लेखक परिचय

महेश दत्त शर्मा

महेश दत्त शर्मा

जन्म- 21 अप्रैल 1964 शिक्षा- परास्नातक (हिंदी) अनेक प्रमुख हिंदी पत्र-पत्रिकाओं में महेश दत्त शर्मा की तीन हज़ार से अधिक विविध विषयी रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी हैं। आपका लेखन कार्य सन १९८३ से आरंभ हुआ जब आप हाईस्कूल में अध्ययनरत थे। बुंदेलखंड विश्वविद्यालय, झाँसी से आपने 1989 में हिंदी में एम.ए. किया। उसके बाद कुछ वर्षों तक विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के लिए संवाददाता, संपादक और प्रतिनिधि के रूप में कार्य किया। आपने विभिन्न विषयों पर अधिकारपूर्वक कलम चलाई और इस समय आपकी लिखी व संपादित की चार सौ से अधिक पुस्तकें बाज़ार में हैं। हिंदी लेखन के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए आपने अनेक पुरस्कार भी अर्जित किए, जिनमें प्रमुख हैं- नटराज कला संस्थान, झाँसी द्वारा लेखन के क्षेत्र में 'यूथ अवार्ड', अंतर्धारा समाचार व फीचर सेवा, दिल्ली द्वारा 'लेखक रत्न' पुरस्कार आदि। संप्रति- स्वतंत्र पत्रकार, लेखक, संपादक और अनुवादक।

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महेश दत्त शर्मा

पहले एक विनम्र निवेदन : इस लेख में प्रस्तुत विचार मेरी नितांत मौलिक परिकल्पना या कहना होगा अनुभूति हैं। इनसे किसी को ठेस लगे तो मैं क्षमा प्रार्थी हूँ।

मेरे घर में बहुत सी चींटियाँ हैं, कॉक्रोच हैं; छिपकलियाँ, चूहे, मकड़ियाँ, दीमक और अनेक छोटे-बड़े कीट-पतंगे हैं जो मेरे परिवार के साथ रहते हैं। बल्कि यह कहना ठीक होगा कि ज़बरदस्ती रहते हैं। यह स्थिति सभी के घरों में होती है। हम चाहकर भी इन्हें भगा नहीं पाते। ये तो हुई भीतरी घर की बात। घर के बाहर या आसपास कौए, चिड़ियाँ, कबूतर, कुत्तों, बिल्लियाँ, गायें, शूकर, मुर्ग-मुर्गियाँ आदि जीव-जंतु रहते हैं। कभी आपने सोचा है कि ये जीव-जंतु आपके साथ या आसपास क्यों रहते हैं? क्या ये हमारे बिछड़े रिश्तेदार हैं? हिंदू शास्त्रों में 84 लाख योनियों में भटकने की बात कही गई है। स्वर्ग सिधारने के बाद हमारे पूर्वज कर्मों के अनुसार उच्च या निम्न जीव के रूप में जन्म ग्रहण करते हैं और वापस आ जाते हैं हमारे साथ रहने।

‘मार्कण्डेय पुराण’ में पापों के अनुसार प्राप्त होने वाली योनियों के बारे में विस्तार से बताया गया है। जैसे- गुरु से छल करने वाला, गुरु की पत्नी और उसके धन पर कुदृष्टि रखने वाला व्यक्ति कुत्तो की योनि में जन्म लेता है, माता-पिता से अभद्र व्यवहार करने वाला मैना की योनि में, भाई की पत्नी का अपमान करने वाला कबूतर और उसे पीड़ा देने वाला व्यक्ति कछुआ बनता है। किसी की अमानत को हड़पने वाला मनुष्य कीड़े के रूप में जन्म लेता है और विश्वासघाती मनुष्य को निकृष्ट जन्म लेने पड़ते हैं; पहले वह भेड़िया बनता है फिर क्रमश: कुत्ता, सियार, बगुला, गिद्ध, साँप और कौए की योनि में जन्म लेता है। भोजन की चोरी करने वाला मक्खी, घी चुराने वाला नेवला, शहद चुराने वाला चींटी, वस्त्र चुराने वाला खरगोश, स्वर्ण की वस्तुएँ चुराने वाला व्यक्ति कीट योनि में जन्म लेता है। वाहन चुराने वाला मनुष्य अगले जन्म में विकलांग होता है। प्रसाधन सामग्री के चोर को छछूँदर की योनि भोगनी पड़ती है। जो मनुष्य भूमि पर कब्ज़ा कर लेता है, वह रौरव आदि भयंकर नरकों में कष्ट भोगकर झाड़ी, बाँस का वृक्ष, लता और बेल बनकर पूर्व जन्म का पाप भोगता है।

