्री शरद पावर ने यह कहकर बैठक खत्म कर दी थी कि अभी प्रारूप को अंतिम रूप देने के लिए दो – तीन बैंठकें और करनी होंगी। 80 फीसदी रजामंदी वाले उपबंध से शरद पावार के अलावा वित्तमंत्री पी.चिदरबंरम और योजना आयोग के उपाअघ्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया भी सहमत नहीं हैं। इस प्रारूप में एक अच्छी बात यह भी है कि यह विधेयक जब कानूनी रूप ले लेगा तो भूमि अधिग्रहण के उन सभी मामलों पर लागू होगा जिनमें 1894 के अधिनियम के तहत अंतिम फैसला नहीं हुआ है। इसीलिए यह विधेयक उन मंत्रियो को रास नहीं आ रहा है, जो खुदरा में प्रत्यक्ष विदेशी पूंजी निवेश की पैरवी कर रहे है।

हालांकि जयराम रमेश विधेयक में ऐसे प्रावधान डालने के लिए उदार हैं, जिससे गरीब व वंचितो के हित सधें। इसलिए उन्होंने प्रारूप में प्रावधान रखा है कि भूमि अधिग्रहण करने पर शहरों में बाजार मूल्य से दो गुना और गावों में चार गुना ज्यादा की दर पर मुआवजा देना होगा। लेकिन कैबिनेट की बैठक में सबसे ज्यादा इस प्रस्ताव पर आपत्ति वाण्ज्यि मंत्री आनंद शर्मा ने जताई थी। उन्होंने तर्क दिया था कि मुआवजे की यह राशि बहुत ज्यादा है, इससे नए उद्योग प्रोत्साहित नहीं होंगे।

प्रारुप में यह प्रावधान भी अच्छा है कि बहू-फसली सिंचित जमीन और निजी क्षेत्र की कंपनियों के लिए सरकारी स्तर पर भूमि का अधिग्रहण नहीं किया जाएगा। इस प्रस्ताव को भी औद्योगिक घराने और बिल्डर बदलवाना चाहते हैं। इस प्रारुप में पहली बार यह संभव हुआ है कि अधिग्रहण के साथ पुनर्वास का भी विस्थापितों को भी कानूनी हक मिलेगा। यदि निजी कंपनियां अपने स्तर पर भी भूमि की खरीदारी उद्योगों के लिए करती हैं तो उनकी भी यह जवाबदारी होगी कि वे विस्थापितों को आवास सुविधा, रोजगार और जमीन की बढ़ी कीमत का 20 फीसदी हिस्सा 10 साल तक भूमि स्वामियों को देते रहें। जाहिर है, निजी क्षेत्र के पूंजीपति जमीन भले ही मंहगे मूल्य पर क्रय कर लें, लेकिन विस्थापितों को पुनर्वास और रोजगार की वे गारंटी देने वाले नहीं हैं। लिहाजा विरोधाभासों के इन हालातों में एकाएक यह कैसे मुमकिन है कि सरकार सत्याग्रहियों की मांगें अनुबंध होने के बावजूद आसानी से मान लेगी। ऐसे में इस समझौते से लगता है कि सरकार ने फिलहाल सत्याग्रहियों को महज बरगला कर अपना उल्लू सीधा किया है। लेकिन केंद्र यदि करारनामे से मुकरता है तो उसे यह आत्ममंथन करने की जरुरत है कि देश में भूमि से जुड़े जो 1700 जन आंदोलन चल रहे हैं, उन पर संवेदनशीलता से विचार नहीं किया गया तो जमीनी हालात कालांतर में विस्फोटक भी हो सकते हैं।

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