लेखक परिचय

डॉ. शुभ्रता मिश्रा

डॉ. शुभ्रता मिश्रा

डॉ. शुभ्रता मिश्रा वर्तमान में गोवा में हिन्दी के क्षेत्र में सक्रिय लेखन कार्य कर रही हैं। डॉ. मिश्रा के हिन्दी में वैज्ञानिक लेख विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहते हैं । उनकी अनेक हिन्दी कविताएँ विभिन्न कविता-संग्रहों में संकलित हैं। डॉ. मिश्रा की अँग्रेजी भाषा में वनस्पतिशास्त्र व पर्यावरणविज्ञान से संबंधित 15 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं । उनकी पुस्तक "भारतीय अंटार्कटिक संभारतंत्र" को राजभाषा विभाग के "राजीव गाँधी ज्ञान-विज्ञान मौलिक पुस्तक लेखन पुरस्कार-2012" से सम्मानित किया गया है । उनकी एक और पुस्तक "धारा 370 मुक्त कश्मीर यथार्थ से स्वप्न की ओर" देश के प्रतिष्ठित वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित हुई है । मध्यप्रदेश हिन्दी प्रचार प्रसार परिषद् और जे एम डी पब्लिकेशन (दिल्ली) द्वारा संयुक्तरुप से डॉ. शुभ्रता मिश्रा के साहित्यिक योगदान के लिए उनको नारी गौरव सम्मान प्रदान किया गया है।