इस प्रकार इस पुराण के अनुसार, कीट-पतंगों, जीव-जंतुओं के रूप में हमारे पूर्वज ही हर ओर बिखरे पड़े हैं। कई बार आप चींटियों को चुग्गा डालते हैं, गायों को आदर से रोटियाँ खिलाते हैं, कबूतरों को दाना चुगाते हैं, तो अप्रत्यक्ष रूप से अपने किसी पुरखे को ही खिला रहे होते हैं। कई बार अलबत्ता अकसर आप में से कुछ लोग अपने ही पुरखों को मुर्गे-मुर्गियों, बकरे-बकरियों, मछलियों आदि के रूप में प्लेटों में लेकर खा रहे होते हैं। संभवत: पूर्वकाल में ये जंतु भी मनुष्य रहे हों और इन्होंने आपका भक्षण किया हो और प्रतिपरिणामस्वरूप आप उन्हें खा रहे हों!

गीता में कहा गया है कि आत्मा अजर-अमर है, वह शरीररूपी वस्त्र बदलती है। अत: जो आत्मा एक चींटी में है, वही हम और आप में है। आत्मा के स्तर पर हम में और चींटी में कोई भेद नहीं है। केवल शरीररूपी वस्त्र का अंतर है। अत: इस परिकल्पना को बल मिलता है कि हमारे निकट रहने वाले जीव हमारे अपने ही पूर्वज, नाते-रिश्तेदार अथवा स्नेही हैं। मार्कण्डेय पुराण भी इस बात की पुष्टि करती है।

मैं एक अनुभूत उदाहरण देना चाहूँगा। स्थान ‘क’ पर मैं सपरिवार रहने आया तो वहाँ सुबह-शाम-दोपहर एक कौआ मँडराने लगा। वह एक ही कौआ था जो दिन भर हम से चिपका रहना चाहता था। उसकी सबसे बड़ी पहचान थी, उसकी चोंच में पड़ा धातु का छल्ला। अत: उसे पहचानने में हमसे कोई भूल नहीं होती थी। हमने उसका नामकरण भी कर दिया था-‘नथनिया’। उसे बचा-खुचा खाना दिया जाने लगा।

8-10 साल हम ‘क’ स्थान पर रहे और नथनिया हम से जुड़ा रहा। फिर हमने वह मकान छोड़ दिया और 10-12 किलोमीटर दूर ‘ख’ स्थान पर आकर रहने लगे। यहाँ भी कुछ कौए मँडराने लगे। उन्हें देख हमें नथनिया की याद आ गई। यहाँ भी कौओं को दाना-पानी देने का सिलसिला शुरू हो गया।

एक दिन प्रात: घनघोर आश्चर्य से हम उछल पड़े। देखा, नथनिया घर की मुँडेर पर बैठा काँव-काँव कर रहा है। हमें देख वह और ज़ोर-ज़ोर से काँव-काँव करने लगा और फुदक-फुदक कर यहाँ-वहाँ बैठने लगा, मानो मिलन की खुशी जाहिर कर रहा हो।

इस परिघटना से मेरी इस परिकल्पना को और बल मिला कि संभवत: हमारे निकटवर्ती जीव-जंतु हमारे पूर्वज हों। वरना 10-12 किलोमीटर का अनजान सफर तय करके एक कौए का हम तक पहुँचना, इसे क्या कहा जाए?

मेरी अवधारणा है कि घरों में रहने वाले जीव-जंतु संभवत: वर्तमान जन्म से मुक्ति की आस में हमारे यहाँ पड़े रहते हैं और हम प्राय: उन्हें मुक्त भी करते हैं। कॉक्रोच, मच्छरों व अन्य कीट-पतंगों को हम विभिन्न उपायों द्वारा मारते हैं। चींटियों, छिपकलियों, मकड़ियों, चूहों आदि को भी हम घर से बाहर कर देते हैं। वहाँ अभावग्रस्त रहकर वे कितने दिनों तक जीवित रह सकते हैं? अर्थात् वे जल्दी ही दम तोड़ देते हैं और नई योनि के लिए मुक्त हो जाते हैं।

वे कुत्तो, बिल्लियाँ, खरगोश आदि जानवर बहुत भाग्यशाली पूर्वज होते हैं, जिन्हें हम शानोशौकत से पालते हैं। ग्वाले के घर पलने वाले गाय-भैंस उसके पूर्वज हैं जो जीव रूप में उसकी रोजी-रोटी की जुगाड़ करते हैं। किसान के खेत में हल खींचने वाला या बैलगाड़ियों में जुतने वाला बैल उसका पूर्वज है। गली-सड़कों पर घूमने वाले पशु वे लावारिस जीव हैं, जिनके सब रिश्तेदार मर-खप चुके होते हैं और वे मुक्ति की आस में दर-दर भटकते हैं।

कुछ ऐसे जीव भी हैं जो मुक्ति से दूर भागते हैं। हिन्दू शास्त्रों में आई एक रोचक कथा से इस बात की पुष्टि होती है।

एक बार भगवान् शिव और उनकी अध्र्दांगिनी माता पार्वती वेश बदलकर धरती पर घूम रहे थे। एक घर के बाहर एक बूढ़े को उसकी बहू दुत्कार रही थी। बूढ़ा बेचारा बोझा ढो रहा था। माता पार्वती द्रवित हो शिव से बोलीं, ”स्वामी, मैं उस वृध्द की सहायता करना चाहती हूँ।”

शिवजी ने समझाया कि बूढ़ा नहीं मानेगा लेकिन फिर पार्वती की ज़िद के आगे उन्हें झुकना पड़ा और उन्होंने सहायता की सहमति दे दी।

पार्वती वेष बदलकर बूढ़े के पास पहुँचीं और बोलीं, ”बाबा! इस अवस्था में तुम्हारी बहू तुमसे इतना काम ले रही है। मैं इस योनि से तुम्हें सदा-सदा के लिए छुटकारा दिला सकती हूँ।”

बहुत कहने पर भी बूढ़ा अपने बहू-बेटे को छोड़ने के लिए राजी नहीं हुआ और बोला, ”अभी मुझे पौत्रों का मुँह देखना है। मुक्ति की बात बाद में।”

पार्वती जी 8-10 साल बाद पुन: वहाँ आईं, देखा बूढ़ा तीन बच्चों के साथ खेल रहा है। उन्होंने कहा, ”अब चलो मेरे साथ मुक्तिधाम।”

”नहीं, अभी नहीं।” बाबा बोला, ”अभी तो मुझे इनका शादी-ब्याह देखना है।” पार्वती जी फिर खाली हाथ लौट गईं।

कुछ वर्षों बाद वे पुन: आईं। इस बार बूढ़ा कहीं दिखाई नहीं दिया। तभी, घर की नाली से एक मेढ़क टर्राते हुए बाहर कूदा। पार्वती जी ने धयान लगाया तो सारी स्थिति स्पष्ट हो गई। बूढ़ा मरकर मेंढ़क की योनि में जन्मा था।

उसके निकट पहुँचकर पार्वती जी ने कहा, ”मुक्ति में तुमने बहुत देर कर दी, लेकिन मैं तुम्हें एक मौका और देना चाहती हूँ…।”

बात बीच में ही काटते हुए मेंढ़क चीखा, ”जाओ बाबा, जाओ, मुझे नहीं होना मुक्त। कम-से-कम मेरे बच्चे तो मेरी ऑंखों के सामने हैं। मेंढ़क ही सही, उन्हें देखकर ही संतोष कर लेता हूँ।”

तो इस प्रकार लोभ के वशीभूत होकर हमारे पूर्वज हमारे आसपास ही मँडराने का प्रयास करते हैं। अब यह हम पर निर्भर है कि हम उनके साथ कैसा व्यवहार करते हैं। यदि हमारे पूर्वज मच्छर बनकर मलेरिया या डेंगू फैलाएँगे तो जाहिर है, हम उन्हें मारना चाहेंगे, जीवाणु बनकर पोलियो फैलाएँगे तो मारे जाएँगे। लेकिन कैंसर फैलाने वाले जीवाणुरूपी हमारे पूर्वज अपने प्रियजन को तिल-तिलकर मारते हैं; शायद सास-बहू का पुराना वैर हो, और एक दिन अपने ही साथ ले जाते हैं। बुखार, जुकाम, पेचिस आदि जैसे रोगों के पूर्वजरूपी जीवाणु हमारे शरीर में प्रविष्ट होकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं और हमारे दवा लेने के साथ ही उनकी ‘मुक्ति’ हो जाती है तथा हम भी रोग-मुक्त हो जाते हैं।