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surrogacyडॉ. शुभ्रता मिश्रा

पिछले कुछ सालों से भारतीय समाज में सरोगेट मदर चर्चा का विषय रहा है। फिल्मी हस्तियों के सरोगेटी बच्चों ने इस विषय को अच्छा खासा कौतुहल का विषय बना दिया था। चाहे वह आमिर खान साहब हों, शाहरुख खान साहब हों, या फिर हाल ही में सरोगेसी की सहायता से एक बेटे के पिता बने अविवाहित अभिनेता तुषार कपूर हों। और भी जाने ऐसे कितने अमीरों ने अपने धन के बल पर मातृत्व को परिहास की कगार पर खड़ा कर दिया था और उस पर तुर्रा यह सुनने में आया था कि सेलेब्रिटी होते हुए ये तुषार का एक साहसिक निर्णय है। कितनी जुगुप्सा होती है जब सरोगेसी के नाम पर मातृत्व जैसे पवित्र रिश्ते को तार तार किया जाता है। वास्तव में देखा जाए तो प्रसव पीड़ा से बचने के लिए सरोगेसी फैशन सा बनता जा रहा था। निश्चित रुप से इसके लिए कड़े संवैधानिक नियमों की आवश्यकता है, ताकि कोई ऐरा गैरा अपने निजी सुख व स्वार्थ के लिए मातृत्व का सौदा न करे। कोई भी वैधानिक तंत्र नहीं होने से सरोगेसी की आड़ में सबसे अधिक ग्रामीण एवं आदिवासी इलाकों तथा शहरों और कस्बों की लाचार गरीब स्त्रियाँ शोषित होने लगी थीं।
कल एक अच्छी खबर आई कि मोदी कैबिनेट ने सरोगेसी रेगुलेशन बिल 2016 को मंजूरी दे दी है। अपमान से कराह रहे मातृत्व ने मानो एक राहत की साँस ली हो। सबसे अच्छी बात तो इस बिल की यह है कि अब किराये की कोख (सरोगेसी) वाली मां के अधिकारों की रक्षा हो सकेगी और साथ ही सरोगेसी से जन्मे बच्चों के अभिभावकों को कानूनी मान्यता देने का भी प्रावधान रखा गया है। सरोगेसी रेगुलेशन बिल 2016 के अनुसार अब केवल अविवाहित पुरुष या महिला, सिंगल, लिव इन में रह रहे जोड़े और समलैंगिक जोड़े सरोगेसी के लिए आवेदन नहीं कर सकते। इसके साथ ही व्यावसायिक सरोगेसी पर पूरी तरह बैन लगाते हुए यह निर्णय लिया गया है कि अब सिर्फ रिश्तेदार महिला ही सरोगेसी के माध्यम से मां बन सकती है। इसके अलावा यह भी कहा गया है कि जिन माता-पिता के पहले से एक संतान है या उन्होंने एक संतान को गोद लिया है तो वे दूसरी संतान के लिए सरोगेसी का सहारा नहीं ले सकते। अब भारतीय सिर्फ भारतीय नागरिक महिला द्वारा ही सरोगेसी के माध्यम से बच्चे को जन्म दे सकते हैं। सरोगेसी के लिए 26-55 साल के पुरुष और 25-50 साल की महिला ही आवेदन कर सकती है। अगर सरोगेसी के लिए आवेदन करने वाला जोड़ा किसी बीमारी से ग्रसित है तो वो आवेदन नहीं कर सकता है। विवाहित और पहले भी एक बच्चे को जन्म दे चुकी महिला ही सरोगेट मदर बन सकती है और साथ ही एक महिला सिर्फ एक बार ही सरोगेसी द्वारा बच्चे को जन्म दे सकती है। अक्सर ऐसे मामले भी सामने आए हैं जब सरोगेसी के बाद जन्मे बच्चे को अपनाने से इनकार कर दिया जाता है अतः इससे बचने के लिए भी सरोगेसी रेगुलेशन बिल 2016 में 10 साल की जेल और 10 लाख तक के जुर्माने का प्रावधान रखा गया है। स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री की अध्‍यक्षता में केंद्र पर नेशनल सरोगेसी बोर्ड, राज्य और केंद्र शासित प्रदेश स्तर तक स्टेट सरोगेसी बोर्ड का गठन किया जाएगा।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो सरोगेसी मानव सभ्यता के लिए वरदान कही जा सकती है। सरोगेसी एक ऐसी वैज्ञानिक तकनीकी है, जिसके माध्यम से उन दम्पत्तियों को जिनको बच्चे को जन्‍म देने में कठिनाई आ रही हो, या बार-बार गर्भपत हो रहा हो या फिर बार-बार आईवीएफ तकनीक फेल हो रही हो या भ्रूण आरोपण उपचार की विफल हो रहा हो, गर्भ में कोई विकृति हो या फिर गर्भाशय या श्रोणि विकार हो अथवा गर्भावस्था के दौरान महिला को हृदय, यकृत, रक्तचाप की गंभीर स्वास्थ संबंधी परेशानी होने जैसी परिस्थितियों में इसका उपयोग किया जा सकता है। सही मायनों में सरोगेसी नि:संतान लोगों के लिए एक अद्भुत चिकित्‍सा विकल्‍प है। सरोगेसी दो प्रकार की होती है- एक ट्रेडिशनल सरोगेसी और दूसरी जेस्टेशनल सरोगेसी। ट्रेडिशनल सरोगेसी में पिता के शुक्राणुओं को एक अन्य महिला के अंडाणुओं के साथ निषेचित किया जाता है। इसमें आनुवांशिक संबंध सिर्फ पिता से होता है, जबकि जेस्‍टेशनल सरोगेसी में माता-पिता के अंडाणु व शुक्राणुओं का मेल परखनली विधि से करवा कर भ्रूण को सरोगेट मदर की बच्‍चेदानी में प्रत्‍यारोपित कर दिया जाता है। इसमें बच्‍चे का आनुवांशिक संबंध माता-पिता दोनों से होता है।
विश्व स्तर पर सिंहावलोकन करें तो हम पाते हैं कि ब्रिटेन और कुछ दूसरे देशों में सरोगेट मदर को मां का दर्जा मिलता है। हाँलाकि वहीं फ्रांस, नीदरलैंड्स, नॉर्वे जैसे देशों में व्यावसायिक सरोगेसी की अनुमति नहीं दी गई है। इन सबको देखते हुए भारत में आए सरोगेसी नियमों की बहुत अहमियत बढ़ गई है। क्योंकि अब तक भारत में कोई सशक्त सरोगेसी कानून नहीं होने से एक अनुमान के मुताबिक भारत में फर्टिलिटी इंडस्ट्री करोड़ों का कारोबार कर रही है, जिसमें 7 प्रतिशत कारोबार सरोगेसी से जुड़ा हुआ है। भारत में लोग निहित स्वार्थों में लिप्त सरोगेट उपलब्ध कराने वाली संस्था के नाम पर क्लीनिक बैंकों की तरह काम कर रहे हैं। किराए की कोख देने वाली महिलाएं भी सरोगेसी को धन कमाने का जरिया मानने लगीं। विश्लेषणों से पता चलता है कि भारत में विदेशों से पांच गुना सस्ते दर पर सरोगेट मदर उपलब्ध हैं। विदेशियों को भारतीय सरोगेट मदरों में उनके शराब, सिगरेट से दूर रहने और शाकाहारी होने के कारण उनके गर्भ में पलने वाली सन्तान पर सकारात्मक प्रभाव प्रभावित करता है। वे भारतीय महिलाओं को नौ महीने तक किराए पर कोख उपलब्ध कराने के लिए 60 हजार से लेकर एक लाख रुपए तक देते है। भारत की गरीब महिलाएं सरोगेसी जैसी तकनीकी से अनभिज्ञ मात्र दरिद्रता दूर करने के लिए अपने मातृत्व को बेचने का दुःसाहस कर लेती थीं। अच्छा हुआ देर आए दुरुस्त आए, सरोगेसी रेगुलेशन बिल 2016 के प्रावधानों ने सरोगेसी के नाम पर हो रहे भारतीय मातृत्व को और अपमानित होने से समय रहते बचा लिया

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