चेचक जैसे ढीठ पूर्वज जीवाणु को हमने मुश्किल से मुक्ति दिलवाई। अब एड्स जैसा आतंकवादी जीवाणु सारी दुनिया के सामने सीना ताने खड़ा है। लगता है, इस जीवाणुरूपी पूर्वज को अतीत में हमने बड़े कष्ट दिए हैं, तभी इसकी मुक्ति के उपाय अब तक नहीं खोजे जा सके हैं। खैर, हमारे वैज्ञानिक रिसर्च में लगे हैं। इस पूर्वज जीवाणु को भी एक-न-एक दिन मुक्त होना होगा, ये अलग बात है कि तब तक ये धरती का काफी कुछ वज़न हल्का कर देगा।

जो भी व्यक्ति किसी बीमारी के कारण मरता है, संभवत: वह उसी बीमारी का जीवाणु बन जाता हो। कैंसर से मरने वाला कैंसर का जीवाणु, पोलियों से मरने वाला पोलियो का जीवाणु, एड्स से मरने वाला एड्स का जीवाणु आदि-आदि।

सभी जीवाणु हमारे दुश्मन हैं, यह भी पूरी तरह सच नहीं है। साँप के ज़हर से कैंसर जैसी घातक बीमारी की दवा बनाई जाती है। यहाँ देखने वाली बात यह है कि दोनों जीव हमारे दुश्मन हैं, लेकिन जहाँ एक जीव हमें बीमार कर रहा है, तो दूसरा स्वस्थ। इसी प्रकार, दही और पनीर बनाने में कई कीटाणु हमारी सहायता करते हैं। अनेक मादक पेय, खाद्य पदार्थ, औषधियाँ, प्रसाधन सामग्रियाँ आदि बनाने में कीटाणुओं का अहम योगदान होता है। रेशम का कीड़ा हमारे लिए कपड़ा बुनता है, मधुमक्खियाँ शहद बनाती हैं।

इस प्रकार, जहाँ एक ओर कुछ जीव-जंतु इस निकृष्ट योनि में भी पाप कर्मों में प्रवृत्ता रहते हैं, वहीं मधाुमक्खियों जैसे कुछ कीट निकृष्ट योनि पाकर भी परमार्थ करते हैं, परोपकार करते हैं। इस प्रकार जीवन-क्रम सतत् चलता रहता है।

इस क्रम में अगला नंबर हमारा तो नहीं? हम आज कैसे कर्म कर रहे हैं, यह इस बात पर निर्भर करेगा। जैसा कि मार्कण्डेय पुराण में कहा गया है कि लोभ के वशीभूत होकर ही मनुष्य विभिन्न निकृष्ट योनियों में जन्म लेता है। इसका निर्णय हम स्वयं करें कि हम कितने निर्लोभी हैं, कितने दूध के धुले हैं। फिर गणना करके अपने लिए योनि भी तय कर लें।

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2 Comments on "एड्स के जीवाणु हमारे पूर्वज तो नहीं"

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डॉ. राजेश कपूर
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महेश जी आप का लेख अछा है. कभी भारत के उस वर्ग का विश्लेषण भी करिए जिन्हें भारत और भारतीयों से गहन घृणा है और भारत की किसी विशेषता या क्षमता पर लेश मात्र भी विश्वास नहीं. नकारात्मक सोच के ऐसे मानसिक रोगियों को आप किस वर्ग में रख्नेगे. भारत के बिगड़े हालात को और अधिक बिगाड़ने के सबसे बड़े अपराधी ये लोग हैं जो देश की ऊर्जा को घुन की तरह समाप्त कर रहे हैं.

आर. सिंह
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अगर आपके ये विचार सही निकले तो हमारा जिस तरह का आचरण है उससे तो यही लगता है,यह जम्बू द्वीप यानी भात यानी इंडिया अगले सौ वर्षों के अंदर विभिन्न कीटाणुओं मात्र का एक देश बन कर रह जाएगा ,क्योंकि आज के भारतीय अपने कर्मों के फलस्वरूप उसी योनि के हकदार लगते है.

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